आंध्र प्रदेश की 95 फीसदी कमाई कर्मचारियों पर खर्च! किस मुश्किल में फंसे नायडू?
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की सरकार के सामने वेतन, पेंशन और बकाया भुगतान की चुनौती, कर्मचारी संगठनों का दावा HR खर्च सरकार के बताए आंकड़े से कम

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू (फाइल फोटो)
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की 2024-26 की प्रगति रिपोर्ट पेश की. इसमें उन्होंने दो मुद्दों पर चिंता जताई. पहला, 2014 में तेलंगाना के गठन के लिए हुआ राज्य का बंटवारा, जिसके बारे में उनका कहना है कि इससे आंध्र प्रदेश के पास राजस्व की कमी हो गई.
दूसरा मुद्दा था युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) का पांच साल का शासन (2019-24), जिसे उन्होंने व्यापक कुशासन और संस्थानों के कमजोर होने का दौर बताया. उनके मुताबिक, इस दौरान 'ब्रांड आंध्र' को इतना नुकसान पहुंचा कि उसकी छवि तक प्रभावित हुई.
नायडू अब भी तेलंगाना के पास चले गए हैदराबाद को लेकर दुख जताते हैं. हैदराबाद आईटी और फार्मा का बड़ा केंद्र है और नायडू ने अपने पिछले मुख्यमंत्रित्व काल में इसके विकास में अहम भूमिका निभाई थी.
उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री और YSRCP प्रमुख जगन मोहन रेड्डी के कार्यकाल पर आंध्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने का आरोप भी लगाया. इसमें नायडू की अमरावती राजधानी परियोजना का रुकना भी शामिल है.
लेकिन 4 अगस्त को दो घंटे चली प्रगति रिपोर्ट का प्रेजेंटेशन, जिसे राज्य के वित्त पर श्वेतपत्र भी कहा गया, में सबसे चौंकाने वाली बात वह थी जिसे नायडू ने विरासत में मिली समस्या बताया. रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश का HR खर्च यानी कर्मचारियों को सैलरी के साथ दूसरी मदों में दिया जाने वाला पैसा राज्य के अपने राजस्व (SOR) का 95 फीसदी है. 2025-26 में राज्य सरकार ने अपने कर्मचारियों के वेतन और अन्य भत्तों पर 1,05,039 करोड़ रुपए खर्च किए.
इसी साल पड़ोसी राज्य कर्नाटक में HR बिल उसके अपने राजस्व का सिर्फ 28 फीसदी था, जबकि तेलंगाना में यह 44 फीसदी था. नायडू ने बताया कि तमिलनाडु और केरल में इसी मद में खर्च क्रमशः 49 और 68 फीसदी था.
नायडू ने कहा कि YSRCP के शासन के दौरान HR खर्च SOR का 110 फीसदी था. यह उनके पिछले कार्यकाल 2014 से 2019 के दौरान रहे औसत 87 फीसदी से 23 फीसदी अधिक था.
मुख्यमंत्री ने कहा, "HR खर्च ज्यादा होने से हमारा राजकोषीय बोझ बढ़ गया है." उनका दावा है कि YSRCP सरकार के दौरान इसमें तेज बढ़ोतरी जगन रेड्डी के कार्यकाल में जरूरत से ज्यादा सरकारी नियुक्तियों के कारण हुई. अधिकारियों के मुताबिक, रेड्डी की चर्चित ग्राम और वार्ड सचिवालय व्यवस्था के लिए करीब 1.26 लाख कर्मचारियों की नियुक्ति की गई थी.
नायडू ने कहा कि पिछले दो वित्त वर्षों में औसत को घटाकर 96 फीसदी किया गया है. नायडू ने शीर्ष मंत्रियों और अधिकारियों से कहा, "HR बिल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है और इसे संतुलित करना महत्वपूर्ण है."
विपक्षी YSRCP ने नायडू के आंकड़ों और बयानों को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्हें "पूरी तरह गलत और तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने वाला" बताया.
