बीजेपी का अभेद्य किला ढहा, बांकीपुर में कैसे जीते प्रशांत किशोर?
बीजेपी का सबसे सुरक्षित गढ़ रहे बांकीपुर में प्रशांत किशोर ने पहली प्रत्यक्ष चुनावी परीक्षा में ही जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया. बिहार की बदलती राजनीति और बीजेपी के लिए इस चुनाव परिणाम ने बड़े राजनीतिक संकेत छोड़ दिए हैं

जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर
करीब तीन दशकों तक बिहार का बांकीपुर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का सबसे भरोसेमंद गढ़ रहा. 1995 में जब इस सीट का नाम पटना पश्चिम था, तब से पार्टी यहां कभी नहीं हारी थी लेकिन अब यह सिलसिला टूट गया है.
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीत लिया है. उन्होंने बीजेपी के नीरज कुमार सिन्हा को हराकर अपने पहले ही प्रत्यक्ष चुनाव में जीत दर्ज की जबकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं.
मतगणना के दौरान तीसरे राउंड में लगभग 1,100 वोटों की मामूली बढ़त से शुरू हुआ अंतर 12वें राउंड तक 6,600 से अधिक वोटों तक पहुंच गया और सभी 32वें राउंड की गिनती पूरी होने के तक 19,000 से अधिक हो गया. करीब नौ महीने पहले तक शायद ही किसी ने ऐसे नतीजे की कल्पना की होगी.
हार से जीत तक का सफर
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 243 में से 238 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी. पूरे राज्य में उसका वोट शेयर केवल 3.4 प्रतिशत रहा. बांकीपुर में भी जन सुराज की उम्मीदवार वंदना कुमारी को 8,000 से भी कम वोट मिले थे जबकि बीजेपी के नितिन नवीन को 98 हजार से अधिक वोट हासिल किए थे. वंदना अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी थीं.
उस समय प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा था. विपक्ष ने उन पर तंज कसते हुए कहा था कि वे 'वैकल्पिक राजनीति' की बात तो करते हैं लेकिन खुद चुनाव लड़ने से बचते हैं.
नितिन नवीन के राज्यसभा जाने और बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद हुए इस उपचुनाव ने प्रशांत किशोर को अलग अवसर दिया. इस बार मुकाबला पूरे राज्य में फैले सैकड़ों उम्मीदवारों का नहीं बल्कि एक हाई-प्रोफाइल सीट पर खुद प्रशांत किशोर का था. यही बदलाव नवंबर 2025 की हार और अगस्त 2026 की जीत के बीच सबसे बड़ा अंतर माना जा रहा है.
प्रशांत किशोर की जीत की वजह
इस जीत की सबसे बड़ी वजह खुद प्रशांत किशोर रहे. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन इस बार वे सीधे मैदान में उतरे. मतगणना के दिन उन्होंने कहा कि उन्होंने जानबूझकर ऐसी सीट से चुनाव लड़ना चुना जहां यह साबित किया जा सके कि वोट केवल जाति या धर्म के नाम पर नहीं मांगे जाते.
उन्हें बीजेपी के पहले बार चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा का सामना करना पड़ा. पार्टी ने पहले अभिषेक 'बंटी' सिन्हा को उम्मीदवार बनाया था लेकिन उनका टिकट अचानक वापस लेकर नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतार दिया गया. इसके कारण बीजेपी की चुनावी तैयारी भी प्रभावित हुई.
प्रशांत किशोर ने चुनाव को केवल स्थानीय मुकाबला नहीं रहने दिया. उन्होंने इसे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व पर जनमत संग्रह की तरह पेश किया. उनका आरोप था कि बीजेपी ने बांकीपुर को अपनी स्थायी जागीर मान लिया है जबकि असली ताकत मतदाताओं के पास होती है.
चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने शिक्षा, रोजगार, जल-जमाव, पेयजल संकट और सरकारी स्कूलों की स्थिति जैसे स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता दी. उन्होंने जाति और धर्म के बजाय विकास और बुनियादी सुविधाओं को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया.
जन सुराज की संगठनात्मक तैयारी भी इस बार पहले से कहीं मजबूत दिखाई दी. पार्टी ने मोहल्ला स्तर तक बैठकें कीं, हर बूथ की अलग जिम्मेदारी तय की और कार्यकर्ताओं से नियमित रिपोर्ट ली. 2025 के विधानसभा चुनाव की तुलना में यह कहीं अधिक संगठित अभियान था.
