नेपाल की बाढ़ से बिहार पहुंचीं 'अनजान' मछलियां! सरकार ने क्यों दी चेतावनी?

बिहार के कुछ हिस्सों में नेपाल की तरफ से बाढ़ के पानी के साथ अनजान और असामान्य रूप से बड़ी मछलियां पहुंची हैं. इन्हें खाने के बाद लोगों के बीमार पड़ने की खबरें भी सामने आई हैं

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अनजान किस्म की मछलियां खासकर गंडक क्षेत्र में देखी गई हैं (सांकेतिक तस्वीर)

यह जुलाई 2004 की बात है जब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री हुआ करते थे. एक दिन वे हाथ में गमछा लेकर पत्रकारों से भरे एक कमरे के सामने खड़े हुए और बिहार की बाढ़ को देखने का एक अलग नजरिया पेश किया. 

उन्होंने कहा कि बढ़ता पानी पूरी तरह आपदा नहीं है. बाढ़ गरीबों को उन तालाबों की मछलियां खाने का मौका देती है जो आमतौर पर अमीरों के मालिकाना हक में होते हैं. ये ऐसी दुर्लभ और स्वादिष्ट मछलियां हैं जिन्हें गरीब सूखे के मौसम में खाने का सपना भी नहीं देख सकते.

यह लालू की खास शैली वाली टिप्पणी थी. इसमें मजाक था, वर्ग की राजनीति थी और आपदा को इस सवाल से जोड़ने का तरीका था कि बिहार के संसाधनों पर किसका अधिकार है. 22 साल बाद BJP के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने इसके ठीक उलट सलाह दी है: बाढ़ के पानी के साथ आई मछलियां न खाएं.

31 अगस्त को बिहार के डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग ने एक निर्देश जारी किया. इसमें लोगों को नेपाल से आए बाढ़ के पानी के साथ बिहार के कुछ हिस्सों में पहुंची अज्ञात और असामान्य मछलियों को खाने, खरीदने या बेचने से बचने की चेतावनी दी गई. 

यह चेतावनी ऐसी मछलियां खाने के बाद लोगों के बीमार पड़ने की खबरों के बाद जारी की गई. सरकार ने लोगों से ऐसी असामान्य मछलियां मिलने पर जिला मत्स्य पदाधिकारी या स्थानीय प्रशासन को सूचना देने को भी कहा.

लालू की 2004 की मछली वाली कहानी के साथ यह तुलना लगभग बिल्कुल सटीक बैठती है. तब बाढ़ कुछ समय के लिए सामाजिक अंतर मिटा देती थी. पानी निजी तालाबों की सीमाएं तोड़ देता था और किसी और की मछलियां अचानक जाल लेकर आने वाले हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध हो जाती थीं. 

2026 में राज्य लोगों से ठीक इसी प्रवृत्ति का विरोध करने को कह रहा है. यानी बाढ़ के पानी में दिखने वाली अनजान मछली को अचानक मिला फायदा नहीं, बल्कि संभावित स्वास्थ्य खतरा समझने को कहा जा रहा है.

गंडक में पकड़ी गई अनजान किस्म की एक बड़ी मछली

इसकी वजह बेहद सामान्य है. बाढ़ का पानी अपने साथ लगभग हर चीज बहाकर ले जाता है. मछलियां तालाबों, नदियों, झीलों और जलाशयों से निकलकर अपने प्राकृतिक क्षेत्र से बहुत दूर तक पहुंच सकती हैं. 

इस दौरान वे नालों से होकर गुजर सकती हैं, मरे हुए जानवरों और सड़ते पदार्थों के संपर्क में आ सकती हैं और दूसरी गंदगी के संपर्क में भी आ सकती हैं. बिहार सरकार के मुताबिक ऐसे संपर्क से बैक्टीरिया, वायरस और फंगस से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मछली भोजन, कारोबार और आजीविका का हिस्सा है.

