AI के अखाड़े में शुरू हुई अखिलेश-योगी की लड़ाई कहां तक पहुंची?

अखिलेश के ‘टीपू’ पर योगी के ‘बाबा’ से पलटवार, AI वीडियो की जंग ने 2027 के यूपी चुनाव में डिजिटल प्रचार, डीपफेक और नैरेटिव की नई लड़ाई के संकेत दे दिए हैं

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अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ. (File Photo)

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही सियासी तापमान बढ़ने लगा है. इस बार चुनावी लड़ाई का एक नया मैदान तैयार है और उसका हथियार है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI. पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ सामने आए AI वीडियो ने इस लड़ाई की शुरुआत की. 

BJP समर्थक बताए जा रहे कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स से शेयर किए गए वीडियो में अखिलेश को ‘टीपू’ कहकर निशाना बनाया गया. गाने में उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए गए और बेरोजगारी व कथित पेपर लीक जैसे मुद्दों को भी जोड़ा गया. 

लोकप्रिय गाने की तर्ज पर तैयार यह वीडियो राजनीतिक विज्ञापन से ज्यादा मनोरंजक कंटेंट की तरह पेश किया गया, ताकि सोशल मीडिया पर तेजी से फैल सके. अखिलेश का जवाब भी उसी अंदाज में आया. 31 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने पहले अपने खिलाफ बनाए गए वीडियो का जिक्र किया और फिर योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाने वाला AI वीडियो चलाया. 

इसमें भगवा वस्त्र पहने लोगों को मंदिर की दानपेटी से चोरी करते दिखाया गया और योगी की AI इमेज को चिलम पीते हुए दिखाया गया. गाने की लाइन थी, “UP बदनाम हुआ, बाबा तेरे मारे...” 

वीडियो के जरिए SP ने एक साथ कई राजनीतिक मुद्दे साधने की कोशिश की. बेरोजगारी और पेपर लीक के जरिए युवाओं को संदेश, सरकार की कथित विफलताओं के जरिए विपक्षी नैरेटिव और राम मंदिर में कथित वित्तीय गड़बड़ियों के जरिए BJP पर हमला.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर बने AI वीडियो का स्क्रीनग्रैब

अखिलेश ने इसे BJP के AI हमले का जवाब बताया. उनका संदेश था कि अगर विरोधी इसी तकनीक का इस्तेमाल करेगा तो SP भी पीछे नहीं हटेगी. यहीं से AI को लेकर दोनों दलों के बीच खुली राजनीतिक लड़ाई शुरू होती दिखाई दी.

BJP ने वीडियो पर तीखी प्रतिक्रिया दी. पार्टी ने आरोप लगाया कि अखिलेश ने संतों, सनातन परंपरा और सनातनियों की आस्था का अपमान किया है. BJP सांसद जगदंबिका पाल ने कहा कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उन्हें राजनीतिक गरिमा बनाए रखनी चाहिए. उन्होंने सवाल किया कि क्या विपक्षी राजनीति इस स्तर तक पहुंच जाएगी कि मुख्यमंत्री को चिलम पीते हुए दिखाया जाए.  

BJP नेता और पूर्व सांसद सुब्रत पाठक ने कहा कि योगी सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बल्कि संत भी हैं और वीडियो SP की मानसिकता को दिखाता है. 

मंत्री दयाशंकर सिंह ने SP पर 2027 से पहले माहौल खराब करने का आरोप लगाया. उन्होंने BJP की हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और बंगाल में जीत का हवाला देते हुए कहा कि अब उत्तर प्रदेश में भी BJP और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जीत की ‘सुनामी’ आएगी. 

यानी जिस AI वीडियो को SP ने सरकार के खिलाफ राजनीतिक व्यंग्य के तौर पर इस्तेमाल किया, BJP ने उसे सनातन और संतों के अपमान का मुद्दा बना दिया. यही AI राजनीति की खासियत है. एक ही वीडियो अलग-अलग राजनीतिक समूहों के लिए अलग-अलग अर्थ पैदा कर सकता है.

कौन है X हैंडल के पीछे

इस पूरे विवाद का सबसे अहम और अनसुलझा सवाल उन सोशल मीडिया अकाउंट्स को लेकर है, जहां से ये वीडियो सामने आए. दो X हैंडल खास तौर पर चर्चा में हैं, ‘याद रखेगा UP’ और ‘क से कलम’. ‘याद रखेगा UP’ अकाउंट इसी साल जून में शुरू हुआ और यहां लगातार अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के खिलाफ राजनीतिक पोस्ट और AI वीडियो शेयर किए गए.

इसी हैंडल से ‘मुन्नी बदनाम हुई’ की तर्ज पर अखिलेश को निशाना बनाने वाला AI वीडियो भी सामने आया. सूत्रों का दावा है कि इसे BJP समर्थित समूह चला रहा है लेकिन BJP ने आधिकारिक तौर पर इस अकाउंट या उससे जुड़े वीडियो की जिम्मेदारी नहीं ली है. इसलिए इसे BJP का आधिकारिक हैंडल कहना अभी उचित नहीं होगा. 

दूसरा अकाउंट ‘क से कलम’ है, जिसकी शुरुआत इस साल मार्च में हुई. शुरुआत में इस हैंडल से सरकार और योगी आदित्यनाथ को लेकर आलोचनात्मक पोस्ट किए गए. बाद में मुख्यमंत्री को निशाना बनाने वाले AI वीडियो भी यहां शेयर होने लगे. अखिलेश यादव ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी हैंडल से सामने आए वीडियो को मीडिया के सामने चलाया. 

