आनंदीबेन पटेल के सवालों के घेरे में योगी सरकार!
गोरखपुर से लखनऊ और कानपुर तक राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विश्वविद्यालयों और ब्यूरोक्रेसी की खामियों पर सवाल उठाए हैं. उनकी टिप्पणियों से विपक्ष को योगी सरकार को घेरने का मौका मिला है और 2027 से पहले सियासी बहस भी तेज हुई है

राजभवन से लेकर विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों तक इन दिनों उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का अंदाज कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है. जिस मंच पर आमतौर पर मेधावी छात्रों को पदक और डिग्रियां देकर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है, उसी मंच से राज्यपाल अब विश्वविद्यालय प्रशासन, अधिकारियों और सरकारी व्यवस्थाओं की कमियां गिना रही हैं.
कहीं हॉस्टल में मेस नहीं है, कहीं छात्रों को खराब खाना मिल रहा है, कहीं वाई-फाई नहीं चल रहा, कहीं सफाई व्यवस्था बदहाल है तो कहीं सरकारी फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमते-घूमते अटक जाती है. राज्यपाल इन सब पर खुलकर बोल चुकी हैं.
सबसे ज्यादा चर्चा 6 अगस्त को दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के 45वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल की तल्ख टिप्पणी की हुई. गोरखपुर में उन्होंने कहा, "लोगों को शायद बुरा लगेगा, लेकिन जो हमारी कमियां हैं वे तो हमें बतानी ही पड़ेंगी. आने वाले तीन महीने में पूरा करके दिखाओ."
इसके बाद उन्होंने सवाल किया कि जब गोरखपुर में ही ऐसी कमियां हैं, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक और आध्यात्मिक आधार है, तो प्रदेश के बाकी विश्वविद्यालयों का क्या हाल होगा?
यह सिर्फ किसी विश्वविद्यालय की व्यवस्था पर सामान्य नाराजगी नहीं थी. गोरखपुर उत्तर प्रदेश की सत्ता के लिहाज से प्रतीकात्मक शहर है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंबे समय तक गोरखपुर से सांसद रहे हैं और गोरखनाथ मठ से उनका गहरा जुड़ाव है.
ऐसे में राज्यपाल का यह कहना कि मुख्यमंत्री के शहर में ही ऐसी कमियां हैं, राजनीतिक तौर पर अपने आप में एक संदेश बन गया. विपक्ष ने इसे तुरंत सरकार के खिलाफ हथियार बना लिया और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर कथित मतभेदों की तरफ इशारा शुरू हो गया.
गोरखपुर से निकला सवाल
गोरखपुर विश्वविद्यालय में राज्यपाल ने हॉस्टल की व्यवस्थाओं पर सीधे सवाल उठाए. विश्वविद्यालय में नौ हॉस्टल हैं, जिनमें छह लड़कों और तीन लड़कियों के लिए हैं. राज्यपाल ने बताया कि लड़कियों के हॉस्टल में मेस चल रही है, जबकि लड़कों के हॉस्टल में मेस की सुविधा नहीं है और छात्र बाहर से टिफिन मंगाते हैं.
उनका सवाल था कि जब एक ही विश्वविद्यालय में छात्राओं के लिए मेस चल सकती है तो छात्रों के लिए क्यों नहीं? मामला सिर्फ मेस तक नहीं रुका. राज्यपाल ने हॉस्टल में पहुंचने वाले खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाया और खाना पकाने के तेल तक की जांच कराई.
आनंदीबेन पटेल ने फूड सेफ्टी अधिकारियों को सैंपल लेने के निर्देश दिए और यह भी कहा कि वे अलग सैंपल लखनऊ ले जाकर जांच कराएंगी. उनका तर्क था कि कई बार जांच के लिए लिए गए सैंपल बदल दिए जाते हैं. उन्होंने इसे राज्यपाल के तौर पर नहीं बल्कि एक मां के तौर पर अपनी चिंता बताया.
सबसे गंभीर टिप्पणी उन्होंने हॉस्टल में बाहर से आने वाले टिफिन और फूड डिलीवरी को लेकर की. उनका कहना था कि ऐसी सेवाएं हॉस्टल में नशीले पदार्थों की पहुंच का रास्ता बन सकती हैं. उन्होंने दावा किया कि प्रदेश के लगभग सभी राज्य विश्वविद्यालयों के दौरे में उन्हें कहीं न कहीं नशे से जुड़ी समस्या के संकेत मिले हैं.
कानपुर से लखनऊ तक एक ही तेवर
गोरखपुर की टिप्पणी को अगर अलग-थलग घटना माना जाए तो शायद इसे विश्वविद्यालय प्रशासन की खिंचाई भर कहा जा सकता है. लेकिन पिछले कुछ सप्ताह की उनकी गतिविधियों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है.
10 जुलाई को कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भी राज्यपाल ने सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाए थे. उन्होंने किसानों की समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि किसानों को बीज उत्पादन के बड़े लक्ष्य दिए जाते हैं, लेकिन किसान जब लक्ष्य पूरा कर लेते हैं तो बड़ी कंपनियों से बीज खरीद लिए जाते हैं.
किसानों ने उनके सामने अपनी व्यथा रखी और जब उन्होंने कृषि अधिकारियों से सवाल किया तो उनके पास संतोषजनक जवाब नहीं था. उन्होंने वैज्ञानिकों द्वारा किसानों के लिए बनाए जा सकने वाले सस्ते और उपयोगी कृषि उपकरणों की अनदेखी और बड़ी कंपनियों से होने वाले सौदों पर भी सवाल उठाया. यानी कानपुर में निशाने पर विश्वविद्यालय और कृषि व्यवस्था थी, जबकि गोरखपुर में हॉस्टल, भोजन, नशा और प्रशासनिक निगरानी. लेकिन दोनों जगह सवाल एक ही था, क्या सरकारी संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा रही हैं?
