AMU में आठ साल बाद छात्रसंघ चुनाव, जेन-ज़ी तय करेगी मुद्दे?
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में आठ साल बाद छात्रसंघ चुनाव होने जा रहे हैं. यह कवायद Gen Z की सोच और प्राथमिकताओं की परीक्षा भी है, जिसमें भोजन, हॉस्टल, छात्राओं के प्रतिनिधित्व और प्रशासन में भागीदारी जैसे मुद्दे अहम रहेंगे

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (फाइल फोटो)
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) में आठ साल बाद छात्रसंघ चुनाव होने जा रहे हैं. पांच नवंबर को प्रस्तावित चुनाव ने परिसर की राजनीति को फिर सक्रिय कर दिया है. छात्रावासों में संभावित प्रत्याशियों के नामों पर चर्चा हो रही है, क्षेत्रीय समूह लामबंद हैं और छात्राओं के प्रतिनिधित्व की मांग भी जोर पकड़ रही है.
लेकिन इस बार चुनाव का महत्व केवल नए छात्रसंघ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव के चयन तक सीमित नहीं है. यह चुनाव तय करेगा कि लंबे समय से कमजोर पड़े छात्र-प्रशासन संवाद को किस तरह बहाल किया जाए और नई पीढ़ी की छात्र राजनीति किन मुद्दों को प्राथमिकता देती है.
साल 2018 के बाद छात्रसंघ चुनाव नहीं होने से परिसर में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की एक नई पीढ़ी सामने आ चुकी है. उसकी अपेक्षाएं पुरानी छात्र राजनीति से अलग हैं. भोजन की गुणवत्ता, छात्रावासों में कमरों का आवंटन, साफ-सफाई, पढ़ाई का माहौल और प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने का अवसर चुनाव के प्रमुख मुद्दे बन रहे हैं.
क्षेत्रीय समीकरणों और राष्ट्रीय राजनीति की बहस के बीच उम्मीदवारों को यह भी बताना होगा कि वे विद्यार्थियों की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान कैसे कराएंगे. चुनाव के साथ AMU कोर्ट के लिए भी मतदान कराने की मंजूरी ने इसकी अहमियत बढ़ा दी है.
विभिन्न विभागों से 11 छात्र प्रतिनिधि चुने जाएंगे, जिन्हें विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण फैसलों से जुड़े मंच पर विद्यार्थियों की बात रखने का अवसर मिलेगा. इस तरह आठ साल बाद होने वाला चुनाव छात्र नेतृत्व की वापसी के साथ विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया में छात्र भागीदारी की भी परीक्षा है.
19 दिन की भूख हड़ताल
AMU में छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग वर्ष 2018 से ही उठती रही है. वर्ष 2019 से 2026 के बीच इस मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन हुए लेकिन चुनाव नहीं हो सके. इस बार छात्र नेता यासिर फहद की 19 दिन की भूख हड़ताल के बाद आंदोलन निर्णायक मोड़ पर पहुंचा. कुलपति प्रो. नईमा खातून ने धरनास्थल पर पहुंचकर उनका अनशन समाप्त कराया.
इसके बाद चुनाव कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी. इस घटनाक्रम ने स्पष्ट किया कि विद्यार्थियों के बीच छात्रसंघ की मांग केवल चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं तक सीमित नहीं है. इसका संबंध अपनी समस्याओं को सामूहिक रूप से उठाने और विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगने के अधिकार से भी है.
छात्रसंघ के अभाव में विद्यार्थियों को अपनी मांगों के लिए अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों का सहारा लेना पड़ा. निर्वाचित प्रतिनिधियों की वापसी से शिकायतों को एक साझा मंच मिलने की उम्मीद है. छात्र नेता सलमान गौरी का मानना है कि छात्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच संवाद का रास्ता कमजोर हुआ है. छात्रसंघ इसे फिर सक्रिय कर सकता है.