YSRCP की राजनीतिक सलाहकार समिति के सदस्य दुव्वुरी कृष्णा ने कहा, "नायडू के पिछले कार्यकाल में भी कुछ वर्षों में HR खर्च SOR का 98 फीसदी तक था, जैसे 2017-18 में. 2020-21 में (जगन रेड्डी के कार्यकाल में) यह अनुपात 123 फीसदी तक पहुंच गया था क्योंकि कोविड-19 महामारी से राजस्व बुरी तरह प्रभावित हुआ था. हमने कर्मचारियों को 27 फीसदी अंतरिम राहत भी दी थी."
दुव्वुरी ने कहा, "अर्थव्यवस्था में सुधार आने के बाद 2024 में जब हमने सत्ता सौंपी, तब तक यह अनुपात घटकर करीब 98 फीसदी हो चुका था. नायडू का दावा है कि उन्होंने पिछले साल यही आंकड़ा हासिल किया है."
जगन रेड्डी के मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष सचिव (वित्त) रह चुके दुव्वुरी ने कहा, "इन दो वर्षों में नायडू ने कर्मचारियों को मिलने वाला महंगाई भत्ता और अन्य लाभ जारी नहीं किए हैं, फिर भी उनका दावा है कि उन्होंने HR खर्च कम कर दिया है."
दूसरे राज्यों की तुलना में आंध्र प्रदेश की स्थिति कैसी है? नायडू ने कहा कि कर्नाटक में राज्य का राजस्व बढ़ा, जबकि कर्मचारियों की संख्या कम हुई. नायडू के मुताबिक, मजबूत कर्मचारी और श्रमिक यूनियन संस्कृति वाले केरल में भी HR खर्च 68 फीसदी है.
नायडू ने कहा, "हमें सभी कर्मचारियों को वेतन देना है. यह विरासत में मिली समस्या है, जिसका सामना आंध्र प्रदेश कर रहा है और इससे निपटते समय हमें सावधान रहना चाहिए. बंटवारे के बाद ज्यादा कर्मचारी हमारे पास आ गए, जबकि संसाधन तेलंगाना के पास रह गए."
ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब कर्मचारी यूनियन लंबे समय से लंबित अपनी मांगों, जैसे वेतन संशोधन और बकाया भुगतान, के समाधान के लिए दबाव बना रहे हैं. इन बकायों का अनुमान करीब 50,000 करोड़ रुपए है.
कर्मचारियों की आंध्र प्रदेश संयुक्त कार्रवाई समिति अमरावती के अध्यक्ष बोप्पाराजू वेंकटेश्वरलु ने HR खर्च को लेकर नायडू के दावों पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि वेतन और पेंशन SOR का सिर्फ 59 फीसदी है.
SOR वह आय है जिसे राज्य सरकारें अपने कर और गैर-कर स्रोतों से सीधे जुटाती हैं. इसमें आबकारी शुल्क, स्टांप शुल्क और पंजीकरण शुल्क, ब्याज से होने वाली आय और खनन से मिलने वाली रॉयल्टी शामिल हैं. इसमें केंद्र से मिलने वाले करों में राज्य का हिस्सा और अनुदान शामिल नहीं होते.
वित्त विभाग के प्रमुख सचिव पीयूष कुमार ने इंडिया टुडे से आंध्र प्रदेश के HR बिल में तेज बढ़ोतरी के कारणों पर बात की. उनके मुताबिक, राज्य सरकार हर महीने औसतन 13 लाख लोगों को वेतन और पेंशन देती है. इस पर 1.05 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं.
इसमें नियमित कर्मचारी (67 फीसदी), पेंशनभोगी (25 फीसदी), सहायता अनुदान पाने वाले कर्मचारी, पेशेवर, दिहाड़ी कर्मचारी और अनुबंध/आउटसोर्सिंग कर्मचारी शामिल हैं. सरकार स्थानीय निकायों और सड़क परिवहन निगम जैसी कुछ निगमों के कर्मचारियों को भी वेतन देती है.
2013-14 में अविभाजित आंध्र प्रदेश का HR खर्च 43,276 करोड़ रुपए था, जो SOR का 54 फीसदी था. राज्य के बंटवारे के बाद आंध्र प्रदेश को अविभाजित राज्य के संसाधनों का केवल करीब 46 फीसदी हिस्सा मिला, लेकिन उसे 58 फीसदी आबादी का हिस्सा संभालना पड़ा.
