निर्दलीय विधान परिषद सदस्यों की BJP से करीबी ने बढ़ाई JDU की बेचैनी
JDU उम्मीदवारों को हराने वाले दो निर्दलीय MLC के साथ BJP के सार्वजनिक जुड़ाव ने बिहार में दोनों पार्टियों के गठबंधन की मर्यादा, भरोसे और सत्ता में हिस्सेदारी के संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं

BJP हाल ही में चुने गए दो निर्दलीय MLC के साथ जिस तरह पेश आई, उससे सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) असहज हो गई है. 23 अक्टूबर को बिहार विधान परिषद के चुनाव में JDU उम्मीदवारों को हराने वाले बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज 31 अक्टूबर को BJP के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में भगवा गमछा पहने नजर आए.
इन तस्वीरों के बाद उनके राजनीतिक जुड़ाव को लेकर अटकलें शुरू हो गईं. इसके बाद BJP ने सफाई दी कि दोनों ने सिर्फ पार्टी को समर्थन दिया है, वे औपचारिक रूप से BJP में शामिल नहीं हुए हैं.
हालांकि इस सफाई से राजनीतिक बेचैनी कम नहीं हुई. दोनों ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था और बिहार में BJP के प्रमुख सहयोगी JDU के उम्मीदवारों को हराया था. ऐसे में BJP के साथ उनके सार्वजनिक जुड़ाव ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है. क्या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का कोई घटक दल उन उम्मीदवारों के साथ राजनीतिक रिश्ते बढ़ा सकता है जिन्होंने उसके ही सहयोगी दल को हराया हो?
विधान परिषद की आठ सीटों के नतीजों ने सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर राजनीतिक चर्चा की दिशा बदल दी है. BJP और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने दो-दो सीटें जीतीं, जबकि JDU और जन सुराज पार्टी को एक-एक सीट मिली. दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की.
BJP ने तिरहुत शिक्षक और कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीटें बरकरार रखीं जबकि JDU ने पटना स्नातक सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा. RJD ने पटना शिक्षक और दरभंगा स्नातक सीटें जीतीं. वहीं, जन सुराज को दरभंगा शिक्षक सीट पर जीत मिली. निर्दलीय उम्मीदवारों ने तिरहुत स्नातक और सारण शिक्षक सीटों पर जीत दर्ज की.
JDU के लिए तिरहुत स्नातक और सारण शिक्षक सीटों पर हार खास तौर पर निराशाजनक रही. तिरहुत स्नातक सीट पर ब्रजवासी ने JDU के अभिषेक झा को 9,000 से ज्यादा वोटों से हराया. उन्होंने लगातार दूसरी बार यह सीट जीती.
सारण शिक्षक सीट पर राहुल राज ने JDU उम्मीदवार आनंद पुष्कर को 1,800 से अधिक वोटों से शिकस्त दी. राहुल राज पहले BJP से जुड़े थे. लेकिन जब यह सीट JDU के खाते में गई तो उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. इसके बाद BJP ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था.
JDU की नाराजगी उसके प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा के सार्वजनिक बयान में भी दिखी. इस पूरे घटनाक्रम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "NDA की पहचान उसके घटक दलों के बीच एकता है. सभी घटक दलों को इस पर नजर रखनी चाहिए."
कुशवाहा ने BJP से सीधे टकराव से परहेज किया लेकिन उनके बयान से JDU की नाराजगी साफ झलकी. गठबंधन में एकता बनाए रखने की अपील और सभी घटक दलों को सतर्क रहने की नसीहत के पीछे उसकी असहजता थी.
मुद्दा सिर्फ यह नहीं था कि दो निर्दलीय उम्मीदवारों ने BJP को समर्थन दिया है. असली बात यह थी कि दोनों ने JDU उम्मीदवारों को हराया था और BJP के साथ उनकी सार्वजनिक नजदीकी से सहयोगी दल को गलत संदेश जा सकता था. NDA की एकता के दिखावे के पीछे की दरारें साफ नजर आने लगी थीं.
JDU के भीतर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में BJP नेताओं ने गठबंधन सहयोगी से अपेक्षित प्रतिबद्धता के साथ प्रचार नहीं किया. ऐसा तब हुआ, जब NDA की बैठकों में इस संबंध में फैसले लिए गए थे. पार्टी के नेता निजी तौर पर मानते हैं कि जीतने वाले उम्मीदवारों के साथ BJP के सार्वजनिक जुड़ाव ने विश्वासघात की भावना को और बढ़ा दिया है. हालांकि इन आरोपों को BJP के इस रुख के संदर्भ में भी देखना होगा कि दोनों MLC ने सिर्फ उसे समर्थन दिया है.
