गहलोत-डोटासरा की खींचतान में उलझी राजस्थान कांग्रेस

राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आदिवासी नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय की घर वापसी के दौरान उन पर जो निशाना साधा, उसे अशोक गहलोत के लिए संदेश के तौर पर देखा जा रहा है

अशोक गहलोत और गोविंद सिंह डोटासरा (फाइल फोटो)

राजस्थान कांग्रेस के सामने एक नया संकट खड़ा हो गया है. आदिवासी नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय की पार्टी में वापसी के दौरान जो घटनाक्रम सामने आया, वह सिर्फ एक असहज घर वापसी समारोह नहीं था. इसने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच बढ़ती खाई को सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया.

इस विवाद की शुरुआत तब हुई, जब पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद और चार बार विधायक रहे मालवीय ने 30 जुलाई को औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल होने से पहले जयपुर में अशोक गहलोत के आवास पर उनसे मुलाकात की. उनके साथ करीब 300 समर्थक भी थे. मालवीय ने गहलोत का आभार जताया और समर्थकों ने गहलोत को चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने के नारे लगाए.

माना जा रहा है कि इसी बात ने डोटासरा को नाराज कर दिया. प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) कार्यालय में मालवीय की मौजूदगी में डोटासरा ने ऐसा बयान दिया जो ऊपर से तो मालवीय के लिए था लेकिन उसका निशाना साफ तौर पर गहलोत थे. 

डोटासरा ने 'व्यक्तिगत ब्रांडिंग' की राजनीति की आलोचना करते हुए पूछा कि ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है, “खुद का प्रचार करने वाला नेता या पार्टी.” उन्होंने कहा कि व्यक्तिपूजा की राजनीति के कारण कांग्रेस कई बार सत्ता से बाहर हुई है. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 2023 विधानसभा चुनाव से पहले गहलोत को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने वाले नारों के बावजूद पार्टी हार गई थी.

डोटासरा यहीं नहीं रुके. उन्होंने मालवीय को याद दिलाया कि पार्टी में उनकी वापसी पार्टी आलाकमान के सामने उनकी सिफारिश के कारण संभव हुई. इसका संकेत यह था कि सिर्फ गहलोत के प्रयासों से उनकी वापसी नहीं हो सकती थी. 

उन्होंने यह भी कहा कि मालवीय उनसे वरिष्ठ हैं लेकिन “आज वे मेरे पीछे खड़े हैं.” इसके बाद डोटासरा ने कहा कि संगठन के बिना कोई भी नेता, चाहे कितना बड़ा क्यों न हो, चुनाव नहीं जिता सकता.

राजनीतिक जानकार इसे राजस्थान कांग्रेस में गहलोत के मजबूत व्यक्तिगत प्रभाव के मुकाबले संगठन की ताकत का अब तक का सबसे तीखा सार्वजनिक प्रदर्शन मान रहे हैं.

विडंबना यह है कि डोटासरा का राजनीतिक उभार खुद गहलोत की वजह से हुआ था. 2020 में सचिन पायलट के असफल विद्रोह के बाद गहलोत ने ही उस समय के शिक्षा मंत्री डोटासरा को राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष बनवाया था. छह साल बाद अब वे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत दिखाते नजर आ रहे हैं.

क्या डोटासरा का यह असामान्य रूप से आक्रामक रुख उनके अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंता का संकेत है? विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं लेकिन यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या कांग्रेस आलाकमान उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखेगा. 

गहलोत लगातार किसी भी ऐसे कदम का विरोध करते रहे हैं जिससे सचिन पायलट की संगठन के शीर्ष पद पर वापसी हो. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे डोटासरा का समर्थन ही करेंगे. क्या यही अनिश्चितता इस टकराव की वजह है?

अगले दिन गहलोत की प्रतिक्रिया संतुलित रही. उन्होंने कहा कि वह आमतौर पर समर्थकों को अपने घर आने से मना करते हैं. उन्होंने दावा किया कि मालवीय ने शिष्टाचार मुलाकात के लिए कई बार आग्रह किया था क्योंकि उनके कार्यकर्ता गहलोत से मिलना चाहते थे. गहलोत ने स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम मालवीय के कांग्रेस में औपचारिक प्रवेश के लिए नहीं था.

यह माहौल को शांत करने की कोशिश थी बिना सीधे तौर पर डोटासरा से टकराव किए. लेकिन तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका था. प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) कार्यालय पहुंचने से पहले कार्यकर्ताओं का “गहलोत फिर मुख्यमंत्री” के नारे लगाना राजस्थान कांग्रेस की एक पुरानी हकीकत को फिर सामने ले आया. गहलोत भले अब सत्ता में नहीं हैं, लेकिन पार्टी के भीतर आज भी उनका मजबूत जनाधार और भावनात्मक प्रभाव कायम है.

इस विवाद ने कांग्रेस और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के रिश्तों को भी उलझा दिया है. पार्टी के संस्थापक और सांसद राजकुमार रोत ने कांग्रेस के उस दावे पर सवाल उठाया कि मालवीय के साथ बड़ी संख्या में BAP कार्यकर्ता भी कांग्रेस में शामिल हुए हैं. उन्होंने पूछा कि क्या कांग्रेस का मकसद BJP से लड़ना है या फिर BAP को कमजोर करना.

यह सवाल मामूली नहीं है. दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी इलाके में BAP एक मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है. अगर यह धारणा बनती है कि कांग्रेस BAP के कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है तो BJP के खिलाफ भविष्य में दोनों दलों के बीच तालमेल प्रभावित हो सकता है.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि मालवीय प्रकरण अब राजस्थान कांग्रेस में नेतृत्व के उत्तराधिकार की परोक्ष लड़ाई बन चुका है. डोटासरा के बयान बताते हैं कि वे यह स्थापित करना चाहते हैं कि संगठन की असली ताकत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पास है यानी उनके पास. दूसरी ओर गहलोत खेमा लगातार यह संदेश दे रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री आज भी राज्य में कांग्रेस के सबसे बड़े जननेता हैं.

अब सबसे बड़ा रहस्य यह है कि गहलोत अगले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर किसे देखना चाहते हैं. अगर सचिन पायलट नहीं तो क्या वे डोटासरा को एक और कार्यकाल दिलाने का समर्थन करेंगे? या फिर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सर्वसम्मति वाले विकल्प के रूप में उभर रहे हैं? या गहलोत बिना किसी औपचारिक संगठनात्मक पद पर रहते हुए भी निर्णायक प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं?

राजस्थान में सत्तारूढ़ BJP को चुनौती देने की तैयारी कर रही कांग्रेस के लिए यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हुआ है. आदिवासी क्षेत्र के एक बड़े नेता की घर वापसी का जश्न मनाने के बजाय पार्टी ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि उसकी सबसे बड़ी लड़ाई अभी भी अपने ही भीतर चल रही है.

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