हालांकि चुनाव करा देना अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा. निर्वाचित प्रतिनिधियों को यह साबित करना होगा कि वे केवल भाषणों और प्रदर्शनों तक सीमित नहीं हैं बल्कि बातचीत और संस्थागत प्रक्रिया के जरिए समस्याओं का समाधान भी करा सकते हैं.
प्रशासन के सामने निष्पक्ष मतदान और परिसर में सुरक्षा बनाए रखने की चुनौती भी है. पूर्व छात्रों की दखलअंदाजी और बाहरी तत्वों की संभावित घुसपैठ रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था सख्त करने की तैयारी है. जिला और पुलिस प्रशासन के साथ समन्वय कर विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वारों पर निगरानी बढ़ाई जा रही है. आठ साल बाद हो रहा चुनाव तभी सार्थक होगा जब मतदान शांतिपूर्ण और पारदर्शी तरीके से संपन्न हो तथा परिणाम को विद्यार्थियों का वास्तविक जनादेश माना जाए.
खाने और हॉस्टल से तय होगी छात्र राजनीति!
इस बार चुनाव के केंद्र में राष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा विद्यार्थियों की बुनियादी जरूरतें हैं. भोजन की गुणवत्ता, छात्रावासों में कमरों का आवंटन और साफ-सफाई जैसे मुद्दे छात्र नेताओं की परीक्षा लेंगे. इन समस्याओं को लेकर हाल के दिनों में हुए विरोध प्रदर्शनों ने विद्यार्थियों के असंतोष को सामने ला दिया है.
आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी वीमेंस कॉलेज के छात्रावासों से जुड़ी रही. छात्राओं ने मेस में खाने की गुणवत्ता और स्वच्छता पर सवाल उठाए. हॉस्टल आवंटन में अनियमितताओं के आरोप भी सामने आए. विरोध के दौरान छात्राओं ने प्रॉक्टर टीम पर अभद्रता और मारपीट के आरोप लगाए. इन घटनाओं के बाद असंतोष का दायरा बढ़ा और छात्रसंघ चुनाव की मांग ने जोर पकड़ा.
आंदोलन के दौरान प्रॉक्टर के इस्तीफे की मांग भी उठी. बाद में तत्कालीन प्रॉक्टर को हटाकर प्रो. नफीस को नया प्रॉक्टर नियुक्त किया गया. इन घटनाओं ने विद्यार्थियों के सामने यह सवाल खड़ा किया कि उनकी शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं होती. खाने की गुणवत्ता और हॉस्टल आवंटन जैसे मुद्दे केवल प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े नहीं हैं.
इनका सीधा संबंध छात्रों के स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और पढ़ाई के माहौल से है. इसलिए उम्मीदवारों की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वे इन समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस प्रस्ताव रखते हैं. पीएचडी स्कॉलर इमरान खान के मुताबिक, Gen-Z के विद्यार्थी केवल किसी उम्मीदवार के पीछे चलने के बजाय अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं. उनके लिए खाने की गुणवत्ता, कमरों का आवंटन, साफ-सफाई और पढ़ाई का बेहतर माहौल प्राथमिकता हैं.
इमरान कहते हैं कि छात्रावासों में भोजन को लेकर उनकी मांग केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं है. वे चाहते हैं कि खाने में प्रोटीन सहित जरूरी पोषक तत्वों का ध्यान रखा जाए. स्वास्थ्य के प्रति जागरूक विद्यार्थी इसके लिए कुछ अधिक खर्च करने को भी तैयार हैं. चुनाव में नॉन-रेजिडेंस विद्यार्थियों की मांग भी नया समीकरण बना सकती है. इन छात्रों का कहना है कि परिवहन, लाइब्रेरी के समय, कक्षा के शेड्यूल और परिसर में बैठने की जगह जैसी उनकी समस्याओं को पर्याप्त अहमियत नहीं मिलती.
