बांकीपुर उपचुनाव : दांव पर लगा नितिन नवीन के दो दशक का भरोसा
बिहार BJP की सबसे सुरक्षित शहरी सीट बांकीपुर में उपचुनाव को लेकर एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या नीरज सिन्हा, नितिन नवीन की तरह, इस सीट पर BJP की मजबूत साख कायम रख पाएंगे?

करीब दो दशकों से पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर लोग सिर्फ BJP को नहीं बल्कि एक व्यक्ति के लिए भी वोट करते रहे हैं. नितिन नवीन लगातार पांच बार इस सीट से विधायक चुने गए और उन्होंने इसे बिहार में BJP के सबसे मजबूत शहरी गढ़ों में से एक बना दिया.
बदलते राजनीतिक माहौल, सत्ता विरोधी लहर और 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव के मजबूत सामाजिक गठबंधन के बावजूद नितिन नवीन ने बड़ी जीत हासिल की. उस चुनाव में BJP को बिहार में अपनी सबसे बड़ी हारों में से एक का सामना करना पड़ा था लेकिन बांकीपुर से नितिन नवीन ने आराम से जीत दर्ज की.
यह रिकॉर्ड बताता है कि BJP का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बावजूद नितिन नवीन 13 जुलाई को पटना पहुंचे. उन्होंने BJP की चुनावी टीम से मुलाकात की और बांकीपुर उपचुनाव की रणनीति को अंतिम रूप दिया. उनका दौरा छोटा लेकिन काफी अहम माना गया. पटना में उन्होंने पार्टी के चुनाव प्रबंधकों के साथ विस्तार से चर्चा की और अगले ही दिन लौट गए.
पार्टी के भीतर इस दौरे को नितिन नवीन के बांकीपुर पर भरोसे और BJP की चुनावी कार्यशैली का संकेत माना गया. राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारियां सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं हैं. इसके बावजूद उन्होंने करीब दो दशक तक जिस सीट का प्रतिनिधित्व किया, वहां की तैयारियों की खुद समीक्षा की. इससे यह भी साफ हुआ कि BJP हर सीट बचाने को कितना महत्व देती है और नितिन नवीन को बांकीपुर के मतदाताओं पर कितना भरोसा है.
30 जुलाई को होने वाला यह उपचुनाव सिर्फ नया विधायक चुनने का चुनाव नहीं है. यह इस बात की भी परीक्षा है कि बिहार के प्रमुख BJP नेताओं में शामिल नितिन नवीन क्या अपने 20 वर्षों की व्यक्तिगत साख और भरोसा अपेक्षाकृत कम चर्चित उत्तराधिकारी तक पहुंचा पाएंगे.
14 जुलाई को अपने पुराने निर्वाचन क्षेत्र में लौटने के बाद पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में नितिन नवीन ने बार-बार मतदाताओं से अपील की कि वे BJP उम्मीदवार नीरज सिन्हा को भी वही स्नेह और विश्वास दें, जो उन्होंने वर्षों तक उन्हें दिया. उन्होंने कहा, "बांकीपुर की जनता ने मुझे जो स्नेह, विश्वास और आशीर्वाद दिया, वही नीरज सिन्हा की शानदार जीत सुनिश्चित करेगा."
यह सिर्फ चुनावी अपील नहीं थी बल्कि BJP के पूरे चुनाव अभियान का मुख्य आधार थी. कई नेताओं की तरह सिर्फ संगठन के दम पर सुरक्षित सीट पाने के बजाय नितिन नवीन ने बांकीपुर के लोगों के साथ एक बेहद व्यक्तिगत रिश्ता बनाया. उनके पिता स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने इसकी नींव रखी थी लेकिन पिछले 20 वर्षों में नितिन नवीन ने इस विरासत को एक मजबूत और स्थायी रिश्ते में बदल दिया.
लोग उन्हें सिर्फ अपने विधायक के रूप में नहीं बल्कि हमेशा उपलब्ध रहने वाले जनप्रतिनिधि के रूप में देखने लगे. वे मोहल्लों के कार्यक्रमों में शामिल होते, सड़क, नाली, पेयजल, पार्क, सामुदायिक ढांचे और अन्य नागरिक सुविधाओं जैसी समस्याओं में दखल करते रहे और चुनाव से आगे बढ़कर लोगों से रिश्ते बनाते रहे.
बिहार सरकार में मंत्री रहने के दौरान उन्होंने अपने पद का उपयोग बांकीपुर में शहरी जीवन की गुणवत्ता सुधारने वाली परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए किया. दो दशकों में उनकी उपलब्धता और शहरी विकास को लेकर सोच ने इस राजनीतिक क्षेत्र को उनके लिए एक व्यक्तिगत जनाधार में बदल दिया.
BJP ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. निखिल आनंद कहते हैं, "बांकीपुर के लोगों के लिए यह चुनाव भावनाओं से जुड़ा है. इसका कारण नितिन नवीन और उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के साथ लोगों का जमीनी रिश्ता है. नितिन नवीन हमेशा लोगों के सुख-दुख में साथ खड़े रहे हैं और बदले में हम भी उनके परिवार के सुख-दुख में शामिल होते हैं. हमारे लिए नितिन नवीन किसी फिल्म स्टार से भी बड़े सेलिब्रिटी हैं."