कुमार ने कहा कि अर्थव्यवस्था में लगभग रातोरात बड़े संरचनात्मक बदलाव हुए. कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 2013-14 में 24 फीसदी थी, जो बंटवारे के तुरंत बाद 2014-15 में बढ़कर 31 फीसदी हो गई. 2025-26 में यह और बढ़कर 33 फीसदी हो गई.
दूसरी ओर, हैदराबाद के तेलंगाना में चले जाने के बाद IT समेत राजस्व पैदा करने वाले सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी में तेज गिरावट आई. 2013-14 में यह 51 फीसदी थी, जो बंटवारे के तुरंत बाद 2014-15 में घटकर 44 फीसदी रह गई और 2025-26 में 43 फीसदी हो गई.
कुमार ने बताया कि बंटवारे के बाद आंध्र प्रदेश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का संसाधन आधार कमजोर है और वह राज्य के राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान नहीं दे सकती.
2013-14 में संयुक्त आंध्र प्रदेश का SOR/GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) अनुपात 8.7 फीसदी था. 2024-25 में यह घटकर 6 फीसदी रह गया, जबकि उसी वर्ष तेलंगाना में यह 8.7 फीसदी था.
नायडू के मुताबिक, YSRCP शासन के दौरान जरूरत से ज्यादा नियुक्तियों ने HR का बोझ बढ़ाया. इनमें जगन रेड्डी के चर्चित ग्राम और वार्ड सचिवालयों में करीब 1.26 लाख कर्मचारियों की नियुक्ति और 2.5 लाख युवाओं को ग्राम/वार्ड स्वयंसेवक के तौर पर लगाया जाना शामिल है. नायडू के मुताबिक, इससे "2019 के बाद वेतन का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ गया."
हालांकि, दुव्वुरी ने वार्ड, ग्राम सचिवालय के कर्मचारियों और स्वयंसेवकों की नियुक्ति को जगन रेड्डी की क्रांतिकारी पहल बताया. उनके मुताबिक, इससे "स्थानीय प्रशासन आसान हुआ और लोगों को उनके घर तक सेवाएं पहुंचाने में मदद मिली."
2.5 लाख स्वयंसेवक अब काम नहीं कर रहे हैं. उन्हें हर महीने 5,000 रुपए मानदेय दिया जाता था.
प्रमुख सचिव कुमार ने इसके अलावा कुछ और कारण भी बताए. उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश सरकार आशा कार्यकर्ताओं को 10,000 रुपए मानदेय देती है, जो राज्यों में सबसे ज्यादा है. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को 11,500 रुपए का मानदेय भी देश में सबसे अधिक में से एक है.
इन सभी कारणों से आंध्र प्रदेश के SOR में HR खर्च का अनुपात बहुत ज्यादा बना हुआ है.
हालांकि, कर्मचारी यूनियन के नेताओं ने 2025-26 के भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वेतन और पेंशन SOR का केवल 59.36 फीसदी और कुल राजस्व प्राप्तियों का 47.64 फीसदी है.
वेंकटेश्वरलु ने कहा, "तेलुगु देशम पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) कर्मचारियों की समस्याओं के जल्द समाधान और बकाया भुगतान का वादा करके सत्ता में आया था. YSRCP शासन के समय से लंबित भुगतान करीब 28,000 करोड़ रुपए हैं. मौजूदा सरकार के दो साल में 20,000 करोड़ रुपए से ज्यादा और जुड़ने का अनुमान है."
आंध्र प्रदेश के पुनर्निर्माण और अत्याधुनिक राजधानी अमरावती के निर्माण में जुटे मुख्यमंत्री नायडू के सामने तुरंत निपटाने के लिए कई अन्य अहम मुद्दे भी हैं. पिछली नायडू सरकार ने 2014 में राज्य सरकार के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष कर दी थी. इसके बाद जगन रेड्डी ने 2022 में इसे बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया.
इस जुलाई में नायडू सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), निगमों और सोसाइटियों के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र भी बढ़ाकर 62 वर्ष करने का आदेश जारी किया.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के फैसलों से सरकार सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान को टाल सकती है. यह ऐसा खर्च है, जो सरकारी खजाने पर पड़ने वाले कुल बोझ का एक बड़ा हिस्सा होता है.