तेलंगाना में जीतकर भी ओवैसी की महत्वाकांक्षाओं को लग सकता है झटका
तेलंगाना में AIMIM ने पिछले विधानसभा चुनाव की तरह ही इस बार भी 7 सीटें जीती हैं लेकिन अपनी सहयोगी बीआरएस की हार के मुकाबले उसे एक अन्य मोर्चे पर बड़ा झटका लग सकता है

पिछले विधानसभा चुनावों की तरह ही तेलंगाना में इस बार भी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने 7 सीटें जीती हैं. फर्क बस इतना है कि पिछली बार 7 सीटें जीतकर पार्टी सत्ता में थी और इस बार सत्ता से बाहर. हालांकि सत्ता से बाहर होना AIMIM के लिए उतनी बड़ी चुनौती नहीं है जितना बड़ा धक्का पार्टी एक दूसरे मोर्चे पर लगा है.
सिर्फ हैदराबाद से ही सीटों पर चुनाव लड़ने वाली AIMIM ने 2018 के विधानसभा चुनावों की तरह ही इस बार भी 7 सीटें जीती मगर वोटों की संख्या जो पिछली बार 5,61,091 थी, इस बार घटकर 5,19,379 रह गई है. यही नहीं पार्टी का वोट शेयर भी 2.71 प्रतिशत से घटकर 2.22 प्रतिशत पर आ गया है. इसका सीधा सा मतलब है कि पार्टी से वोट छिटके हैं.
भले ही 2009 से लगातार जीती जाने वाली सीटों में AIMIM ने बाजी मारी मगर 7 में से 2 सीटों, याकूतपुरा और नम्पल्ली पर, वह बस किसी तरह फिनिश लाइन को पार कर सकी.
बिहार के 2020 विधानसभा चुनावों में ओवैसी की पार्टी ने 5 सीटें जीतकर राजद के लिए न सिर्फ चुनावी समीकरण बिगाड़ा बल्कि सीमांचल क्षेत्र में बड़ी चुनावी रैलियां कर के अपने एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के लिए मशहूर लालू यादव की पार्टी के समकक्ष अल्पसंख्यकों के लिए एक विकल्प की तरह भी खुद को पेश किया. इसके अलावा महाराष्ट्र में भी AIMIM ने 2019 में अपना वोट शेयर 0.9 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.4 प्रतिशत कर लिया था जिससे पार्टी के बढ़ते सियासी प्रभाव को साफ देखा जा सकता था.
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सीटों का समीकरण बिगाड़ कर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा रखने वाली AIMIM क्या अपने ही गढ़ में मुस्लिम वोटर्स को लुभाने में पिछड़ रही है? देशभर के मुसलमानों को केंद्र में रखकर कांग्रेस और बीजेपी पर हमलावर होने वाले ओवैसी अगर अपने ही शहर में पिछड़े तो उनकी विश्वसनीयता कमजोर तो होगी ही. इसका सीधा सा मतलब है कि बाकी राज्यों में जहां ओवैसी की पार्टी चुनाव लड़ेगी वहां मुसलमानों के बीच कांग्रेस को ज्यादा तवज्जो मिल सकती है.
इधर तेलंगाना 9 में से भले ही AIMIM ने 7 सीटें जीती हों मगर बाकी की सीटों पर उन्होंने बीआरएस को पूरा समर्थन दिया. यहां तक कि जहां ओवैसी की पार्टी कोई चुनाव नहीं लड़ रही थी, वहां भी उन्होंने जाकर बीआरएस के काम की तारीफ की. ऐसा नहीं है कि मामला एकतरफा था - इससे पहले सत्ता में रह चुकी बीआरएस भी किसी भी तरह के अल्पसंख्यकों से जुड़ी स्कीम में AIMIM को अपने पाले में रखकर ही आगे बढ़ती थी.
अब कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद बीआरएस से ज्यादा चुनौती ओवैसी की पार्टी के सामने होगी क्योंकि मुस्लिम वोटर्स के सामने अब एक और विकल्प खुल गया है. विकल्प तब और विश्वसनीय हो जाता है जब वो सत्तारूढ़ हो. AIMIM ने कांग्रेस का मुखर रूप से हमेशा विरोध किया है जिसकी वजह से राहुल गांधी की पार्टी उन्हें बीजेपी का 'बी टीम' बताती रही है. इसी पर नतीजों के बाद ओवैसी का कहना था,"हमने 8 सीटों पर बीआरएस के लिए पब्लिक मीटिंग की थी जिसमें से 7 पर बीआरएस जीती और 1 पर कांग्रेस. बीजेपी कहीं पर नहीं जीती. आप इसके कई नतीजे निकाल सकते हैं जैसे सौदा हुआ या नहीं. आगे कैसा माहौल रहेगा कुछ पता नहीं. नई हुकूमत बनेगी तो जाहिर है हमें भी उन्हें टाइम देना पड़ेगा. मगर ये बात सच है कि हम एक आक्रामक विपक्ष का रुख अख्तियार करेंगे और जनता के मुद्दों को उठाते रहेंगे."
हाल ही में ओवैसी की पार्टी की तरफ से कांग्रेस के रेवंत रेड्डी पर भी सवाल उठाए गए थे. उनके संघ और ABVP से पिछले संबंधों को लेकर AIMIM ने रेवंत रेड्डी पर निशाना साधा था. ऐसे में सत्ता पर काबिज होने के बाद अब कांग्रेस के रडार पर ओवैसी के मुस्लिम वोटर्स हो सकते हैं. इसी वजह से संभव है कि तेलंगाना में आने वाले दिनों में दोनों पार्टियों के बीच उठापटक देखने को मिले.