भारत में सबसे ज्यादा अवैध कारतूस बिहार कैसे पहुंच रहे?
बिहार में 2024 में देशभर में जब्त बिना लाइसेंस वाले हर तीन में से करीब एक कारतूस यहीं मिला. NCRB के आंकड़े अवैध कारतूसों की बड़ी खेप और उनकी सप्लाई के नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं

बिहार दशकों से अवैध हथियारों के कारोबार से जुड़ा रहा है (सांकेतिक तस्वीर)
सुरक्षा बलों ने 7 अक्टूबर को बिहार के गया जिले में झारखंड सीमा के पास तिलैया-हिसुआ मार्ग के किनारे जंगल की जमीन खोदी. वहां उन्हें वहां से हथियारों और गोला-बारूद का जखीरा मिला. इसमें 9 एमएम की एक कार्बाइन, दो देसी बंदूकें, मैगजीन, एक वॉकी-टॉकी और 92 जिंदा कारतूस शामिल थे. इनमें 9 एमएम के 79 और 7.62 एमएम के 13 कारतूस थे.
जांचकर्ताओं को शक है कि ये हथियार माओवादी गतिविधियों से जुड़े लोगों ने छिपाए होंगे. हालांकि अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है.
यह बरामदगी बिहार में पहले हो चुकी बड़ी कारतूस बरामदगियों के मुकाबले काफी छोटी थी. लेकिन इसने एक और चौंकाने वाले आंकड़े की ओर ध्यान खींचा. साल 2024 में बिहार में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'अन्य स्रोतों से' श्रेणी के तहत बिना लाइसेंस वाले 19,796 कारतूस जब्त किए गए. यह इस श्रेणी में देशभर में जब्त कुल 62,363 कारतूसों का करीब 32 फीसदी था. इस मामले में दूसरे स्थान पर रहे राजस्थान में 6,210 कारतूस बरामद हुए. यानी बिहार में बरामद कारतूसों की संख्या राजस्थान से तीन गुने से भी ज्यादा थी.
NCRB के स्पष्टीकरण के मुताबिक, 'अन्य' श्रेणी में अपराधी, गैंगस्टर और तस्कर शामिल हो सकते हैं. इस वर्गीकरण से यह साबित नहीं होता कि बरामद हर कारतूस किसी आपराधिक गिरोह का था. न ही इससे यह साबित होता है कि सभी कारतूस बिहार के बाहर से आए थे.
लेकिन इतनी बड़ी संख्या में कारतूसों की बरामदगी इस बात की गहराई से जांच की जरूरत बताती है कि बिना लाइसेंस वाले कारतूस कहां से खरीदे जाते हैं, उनका परिवहन कैसे होता है और उन्हें कहां-कहां पहुंचाया जाता है.
राज्य में कुल कारतूसों की बरामदगी के आंकड़ों के साथ देखने पर ये संख्याएं और अहम हो जाती हैं. साल 2024 में बिहार में कुल 25,289 कारतूस जब्त किए गए. यह उस साल किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा संख्या थी. देशभर में कुल 89,212 कारतूस बरामद हुए थे. यानी देश में जब्त हुए कुल कारतूसों में बिहार की हिस्सेदारी 28 फीसदी से अधिक थी.
NCRB के आंकड़ों की एक दूसरी श्रेणी भी इस तस्वीर का एक और पहलू सामने लाती है. 'पूर्वोत्तर के उग्रवादियों से- बिना लाइसेंस' श्रेणी में देशभर के राज्यों में दर्ज 11,577 कारतूसों में से 5,487 बिहार में जब्त किए गए. यह कुल संख्या का करीब 47 फीसदी है. यह 'अन्य स्रोतों से' वाली श्रेणी से अलग है. हालांकि दोनों आंकड़े मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर कारतूसों की बरामदगी में बिहार की बड़ी हिस्सेदारी दिखाते हैं. साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं कि अवैध कारतूस किन रास्तों से राज्य तक पहुंच रहे हैं.
