क्या अब इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार की पूछ-परख फिर बढ़ने वाली है?

बिहार की राजधानी पटना से शुरू हुई 'इंडिया' गठबंधन की राजनीति पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद एक बार फिर घूम-फिरकर वहीं पहुंच गई लगती है

6 दिसंबर को होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक स्थगित की गई है
6 दिसंबर को होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक स्थगित की गई है

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न सिर्फ कांग्रेस को झटका दिया है बल्कि इंडिया गठबंधन में भी उसकी स्थिति कमजोर की है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब 6 दिसंबर को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की बैठक को स्थगित करना पड़ा.

इसकी वजह बताई गई कि बैठक से बिहार, झारखंड और बंगाल जैसे तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों और यूपी के बड़े राजनीतिक दल सपा के प्रमुख के गैरहाजिर हो सकते हैं. नीतीश कुमार की तरफ से तबीयत खराब होने की बात कही गई है.

दूसरी तरफ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो साफ-साफ कह दिया कि उन्हें आमंत्रण ही नहीं मिला था. इसके बाद ऐसा लग रहा है कि इंडिया गठबंधन की राजनीति फिर से घूम-फिर कर वहीं पहुंच गई है, जहां से वह बिहार की राजधानी पटना से शुरू हुई थी.

इस मुद्दे पर इंडिया टुडे से बात करते हुए जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं, "इन नतीजों से यह साबित हुआ है कि विपक्ष की राजनीति में भी बिहार मॉडल ही चलेगा. जिस तरह हमनें सभी दलों को साथ लेकर बिहार में एनडीए को मात दी, राष्ट्रीय स्तर पर भी यही मॉडल अपनाना होगा. कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव अकेले लड़कर गलती की और उसे इंडिया गठबंधन के सभी दलों को साथ लेकर यह चुनाव लड़ना चाहिए था. भले आप सीट नहीं देते, मगर चुनाव प्रचार अभियान में उन्हें हमारे नेता नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव जैसे कद्दावर नेताओं को भी बुलाना चाहिए था."

चुनावी नतीजे आने के बाद बिहार में जदयू के कई बड़े नेता मुखर होकर इस तरह की बातें कर रहे हैं. नीरज कुमार के अलावा विजय कुमार चौधरी और अशोक चौधरी जैसे बड़े जदयू नेताओं ने भी कांग्रेस को इस तरह की सलाह दे डाली है. जानकारों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि कांग्रेस को इन चुनावों में बड़ी उम्मीदें थीं और उसने इस वजह से इंडिया गठबंधन के कई फैसलों को होल्ड पर रखा था.

इन फैसलों में इंडिया गठबंधन के संयोजक के पद पर मनोनयन और सीटों की शेयरिंग जैसे सवाल थे. कांग्रेस चाहती थी कि नतीजों के बाद ये फैसले हों. जदयू नेता अशोक कुमार चौधरी साफ-साफ कहते हैं, "कांग्रेस ने सोचा था कि नतीजों के बाद ये फैसले होंगे तो उनकी पार्टी मोलभाव करने में मजबूत स्थिति में होगी. अब मंथन का समय है."

नीतीश कुमार खुद समय-समय पर इस तरह के कांग्रेस के बर्ताव पर कभी परोक्ष तो कभी प्रत्यक्ष रूप से नाराजगी जाहिर करते रहे हैं. अगस्त, 2022 में भाजपा से अलग होने के बाद से नीतीश कुमार केंद्रीय राजनीति में एक बड़ा विपक्षी विकल्प खड़ा करने की मंशा से काम करते रहे हैं. महागठबंधन की सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने इसके लिए अभियान शुरू कर दिया था. मगर कांग्रेस की तरफ से लगातार सुस्ती रही.

पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की वजह से काम अटका रहा. जून, 2023 में काफी मशक्कत के बाद विपक्षी दलों की साझा बैठक हुई भी तो उसमें कांग्रेस कोई भी बड़ा फैसला करने से बचती रही. उसके बाद भी जो बैठकें हुईं, उसमें सीटों की साझेदारी और संयोजक के पद जैसे कई फैसले अटके रहे. सूत्र बताते हैं कि नीतीश इस परियोजना के लिए इंडिया गठबंधन के संयोजक का पद चाहते थे. मगर मुंबई की बैठक के बाद जब इस पर फैसला नहीं हुआ तो वे इस गठबंधन को लेकर अनिच्छुक नजर आने लगे. मगर अब विधानसभा नतीजे आने के बाद माना जा रहा है कि कांग्रेस की स्थिति थोड़ी कमजोर हुई है और वह क्षेत्रीय दलों के दबाव में झुक सकती है.

इधर जदयू में फिर से नीतीश को लेकर चर्चाएं होने लगी हैं. अशोक चौधरी ने सीधे तो नहीं कहा कि नीतीश पीएम कैंडिडेट हो सकते हैं, मगर उन्होंने कहा कि नीतीश में पीएम बनने के तमाम गुण हैं. नीरज कुमार कहते हैं, "कौन पीएम बनेगा यह बड़ा सवाल नहीं है. बड़ी बात यह है कि अब कांग्रेस के रुख में बदलाव आ रहा है और वह क्षेत्रीय दलों के मुद्दों को ठीक से समझेगी."

जदयू नेता विजय कुमार चौधरी कहते हैं, "कांग्रेस को बड़े दल के नेता होने की वजह से और अधिक उदार होना होगा और सामंजस्य बनाकर चलना होगा. जहां क्षेत्रीय दल मजबूत होंगे वहां उसे उसके लिए जगह बनानी होगी." दिलचस्प है कि जहां एक तरफ राजद इस पूरे मसले पर चुप्पी अख्तियार किए हुए है, वहीं भाजपा ने कहना शुरू कर दिया है कि इंडिया गठबंधन के सभी दल एकजुट हो जाते तो भी इन चुनावों में जीत नहीं मिलती. वे कहते हैं, "जदयू, राजद, सपा इस भ्रम में बिल्कुल न रहें कि वे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणाम पर कोई असर डाल पाते. कांग्रेस यदि इनको साथ लेती तो उसकी स्थिति और खराब होती. कांग्रेस ने तीन हिंदी प्रदेशों में बोझ बनने वाले दलों से दूरी बना कर बुद्धिमानी ही की."

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