बीजेपी के भीतर उम्मीदवार बदलने को लेकर पैदा हुई असहजता ने भी जन सुराज को फायदा पहुंचाया.
मतदान प्रतिशत भी इस बार घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गया जबकि नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में यह 41.45 प्रतिशत था. आमतौर पर कम मतदान को सत्तारूढ़ दल के लिए नुकसानदेह माना जाता है.
मतदान से ठीक पहले पटना के एक थाने में प्रशांत किशोर का धरना भी काफी चर्चा में रहा. उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी के दबाव में पुलिस ने उनके कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया. इससे उन्हें चुनाव के अंतिम चरण में भी व्यापक राजनीतिक चर्चा मिली.
बीजेपी के लिए कितना बड़ा झटका?
नितिन नवीन लगातार पांच बार इस सीट से चुनाव जीत चुके थे. नवंबर 2025 में उन्होंने करीब 50 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी और उनका वोट शेयर 63 प्रतिशत से अधिक था. 2020 और 2015 में भी उन्होंने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी.
कायस्थ बहुल इस सीट पर ब्राह्मण, भूमिहार और अन्य सवर्ण मतदाताओं का भी प्रभाव है. लंबे समय से इसे बीजेपी का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता रहा है. ऐसे में नौ महीने पहले चुनाव में एक भी सीट नहीं जीतने वाली पार्टी के नेता के हाथों यह सीट निकल जाना प्रतीकात्मक रूप से बड़ा झटका माना जा रहा है.
यह सीट नितिन नवीन की व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान भी रही है. उनके पिता के समय से यानी उनका परिवार 1995 से इस सीट का प्रतिनिधित्व करता रहा है. अब जबकि नितिन नवीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, इस सीट का हाथ से निकलना उनके लिए भी व्यक्तिगत राजनीतिक झटका माना जा रहा है.
यह नतीजा ऐसे समय आया है जब सम्राट चौधरी अप्रैल में बिहार के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री बने हैं. भारत तिवारी एनकाउंटर विवाद, छात्र आंदोलन और चुनाव प्रचार के दौरान पुलिस की भूमिका जैसे मुद्दों के बीच इस उपचुनाव को उनके नेतृत्व की पहली बड़ी परीक्षा माना जा रहा था.
पिक्चर अभी बाकी है
हालांकि इस नतीजे को बहुत दूर तक ले जाकर देखना भी जल्दबाजी होगी. यह केवल एक विधानसभा सीट का उपचुनाव है और इसमें लगभग 34 प्रतिशत मतदान हुआ. इससे विधानसभा का गणित नहीं बदलता और न ही यह पूरे बिहार के चुनावी रुझान का अंतिम संकेत माना जा सकता है.
जन सुराज के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या वह बांकीपुर जैसी प्रशांत किशोर केंद्रित रणनीति को भविष्य में कितना दोहरा पाएगी. हालांकि यह जीत उसके मनोबल को आसमान पर ले जाने के लिए काफी है. प्रशांत किशोर नतीजों के दौरान पहली प्रतिक्रिया देते हुए संकेत कर चुके हैं कि विधानसभा में उनका रहना सत्ताधारी पार्टी के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है.
प्रशांत किशोर ने नतीजों पर कहा, यह बीजेपी के नेतृत्व को संकेत है कि आप किसी अच्छे आदमी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाइए. सम्राट चौधरी जैसे को नहीं. भले किसी कुशवाहा को बनाइए लेकिन अच्छे आदमी को बनाइए.
वहीं बीजेपी की ओर से पहली प्रतिक्रिया में आत्ममंथन की बात कही गई. संभवतः इस हार को भाजपा स्थानीय उम्मीदवार चयन और कम मतदान का परिणाम बताएगी, न कि राज्य में अपने जनाधार में आई किसी बड़ी कमजोरी का संकेत. हालांकि पार्टी को सोचना होगा कि जिन मुद्दों पर प्रशांत चुनाव जीते हैं, वे उसके व्याकरण में कहां ठहरते हैं.
फिर भी जिस सीट पर बीजेपी सबसे ज्यादा आश्वस्त रहती थी और जहां से उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की राजनीतिक पहचान बनी, वहां मिली इस हार के मायने बिहार की राजनीति में दूर तक निकाले जाएंगे.