सम्राट चौधरी और BJP के लिए किस खतरे की चेतावनी है बांकीपुर की हार?
प्रशांत किशोर ने दिखा दिया है कि बिहार में BJP विरोधी मतदाताओं और NDA से नाराज समर्थकों का गठजोड़ चुनावी तौर पर बनाया जा सकता है

बांकीपुर उपचुनाव, जिसमें प्रशांत किशोर ने शानदार जीत दर्ज कर इस सीट पर BJP के दशकों पुराने दबदबे को खत्म कर दिया, सिर्फ पटना की एक शहरी विधानसभा सीट का चुनाव नहीं था. यह अप्रैल में बिहार के मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी की पहली राजनीतिक परीक्षा भी थी.
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह रही कि बिहार में अपने दम पर सरकार की कमान संभालने के बाद BJP की यह पहली चुनावी परीक्षा थी. इसके साथ ही लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के 'सामाजिक न्याय' आधारित नेतृत्व से परिभाषित 36 साल की राज्य की राजनीति का एक दौर भी खत्म हुआ.
करीब तीन दशक तक अपने कब्जे में रही सीट पर BJP की निर्णायक हार और वह भी ऐसी सीट पर, जिसे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने खाली किया था, इसलिए सिर्फ चुनावी गणित तक सीमित नहीं है. यह नए मुख्यमंत्री के लिए साफ चेतावनी है. साथ ही यह याद दिलाती है कि सत्ता विरासत में मिल जाना एक बात है लेकिन राजनीतिक वैधता को मजबूत करना बिल्कुल अलग और समय लेने वाली प्रक्रिया है.
बिहार में वर्षों तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को चुनावी स्तर पर एक संरचनात्मक बढ़त हासिल रही. शहरी मध्यम वर्ग, सवर्णों और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के बड़े हिस्से ने NDA का समर्थन सिर्फ उसके शासन के कारण नहीं किया, बल्कि इसलिए भी किया क्योंकि उन्हें राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की वापसी का डर था.
RJD विरोधी यह भावना गठबंधन के लिए राजनीतिक सुरक्षा कवच का काम करती रही. सरकार से असंतुष्ट मतदाता भी NDA के साथ बने रहे क्योंकि उन्हें कोई स्वीकार्य विकल्प नहीं दिखता था.
बांकीपुर में प्रशांत किशोर के अभियान ने इस बढ़त को तोड़ दिया. उन्होंने बार-बार मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि यहां जन सुराज पार्टी की जीत से न तो NDA सरकार गिरेगी और न ही RJD की वापसी होगी. इससे BJP के खिलाफ वोट देने की मनोवैज्ञानिक कीमत कम हो गई. उनका तर्क सीधा था. यह उपचुनाव सरकार बदलने का नहीं बल्कि BJP से बिहार को बेहतर नेतृत्व देने की मांग करने का चुनाव है.
ऐसा करके प्रशांत ने मतदाताओं के दो ऐसे वर्गों को साथ ला दिया, जो आमतौर पर एक साथ नहीं आते. पहला, पारंपरिक BJP विरोधी मतदाता जो अब RJD की जगह जन सुराज पार्टी को मुख्य चुनौती देने वाली ताकत के रूप में देखने लगे हैं. दूसरा, BJP के समर्थन आधार का वह हिस्सा, जो अपनी नाराजगी तो जताना चाहता था लेकिन RJD को मजबूत नहीं करना चाहता था.
यह बदलाव NDA के लिए सामान्य सत्ता विरोधी लहर से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि यह उसके चुनावी गणित की बुनियाद पर चोट करता है.
19 हजार से अधिक वोटों के अंतर से प्रशांत किशोर की जीत मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे उनके नेतृत्व पर जनमत के रूप में देखा जा सकता है. 2025 के विधानसभा चुनाव के विपरीत, जहां उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं बनाया गया था, बांकीपुर पहला चुनाव बन गया, जिसमें मतदाताओं ने चौधरी को बिहार सरकार के मुखिया के रूप में परखा.
यह अस्वीकृति स्पष्ट थी. जब सत्तारूढ़ दल अपने ही राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा खाली की गई सीट हार जाए और चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्री, वरिष्ठ मंत्री तथा कई स्टार प्रचारकों को उतारने के बावजूद हार मिले, तो इस नतीजे को स्थानीय अपवाद कहकर नहीं टाला जा सकता. यह राजनीतिक सद्भावना में गहरी गिरावट को दिखाता है.
यह गिरावट नेतृत्व के सवाल से भी जुड़ी है. पद संभालने के चार महीने बाद भी सम्राट चौधरी, नीतीश कुमार की लंबी छाया से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने अपनी सरकार का महत्वाकांक्षी एजेंडा पेश किया है और निर्णायक नेता की छवि बनाने का प्रयास किया है. लेकिन अभी तक वे वह राजनीतिक पूंजी और व्यक्तिगत विश्वसनीयता हासिल नहीं कर पाए हैं जो नीतीश ने करीब दो दशकों में अर्जित की थी.
