बिहार के मंत्री SC कोटे के भीतर उप-वर्गीकरण के लिए क्या दलीलें दे रहे?

बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन SC कोटे में उप-वर्गीकरण की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि कुछ दलित समुदायों ने आरक्षण का ज्यादा फायदा उठाया है जबकि मुसहर जैसे समुदाय पीछे छूट गए हैं

संतोष सुमन (फाइल फोटो)

बिहार सरकार में सूचना प्रौद्योगिकी और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री मंत्री संतोष कुमार सुमन ने एक अहम सवाल उठाया है. बिहार के जातिगत सर्वे ने जिस पुरानी हकीकत को आंकड़ों में सामने रखा है, उसके बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि आरक्षण का लाभ कतार में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक कैसे पहुंचे?

सुमन पूछते हैं कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक कैसे पहुंचे जिन्हें अब तक इससे सबसे कम फायदा मिला है? करीब आठ दशक पहले बी.आर. आंबेडकर ने जिस व्यवस्था की कल्पना की थी, वह सबसे वंचित समुदायों में से कुछ के लिए अब तक क्यों साकार नहीं हो पाई है?

सुमन अनुसूचित जाति के आरक्षण पर सवाल नहीं उठा रहे हैं. उनकी मांग है कि इसके दायरे को खोला जाए. उनका तर्क है कि उप-वर्गीकरण आरक्षण को खत्म करना नहीं बल्कि उसका ज्यादा न्यायपूर्ण बंटवारा है. यानी उसी आरक्षण के भीतर उन समुदायों के लिए हिस्सेदारी तय करना जिन्हें अब तक इसका सबसे कम लाभ मिला है. उनका कहना है कि इस तरह के पुनर्वितरण को आरक्षण खत्म करने के तौर पर पेश करके गरीबों को डराने की राजनीति बंद होनी चाहिए.

सुमन बार-बार बिहार के जातिगत सर्वे के आंकड़ों का हवाला देते हैं. बिहार में 13 करोड़ से ज्यादा लोगों की गिनती की गई. इनमें 20,49,370 लोग सरकारी नौकरियों में हैं यानी सिर्फ 1.57 फीसदी. सरकारी नौकरी पहले ही सीमित है. लेकिन अनुसूचित जातियों के भीतर भी इन नौकरियों तक पहुंच समान नहीं है.

दुसाध, जिन्हें धारी और धारही के नाम से भी दर्ज किया गया है, उनकी आबादी करीब 69.4 लाख है. यह राज्य की कुल आबादी का 5.31 फीसदी है. इनमें 99,830 लोग सरकारी सेवा में हैं, यानी 1.44 फीसदी. वहीं मोची, रविदास और चर्मकार समुदाय की आबादी 68,69,664 है. इनमें 82,250 लोग सरकारी नौकरियों में हैं, यानी 1.2 फीसदी.

अपने पिता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के साथ संतोष सुमन (फाइल फोटो)

इन दोनों समुदायों को मिलाकर बिहार की अनुसूचित जाति की आधी से ज्यादा आबादी होती है. जातिगत सर्वे में अनुसूचित जातियों की आबादी करीब 19.65 फीसदी बताई गई है. सरकारी नौकरियों में इन दोनों समुदायों की हिस्सेदारी राज्य के औसत के सबसे करीब है.

मुसहरों के आंकड़े बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं. सर्वे में मुसहरों की संख्या 40,35,787 बताई गई है. यह बिहार की आबादी का 3.08 फीसदी है. इनमें सरकारी नौकरी करने वालों की संख्या सिर्फ 10,615 है. यह दर 0.26 फीसदी है. यानी करीब 380 मुसहरों में सिर्फ एक के पास सरकारी नौकरी है. दुसाधों में यह आंकड़ा करीब 70 में एक है. पासवानों की सरकारी नौकरी की दर मुसहरों से पांच गुना से ज्यादा है जबकि रविदासों की दर चार गुना से भी ज्यादा है.

गरीबी की तस्वीर इसके ठीक उलट है. इसी रिपोर्ट के मुताबिक 54.56 फीसदी मुसहर परिवार गरीब हैं. इसके मुकाबले दुसाध परिवारों में गरीबी की दर 39.36 फीसदी और रविदासिया परिवारों में 42.06 फीसदी है. सर्वे जारी होने के बाद सामने आए आंकड़ों के मुताबिक मुसहरों की साक्षरता करीब 35 फीसदी है. ऐसे में शिक्षा की सीढ़ी पर सबसे नीचे बने एक समुदाय को लेकर सुमन का सवाल आंकड़ों पर आधारित है.