अब नितिन नवीन इसी रिश्ते को अपने उत्तराधिकारी तक पहुंचाने की अपील कर रहे हैं. उन्होंने कहा, "जिस तरह बांकीपुर की जनता ने मुझे अपने छोटे भाई की तरह आशीर्वाद दिया, मुझे विश्वास है कि उसी तरह वह मेरे छोटे भाई नीरज सिन्हा को भी वही विश्वास और आशीर्वाद देगी." उन्होंने यह भी कहा कि भले ही वे राज्यसभा चले गए हों, "बांकीपुर कभी मुझसे दूर नहीं होगा और उसके विकास का मेरा संकल्प हमेशा बना रहेगा."
BJP को भरोसा है कि नितिन नवीन की साख नीरज सिन्हा की जीत में बदल जाएगी लेकिन चुनौती आसान नहीं है. नीरज सिन्हा संगठन के समर्पित कार्यकर्ता और पूर्व मंडल अध्यक्ष रहे हैं लेकिन उनकी सार्वजनिक पहचान नितिन नवीन जैसी नहीं है. दिलचस्प बात यह है कि खुद नवीन ने भी इसे स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि भले ही नीरज सिन्हा अभी व्यापक रूप से प्रसिद्ध न हों लेकिन जिन इलाकों में उन्होंने काम किया है वहां लोग उन्हें उनकी प्रतिबद्धता और सेवा के लिए जानते हैं.
यानी BJP मतदाताओं से कह रही है कि वे नीरज पर इसलिए भरोसा करें क्योंकि उन्हें नितिन नवीन पर भरोसा है. हालांकि यह उतना आसान नहीं हो सकता. राजनीतिक इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां लोकप्रिय नेताओं की व्यक्तिगत साख उनके उत्तराधिकारियों तक पूरी तरह नहीं पहुंच सकी. वर्षों की व्यक्तिगत मेहनत से मिले वोट किसी दूसरे उम्मीदवार के खाते में अपने आप नहीं चले जाते, चाहे संगठन कितना भी मजबूत क्यों न हो.
फिर भी, अगर बिहार BJP में कोई नेता ऐसा करने की कोशिश कर सकता है तो वह नितिन नवीन हैं. उनका चुनावी रिकॉर्ड इसकी गवाही देता है. उन्होंने 2006 में बांकीपुर जीता, 2010 में सीट बरकरार रखी, 2015 की BJP विरोधी लहर में भी जीत हासिल की, 2020 में फिर जीते और उसके बाद हुए चुनाव में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली. बिहार में शहरी क्षेत्रों के बहुत कम BJP नेता किसी एक सीट पर इतनी लंबी चुनावी सफलता हासिल कर पाए हैं.
इसी वजह से इस चुनाव की एक और दिलचस्प बात सामने आई है. जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर को अपना सबसे चर्चित चुनावी मैदान बनाने के बावजूद नितिन नवीन पर सीधे हमला करने से काफी हद तक परहेज किया है. उनकी आलोचना मुख्य रूप से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और BJP सरकार पर केंद्रित रही है.
इस रणनीति की वजह समझी जा सकती है. अगर वे सीधे नितिन नवीन पर हमला करते तो उन मध्यमवर्गीय और पारंपरिक BJP मतदाताओं को नाराज करने का जोखिम रहता, जिन्हें वे अपनी ओर लाना चाहते हैं. सरकार को निशाना बनाकर लेकिन पूर्व विधायक पर सीधे हमला न करके, जन सुराज शायद यह मान रही है कि बांकीपुर में नितिन नवीन की व्यक्तिगत लोकप्रियता अब भी कायम है. यहां तक कि उन मतदाताओं के बीच भी जो राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.
BJP नेता डॉ. निखिल आनंद ने कहा, "इस चुनाव में वास्तव में कोई भी प्रशांत किशोर की ओर नहीं देख रहा है. वह ज्यादा से ज्यादा अपने नाटकीय बयानों से चुनाव प्रचार में कुछ रंग भर सकते हैं." दूसरी ओर BJP ने अपनी संगठनात्मक संस्कृति के अनुरूप जवाब दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी की एक खास पहचान रही है कि वह किसी भी चुनाव को छोटा नहीं मानती. पंचायत चुनाव, नगर निकाय चुनाव, विधानसभा उपचुनाव या लोकसभा चुनाव, हर चुनाव में पार्टी उसकी संख्या से कहीं ज्यादा संगठनात्मक ताकत लगाती है.
बांकीपुर भी इसका अपवाद नहीं है. इसलिए पार्टी ने सिर्फ संगठन ही नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी, भले ही थोड़े समय के लिए, तैयारियों की निगरानी के लिए भेजा. यह फैसला दिखाता है कि BJP किसी भी प्रतीकात्मक सीट को छोड़ना नहीं चाहती और किसी भी राजनीतिक विरासत को असुरक्षित नहीं छोड़ना चाहती.
आखिरकार यह उपचुनाव सिर्फ नीरज सिन्हा की परीक्षा नहीं है. यह इस बात की भी परीक्षा है कि क्या नितिन नवीन ने 20 वर्षों में जो भरोसा बनाया, वह किसी दूसरे बीजेपी नेता तक पहुंच सकता है? और क्या लगातार पांच चुनावी जीतों से बना राजनीतिक रिश्ता उस व्यक्ति के हटने के बाद भी कायम रह सकता है जिसने उसे बनाया?
इन सवालों के जवाब सिर्फ यह तय नहीं करेंगे कि बांकीपुर का अगला विधायक कौन होगा. वे भारतीय राजनीति की एक बड़ी सच्चाई भी सामने रखेंगे. पार्टियां उम्मीदवार तय कर सकती हैं लेकिन भरोसा अब भी व्यक्तियों का होता है. बांकीपुर में उस भरोसे का नाम आज भी एक ही है- नितिन नवीन.