हाल के समय की सबसे अहम जांच की शुरुआत किसी जंगल से नहीं, बल्कि हाईवे के टोल प्लाजा से हुई थी. पिछले साल जून में बिहार पुलिस की विशेष कार्य बल (STF) ने कैमूर जिले के मोहनिया टोल प्लाजा के पास एक गाड़ी रोकी. तलाशी में छिपाकर रखे गए 3,700 कारतूस मिले. इनमें 8 एमएम के 2,950 और .32 बोर के 750 कारतूस थे. इसके बाद नालंदा में की गई तलाशी में कुछ और कारतूस मिले. इस तरह कुल बरामदगी की संख्या बढ़कर 4,536 हो गई.
पुलिस के मुताबिक कारतूसों की यह खेप उत्तर प्रदेश के कानपुर से खरीदी गई थी और इसे अवैध बाजार में बेचने के लिए बिहार लाया जा रहा था. इस कार्रवाई और उसके बाद की गई तलाशी में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया. बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इस मामले की जांच अपने हाथ में ले ली. एजेंसी ने जांच का दायरा बढ़ाते हुए अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क का पता लगाने की कोशिश शुरू की.
पिछले साल दिसंबर में NIA ने बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में एक साथ तलाशी अभियान चलाया. एजेंसी के मुताबिक, जांच में एक ऐसे नेटवर्क का पता चला जो हरियाणा और अन्य जगहों के बंदूक विक्रेताओं से अवैध तरीके से कारतूस खरीदता था.
इसके बाद इन्हें उत्तर प्रदेश के रास्ते बिहार और दूसरी जगहों तक पहुंचाया जाता था. इस कार्रवाई में कुछ और गिरफ्तारियां हुईं. नकदी, दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसें भी जब्त की गईं. जांचकर्ताओं ने इस सप्लाई चेन में लाइसेंसधारी बंदूक विक्रेता से जुड़े लोगों की कथित भूमिका की भी जांच की.
इस मामले ने एक बड़ी खामी उजागर की. कारतूस पहले कानूनी बाजार में पहुंच सकते हैं और फिर उन्हें अवैध तरीके से दूसरी जगह भेजा जा सकता है. जांचकर्ताओं के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि खरीद के रिकॉर्ड, स्टॉक और उसके स्थानांतरण में कहां गड़बड़ी हुई. साथ ही यह भी साबित करना होगा कि कारतूस अधिकृत माध्यमों से बाहर बेचे गए या पहुंचाए गए थे.
मोहनिया का मामला बताता है कि जांच सिर्फ खुदरा विक्रेता तक सीमित नहीं रह सकती. कारतूसों के पूरे रास्ते पर नजर रखनी होगी. इसमें बिचौलियों, परिवहन करने वालों और उन्हें हासिल करने वाले लोगों की भी जांच जरूरी है.
दशकों से बिहार में अवैध हथियारों का कारोबार देसी हथियारों से जुड़ा रहा है. खासकर मुंगेर जैसे पारंपरिक हथियार निर्माण केंद्रों के आसपास यह कारोबार फैला है. लेकिन हजारों फैक्ट्री में बने कारतूसों की बरामदगी एक अलग चुनौती की ओर इशारा करती है.
स्थानीय वर्कशॉप में देसी हथियार बनाए जा सकते हैं लेकिन भरोसेमंद और फैक्ट्री में बने कारतूसों की सप्लाई के लिए निर्माताओं, लाइसेंसधारी विक्रेताओं, बिचौलियों और परिवहन नेटवर्क की बड़ी सप्लाई चेन की जरूरत होती है. ये दोनों बाजार एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं लेकिन इनकी जांच के तरीके अलग-अलग होने चाहिए.
एक अलग जांच में बिहार तक पहुंचने वाले एक और रास्ते का पता चला है. साल 2024 में एक मामले में एके-47 राइफल और कारतूस बरामद किए गए थे. बाद में NIA ने इस मामले को अपने हाथ में लेकर नगालैंड से अवैध हथियारों की तस्करी कर उन्हें बिहार में खपाने के आरोपों की जांच शुरू की.
अक्टूबर 2025 में एजेंसी ने इस मामले के सिलसिले में वैशाली जिले में कुछ और हथियार और कारतूस बरामद किए जाने की जानकारी दी. इस जांच से पता चला कि हथियार जहां बरामद होते हैं, जांच सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. सप्लायरों और उनसे जुड़े लोगों तक पहुंचना भी जरूरी है.