फिलहाल बिहार का अनुसूचित जाति कोटा सरकारी नौकरियों में 3.14 फीसदी प्रतिनिधित्व वाले धोबियों और सिर्फ 0.26 फीसदी प्रतिनिधित्व वाले मुसहरों के बीच कोई अंतर नहीं करता. सुमन का तर्क है कि इससे कोई समाधान नहीं निकलता. यह सिर्फ आरक्षण की कतार को अलग-अलग हिस्सों में बांटना है

सुमन की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) या HAM(S) के नेताओं का मानना है कि मुसहरों और भुइयां को एक ही सामाजिक समूह के रूप में देखा जाना चाहिए. बिहार का जातिगत सर्वे ऐसा नहीं करता. इसमें भुइयां को अलग से दर्ज किया गया है. उनकी आबादी करीब 11.7 लाख है. इनमें 3,514 लोग सरकारी नौकरी में हैं. यह दर 0.30 फीसदी है जो मुसहरों की दर से मामूली ही ज्यादा है. कुछ मुसहर खुद को भुइयां भी बताते हैं.

कोटे के भीतर कोटा के मुद्दे पर मांंझी पर सवाल उठा चुके हैं चिराग पासवान (फाइल फोटो)

दोनों समुदायों को मिलाकर उनकी आबादी 52 लाख से थोड़ी ज्यादा है. यह बिहार की आबादी का करीब 4 फीसदी और राज्य की अनुसूचित जातियों की आबादी का करीब पांचवां हिस्सा है. सरकारी नौकरियों में इनकी हिस्सेदारी एक फीसदी के एक-तिहाई से भी कम है.

सुमन का कहना है कि किसी तालिका में अलग-अलग नाम होने का मतलब यह नहीं है कि वंचित होने का अनुभव भी अलग है. उसी पन्ने पर दिए धोबी समुदाय के आंकड़े बताते हैं कि एक ही सूची के भीतर कितना अंतर छिपा रह सकता है. करीब 10.9 लाख आबादी वाले धोबियों के पास 34,372 सरकारी नौकरियां हैं. यह दर 3.14 फीसदी है, जो राज्य के औसत से करीब दोगुनी है. वहीं 12,88,031 आबादी वाले पासियों के पास 25,754 सरकारी नौकरियां हैं, यानी 2 फीसदी.

एक समान अनुसूचित जाति कोटा इन समुदायों और मुसहरों को इतिहास में एक जैसी सामाजिक और आर्थिक परेशानी झेलने वाला मानता है. इसी वजह से सुमन आरक्षण के बंटवारे में बदलाव चाहते हैं. वे 2024 की संविधान पीठ के उस फैसले का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया था कि राज्य अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण कर सकता है बशर्ते यह वर्गीकरण तर्कसंगत आधार और अनुभवजन्य आंकड़ों पर आधारित हो.

हरियाणा ने अपने 20 फीसदी अनुसूचित जाति कोटे को वंचित जातियों के लिए 10 फीसदी और अन्य के लिए 10 फीसदी में बांटा है. आंध्र प्रदेश ने अपने 15 फीसदी कोटे को 1, 6.5 और 7.5 फीसदी में बांटा है. तेलंगाना में 1, 9 और 5 फीसदी का बंटवारा किया गया है. कर्नाटक ने तीन समूहों के लिए 6, 6 और 5 फीसदी का बंटवारा कानून के जरिए किया, हालांकि यह कानून विवाद में है. तमिलनाडु में अरुंधतियारों (अनुसूचित जाति का एक समुदाय) के लिए आंतरिक आरक्षण है.

सुमन का तर्क है कि इनमें से किसी भी मामले में अनुसूचित जाति का कोटा खत्म नहीं किया गया. उसके भीतर हिस्सेदारी का पुनर्वितरण किया गया. अगर दूसरे राज्यों में ऐसा किया जा सकता है तो बिहार में ऐसा करना आरक्षण खत्म करना क्यों माना जाए?

