अमित शाह के ‘स्थाई राजनीतिक समाधान’ से दार्जिलिंग को क्या मिलेगा?
1988 के गोरखा समझौते और 2011 में बनी GTA के बाद अब केंद्र ने दार्जिलिंग की पहाड़ियों के लिए व्यापक राजनीतिक समाधान की दिशा में नई पहल की है

दार्जिलिंग में बैठक के लिए पहुंच केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह
केंद्र सरकार ने 22 अगस्त दार्जिलिंग की पहाड़ियों में गोरखा पहचान और प्रशासनिक मांगों के लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे के 'स्थाई राजनीतिक समाधान' की दिशा में पहला ठोस कदम उठाया. BJP ने पश्चिम बंगाल के चुनाव से पहले इसका वादा भी किया था.
सरकार ने एक समिति गठित करने का ऐलान किया, जो समझौते का मसौदा तैयार करेगी और अंतिम समाधान के तौर-तरीके तय करेगी.
यह फैसला दार्जिलिंग की तलहटी में सुकना में हुई एक अहम त्रिपक्षीय बैठक के बाद आया. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, गोरखा नेता और पहाड़ी प्रशासन के प्रतिनिधि शामिल हुए. यह बैठक शाह के पश्चिम बंगाल दौरे के तीसरे और आखिरी दिन हुई.
गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि बैठक में पहाड़ी आबादी की अलग पहचान, स्थाई राजनीतिक समाधान और संविधान के तहत मान्यता की मांग पर चर्चा हुई. शाह ने प्रतिभागियों को भरोसा दिलाया कि केंद्र "भारत के संविधान के दायरे में" समाधान की दिशा में काम करेगा.
अब केंद्र के दार्जिलिंग पहाड़ियों, दुआर्स और तराई के लिए वार्ताकार पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जाएगी. यह समिति प्रस्तावित अंतिम समझौते के तौर-तरीके तय करने के साथ उसका ढांचा तैयार करेगी.
पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी और सीमा सुरक्षा बल यानी BSF के पूर्व महानिदेशक भी रह चुके हैं. उन्हें अक्टूबर 2025 में वार्ताकार नियुक्त किया गया था.
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BJP ने बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान वादा किया था कि राज्य में सरकार बनने के छह महीने के भीतर गोरखा मुद्दे का समाधान किया जाएगा. हालांकि 22 अगस्त की बैठक में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अंतिम समझौते का स्वरूप क्या होगा.
इसमें बंगाल के भीतर अधिक प्रशासनिक और राजनीतिक स्वायत्तता से लेकर पहाड़ियों के लिए नई संवैधानिक व्यवस्था तक शामिल हैं. लेकिन केंद्र ने साफ किया है कि कोई भी समाधान मौजूदा संवैधानिक ढांचे के भीतर ही होगा.
शाह ने पहाड़ी प्रतिनिधियों को यह भी भरोसा दिलाया कि दूसरी लंबित मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा और पहाड़ियों की लंबित विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए पर्याप्त केंद्रीय फंड उपलब्ध कराया जाएगा.
बैठक में पहाड़ी नेतृत्व के अलग-अलग धड़ों के प्रतिनिधि शामिल हुए. इनमें गोरखा जनमुक्ति मोर्चा यानी GJM के प्रमुख बिमल गुरूंग और वरिष्ठ नेता रोशन गिरी, गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट यानी GNLF के अध्यक्ष मन घीसिंग, BJP दार्जिलिंग सांसद राजू बिष्ट, BJP राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला, पहाड़ियों से BJP के विधायक और राज्य सरकार के अधिकारी शामिल थे.
गिरी ने कहा कि गोरखा नेतृत्व संवैधानिक ढांचे के भीतर इस मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है. उन्होंने कहा, "केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस मुद्दे के समाधान के लिए जो भी रास्ता निकलेगा, वह संवैधानिक ढांचे के तहत होगा. मैं संवैधानिक समाधान के पक्ष में हूं और मैंने उसी के अनुरूप अपने सुझाव रखे हैं."
BJP के पहाड़ी नेतृत्व के लिए इस बैठक का एक ऐतिहासिक महत्व भी था. बिष्ट ने बताया कि यह बैठक 1988 के गोरखा समझौते पर हस्ताक्षर की वर्षगांठ के साथ हुई. यह समझौता 1980 के दशक के हिंसक गोरखालैंड आंदोलन के बाद हुआ था और इसके तहत दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल यानी DGHC का गठन किया गया था.
बिष्ट ने आरोप लगाया, "पहाड़ी समुदायों के संघर्ष का इतिहास चार दशकों से अधिक पुराना है. इस दौरान पिछली वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस सरकारों ने पहाड़ी लोगों की आकांक्षाओं को कुचला. हमारे लोगों के बलिदान में करीब 2,000 लोगों की शहादत, 5,000 से अधिक लोगों का विस्थापन और महिलाओं के साथ अत्याचार और बलात्कार शामिल हैं."
उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधियों ने शाह के सामने अपनी चिंताएं और उम्मीदें रखीं, जबकि अधिकारी ने बताया कि नई राज्य सरकार पहाड़ियों की समस्याओं का समाधान किस तरह करना चाहती है. बिष्ट ने कहा, "सभी पक्षों की बात सुनने के बाद शाह ने बैठक का समापन करते हुए बताया कि आने वाले दिनों में इन मुद्दों का स्थाई समाधान किस तरह निकाला जा सकता है."
केंद्र के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि 22 अगस्त का ऐलान इस क्षेत्र में एक और अंतरिम व्यवस्था बनकर न रह जाए. इस इलाके में राजनीतिक सहमति बनाने की कई कोशिशें हो चुकी हैं लेकिन मूल विवाद का समाधान नहीं हो सका है.
1988 के समझौते के तहत DGHC का गठन हुआ था जबकि 2011 में एक और आंदोलन के बाद गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन यानी GTA बनाया गया. इनमें से कोई भी व्यवस्था अधिक व्यापक राजनीतिक समाधान की मांग को खत्म नहीं कर सकी. पहाड़ी नेताओं का लगातार कहना रहा है कि इन संस्थाओं के पास पर्याप्त अधिकार, वित्तीय स्वायत्तता और संवैधानिक सुरक्षा नहीं है.
गोरखा की व्यापक मांग में 11 समुदायों को अनुसूचित जनजाति यानी ST का दर्जा और संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग भी शामिल है. इसके अलावा जमीन के अधिकार, आर्थिक विकास, चाय बागानों, रोजगार और बुनियादी ढांचे से जुड़ी चिंताएं भी हैं.
इसलिए 22 अगस्त की बैठक एक और अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था की भाषा से आगे बढ़कर अधिक स्थाई राजनीतिक समाधान पर बातचीत की कोशिश की दिशा में बदलाव का संकेत देती है. लेकिन इस समाधान का स्वरूप क्या होगा और क्या यह बंगाल की क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखते हुए पहाड़ियों की अलग-अलग आकांक्षाओं को संतुष्ट कर पाएगा, यह अब सिंह की अध्यक्षता वाली समिति पर निर्भर करेगा.
फिलहाल केंद्र ने पहाड़ियों को स्थायित्व का भरोसा दिया है. अब बड़ी चुनौती यह तय करना होगी कि इस स्थायित्व का वास्तविक मतलब क्या है.