लखनऊ विश्वविद्यालय में राज्यपाल ने हॉस्टलों की वाई-फाई व्यवस्था, मेस में दूध और पनीर की गुणवत्ता, पेयजल और कमरों के रखरखाव पर सवाल उठाए. विश्वविद्यालय परिसर के कंप्यूटर साइंस और वनस्पति विज्ञान विभाग के आसपास तथा टैगोर लाइब्रेरी के आसपास सफाई व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने नाराजगी जताई.
लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी यानी केजीएमयू के दीक्षांत समारोह में उन्होंने मेस में इस्तेमाल हो रहे एक्सपायर्ड मसाला पाउडर और भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठाया था. उन्होंने लोकल पनीर के बजाय ब्रांडेड कंपनी का पनीर इस्तेमाल करने, सफाई व्यवस्था सुधारने और वॉशिंग मशीन जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देने के निर्देश दिए.
इसके बाद केजीएमयू प्रशासन ने निगरानी के लिए विशेष टास्क फोर्स भी बनाई. वाराणसी के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में भी उनका फोकस हॉस्टल की व्यवस्थाओं पर रहा. मेस बंद होने, इंडक्शन पर खराब खाना मिलने, वाई-फाई और सफाई जैसी सुविधाओं की कमी पर उन्होंने नाराजगी जताई.
राज्यपाल ने छात्रों की डिग्रियां डिजिलॉकर में भेजने की व्यवस्था पर भी जोर दिया. इस तरह देखें तो आनंदीबेन पटेल का दीक्षांत समारोह अब सिर्फ औपचारिक शैक्षणिक आयोजन नहीं रह गया है. राज्यपाल की टीम समारोह से पहले विश्वविद्यालय का जायजा लेती है, रिपोर्ट तैयार करती है और राज्यपाल के सामने कमियों की सूची रखती है. इसके बाद राज्यपाल खुद मौके पर जाकर व्यवस्थाओं को देखती हैं और सार्वजनिक मंच से सवाल करती हैं.
विपक्ष को मिला मौका
राज्यपाल की टिप्पणियों ने विपक्ष को बैठे-बिठाए सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है. खासतौर पर गोरखपुर की टिप्पणी इसलिए राजनीतिक बन गई क्योंकि वह सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सबसे मजबूत राजनीतिक आधार पर की गई थी.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राज्यपाल की टिप्पणी को BJP में नेताओं और सरकारों के बीच कथित टकराव से जोड़ते हुए तीखा हमला किया. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि ‘गोरखपुर मॉडल’ की पोल खोलते-खोलते गुजरात मॉडल की घपलेबाजी की बात भी सामने आ गई.
अखिलेश ने दोनों जगह BJP सरकार होने का जिक्र करते हुए ‘डबल इंजन’ को ‘ट्रबल इंजन’ तक कह दिया. अखिलेश का निशाना सिर्फ विश्वविद्यालय की बदहाली पर नहीं था. उन्होंने राज्यपाल के उस संदर्भ को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किया जिसमें उन्होंने गुजरात में सैंपल बदलने जैसी घटनाओं का जिक्र किया था. सपा प्रमुख ने इसी बहाने BJP शासित राज्यों के मॉडल और कथित भ्रष्टाचार पर हमला बोला.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह भी ध्यान रखना होगा कि राज्यपाल की टिप्पणियों को सीधे BJP और योगी सरकार के खिलाफ राजनीतिक बयान मान लेना जल्दबाजी होगी. राज्यपाल राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति हैं और विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक एवं प्रशासनिक गुणवत्ता की निगरानी उनकी संवैधानिक भूमिका का हिस्सा है.
राज्यपाल का तर्क यही है कि कमियां छिपाने के बजाय सामने लाई जाएं और समयबद्ध तरीके से दूर किया जाए. लेकिन समस्या तब राजनीतिक बन जाती है जब यही सवाल मुख्यमंत्री के गृह शहर में उठता है और राज्यपाल खुद कहती हैं कि "यह तो गोरखपुर है, जहां खुद हमारे मुख्यमंत्री विराजमान हैं."
इस एक वाक्य ने विश्वविद्यालय प्रशासन की खामी को सरकार की जवाबदेही से जोड़ दिया.
इसका दूसरा पहलू ब्यूरोक्रेसी को लेकर उनकी टिप्पणी है. अयोध्या में उन्होंने कहा था कि राम मंदिर में दर्शन आसानी से हो जाते हैं लेकिन सरकारी फाइल के दर्शन के लिए एक टेबल से दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवीं टेबल तक जाना पड़ता है.
उनके मुताबिक एक अधिकारी फाइल में कमियां निकालता है, उसे दूर करने के बाद फाइल दूसरे टेबल पर पहुंचती है और वहां नई कमियां निकाल दी जाती हैं. यह टिप्पणी विश्वविद्यालयों से बाहर निकलकर पूरी प्रशासनिक मशीनरी पर सवाल खड़ा करती है.
यानी आनंदीबेन पटेल का निशाना केवल कुलपतियों या विश्वविद्यालय प्रशासन तक सीमित नहीं है. वे सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही, काम की गति और अधिकारियों के रवैये पर भी सवाल उठा रही हैं. राजनीतिक रूप से इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है.
BJP के लिए शासन की छवि सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी है. ऐसे समय में जब सरकार विकास, सुशासन और डबल इंजन मॉडल को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है, उसी व्यवस्था की कमियां राजभवन से सार्वजनिक रूप से सामने आना विपक्ष के लिए बड़ा नैरेटिव बन सकता है.