नीतीश की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उनकी योजनाएं नहीं थीं. बल्कि यह व्यापक धारणा भी थी कि प्रशासन पर उनकी मजबूत पकड़ है. उनके आलोचक भी अक्सर मानते थे कि आखिरकार पूरा तंत्र उन्हीं के निर्देश पर चलता है. ऐसी धारणा अभी तक सम्राट चौधरी के बारे में नहीं बन पाई है.
प्रशासनिक बदलाव के बार-बार किए गए वादों के बावजूद, कई मतदाताओं को अब भी नौकरशाही की सुस्ती, फैसले लेने में देरी और अधिकारियों की उदासीनता का सामना करना पड़ रहा है. सम्राट चौधरी के सामने चुनौती इरादों की कमी नहीं, बल्कि नतीजों के नजर नहीं आने की है.
धीरे-धीरे यह धारणा बन रही है कि शीर्ष स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व बदल गया है लेकिन नौकरशाही पहले की तरह ही काम कर रही है. सरकार ने नई पहल की घोषणा तो की है लेकिन उनके क्रियान्वयन में देरी दिख रही है. इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि प्रशासन राजनीतिक तात्कालिकता से ज्यादा नौकरशाही की नियमित कार्यप्रणाली से संचालित हो रहा है.
सम्राट चौधरी की छवि के लिए चुनौती कानून-व्यवस्था से जुड़े कई विवादों ने भी बढ़ाई है. इन घटनाओं ने अपराध के खिलाफ उनके शुरुआती अभियान से बनी सकारात्मक गति को कमजोर किया है. पद संभालने के तुरंत बाद अपराधियों के खिलाफ उनके सख्त बयान और कानून का डर बहाल करने के वादे ने अधिक सख्त प्रशासन की उम्मीद जगाई थी.
लेकिन बाद की घटनाओं ने इस कहानी को जटिल बना दिया. इनमें भोजपुर में भरत तिवारी की विवादित पुलिस मुठभेड़ में मौत और हाल में सीवान में प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग के दौरान पुलिस द्वारा कथित तौर पर AK-47 (असॉल्ट राइफल) के इस्तेमाल का मामला शामिल है.
सरकार ने पुलिस का बचाव किया है. लेकिन इन घटनाओं से कुछ वर्गों में यह धारणा बनी है कि मुख्यमंत्री अभी तक प्रशासनिक और पुलिस तंत्र पर उतनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाए हैं, जितनी इस पद के लिए जरूरी मानी जाती है.
ये धारणाएं सही हों या नहीं, लेकिन इन घटनाओं ने विपक्ष को यह कहने का मौका दिया है कि निर्णायक प्रशासन के सरकार के वादे अभी तक जमीन पर दिखाई नहीं दिए हैं. महज चार महीने पुरानी सरकार के लिए धारणाएं बहुत तेजी से हकीकत का रूप ले सकती हैं.
रोजमर्रा की राजनीति से नीतीश की दूरी ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है. वर्षों तक उनकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता NDA के भीतर स्थिरता का आधार रही. जब शासन में कमी भी रहती थी, तब भी वे जनता की नाराजगी को काफी हद तक अपने ऊपर ले लेते थे.
पद छोड़ने के बाद से नीतीश ने बेहद सीमित राजनीतिक भूमिका निभाई है. ऐसे में वह सुरक्षा कवच अब खत्म हो चुका है. अब BJP का आकलन उसके अपने नेतृत्व, अपने शासन और अपनी प्रशासनिक क्षमता के आधार पर हो रहा है.
इसलिए बांकीपुर का फैसला सिर्फ BJP ही नहीं, बल्कि उसकी अगुवाई वाली सरकार के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए. यह संकेत देता है कि मतदाताओं का एक वर्ग अब सरकार से पहले की तुलना में तेज काम, मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन पर अधिक स्पष्ट नियंत्रण की उम्मीद कर रहा है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अब NDA यह मानकर नहीं चल सकता कि उसके नाराज समर्थक सिर्फ RJD को वोट देने से बचने के लिए उसके साथ बने रहेंगे.
शायद यही बांकीपुर का सबसे बड़ा राजनीतिक सबक है. BJP के सामने अगली बड़ी चुनावी चुनौती ऐसी ताकत से आ सकती है, जो एक साथ BJP विरोधी मतदाताओं और NDA से नाराज समर्थकों को अपने साथ जोड़ सके.
प्रशांत किशोर ने दिखा दिया है कि ऐसा चुनावी गठजोड़ संभव है. वे इसे पूरे बिहार में दोहरा पाएंगे या नहीं, यह अभी निश्चित नहीं है. लेकिन अगर बांकीपुर शुरुआती चेतावनी है तो क्या बिहार में BJP की अगुवाई वाली सरकार इसकी गंभीरता समझ रही है?