BJP ने छह महीने के अभियान के लिए संत रविदास की जन्मस्थली ही क्यों चुनी?

संत रविदास की जन्मस्थली सीर गोवर्धन से शुरू हो रहे BJP के छह महीने के अभियान के पीछे सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं बल्कि इस जगह के बढ़ते राजनीतिक महत्व और 2027 के चुनावी समीकरणों की भी बड़ी भूमिका है

Saint Ravidas
PM मोदी ने 2024 में सीर गोवर्धनपुर में संत रविदार की 25 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया था

वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर स्थित संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज की जन्मस्थली एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है. संत रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस बार आयोजन को केवल धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे छह महीने तक चलने वाले राष्ट्रीय स्तर के 'गुरु रविदास महाराज समरसता संकल्प अभियान' का आधार बनाया है.

गुरु पूर्णिमा से शुरू होकर अगले वर्ष माघी पूर्णिमा तक चलने वाले इस अभियान की शुरुआत संत रविदास की जन्मस्थली से होगी, जहां से 131 कलशों में भरी पवित्र मिट्टी पूरे देश के राज्यों, संगठनात्मक जोनों और जिलों तक पहुंचेगी.

BJP इसे सामाजिक समरसता और संत रविदास के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का अभियान बता रही है लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ भी उतने ही महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश और पंजाब, दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और दोनों ही राज्यों में अनुसूचित जाति समाज चुनावी परिणाम तय करने की क्षमता रखता है. ऐसे में सीर गोवर्धनपुर एक बार फिर केवल आस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का भी केंद्र बन गया है.

समरसता संदेश के साथ संगठन विस्तार

BJP की तैयारियां यह संकेत देती हैं कि पार्टी संत रविदास की जयंती को संगठन विस्तार और सामाजिक पहुंच के बड़े अभियान में बदलना चाहती है. लखनऊ स्थित विश्वेश्वरैया प्रेक्षागृह में 23 जुलाई को आयोजित प्रदेश स्तरीय कार्यशाला में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने अभियान का उद्घाटन करते हुए कहा कि संत रविदास का संदेश सामाजिक समरसता, समानता और मानवता का संदेश है, जिसे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना BJP की जिम्मेदारी है. प्रदेश महामंत्री (संगठन) धर्मपाल सिंह ने पूरे अभियान की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि 25 से 27 जुलाई तक सभी संगठनात्मक जिलों में कार्यशालाएं आयोजित होंगी. यह अभियान अगले वर्ष माघी पूर्णिमा तक विभिन्न चरणों में चलता रहेगा.

BJP अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लाल सिंह आर्य का कहना है कि BJP ने संत रविदास, डॉ. भीमराव आंबेडकर और भगवान बिरसा मुंडा के सम्मान को जन-आंदोलन का स्वरूप दिया है और यह अभियान उसी कड़ी का विस्तार है. उनके अनुसार यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक चेतना और समरसता का राष्ट्रीय अभियान है.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे अभियान को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखते. वाराणसी के राजनीतिक विश्लेषक उत्पल पाठक कहते हैं, “पिछले लगभग ढाई दशकों का इतिहास यह बताता है कि सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास की जन्मस्थली हर बड़े चुनाव से पहले राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख पड़ाव बन जाती है. विधानसभा या लोकसभा चुनाव आते ही प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और लगभग सभी प्रमुख दलों के शीर्ष नेता यहां मत्था टेकने पहुंचते हैं. चुनाव खत्म होने के बाद यहां राजनीतिक गतिविधियां अपेक्षाकृत कम हो जाती हैं. यही कारण है कि इस बार भी BJP की सक्रियता को 2027 के चुनावी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है.

क्यों बढ़ जाता है सीर गोवर्धनपुर का राजनीतिक महत्व

सीर गोवर्धनपुर का राजनीतिक महत्व साल 2008 के बाद तेजी से बढ़ा. तब पंजाब से आई स्वर्ण पालकी का तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अनावरण किया था. इसके बाद यह जन्मस्थली राष्ट्रीय राजनीति के मानचित्र पर स्थाई रूप से दर्ज हो गई. 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां पहुंचे. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने दोबारा दर्शन किए.

वर्ष 2021 में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव यहां पहुंचे. साल 2022 में जब उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव थे, तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा प्रमुख मायावती, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी, पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी तथा आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह भी यहां पहुंचे. इसके बाद 2023 में, जब लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं, केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी ने भी यहां मत्था टेका. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी ने भी इस स्थल के राष्ट्रीय राजनीतिक महत्व को और मजबूत किया.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन यात्राओं के समय पर गौर किया जाए तो एक साफ पैटर्न दिखाई देता है. 2008-09 में बीएसपी ने दलित सामाजिक आधार को मजबूत करने का संदेश दिया. 2016-17 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP ने गैर-जाटव दलित समाज और संत परंपरा के साथ अपने जुड़ाव को मजबूत करने की रणनीति अपनाई. 2019 में BJP ने लोकसभा चुनाव से पहले दलित समर्थन बनाए रखने का प्रयास किया. 2021-22 में समाजवादी पार्टी ने दलित समाज तक अपनी राजनीतिक पहुंच का संदेश देने के लिए इस स्थल को चुना, जबकि 2024 में आम आदमी पार्टी सहित विभिन्न दलों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. इससे यह साफ होता है कि संत रविदास की जन्मस्थली अब केवल धार्मिक महत्व का स्थान नहीं रही, बल्कि यह दलित राजनीति और सामाजिक प्रतिनिधित्व का राष्ट्रीय प्रतीक बन चुकी है.

