यूपी में BJP की कौन-सी कमजोर कड़ियां दुरुस्त करेंगे अमित शाह?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नवंबर में उत्तर प्रदेश के सभी छह संगठनात्मक क्षेत्रों का दौरा करने की तैयारी में हैं

Amit Shah
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (फाइल फोटो)

30 अक्टूबर को लखनऊ में BJP की राज्य कार्यसमिति की बैठक को संबोधित करने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नवंबर में उत्तर प्रदेश के सभी छह संगठनात्मक क्षेत्रों का दौरा करने की तैयारी में हैं. मकसद साफ है, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की कमजोरियों को पहचानना, नाराजगी दूर करना और बूथ स्तर पर पार्टी की पकड़ मजबूत करना. 

उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की चुनौती के बीच शाह की सक्रियता इसलिए अहम है क्योंकि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में BJP की बड़ी जीत के पीछे संगठन विस्तार, बूथ प्रबंधन और सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. 

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की सीटें 2019 की 62 से घटकर 33 रह गईं जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई. कांग्रेस को भी छह सीटें मिलीं. इन नतीजों ने BJP के उस सामाजिक गठबंधन पर सवाल खड़े किए जिसके दम पर पार्टी ने लगातार चुनावी सफलताएं हासिल की थीं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि शाह अब इसी गठबंधन को दोबारा मजबूत करने की कोशिश करेंगे. 

संगठन की कमजोरियों की पड़ताल

शाह की रणनीति का पहला हिस्सा संगठन को चुनावी मोड में लाना है. लखनऊ में 30 और 31 अक्टूबर को होने वाली राज्य कार्यसमिति की बैठक में 548 सदस्यीय कार्यसमिति के अलावा विधायक, सांसद, जिला अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी शामिल होंगे. कुल तीन हजार से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी वाली इस बैठक में मिशन-2027 के लिए बूथ प्रबंधन की नई योजना पर चर्चा होने की उम्मीद है. 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ अमित शाह (फाइल फोटो)

इसके बाद नवंबर में पश्चिम, अवध, काशी, ब्रज, गोरखपुर और कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्रों में अलग-अलग बैठकें कर जमीनी फीडबैक लेने की योजना है. इन बैठकों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि लोकसभा चुनाव के दौरान कई सीटों पर BJP को अपने मजबूत माने जाने वाले इलाकों में भी चुनौती मिली. पार्टी को यह पता करना होगा कि हार या कमजोर प्रदर्शन की वजह स्थानीय उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी थी, संगठन की निष्क्रियता, सहयोगी दलों के साथ तालमेल की कमी या सामाजिक समीकरणों में बदलाव.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बड़े नेताओं की बैठकें तभी चुनावी नतीजों में बदलती हैं जब उनके निर्देश बूथ स्तर तक लागू हों. केवल समीक्षा और लक्ष्य तय करने से मतदाताओं का रुख नहीं बदलता. BJP के सामने चुनौती यह भी है कि चुनावी जिम्मेदारियों के बंटवारे के साथ संगठन के भीतर नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भरोसा बहाल किया जाए. 

शाह की संगठनात्मक शैली का एक अहम पहलू जवाबदेही तय करना रहा है. ऐसे में जिला अध्यक्षों और क्षेत्रीय पदाधिकारियों से सीधे संवाद के जरिए पार्टी यह जानने की कोशिश कर सकती है कि 2024 में कहां संगठन कमजोर पड़ा और 2027 से पहले किन बदलावों की जरूरत है. 

नए सामाजिक समीकरण की तलाश

BJP ने 2014, 2017 और 2022 के चुनावों में सवर्णों, गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को साथ लाकर व्यापक सामाजिक आधार तैयार किया था. इसे अक्सर 60 बनाम 40 के फार्मूले के रूप में पेश किया गया. इसके मुकाबले विपक्ष का आधार यादव, मुस्लिम और जाटव मतदाताओं के इर्द-गिर्द माना जाता रहा. 

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस गणित की सीमाएं उजागर कर दीं. समाजवादी पार्टी ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA के नारे के जरिए गैर यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश की. 

