शिकायतें सुनने का नया सिस्टम बिहार में छात्र आंदोलन रोक पाएगा?
बिहार सरकार ने छात्रों की शिकायतों के लिए तय की 30 दिन की समय सीमा. मामला नहीं सुलझा तो जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगी

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (फाइल फोटो)
अगस्त की 17 तारीख को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार के नए छात्र शिकायत पोर्टल की घोषणा की है. इसकी सबसे अहम बात शायद 'विद्यार्थी सहयोग पोर्टल' खुद नहीं है, बल्कि इसका समय है.
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं के नेतृत्व में हुआ आंदोलन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ. वहीं पड़ोसी राज्य झारखंड में भर्ती में गड़बड़ियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर नौकरी के इच्छुक युवाओं का आंदोलन चौथे सप्ताह में पहुंच गया है.
ऐसे समय में बिहार ने छात्रों के बढ़ते असंतोष से पहले ही निपटने की कोशिश की है. इसके लिए समयबद्ध शिकायत निवारण का वादा किया गया है.
चौधरी ने विद्यार्थी सहयोग पोर्टल शुरू किया है. यह एकल-खिड़की व्यवस्था है, जिसके जरिए छात्र शैक्षणिक समस्याओं, छात्रावास की सुविधाओं और शिक्षा से जुड़े दूसरे मुद्दों की शिकायत कर सकते हैं. वे ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं या टोल-फ्री नंबर पर फोन कर सकते हैं. सरकार का कहना है कि उनकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी.
लेकिन शिकायत दर्ज होने के बाद क्या होता है, यह ज्यादा दिलचस्प है. सरकार ने 30 दिनों के भीतर शिकायत का समाधान करने का वादा किया है. इसकी लिखित सूचना छात्र को दी जाएगी. अगर 10 दिनों के भीतर कार्रवाई शुरू नहीं होती है तो 11वें दिन मुख्यमंत्री कार्यालय से अपने आप नोटिस जारी हो जाएगा.
इसके बाद 20वें और 25वें दिन भी नोटिस जारी किए जाएंगे. 30 दिनों के बाद भी मामला हल नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है.
भारतीय सरकारी तंत्र की लालफीताशाही को देखते हुए, जहां कोई शिकायत महीनों तक एक मेज से दूसरी मेज तक घूमती रहती है और आखिर में प्रशासनिक शून्य में गायब हो जाती है, बिहार का यह वादा खासा अहम है. राज्य ने खुद के लिए समय सीमा तय कर दी है.
यही वजह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह पोर्टल महत्वपूर्ण है. दिल्ली और रांची की घटनाओं ने दिखाया है कि छात्र अब जरूरी नहीं कि व्यवस्था के खुद-ब-खुद ठीक हो जाने का इंतजार करें.
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के बाद प्रधान के इस्तीफे के अलावा प्रदर्शनकारियों की मांगों पर सरकार को कई आश्वासन भी देने पड़े. इनमें उनके खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने का आश्वासन भी शामिल था.
झारखंड में बार-बार बातचीत के दौर और हेमंत सोरेन सरकार की हाल में भर्ती की कई परीक्षाएं रद्द करने के फैसले के बावजूद आंदोलन जारी है.
दोनों आंदोलन एक जैसे नहीं हैं और बिहार के पोर्टल को सीधे तौर पर इनमें से किसी एक की प्रतिक्रिया के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए. बिहार में पहले से ही छात्र सहायता शिविरों की व्यवस्था थी.
नया पोर्टल इसी व्यवस्था को औपचारिक रूप देता है और उसका विस्तार करता है. फिर भी जिस राजनीतिक माहौल में इसे शुरू किया गया है, उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.
पूरे भारत में सरकारें पिछले कुछ हफ्तों से युवा शक्ति की बात कर रही हैं. लेकिन अब स्थिति यह है कि युवाओं ने दिखा दिया है कि वे इस भाषा को पलटकर यह पूछ सकते हैं कि जब वे खुद बोल रहे हों तो क्या सरकार उनकी बात सुनने के लिए तैयार है.