रविदासिया समाज का व्यापक प्रभाव और 2027 का चुनावी गणित

इस राजनीतिक महत्व की सबसे बड़ी वजह संत रविदास का व्यापक सामाजिक प्रभाव है. उनका प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. रविदासिया समाज और अनुसूचित जाति समुदाय में उनकी गहरी स्वीकार्यता के कारण पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र तक उनकी जन्मस्थली का विशेष महत्व है.

हर वर्ष रविदास जयंती के अवसर पर सीर गोवर्धनपुर में लगने वाले मेले में हजारों श्रद्धालु इन राज्यों से पहुंचते हैं. स्थानीय लोग इसे 'मिनी पंजाब' भी कहते हैं क्योंकि यहां पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और अन्य राज्यों के अलग-अलग पंडाल लगते हैं, लेकिन सभी का उद्देश्य गुरु रविदास के प्रति श्रद्धा और सेवा ही होता है. अमृतवाणी की गूंज, विशाल लंगर और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ इस स्थान को राष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र का स्वरूप दे देती है.

यही व्यापक सामाजिक प्रभाव इस जन्मस्थली को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाता है. उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता लगभग हर क्षेत्र में चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं, जबकि पंजाब में अनुसूचित जाति आबादी देश में सबसे अधिक मानी जाती है. ऐसे में दोनों राज्यों में एक साथ विधानसभा चुनाव होने से पहले भाजपा का सीर गोवर्धनपुर से छह महीने का अभियान शुरू करना केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि BJP पिछले एक दशक से संत परंपरा, सामाजिक समरसता और गैर-जाटव दलित समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की लगातार कोशिश कर रही है. संत रविदास की 650वीं जयंती का यह अभियान उसी रणनीति का विस्तार दिखाई देता है. विपक्ष भी इस महत्व को भलीभांति समझता है. यही कारण है कि समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता भी समय-समय पर सीर गोवर्धनपुर पहुंचते रहे हैं.

उनके लिए भी यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं होती, बल्कि दलित समाज के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता का सार्वजनिक संदेश भी होती है. यही वजह है कि चुनावी वर्षों में यहां नेताओं की आवाजाही बढ़ जाती है और चुनाव खत्म होते ही राजनीतिक गतिविधियां सामान्य हो जाती हैं.

आस्था से आगे बढ़कर राष्ट्रीय प्रतीक बन चुकी है जन्मस्थली

सीर गोवर्धनपुर का इतिहास भी इसे विशिष्ट बनाता है. वर्ष 1964 में संत सरवण दास ने अपने शिष्य संत हरिदास को काशी भेजकर संत रविदास की जन्मस्थली की खोज करवाई. इसके बाद भक्तों ने यहां मंदिर की नींव रखी और समय के साथ इसका विस्तार होता गया. वर्ष 2008 में पंजाब से स्वर्ण पालकी आने के बाद यह मंदिर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया. इसके बाद यहां श्रद्धालुओं के सहयोग से लगातार विकास हुआ. मंदिर में आज स्वर्ण पालकी, स्वर्ण छत्र, स्वर्ण दीप, स्वर्ण कलश, स्वर्ण जड़ित बड़े और छोटे गुंबद, स्वर्ण जड़ित द्वार तथा रजत पालकी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं.

यह भी गौर करने वाली बात है कि मंदिर का अधिकांश विकास सरकारी अनुदान से नहीं बल्कि देश-विदेश के भक्तों के योगदान से हुआ है. BJP इस बार संत रविदास के 'बेगमपुरा' के दर्शन को सामाजिक समरसता के आधुनिक संदेश के रूप में प्रस्तुत कर रही है. पार्टी का कहना है कि संत रविदास ने जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज और समान अवसरों की कल्पना की थी. इसी विचार को समाज तक पहुंचाने के लिए समरसता संकल्प अभियान चलाया जा रहा है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी वर्ष से ठीक पहले इतने व्यापक और लंबे अभियान का राजनीतिक असर भी स्वाभाविक रूप से दिखाई देगा. छह महीने तक गांव-गांव, मंदिर-मंदिर और संत समाज के बीच सक्रिय रहने से BJP को संगठनात्मक स्तर पर भी लाभ मिल सकता है.

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