निर्देश में साफ तौर पर कहा गया है कि लोग अनजान या असामान्य दिखने वाली मछलियों को न खाएं. बाढ़ के पानी से पकड़ी गई ऐसी मछलियों को खरीदने या बेचने से भी बचने को कहा गया है. 

सरकार ने लोगों से यह भी कहा है कि कोई अनजान मछली सिर्फ इसलिए खाने योग्य नहीं हो जाती क्योंकि वह आम तौर पर खाई जाने वाली किसी मछली जैसी दिखती है. ऐसी मछली खाने के बाद किसी व्यक्ति को उल्टी, दस्त, पेट दर्द, चक्कर या कोई अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दे तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करने की सलाह दी गई है.

यह चेतावनी मुख्य रूप से गंडक क्षेत्र में केंद्रित है. खासकर पश्चिम चंपारण और गोपालगंज में, जहां नेपाल से आया बाढ़ का पानी नदी तंत्र में पहुंचा और निचले इलाकों में भर गया. 

वाल्मीकिनगर, बगहा और गोपालगंज के कुछ हिस्सों में असामान्य रूप से बड़ी मछलियां मिलने की खबरें हैं. ये मछलियां अपने आप में लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई हैं. लोग यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर उनके जाल में किस तरह की मछली आ गई है और इसकी तस्वीरें और वीडियो प्रसारित हो रहे हैं.

भारत, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में तेज बहाव वाली नदियों में मीठे पानी की कई बड़ी प्रजातियां पाई जाती हैं. बिहार सरकार ने नेपाल में आई बाढ़ को भी इसकी वजहों में शामिल किया है. 

अगस्त के आखिर में नेपाल में भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ के कारण बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बिहार में पहुंचा. दोनों देशों को एक तरह से सीधे जोड़ने वाली गंडक नदी व्यवस्था इस पानी को मैदानी इलाकों तक ले आई. 

बिहार की बाढ़ की समस्या की भौगोलिक स्थिति हमेशा से कुछ ऐसी रही है कि नेपाल में होने वाली घटना चंपारण या गोपालगंज में संकट का रूप ले सकती है. और जब नदी लोगों की जिंदगी में दाखिल होती है तो खाने-पीने से जुड़े नियम भी बदल जाते हैं.

एक मछुआरे को बाढ़ का दूषित पानी दिखाई देना जरूरी नहीं है. उसे शायद इतनी बड़ी मछली दिखती है जो उसकी दिन भर की पकड़ को फायदे का सौदा बना सकती है. जिस परिवार की फसल, पशुधन या आमदनी बाढ़ में बर्बाद हो गई हो, उसके लिए यह भोजन हो सकता है.

किसी कारोबारी के लिए यह ऐसी अनोखी चीज हो सकती है जिसके लिए ग्राहक पैसे देने को तैयार हों. यही वजह है कि जन स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी सलाह को लागू करना कागज पर दिखने से कहीं ज्यादा मुश्किल होता है.

सरकार ने सभी मछलियों को लेकर व्यापक चेतावनी जारी नहीं की है और यह एक सही कदम है. फर्क जानी-पहचानी और अनजान मछलियों के बीच किया गया है. यानी आम तौर पर उपलब्ध मछलियों और बाढ़ के पानी में बहकर अचानक सामने आई ऐसी मछलियों के बीच, जिनकी पहचान नहीं हो पाई है. 

बिहार में बाढ़ के दौरान अक्सर मछलियों की प्रचुरता हो जाती है (सांकेतिक फोटो)

यह ज्यादा वाजिब चेतावनी है. मछली बाजार लोगों की आजीविका से जुड़ा है. सभी मछलियों को लेकर डर पैदा करने से लोगों को नुकसान हो सकता है. लेकिन इसका उलटा भी सही नहीं है. सिर्फ इसलिए कि स्थानीय खान-पान में मछली आम तौर पर शामिल है, नदी जो कुछ दे रही है उसे सुरक्षित मान लेना बाढ़ को जन स्वास्थ्य के एक नए संकट में बदल सकता है.

