BJP से ज्यादा भजन लाल शर्मा की परीक्षा बने शहरी निकाय चुनाव
मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने शहरी निकाय चुनावों में खुद प्रचार की कमान संभाली है. ऐसे में इसके नतीजों का श्रेय और जिम्मेदारी दोनों उनके खाते में जा सकते हैं

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा (फाइल फोटो)
राजस्थान के शहरों में हो रहे चुनाव सिर्फ पार्षद चुनने तक सीमित नहीं हैं. 41 जिलों के 309 शहरों और कस्बों में 10,245 पार्षद चुने जा रहे हैं. चुनाव 9 और 11 सितंबर को दो चरणों में हो रहा है, जबकि वोटों की गिनती 14 सितंबर को होगी. इसमें 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं शामिल हैं.
मुख्य मुकाबला BJP और कांग्रेस के बीच है, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के कामकाज और उनकी राजनीतिक पकड़ का है. दिसंबर 2023 में BJP की सरकार बनने और उसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में पार्टी के अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव है. इसलिए पार्षदों के ये चुनाव भजन लाल शर्मा के लिए अब तक सरकार के कामकाज पर जनता की राय जानने का सबसे बड़ा मौका और परीक्षा हैं.
हालांकि एक बात ध्यान में रखनी होगी. राजस्थान के शहरों में होने वाले चुनावों में सिर्फ राज्य सरकार के कामकाज के आधार पर वोट नहीं पड़ते. स्थानीय उम्मीदवार, जाति का गणित, पार्टी से नाराज होकर चुनाव लड़ रहे नेता और निर्दलीय उम्मीदवार भी नतीजों पर काफी असर डालते हैं. आंकड़े बताते हैं कि सत्ता में रहने वाली पार्टी को अक्सर फायदा मिलता है, लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता.
इस बार का चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने खुद चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी संभाली है. उन्होंने बड़े शहरों में रोड शो किए हैं और लगातार दौरे किए हैं. यह उनके लिए मौका भी है और जोखिम भी. अगर BJP का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो इसका फायदा भजन लाल शर्मा को मिल सकता है और वे कह सकते हैं कि उनके प्रचार से पार्टी की बात लोगों तक पहुंची. लेकिन अगर BJP का प्रदर्शन कमजोर रहता है, खासकर बड़े नगर निगमों में तो यह सवाल उठ सकता है कि भजन लाल शर्मा के खुद प्रचार में उतरने का पार्टी को कितना फायदा मिला.
एक राय यह है कि भजन लाल शर्मा को जीत का भरोसा है और वे इसका श्रेय खुद लेना चाहते हैं. दूसरी राय यह है कि BJP को पता है कि कई जगहों पर मुकाबला काफी करीबी है. पार्टी को लगता है कि जिन सीटों पर जीत और हार के बीच बहुत कम अंतर है वहां मुख्यमंत्री के खुद चुनाव प्रचार में उतरने से नतीजा बदल सकता है.
पार्टी ने इसके साथ ही मंत्रियों, विधायकों और सांसदों को भी अपने-अपने इलाकों में बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार में लगाया है. इससे BJP के लिए यह भी साफ होगा कि अगर किसी इलाके में नतीजे खराब रहते हैं तो इसकी जिम्मेदारी स्थानीय नेताओं की मानी जा सकती है, न कि तुरंत इसे मुख्यमंत्री के खिलाफ लोगों का फैसला माना जाए. वहीं, पार्टी से अलग होकर चुनाव लड़ रहे नेताओं और टिकट नहीं मिलने से नाराज दावेदारों के कारण पार्टी के अंदर की नाराजगी और आपसी खींचतान को संभालना भी बहुत जरूरी हो गया है. चुनाव से पहले BJP ने ऐसे कुछ नेताओं को पार्टी से निकाल भी दिया है.
कांग्रेस के लिए भी इस चुनाव में दांव कम नहीं हैं. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार भजन लाल शर्मा की सरकार पर हमला करते रहे हैं और उन्होंने वोटरों से BJP को ‘सजा’ देने की अपील की है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी इन चुनावों के जरिए सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने शहरों की आर्थिक हालत और आरक्षण जैसे मुद्दे उठाए हैं. ऐसे में अगर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहता है तो सवाल उठेगा कि सरकार के खिलाफ लंबे समय से चलाए जा रहे उसके अभियान को कांग्रेस कितने वोटों में बदल पाई.
जातियों का हिसाब भी इस चुनाव का एक अहम हिस्सा है. दोनों पार्टियों ने ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों में तय संख्या से ज्यादा टिकट ओबीसी उम्मीदवारों को देने की कोशिश की है. इससे सामान्य वर्ग के कुछ लोगों में नाराजगी हुई है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ओबीसी आरक्षण की अब जरूरत नहीं है. इसके बजाय यह दिखाता है कि राजनीति में ओबीसी समुदाय कितना अहम है और दोनों पार्टियों के बीच ओबीसी समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कितनी ज्यादा है.
इस चुनाव में BJP का एक खास प्रयोग भी देखने को मिल रहा है. राजस्थान में 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा था. अब पार्टी का कहना है कि उसने इस बार पूरे राज्य में हो रहे इन चुनावों में 480 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है. वहीं पूरे राज्य में चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में करीब 36 फीसदी महिलाएं हैं.
शायद चुनाव के बाद का समय सबसे ज्यादा अहम होगा. पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार चुने गए पार्षदों को अपने साथ बनाए रखने की तैयारी कर रहे हैं. इसमें पार्षदों को बोर्ड बनने तक एक साथ रखा जाता है, ताकि वे दूसरी पार्टी के पक्ष में वोट न दें या दूसरी पार्टी के साथ न चले जाएं. खबरों के मुताबिक, पार्टियां इसके लिए पार्षदों को रिजॉर्ट और दूसरी सुरक्षित जगहों पर रखने की तैयारी कर रही हैं. यह चिंता बेवजह नहीं है. पहले भी मेयर के चुनावों में पैसे और दूसरे तरह के लालच देने के आरोप लग चुके हैं.
इसलिए 14 सितंबर को आने वाले चुनाव नतीजों के बाद ही असली राजनीतिक तस्वीर साफ होगी. नतीजे आने के बाद पार्टियां बहुमत जुटाने की कोशिश करेंगी. इसके बाद मेयर, चेयरपर्सन और अध्यक्ष चुनने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू होगी.
इसके बाद इस साल होने वाले पंचायत चुनाव सबसे बड़ी परीक्षा होंगे. ग्रामीण राजस्थान में होने वाले इन चुनावों से यह पता चलेगा कि किस पार्टी की जमीनी पकड़ कितनी मजबूत है और कौन सी पार्टी अलग-अलग जातियों के लोगों को अपने साथ जोड़ पाती है. शहरी और ग्रामीण, दोनों चुनावों के नतीजे दिसंबर में शर्मा सरकार की तीसरी सालगिरह के समय राज्य की राजनीति पर बड़ा असर डालेंगे. इन नतीजों से BJP का केंद्रीय नेतृत्व विधानसभा चुनाव से काफी पहले यह भी तय कर सकता है कि मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों का काम कैसा रहा है.
इसलिए भजन लाल शर्मा के लिए ये सिर्फ शहरी चुनाव नहीं हैं. BJP भले ही 10,245 वार्डों में चुनाव लड़ रही हो, लेकिन भजन लाल शर्मा ने भी अपने राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड का एक हिस्सा इन चुनावों के नतीजों पर लगा दिया है.