गया में हालिया बरामदगी इस समस्या का एक अलग पहलू है, जिसकी गुत्थी अभी सुलझी नहीं है. पुलिस यह पता नहीं लगा पाई है कि हथियारों और कारतूसों को किसने जमीन में छिपाया था, इन्हें कब वहां रखा गया और क्या इनका इस्तेमाल किसी आपराधिक या माओवादी गतिविधि में होना था. फिर भी यह बरामदगी सीमा से लगे इलाकों में लगातार निगरानी और हथियारों तथा कारतूसों की आवाजाही की गहराई से जांच की जरूरत बताती है.
राज्य में वैध हथियारों की व्यवस्था का आकार भी निगरानी को जरूरी बनाता है. मार्च 2025 तक बिहार में वैध हथियार लाइसेंस धारकों की संख्या 39,275 थी. हर लाइसेंस धारक को सालाना अधिकतम 200 कारतूस खरीदने की अनुमति थी.
इस हिसाब से सालभर में करीब 80 लाख कारतूस खरीदने की सैद्धांतिक अनुमति बनती है. हालांकि, यह केवल खरीद की अधिकतम सीमा है. इससे यह साबित नहीं होता कि वास्तव में इतने कारतूस खरीदे गए या उन्हें अवैध तरीके से दूसरी जगह भेजा गया. फिर भी यह आंकड़ा बताता है कि खरीद के सही रिकॉर्ड, स्टॉक की जांच और लाइसेंस जारी करने वाले अधिकारियों तथा कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच तालमेल कितना जरूरी है.
बुनियादी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बिहार में इतने ज्यादा कारतूस क्यों जब्त होते हैं. बरामदगी की बड़ी संख्या के पीछे तस्करी की गतिविधियों के साथ-साथ पुलिस की प्रभावी कार्रवाई भी हो सकती है. सिर्फ NCRB के आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि अवैध बाजार कितना बड़ा है या हर कारतूस बिहार में ही इस्तेमाल के लिए लाया गया था. लेकिन ये आंकड़े कारतूसों के स्रोत और उनके पहुंचने की जगहों की गहराई से जांच करने की ठोस वजह जरूर देते हैं.
पुलिस को अब सिर्फ बरामद कारतूसों की संख्या गिनने से आगे बढ़ना होगा. जांच में यह पता लगाना जरूरी है कि इन खेपों के लिए पैसा कौन देता है, कारतूस कौन खरीदता है, वे एक राज्य से दूसरे राज्य में कैसे पहुंचते हैं और आखिरकार उन्हें कौन हासिल करता है.
स्टॉक में संदिग्ध गड़बड़ियों और परिवहन के इंतजामों की जांच ठोस सबूतों के आधार पर होनी चाहिए. वहीं जमीन में छिपाकर रखे गए हथियारों और कारतूसों के मामलों में उनके मालिकाना हक, मकसद और पहले से सक्रिय नेटवर्क से संबंधों का पता लगाना जरूरी है.
गया में हथियारों और कारतूसों का जखीरा मिलना और मोहनिया में कारतूसों की बड़ी खेप पकड़ा जाना, कानून लागू करने की एक ही चुनौती के दो अलग-अलग पहलू दिखाते हैं. एक तरफ झारखंड सीमा के पास जंगल में छिपाए गए हथियार हैं तो दूसरी तरफ अंतरराज्यीय आपूर्ति नेटवर्क के जरिए कथित तौर पर पहुंचाए जा रहे हजारों फैक्ट्री में बने कारतूस.
NCRB के 2024 के आंकड़े बताते हैं कि उस साल देश में सबसे ज्यादा कारतूस बिहार में जब्त हुए. 'अन्य स्रोतों से- बिना लाइसेंस' श्रेणी में भी देशभर में जब्त कारतूसों में बिहार की हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई रही.
ये आंकड़े इस बात का सबूत नहीं हैं कि जब्त किए गए सभी कारतूस किसी आपराधिक नेटवर्क तक पहुंचने वाले थे. लेकिन वे चेतावनी जरूर देते हैं कि बिहार में हथियारों की समस्या सिर्फ देसी पिस्तौलों और जंगलों में छिपाए गए हथियारों तक सीमित नहीं है.
अब सबसे बड़ी चुनौती उन आपूर्ति नेटवर्क का पता लगाने और उन्हें तोड़ने की है, जिनके जरिए ये कारतूस पहुंचते हैं. ताकि अगली खेप अपनी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही रोकी जा सके.