सम्राट चौधरी का जवाब इसलिए खास तौर पर प्रशासनिक नजर आता है. युवा भारत की ऊर्जा पर एक और भाषण देने के बजाय बिहार शिकायत नंबर, शिकायत पोर्टल और कार्रवाई की समय सीमा दे रहा है.
योजना का जमीनी रूप भी उतना ही महत्वपूर्ण है. 25 अगस्त से राज्य के स्कूलों और छात्रावासों में विद्यार्थी सहयोग अभियान शुरू होगा. हर महीने के चौथे मंगलवार को शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थी सहयोग शिविर लगाए जाएंगे. यहां छात्र सीधे अपनी समस्याएं रख सकेंगे और सुझाव दे सकेंगे.
इस तरीके के पीछे एक तर्क है. सबसे सरल रूप में देखें तो विरोध प्रदर्शन सुने जाने की मांग है. शिकायत व्यवस्था उस सुनवाई को संस्थागत रूप देने की कोशिश करती है ताकि शिकायत आंदोलन न बन जाए. इस लिहाज से पोर्टल तकनीक से कम और राजनीतिक समय को समझने की कोशिश ज्यादा है. यह व्यवस्था में एक दबाव-निकासी रास्ता बनाने की कोशिश है.
राज्य इस पहल का दायरा बढ़ाने की भी कोशिश कर रहा है. चौधरी ने 211 नए डिग्री कॉलेज खोलने, 342 बीएड कॉलेजों में डिग्री पाठ्यक्रमों का विस्तार करने और उच्च शिक्षा को अधिक सस्ता बनाने की कोशिशों की बात की है.
उनके मुताबिक, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना के तहत करीब 18,000 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता दी गई है. सरकार 551 स्थानों पर आधुनिक मॉडल स्कूल विकसित कर रही है. साथ ही मोबाइल फोन और लैपटॉप के जरिए घर पर पढ़ने वाले छात्रों को देर रात तक लाइव शिक्षक सहायता देने की दिशा में भी काम किया जा रहा है.
यहां एक परिचित राजनीतिक प्रलोभन भी है. शिक्षा से जुड़ी हर घोषणा को बदलाव के बड़े वादे के साथ जोड़ देना. लेकिन शिकायत पोर्टल इससे अलग है.
नया कॉलेज एक कामकाजी संस्थान बनने में वर्षों ले सकता है. वहीं छात्रावास, छात्रवृत्ति, परीक्षा या शैक्षणिक सेवा से जुड़ी छात्र की शिकायत आज की समस्या है. सरकार का वादा है कि वह शिकायत को सिर्फ दर्ज नहीं करेगी, बल्कि उसका जवाब भी देगी.
यह वादा छात्रों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि शिक्षा से जुड़ी शिकायतों में अक्सर शक्ति का असंतुलन होता है. जो छात्र रहने, मूल्यांकन या प्रमाणपत्र के लिए किसी संस्थान पर निर्भर है, वह उसी संस्थान के खिलाफ शिकायत करने से हिचक सकता है. इसलिए गोपनीयता सिर्फ तकनीकी गारंटी नहीं है. यह इस योजना की राजनीतिक संरचना का भी हिस्सा है.
हालांकि यह व्यवस्था नौकरशाही की हकीकत का सामना करने के बाद भी टिकेगी या नहीं, यह अलग सवाल है. अधिक जवाबदेह और पारदर्शी शिक्षा व्यवस्था के सरकार के बड़े-बड़े वादों के बावजूद बिहार का अपना रिकॉर्ड सावधान रहने की वजह देता है.
