क्या अब बिहार के राज्यपाल चांसलर नहीं रह पाएंगे?

बिहार में राजभवन और शिक्षा विभाग के बीच टकराव से ऐसा लग रहा है कि प. बंगाल और केरल की तर्ज पर अब हो सकता है कि यहां भी राज्यपाल विश्वविद्यालयों के चांसलर न रह पाएं

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के साथ
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के साथ

बुधवार को बिहार के सीएम नीतीश कुमार और राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर की बीस मिनट तक चली मुलाकात ने भले ही राज्य में शिक्षा विभाग और राजभवन के बीच चले रहे अभूतपूर्व टकराव को तात्कालिक तौर पर विराम की स्थिति में डाल दिया है. मगर यह टकराव अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है. इनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब बिहार भी राज्य के विश्वविद्यालयों के प्रबंधन का जिम्मा राजभवन से लेकर अपने पास रखना चाह रहा है. जैसा पंजाब और असम में हुआ और जिस तरह की कोशिशें हाल के दिनों में बंगाल और केरल जैसे राज्य में हो रही है. जानकार मानते हैं कि हाल के वर्षों में राज्य सरकार का रुख देखें तो ऐसा ही लगता है. हालिया विवाद ने इस बात को नये सिरे से बहस में ला दिया है.  

बुधवार को सीएम और राज्यपाल की मुलाकात की वजह शिक्षा विभाग और राजभवन के बीच चल रहा टकराव ही था. पिछले दिनों शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव ने राजभवन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. यह विवाद विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर था. इसके लिए पहले राजभवन की तरफ से विज्ञापन निकले थे, बाद में शिक्षा विभाग ने नए सिरे से विज्ञापन निकाल दिए. 

शिक्षा विभाग का दावा था कि चूंकि वह विश्वविद्यालयों को फंड उपलब्ध कराता है तो ऐसे में कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार उसी का है. इस विवाद की वजह से संवैधानिक संकट उठ खड़ा हुआ था. विशेषज्ञों को लगने लगा था कि बिहार भी पंजाब, बंगाल और केरल की तर्ज पर उस दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है कि जब उनके विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल नहीं होंगे. भाजपा के नेता रहे बिहार के राज्यपाल आर्लेकर गोवा से आते हैं और एक बार वहां की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं. उन्हें इसी साल फरवरी में इस पद पर नियुक्त किया गया है.  

 राजभवन और शिक्षा विभाग का यह मौजूदा विवाद तब शुरू हुआ जब शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी कर मुजफ्फरपुर विवि के कुलपति (वीसी) और प्रतिकुलपति (प्रोवीसी) के वेतन पर रोक लगा दी थी. 17 अगस्त, 2023 को शिक्षा विभाग की तरफ से एक आदेश जारी हुआ था. इसमें कहा गया था कि विभाग के निर्देश के मुताबिक वीसी शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी और प्रोवीसी रवींद्र कुमार न नियमित तौर पर कॉलेजों का निरीक्षण कर रहे हैं, न लंबित परीक्षाओं के आजोयन में तत्परता दिखा रहे हैं. वे विभाग द्वारा 17 अगस्त को आयोजित समीक्षा बैठक में भी उपस्थित नहीं हुए. इसलिए इन दोनों के वेतन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी गई और इनकी तमाम वित्तीय शक्तियां भी स्थगित कर दी गई.   

शिक्षा विभाग ने हाल ही में राज्य के सभी महाविद्यालयों के निरीक्षण का अभियान शुरू किया है. इसके तहत रोजाना 15 विश्वविद्यालयों के अलग-अलग कॉलेजों का निरीक्षण किया जा रहा है. विभाग के मुताबिक हर रोज पांच सौ से अधिक शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मी अनुपस्थित पाए जा रहे हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है. बताया जा रहा है कि इसके तहत 17 अगस्त को जब मुजफ्फरपुर के बीआर आंबेडकर विवि की समीक्षा बैठक होनी थी तो उस बैठक में न कुलपति पहुंचे, न प्रतिकुलपति. शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक की अगुआई में विभाग के अधिकारियों की पूरी टीम घंटों उनका इंतजार करती रही. इन दोनों को लेकर विभाग की नाराजगी इसी वजह से थी. 

हालांकि शिक्षा विभाग द्वारा कुलपति स्तर के अधिकारी का वेतन रोकना बड़ी घटना लगती है. मगर जानकार बताते हैं कि केके पाठक जब 2009 में विभाग के उच्च शिक्षा सचिव थे, तब भी उन्होंने कई कुलपतियों के वेतन पर रोक लगाई थी. उस वक्त भी उन्होंने महाविद्यालयों में शिक्षकों की उपस्थिति को सख्ती से लागू कराया था.  

मगर इस बार जब विभाग ने कुलपति और प्रति कुलपति के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उनके वेतन पर रोक लगा दी तो राजभवन ने इसे अपने अधिकार में दखल माना. राजभवन की तरफ से पत्र लिखकर शिक्षा विभाग को सूचित किया गया कि विभाग को विश्वविद्यालय के आय-व्यय का ऑडिट करने का तो अधिकार है, मगर उसे खाते, वेतन और शक्तियों पर रोक लगाने का अधिकार नहीं है. यह कुलाधिपति के अधिकार में हस्तक्षेप है. साथ ही कहा गया कि विभाग यह आदेश वापस ले. 