सुमन कोई सामान्य नेता नहीं हैं. वे जीतन राम मांझी के बेटे हैं जो 2014-15 में बिहार के मुख्यमंत्री रहे और अब केंद्रीय मंत्रिमंडल में हैं. उनकी पार्टी HAM(S) का आधार महादलित श्रेणी में है. यह श्रेणी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2007 में बनाई थी. उस समय 22 अनुसूचित जाति समूहों में से 18 को दुसाधों से अलग करके इस श्रेणी में रखा गया था. मुसहर इस श्रेणी का सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं लेकिन इसमें सिर्फ वही शामिल नहीं हैं.

अगर सिर्फ एक जाति के लिए उप-कोटे की मांग की जाए तो यह पारिवारिक हित जैसी लगेगी. लेकिन अगर यह मांग सर्वे के आंकड़ों के आधार पर उन सभी जातियों के लिए की जाए, जिनकी सरकारी नौकरी और गरीबी की दर बेहतर प्रतिनिधित्व वाले समूहों से काफी अलग है, तो यह अनुसूचित जातियों की सूची में पीछे छूटे आधे हिस्से के हक की मांग बन जाती है.

यह मुसहरों से कहीं बड़ा समूह है. साथ ही यह उसी गठबंधन में मौजूद दूसरी दलित पार्टी से सीधे टकराता है. सुमन ने जो मुद्दा उठाया है, वह महत्वपूर्ण है और बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर भी इसने कुछ नेताओं को असहज किया है.

चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का मुख्य समर्थन आधार दुसाध समुदाय है. अगस्त में उन्होंने मांझी और सुमन से कहा था कि अगर वे अनुसूचित जातियों के भीतर क्रीमी लेयर चाहते हैं तो उन्हें अपने पद छोड़ देने चाहिए.

सुमन का जवाब है कि उप-कोटा और क्रीमी लेयर दो अलग-अलग चीजें हैं. क्रीमी लेयर बेहतर आर्थिक स्थिति वाले लोगों को बाहर करती है. वहीं उप-वर्गीकरण इस आधार पर जातियों को अलग करता है कि कौन कितना पीछे रह गया है. वे क्रीमी लेयर की मांग नहीं कर रहे हैं.

16 फीसदी के भीतर बंटवारे से राज्य में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी कम नहीं होती. इससे सिर्फ उस हिस्से में कमी आती है जिसे सूची में बेहतर प्रतिनिधित्व वाली जातियां अपना मानने लगी हैं.

सुमन ने अपने आलोचकों से जो आठ सवाल पूछे हैं, उनका मकसद इस विरोध को आंकड़ों का सामना करने से इनकार के तौर पर पेश करना है. अगर बिहार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को अलग-अलग श्रेणियों में बांट सकता है तो अनुसूचित जातियों के लिए यही प्रक्रिया गलत क्यों है? क्या आलोचक शिक्षा, आय और सरकारी नौकरियों के जातिवार आंकड़े सार्वजनिक करेंगे? अगर एक समुदाय दशकों तक एक समान कोटे के बावजूद मुश्किल से साक्षर हो पाया है तो इसका विकल्प क्या है?

सुमन उसी पुराने नारे को उन लोगों की ओर मोड़ते हैं जिन्होंने इसका इस्तेमाल किया है. "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी." सुमन पूछते हैं कि जब पिछड़े वर्ग के कोटे का विस्तार करने के लिए संख्या को सामाजिक न्याय का आधार माना गया तो अनुसूचित जातियों के भीतर संख्या गिनना सामाजिक न्याय पर हमला क्यों बन जाता है?

जातिगत सर्वे पहले ही यह गिनती कर चुका है. दुसाध और रविदास मिलकर बिहार की आबादी के 10 फीसदी से कुछ ज्यादा हैं और उनके पास करीब 1.82 लाख सरकारी नौकरियां हैं. वहीं मुसहर और भुइयां बिहार की करीब 4 फीसदी आबादी हैं और उनके पास लगभग 14,000 सरकारी नौकरियां हैं.

ये आंकड़े एक गंभीर सवाल खड़ा करते हैं. जब एक ही आरक्षण से उन समुदायों के बीच इतने असमान नतीजे सामने आ रहे हैं, जिनके लाभ के लिए इसे बनाया गया था, तो शायद अब जरूरत इस बात की है कि इसका लाभ उन लोगों तक भी पहुंचे, जिन्हें अब तक इसका सबसे कम फायदा मिला है.

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