छात्र नेताओं के अनुसार विश्वविद्यालय में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या 6,000 से अधिक है. उनका तर्क है कि बड़ी संख्या होने के बावजूद छात्रसंघ की राजनीति पर हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों का प्रभाव अधिक रहता है.
अगर नॉन-रेजिडेंस छात्र अपने मुद्दों पर एकजुट होते हैं तो उम्मीदवारों के लिए उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल होगा. ऐसे में चुनाव में केवल लोकप्रियता या क्षेत्रीय समर्थन पर्याप्त नहीं होगा. प्रत्याशियों को यह बताना पड़ेगा कि वे परिसर में रहने वाले और बाहर से आने वाले, दोनों तरह के विद्यार्थियों की जरूरतों को किस तरह प्रतिनिधित्व देंगे.
Gen-Z का असर
आठ साल के अंतराल ने छात्रसंघ चुनाव को नई चुनौती के सामने खड़ा किया है. इस दौरान परिसर में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की नई पीढ़ी आई है जिनमें से कई ने पहले कभी छात्रसंघ चुनाव का अनुभव नहीं किया. ऐसे में पुराने छात्र नेताओं का प्रभाव और क्षेत्रीय समीकरण कितने कारगर होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा.
AMU में बिहार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, गोंडा-बस्ती-सिद्धार्थनगर यानी जीबीएस, गाजीपुर-आजमगढ़ और अलीगढ़ के स्थानीय छात्रों से जुड़े समूह सक्रिय हैं. कश्मीर, बंगाल, असम और केरल के विद्यार्थी भी अपनी भागीदारी के अनुसार उम्मीदवारों के समर्थन में एकजुट हो सकते हैं.
छात्रावासों में बैठकों का दौर चल रहा है. तीन-चार संभावित दावेदारों में से किसी एक को सामने लाने और आपसी सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है. क्षेत्रीय समूह उम्मीदवारों को समर्थन जुटाने में मदद कर सकते हैं लेकिन इस बार केवल पहचान के आधार पर चुनाव जीतना आसान नहीं होगा.
इमरान के मुताबिक, Gen-Z के छात्र केवल झंडा उठाकर किसी के पीछे चलने के बजाय अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं. इससे प्रत्याशियों के लिए विद्यार्थियों से सीधा संवाद करना जरूरी हो गया है.
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहस भी चुनाव का हिस्सा हो सकती है. पीएचडी स्कॉलर आकिब खुर्शीद का मानना है कि विद्यार्थियों को देश-दुनिया की राजनीति समझनी चाहिए, क्योंकि आगे चलकर वे विभिन्न क्षेत्रों में भूमिका निभाएंगे. हालांकि, छात्रसंघ चुनाव का प्राथमिक उद्देश्य विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व करना है. इसलिए व्यापक राजनीतिक बहस के बीच परिसर की समस्याओं को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता.
AMU चुनाव की हलचल दूसरे विश्वविद्यालयों तक भी पहुंच रही है. यहां के छात्र जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के विद्यार्थियों के संपर्क में हैं. वहां की छात्र राजनीति और चुनावी प्रक्रिया के अनुभवों पर नजर रखी जा रही है.
कुछ दिन पहले JNU छात्रसंघ के संयुक्त सचिव दानिश अली AMU के छात्र आंदोलन को संबोधित कर चुके हैं. ऐसे में AMU का चुनाव यह संकेत भी देगा कि नई पीढ़ी की छात्र राजनीति में क्षेत्रीय पहचान, वैचारिक बहस और बुनियादी समस्याओं में से किसका प्रभाव सबसे अधिक रहता है.