चुनाव परिणामों ने संकेत दिया कि BJP का सामाजिक गठबंधन पहले की तरह एकजुट नहीं रहा. ऐसे में शाह के सामने दोहरी चुनौती होगी. पहली, पार्टी के परंपरागत समर्थकों को साथ बनाए रखना और दूसरी, उन जातियों तथा समुदायों में दोबारा पैठ बनाना, जिनका समर्थन पिछले चुनाव में कमजोर पड़ा.

इस रणनीति में जाटव मतदाता भी अहम हो सकते हैं. राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का यह बड़ा आधार लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी के साथ जुड़ा रहा है लेकिन पिछले कुछ चुनावों में इस वर्ग के भीतर भी राजनीतिक विकल्पों को लेकर बदलाव दिखाई दिया है. BJP यदि इस वर्ग में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है तो उसे केवल चुनावी संपर्क नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े सवालों पर भी काम करना होगा. इसी तरह गैर यादव ओबीसी समुदायों में कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी, निषाद और अन्य जातियों के बीच अलग-अलग क्षेत्रीय समीकरणों को समझना जरूरी होगा.”

राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से BJP के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 2024 में विपक्ष के पक्ष में बने सामाजिक ध्रुवीकरण को 2027 तक बदला जा सकता है. सुशील पांडेय के आकलन के मुताबिक, जातिगत समीकरण केवल नारों से नहीं बनते. स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व, उम्मीदवारों का चयन और समुदायों के बीच सत्ता में हिस्सेदारी का भरोसा भी निर्णायक होता है. इसलिए शाह के सामने चुनौती पुराने चुनावी फार्मूले को दोहराने से ज्यादा उसे मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप बदलने की है.

क्षेत्रवार रणनीति बनाने की चुनौती

अमित शाह के सामने तीसरी चुनौती अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग चुनावी रणनीति तैयार करने की होगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान राजनीति, जाट समीकरण और स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे. अवध में संगठनात्मक मजबूती के साथ पिछड़े और दलित मतदाताओं का समर्थन बनाए रखना जरूरी होगा. 

काशी और गोरखपुर क्षेत्रों में BJP को अपने मजबूत आधार को बचाने के साथ उन इलाकों की समीक्षा करनी होगी जहां विपक्ष ने बढ़त बनाई. ब्रज और कानपुर-बुंदेलखंड में भी स्थानीय नेतृत्व, जातिगत समीकरण और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है. शाह का क्षेत्रवार दौरा इन भिन्नताओं को समझने का अवसर दे सकता है. 

सुशील पांडेय के मुताबिक उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में एक ही चुनावी संदेश और एक ही संगठनात्मक फॉर्मूला हर क्षेत्र में समान परिणाम नहीं दे सकता. पश्चिम में किसान और सामाजिक गठबंधनों की भूमिका अलग हो सकती है, जबकि पूर्वांचल में जातिगत प्रतिनिधित्व और स्थानीय नेतृत्व का महत्व अधिक निर्णायक हो सकता है. इसलिए क्षेत्रीय रणनीति तभी प्रभावी होगी जब वह स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार की जाए. 

BJP के लिए एक और चुनौती सरकार के कामकाज को चुनावी समर्थन में बदलने की है. कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंच, कानून-व्यवस्था, रोजगार, महंगाई और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करेंगे. बूथ प्रबंधन के जरिए पार्टी योजनाओं की जानकारी तो पहुंचा सकती है लेकिन मतदाताओं की शिकायतों और अपेक्षाओं का समाधान भी जरूरी होगा. केवल संगठन की सक्रियता से सरकार के प्रति नाराजगी दूर नहीं की जा सकती.

शाह की मौजूदगी पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने और नेताओं को स्पष्ट जिम्मेदारियां देने में मदद कर सकती है. लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रदेश नेतृत्व और सरकार के बीच तालमेल कितना बेहतर होता है, स्थानीय असंतोष को कितनी गंभीरता से लिया जाता है और उम्मीदवारों के चयन में जमीनी फीडबैक को कितनी जगह मिलती है. 

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