मगर शिक्षा विभाग ने इस आदेश को वापस नहीं लिया. शिक्षा विभाग के सचिव बैद्यनाथ यादव ने 21 अगस्त को इस पत्र का जवाब देते हुए लिखा, “चूंकि विभाग राज्य के विश्वविद्यालयों को हर साल 4000 करोड़ रुपए की राशि की मदद देता है. साथ ही समय से परीक्षाएं हो और रिजल्ट आये, इसकी जिम्मेदारी उसकी भी बनती है. इसलिए विभाग को रिपोर्ट मांगने, बैठक बुलाने और इस पूरे मसले में हस्तक्षेप करने का अधिकार है. आप कहते हैं कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होती है. पर ऐसा किस एक्ट में लिखा है, यह कृपया सूचित करें. इसलिए जब राज्य सरकार विश्वविद्यालयों को हजारों करोड़ की मदद देता है तो वह उसे स्वायत्तता के नाम पर अराजकता करने के लिए नहीं छोड़ सकता.” 

इससे पहले कि राजभवन की तरफ से इस पत्र पर कोई प्रतिक्रिया आती, शिक्षा विभाग ने एक और हमला कुलाधिपति के अधिकारों पर कर दिया है. 22 अगस्त को राज्य के पांच विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के खाली पदों को भरने के लिए विभाग की तरफ से विज्ञापन राज्य के अखबारों में छपे. जबकि राजभवन की तरफ से इन पदों पर आवेदन के लिए चार अगस्त को ही विज्ञापन प्रकाशित कराए गए थे. राजभवन द्वारा जारी विज्ञापन के बदले आवेदकों ने आवेदन भी शुरू कर दिया है, इसकी अंतिम तिथि 26 अगस्त है. जबकि शिक्षा विभाग के विज्ञापनों में आवेदन की अंतिम तिथि 13 सितंबर है.   

इस तरह एक ही पद के लिए दो अलग-अलग विज्ञापन जारी होने से आवेदकों के बीच भ्रम तो पैदा हो ही गया. साथ ही ऐसा भी लग रहा है कि शिक्षा विभाग कुलपति की नियुक्ति को लेकर राजभवन के अधिकार को चुनौती दे रहा है. 

इस मसले पर जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने इंडिया टुडे को बताया, “शिक्षा विभाग का यह तर्क बिल्कुल सही है कि सरकार विश्वविद्यालयों को हजारों करोड़ का फंड देती है. राज्य में सेशन लेट होता है तो उसके लिए भी लोग सरकार को ही जिम्मेदार मानते हैं. जबकि गड़बड़ियां कुलपतियों और कुलाधिपति कार्यालय के लचर रवैये की वजह से होती हैं. अभी शिक्षा विभाग राज्य में स्कूल-कॉलेजों का माहौल बेहतर करने का अभियान चला रहा है, जनता में भी इसको लेकर सकारात्मक माहौल है.”  

ऐसे में सवाल ये भी उठने लगे कि क्या बिहार सरकार राज्य में विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली और राजभवन की भूमिका से असंतुष्ट है? क्या बिहार सरकार पश्चिम बंगाल और केरल की तर्ज पर राज्य में उच्च शिक्षा का पूरा नियंत्रण राजभवन से लेकर अपने पास रखना चाहती है. 

दिलचस्प है कि इसी अगस्त के पहले हफ्ते में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने फिर से यह विधेयक पारित किया है कि राज्य में मुख्यमंत्री ही कुलाधिपति हुआ करेंगे. पिछले साल भी बंगाल विधानसभा ने यह बिल पारित किया था, मगर राज्यपाल ने इस बिल पर अपनी सहमति नहीं दी है. वहीं केरल विधानसभा ने भी पिछले साल एक बिल पारित किया था कि अब राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल नहीं होंगे. सरकार की तरफ से इस मामले में आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं कहा जा रहा, मगर अनौपचारिक बातचीत में सत्ताधारी दल के लोग इससे सहमत दिख रहे हैं. उनके मुताबिक राज्य में एक तरह से इसकी शुरुआत भी हो चुकी है. राज्य के सभी मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों के संचालन के लिए बना बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलाधिपति मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं. इसकी स्थापना बिहार यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज एक्ट, 2021 के तहत एक जुलाई, 2022 को हुई है. इस कानून में ही यह प्रावधान रखा गया था कि इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति राज्य के मुख्यमंत्री होंगे.  

बिहार में शिक्षा के मसले पर लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे लक्ष्मीकांत सजल कहते हैं, “यह पहला मौका नहीं है जब बिहार सरकार कुलाधिपति का दायित्व राज्यपाल से लेने पर विचार कर रही है. लालू यादव जब दूसरी दफा मुख्यमंत्री बने थे और रामचंद्र पूर्वे शिक्षा मंत्री थे, तब भी राज्य सरकार और राजभवन के बीच ऐसा ही एक तीखा विवाद हुआ था. तब भी राज्य सरकार ने मन बना लिया था कि अब विश्वविद्यालयों के चांसलर राज्यपाल नहीं होंगे. अभी भी राज्य के 14 विश्वविद्यालयों के चांसलर ही राज्यपाल हैं. चाणक्या लॉ यूनिवर्सिटी के चांसलर पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस होते हैं. स्वास्थ्य विज्ञान विवि के चांसलर सीएम हैं ही. इसके अलावा बिहार में सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों के संचालन के लिए बिहार टेक्निकल यूनिवर्सिटी और बिहार खेल विश्वविद्यालय की स्थापना हो रही है, इनके चांसलर भी सीएम होंगे, ऐसा तय हो गया है. इस बार का विवाद भी कहीं न कहीं उसी मोड़ पर अटका दीखता है.” 

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