छात्राओं का प्रतिनिधित्व
छात्रसंघ चुनाव में छात्राओं की भागीदारी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभरी है. वीमेंस कॉलेज की 2,000 से अधिक छात्राओं ने उपाध्यक्ष या सचिव का पद छात्राओं के लिए आरक्षित करने की मांग उठाई है. छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल हफीज गांधी ने सुझाव दिया है कि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव के तीन प्रमुख पदों में से कम से कम एक पद छात्राओं के लिए आरक्षित किया जाए. इसके अलावा 10 कैबिनेट सदस्यों में कम से कम चार पद छात्राओं के लिए आरक्षित करने की व्यवस्था हो.
गांधी के मुताबिक मौजूदा चुनाव में आपसी सहमति से यह व्यवस्था लागू की जा सकती है. चुनाव के बाद छात्रसंघ के संविधान में संशोधन कर प्रमुख पदों में से एक को छात्राओं के लिए स्थाई रूप से आरक्षित करने का प्रावधान किया जाना चाहिए.
इस मांग की अहमियत इसलिए भी है कि छात्राओं के छात्रावासों से उठे सवालों ने हालिया आंदोलन को व्यापक बनाने में भूमिका निभाई. अब सवाल यह है कि छात्राओं की भागीदारी केवल मतदान तक सीमित रहेगी या उन्हें नेतृत्व में भी पर्याप्त अवसर मिलेगा.
चुनाव लड़ने के इच्छुक विद्यार्थियों के सामने उम्र संबंधी नियम भी चुनौती बने हैं. मौजूदा व्यवस्था के अनुसार, बीए, बीएससी और बीकॉम के 17 से 22 वर्ष आयु वर्ग के छात्र ही चुनाव लड़ सकते हैं. विद्यार्थियों का तर्क है कि पहले स्नातक पाठ्यक्रम तीन वर्ष के थे जबकि अब चार वर्षीय पाठ्यक्रम लागू होने से पढ़ाई की अवधि बढ़ गई है. इसके बावजूद अधिकतम उम्र में बदलाव नहीं हुआ.
इस मुद्दे पर छात्र नेताओं ने मुख्य चुनाव अधिकारी प्रो. जावेद तालिब से मुलाकात की. उन्होंने छात्रों की मांग पर कमेटी गठित कर 24 घंटे में रिपोर्ट देने की बात कही थी.
छात्रसंघ चुनाव के साथ AMU कोर्ट चुनाव कराने की मंजूरी भी प्रतिनिधित्व के लिहाज से महत्वपूर्ण है. 12 अक्टूबर को विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसकी मंजूरी दी और प्रो. जावेद तालिब को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया. विभिन्न विभागों से 11 छात्र प्रतिनिधियों का चयन किया जाएगा. AMU कोर्ट विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण निकाय है जिसमें चांसलर, प्रो-चांसलर, कुलपति, शिक्षक, प्रोफेसर, दानदाता और अन्य श्रेणियों के प्रतिनिधियों सहित लगभग 193 सदस्य होते हैं.
छात्र प्रतिनिधियों को विश्वविद्यालय की नीतियों और महत्वपूर्ण फैसलों पर अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा. कुलपति चयन की प्रक्रिया में भी उनका मत महत्वपूर्ण होगा. चुनाव की तैयारियों के बीच ऐतिहासिक यूनियन हॉल में साफ-सफाई और रंगाई-पुताई का काम शुरू हो गया है. यह भवन लंबे समय से छात्र राजनीति और भाषणों का केंद्र रहा है.
AMU के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राहत अबरार के अनुसार, 26 फरवरी 1905 को तत्कालीन प्रिंसिपल थियोडोर मॉरिसन ने सिडन्स क्लब के हॉल की आधारशिला रखी थी. बाद में रामपुर के नवाब के आर्थिक सहयोग से विशाल हॉल बना और 17 अप्रैल 1911 को राजा महमूदाबाद ने नए भवन का उद्घाटन किया. आठ साल बाद यूनियन हॉल में लौटने वाली चुनावी गतिविधियां छात्र राजनीति की पुरानी परंपरा को भी पुनर्जीवित करेंगी.