राज्य पुलिस को अक्सर प्रदर्शनों से निपटने में बल प्रयोग के लिए आलोचना झेलनी पड़ी है. वहीं प्रतियोगी परीक्षाएं बार-बार पेपर लीक, गड़बड़ियों और प्रशासनिक चूकों के आरोपों से घिरी रही हैं.
भर्ती से जुड़े मामलों में आरोप साबित करा पाने में भी राज्य का रिकॉर्ड चिंताजनक रहा है. इससे छात्रों में यह धारणा बनती है कि गलत काम सामने आने के बाद भी जवाबदेही तय होने में बहुत समय लग सकता है.
इसलिए नए पोर्टल की विश्वसनीयता उसकी शुरुआत के समय कही गई बातों से कम और इस बात से तय होगी कि प्रशासन वास्तव में शिकायतों पर कार्रवाई करता है या नहीं और अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है या नहीं.
एक पोर्टल 10 लाख शिकायतें दर्ज कर सकता है. लेकिन वह अपने आप किसी लापरवाह अधिकारी को जिम्मेदार, किसी शिक्षक को सक्षम, किसी परीक्षा को सुरक्षित या किसी विश्वविद्यालय को जवाबदेह नहीं बना सकता.
बिहार की 30 दिन की समय सीमा आखिरकार भारतीय प्रशासन की सबसे पुरानी समस्या से टकरा सकती है. यह समस्या वादा करने के अधिकार और उसे पूरा करने की क्षमता के बीच की दूरी है.
अगर शिकायतों को अपने आप ऊपर भेजने की व्यवस्था हो लेकिन उनका समाधान धीमी गति से हो, तो यह असंतोष को दर्ज करने का सिर्फ एक ज्यादा व्यवस्थित तरीका बनकर रह सकती है.
यहीं बिहार की पहल युवाओं के असंतोष की बड़ी राजनीति से जुड़ती है. रांची में सरकार ने उन छात्रों से बातचीत में कई हफ्ते लगा दिए हैं, जिन्हें अब केवल आश्वासनों पर भरोसा नहीं रहा. गिरफ्तारियों, पुलिस कार्रवाई, भूख हड़ताल और बातचीत के कई दौर के बावजूद प्रदर्शन जारी रहे हैं.
दूसरे राज्यों की सरकारों के लिए सबक असहज करने वाला है. जब अविश्वास सामूहिक हो जाता है तो एक और समिति या आश्वासन सिर्फ विवाद को लंबा खींच सकता है.
बिहार इस प्रक्रिया में उससे पहले दखल करने की कोशिश कर रहा है. विचार यह है कि शिकायत को आंदोलन बनने का इंतजार न किया जाए. यह अंतर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
यह पहल युवाओं की बेरोजगारी का समाधान नहीं है. इससे भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता बहाल नहीं होती. यह अपने आप शिक्षण की गुणवत्ता में बदलाव नहीं लाएगी और न ही बिहार के कॉलेजों को दूसरे राज्यों के कॉलेजों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी बनाएगी. लेकिन यह प्रशासन की सोच में एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर दिखाती है. शिकायत आंदोलन बनने से पहले जवाब देना.
इसलिए योजना की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितनी शिकायतें दर्ज हुईं. असली सवाल यह होगा कि क्या छात्रों को लगने लगता है कि शिकायत दर्ज करना सार्थक है. यही असली राजनीतिक परीक्षा हो सकती है.
दिल्ली और रांची के बाद सरकारों को यह याद दिलाया गया है कि युवा अब केवल देश का भविष्य कहे जाने से संतुष्ट नहीं हैं. वे जानना चाहते हैं कि उनके वर्तमान के लिए क्या किया जा रहा है.
फिलहाल बिहार का जवाब एक पोर्टल, एक हेल्पलाइन, एक मासिक शिविर और 30 दिनों की समय सीमा है. बड़ा सवाल यह है कि क्या यह प्रशासनिक वादा अगली शिकायत को अगला आंदोलन बनने से रोक पाएगा.