इस मामले ने कानूनी रूप भी ले लिया है. RJD और जन सुराज पार्टी ने दोनों MLC को अयोग्य ठहराने की मांग की है. उनका तर्क है कि BJP के साथ उनका जुड़ाव दलबदल विरोधी प्रावधानों का उल्लंघन है.
RJD नेता तेजस्वी यादव ने इस घटनाक्रम को संविधान का मजाक बताया है. 2 नवंबर को किशोर कुमार मुन्ना के नेतृत्व में जन सुराज के एक प्रतिनिधिमंडल ने विधान परिषद के सभापति रामबचन राय से मुलाकात की. प्रतिनिधिमंडल ने कथित सबूत सौंपे और कार्रवाई की मांग की. कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया है.
इस मामले में कानूनी सवाल संविधान की दसवीं अनुसूची से जुड़ा है. इसके पैरा 2(2) के मुताबिक निर्दलीय निर्वाचित कोई सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है. यह प्रावधान मनोनीत सदस्यों पर लागू नियमों से अलग है.
मनोनीत सदस्यों को सदन की सदस्यता लेने के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल होने की छूट होती है. इसलिए यहां सबसे अहम सवाल यह है कि क्या दोनों निर्दलीय MLC औपचारिक रूप से BJP में शामिल हुए हैं या उन्होंने सिर्फ पार्टी को समर्थन दिया है. भगवा गमछा पहने उनकी तस्वीरें अपने आप में पार्टी की सदस्यता साबित नहीं करतीं.
अयोग्य ठहराने से जुड़ी किसी भी याचिका पर फैसला विधान परिषद के सभापति को करना होता है. हालांकि उनके फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है. लेकिन राजनीतिक विवाद के कानूनी फैसले का इंतजार करने की संभावना कम है.
अगर दोनों MLC अयोग्य नहीं भी ठहराए जाते हैं तब भी इस घटनाक्रम ने उस नाजुक संतुलन को उजागर कर दिया है, जिसे NDA को अपने सबसे बड़े घटक दल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और सहयोगियों की चिंताओं के बीच बनाए रखना है.
सत्तारूढ़ गठबंधन में BJP सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है. सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी के पास बिहार में अपनी स्थिति और मजबूत करने का मौका है. लेकिन 85 विधायकों वाली JDU अब भी NDA की विधायी ताकत के लिए जरूरी है. गठबंधन में उसकी भूमिका या BJP के बढ़ते संगठनात्मक प्रभाव से ही उसकी राजनीतिक अहमियत तय नहीं होती. JDU का अपना संगठन, चुनावी आधार और नेतृत्व से जुड़े हित हैं, जिनकी उसे रक्षा करनी है.
विधान परिषद चुनाव के नतीजे यह भी याद दिलाते हैं कि BJP बिहार में अपना विस्तार उस गठबंधन व्यवस्था से अलग रहकर नहीं कर सकती जिसके दम पर NDA सत्ता में आया है. जिन निर्वाचन क्षेत्रों में JDU NDA का आधिकारिक उम्मीदवार था, वहां पार्टी को स्वाभाविक रूप से अपने सहयोगी से समर्थन की उम्मीद थी.
अगर यह धारणा बनती है कि BJP अपने सहयोगी को हराने वाले उम्मीदवारों के साथ ही राजनीतिक रिश्ते बढ़ाने को तैयार है तो इससे गठबंधन की यह समझ कमजोर हो सकती है.
बड़ा सवाल यह है कि क्या BJP JDU को असहज किए बिना बिहार में अपना राजनीतिक दायरा बढ़ा सकती है? दोनों दल चुनावी गणित और सत्ता में बने रहने के फायदे के कारण साथ रह सकते हैं. लेकिन गठबंधन सिर्फ इन बातों से नहीं चलते.
गठबंधन के लिए आपसी भरोसा, संयम और राजनीतिक सीमाओं की साझा समझ भी जरूरी होती है. चुनावी हार के बावजूद गठबंधन कायम रह सकता है लेकिन जब सहयोगी दलों को ही यह संदेह होने लगे कि दोनों एक ही नियमों के तहत राजनीति कर रहे हैं तो उसे बनाए रखना ज्यादा मुश्किल हो जाता है.