अखिलेश यादव के ऊपर बने वीडियो का स्क्रीनग्रैब

यहां भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. समाजवादी पार्टी का मीडिया सेल इस तरह के कंटेंट को शेयर करता रहा है, लेकिन ‘क से कलम’ को SP का आधिकारिक अकाउंट बताने वाला कोई निर्णायक सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है. यही इस पूरे डिजिटल युद्ध की सबसे बड़ी पेचीदगी है.

सोशल मीडिया पर राजनीतिक प्रचार का एक नया मॉडल उभर रहा है. राजनीतिक दल आधिकारिक तौर पर किसी विवादित वीडियो से दूरी बनाए रखते हैं लेकिन उनके समर्थक नेटवर्क उसी वीडियो को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा सकते हैं. इसके बाद विरोधी दल उसे संबंधित पार्टी के अभियान का हिस्सा बताता है. 

जिम्मेदारी तय होने से पहले कंटेंट वायरल हो जाता है. AI ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है. किसी फोटो, वीडियो या आवाज के आधार पर कुछ ही समय में नया राजनीतिक कंटेंट तैयार किया जा सकता है. उसे गीत, मीम या छोटे वीडियो के रूप में पेश किया जा सकता है. यानी राजनीतिक प्रचार और सामान्य सोशल मीडिया मनोरंजन के बीच की रेखा और धुंधली हो रही है.

रासपुतिन से AI तक

अखिलेश यादव की AI मुहिम को उनके हालिया सोशल मीडिया प्रयोगों से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता. हाल में ही उन्होंने एक वीडियो दिखाया था जिसमें जापानी छात्रों को योगी आदित्यनाथ के साथ सेल्फी लेते दिखाया गया. इसके साथ Boney M. का चर्चित गीत ‘Rasputin’ चलाया गया.

चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों को डीपफेक या भ्रामक वीडियो के इस्तेमाल से बचने की सलाह देता रहा है

अखिलेश ने गीत में ‘सत्ता की भूख’ वाले हिस्से की ओर इशारा करते हुए इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति से जोड़ा था. यहां तकनीक से ज्यादा राजनीतिक संचार की शैली महत्वपूर्ण थी. अखिलेश लगातार लोकप्रिय संस्कृति, गीत और सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक संदेश को हल्के और मनोरंजक अंदाज में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. 

AI ने इसी रणनीति को और ताकत दे दी है. मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटि‍याल बताते हैं, “पहले राजनीतिक व्यंग्य के लिए कार्टून बनते थे. फिर मीम आए. उसके बाद छोटे वीडियो और रील ने जगह ली. अब AI ने नेता के चेहरे और आवाज को ही राजनीतिक कंटेंट का हिस्सा बना दिया है.” 

इसका असर खासकर युवा मतदाताओं पर पड़ सकता है. कोई राजनीतिक संदेश अगर भाषण के रूप में सामने आता है तो उसकी राजनीतिक प्रकृति साफ होती है. लेकिन वही संदेश किसी लोकप्रिय गाने, मीम या मजेदार वीडियो में छिपा हो तो उसे लोग मनोरंजन के तौर पर शेयर कर सकते हैं. राजनीतिक संदेश बिना पारंपरिक प्रचार की शक्ल लिए आगे बढ़ता रहता है. 

चुनाव आयोग की चुनौती

AI की इस बढ़ती भूमिका ने चुनाव आयोग के सामने भी नई चुनौती खड़ी की है. आयोग पहले ही राजनीतिक दलों को डीपफेक और भ्रामक AI कंटेंट के इस्तेमाल से बचने की सलाह दे चुका है. 2025 में आयोग ने AI-जेनरेटिड  या सिंथेटिक सामग्री को स्पष्ट रूप से लेबल करने की जरूरत पर भी जोर दिया थाॉ.

समस्या यह है कि चुनावी प्रचार में किसी आधिकारिक पार्टी वीडियो पर नियंत्रण अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन अनाम सोशल मीडिया अकाउंट से निकले वीडियो को नियंत्रित करना मुश्किल है. कोई व्यक्ति वीडियो बनाता है, दूसरा उसे पोस्ट करता है, तीसरा उसे शेयर करता है और चौथा उसे WhatsApp ग्रुप में पहुंचा देता है. 

कुछ घंटों में मूल स्रोत गायब हो जाता है, लेकिन वीडियो हजारों फोन में मौजूद रहता है. यही कारण है कि 2027 में AI से जुड़ी सबसे बड़ी लड़ाई तकनीक की नहीं, विश्वसनीयता की होगी. 

2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ रैलियों, पोस्टरों और बूथ मैनेजमेंट का चुनाव नहीं होगा. उसका एक बड़ा हिस्सा मोबाइल स्क्रीन पर लड़ा जाएगा. सवाल यह होगा कि कौन सबसे ज्यादा कंटेंट बनाता है, कौन सबसे तेजी से उसे फैलाता है और कौन मतदाता के दिमाग में अपना नैरेटिव बैठाने में कामयाब होता है. 

लेकिन इस डिजिटल दंगल का असली फैसला AI नहीं करेगा. फैसला मतदाता करेगा. उसके सामने चुनौती होगी कि वह वायरल वीडियो को तुरंत सच न माने और यह देखे कि जो दिख रहा है, वह वास्तव में हुआ भी है या किसी मशीन ने उसे बनाया है. 

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