यहीं लालू का किस्सा महज ऐतिहासिक मजाक से आगे निकल जाता है. उनकी 2004 की टिप्पणी इसलिए असरदार थी क्योंकि उसमें सामाजिक सच्चाई की एक झलक थी. बिहार की बाढ़ हमेशा से संपत्ति की सामान्य सीमाओं को उलटती रही है. 

मछलियां निजी तालाबों से निकल जाती थीं और गरीबों को कुछ समय के लिए ऐसी चीज मिल जाती थी, जो आम तौर पर अमीरों के पास होती थी. लालू ने इसे इस तरह पेश किया कि बाढ़ कुछ समय के लिए अमीरों के तालाब की मछलियां सबके लिए उपलब्ध करा देती थी.

2026 का निर्देश इस रोमांटिक नजरिए को खारिज करता है. बाढ़ कोई दावत नहीं है. यह पर्यावरण में बड़े पैमाने पर बदलाव लाने वाली घटना है. मछली किसी पूरी तरह स्वस्थ नदी से आई हो सकती है. 

लेकिन यह भी संभव है कि वह सीवेज, जानवरों के अपशिष्ट या सड़ते पदार्थों से दूषित पानी से होकर आई हो. मछली का असामान्य आकार उसे किसी जिज्ञासु खरीदार के लिए ज्यादा मूल्यवान बना सकता है लेकिन इससे वह सुरक्षित नहीं हो जाती.

सरकार की सूचना में अफवाहों से बचने की अपील भी एक अहम पहलू है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन मछलियों की चर्चा अब मत्स्य विभाग तक सीमित नहीं रह गई है. बड़ी मछलियों की तस्वीरें और वीडियो लोगों को उनके बारे में तरह-तरह के अनुमान लगाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. 

सोशल मीडिया किसी अनजान जीव को राक्षस, अपशकुन, विदेशी प्रजाति या किसी सनसनीखेज कहानी से जुड़ा जीव बना सकता है. मछली जितनी बड़ी होती है, अफवाह उतनी ही तेजी से फैलती है. इसलिए सरकार की सलाह साफ है : अनुमान लगाकर इसे न खाएं, बल्कि इसकी सूचना दें.

बिहार पीढ़ियों से बाढ़ के साथ जीता आया है और यहां की राजनीतिक संस्कृति ने बाढ़ से बचने के लिए एक पूरी शब्दावली विकसित कर ली है- तटबंध, नावें, राहत शिविर, मुआवजा, दियारा की जमीन और कभी-कभी मछलियों को लेकर लालू के मजाक. 

लेकिन बाढ़ के हालात बदल रहे हैं और उनके साथ उन पुराने तौर-तरीकों का संदर्भ भी बदल रहा है. उफनती नदी से आई मछली असाधारण जगह पर पहुंची कोई बिल्कुल सामान्य प्रजाति हो सकती है. अनिश्चितता जरूरी नहीं कि मछली को लेकर ही हो बल्कि उस सफर को लेकर हो सकती है जो उसने तय किया है.

इसीलिए 2026 की यह चेतावनी लालू के 2004 के ‘दावत’ वाले बयान के संदर्भ में खास लगती है. तब संदेश था: बाढ़ ऐसी चीज लेकर आई है, जिसे गरीब आम तौर पर खरीद नहीं सकते. 

अब संदेश है: बाढ़ ऐसी चीज लेकर आई है, जिसकी सुरक्षित पहचान आप नहीं कर सकते. बिहार के गरीब आज भी बाढ़ के बीच खड़े हैं. मछलियां आज भी आ रही हैं. लेकिन इस बार सरकार लोगों से कह रही है कि पानी जो कुछ बहाकर लाया है उसमें से कुछ चीजों को वहीं छोड़ दें, जहां वे मिली हैं.

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