सपा के गढ़ कन्नौज में किन चुनौतियों से जूझ रहे अखिलेश यादव?
PDA सम्मेलन में खाली कुर्सियों से लेकर टिकट की दावेदारी तक, कन्नौज में गुटबाजी और संगठनात्मक असंतोष के बीच सपा प्रमुख के सामने 2027 से पहले एकजुटता कायम रखने की चुनौती है

अखिलेश यादव के लिए कन्नौज राजनीतिक विरासत और पार्टी की पहचान के लिहाज से बेहद अहम है (फाइल फोटो)
17 अक्टूबर को कन्नौज स्थित समाजवादी पार्टी (सपा) के जिला कार्यालय में आयोजित PDA सम्मेलन में प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल कार्यकर्ताओं को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी और बूथ मजबूत करने का संदेश देने पहुंचे थे.
सम्मेलन में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सक्रिय रहने और पार्टी के सामाजिक आधार को मजबूत करने पर जोर दिया गया लेकिन कार्यक्रम में खाली पड़ी कुर्सियों और पंडाल ने संगठन की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए.
मंच पर नेताओं की मौजूदगी के बावजूद अपेक्षित संख्या में कार्यकर्ता नहीं पहुंचे. करीब दो घंटे तक कार्यक्रम में रहे प्रदेश अध्यक्ष को मंच पर बैठने को लेकर खींचतान भी देखने को मिली. अगले ही दिन 18 अक्टूबर को उनके हस्ताक्षर वाला पत्र सामने आया जिसमें जिलाध्यक्ष कलीम खान समेत कन्नौज की जिला कार्यकारिणी और संबंधित फ्रंटल संगठनों की इकाइयों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया.
कार्रवाई का दायरा जिले से जुड़े पार्टी की राज्य कार्यकारिणी और फ्रंटल संगठनों के राष्ट्रीय पदाधिकारियों तक भी पहुंचा. पत्र में कार्रवाई की वजह स्पष्ट नहीं की गई लेकिन सम्मेलन में कम उपस्थिति को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है.
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कन्नौज केवल इत्र की खुशबू के लिए ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के राजनीतिक गढ़ के रूप में भी पहचाना जाता है. अखिलेश यादव का इस क्षेत्र से गहरा राजनीतिक जुड़ाव है. वे वर्तमान में कन्नौज के सांसद हैं और उनकी पत्नी डिंपल यादव भी यहां से लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.
समाजवादी पार्टी ने 1998 से 2024 के बीच हुए नौ लोकसभा चुनावों में आठ बार कन्नौज सीट जीती है. अखिलेश यादव के लिए यह क्षेत्र राजनीतिक विरासत, संगठनात्मक प्रभाव और पार्टी की पहचान, तीनों लिहाज से अहम है. इसके बावजूद विधानसभा चुनावों में सपा का प्रदर्शन लोकसभा चुनावों जैसा नहीं रहा.
2017 में पार्टी जिले की तीन विधानसभा सीटों में से केवल कन्नौज सदर जीत सकी थी जबकि 2022 में उसे तीनों सीटों पर हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा में मजबूत प्रदर्शन और विधानसभा में लगातार चुनौतियों के बीच का यह अंतर स्थानीय संगठन की भूमिका पर सवाल उठाता है.
कन्नौज में जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने को इसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है. सम्मेलन में खाली कुर्सियां महज एक कार्यक्रम में कम उपस्थिति का मामला हो सकती थीं लेकिन अखिलेश यादव के संसदीय क्षेत्र में प्रदेश अध्यक्ष के कार्यक्रम का अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखना संगठनात्मक जवाबदेही का प्रश्न बन गया. पार्टी की रणनीति में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA वर्गों को एक साथ लाना प्रमुख है.
ऐसे में PDA सम्मेलन का उद्देश्य केवल नेताओं की बैठक करना नहीं बल्कि इन वर्गों के बीच पार्टी की पहुंच और बूथ स्तर पर सक्रियता को मजबूत करना भी था. कार्यक्रम में कम उपस्थिति ने इस रणनीति को जमीन पर लागू करने की चुनौती को सामने ला दिया. हालांकि किसी एक सम्मेलन में खाली कुर्सियों के आधार पर पूरे क्षेत्र में पार्टी के जनाधार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा.
कन्नौज की अंदरूनी राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी को लेकर है. कन्नौज सदर सीट पर BJP के असीम अरुण ने 2022 में सपा के तत्कालीन विधायक अनिल दोहरे को हराया था. तीन बार विधायक रह चुके अनिल दोहरे के निधन के बाद उनके बेटे यश दोहरे उनकी राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरी ओर, पुराने सपा नेता कल्याण सिंह की दावेदारी की चर्चा भी है.
ऐसे में पार्टी के सामने केवल उम्मीदवार चुनने का सवाल नहीं बल्कि स्थानीय नेताओं और उनके समर्थकों के बीच सहमति बनाने की चुनौती भी है. यश दोहरे की संगठन में स्वीकार्यता और राजनीतिक पहचान को लेकर चर्चाएं हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि किसी भी दावेदार की वास्तविक स्थिति का आकलन पार्टी के आंतरिक फैसलों और जमीनी समर्थन के आधार पर ही किया जा सकता है.
तिर्वा विधानसभा क्षेत्र में भी दावेदारों के बीच समीकरण पार्टी के लिए चुनौती बने हुए हैं. पूर्व विधायक विजय बहादुर पाल के निधन के बाद 2022 में उनके बेटे अनिल पाल को टिकट दिया गया था लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. अब हुकुम सिंह यादव और अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले कुक्कू चौहान सहित अन्य नेताओं के नाम दावेदारी की चर्चाओं में हैं.
छिबरामऊ में भी अरविंद यादव और मुस्लिम नेता ताहिर हुसैन सिद्दीकी से जुड़े पुराने राजनीतिक समीकरणों की चर्चा होती रही है. 2022 में टिकट नहीं मिलने के बाद ताहिर हुसैन सिद्दीकी की नाराजगी और बगावती तेवर भी चर्चा में आए थे. इन तीनों सीटों पर टिकट की दावेदारी अपने आप में असामान्य नहीं है लेकिन यदि दावेदारों के बीच मतभेद संगठनात्मक गुटों में बदलते हैं तो चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना मुश्किल हो सकता है.
स्थानीय संगठन में असंतोष का एक दूसरा पहलू नेताओं की कार्यशैली और छोटे कार्यकर्ताओं को मिलने वाली तवज्जो से जुड़ा है. कन्नौज के स्थानीय नेताओं के मुताबिक, सपा नेता विजय तिवारी उर्फ बउवन तिवारी और हसीब हसन की कार्यशैली को लेकर कुछ कार्यकर्ताओं में नाराजगी है.
कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वरिष्ठ नेताओं के कन्नौज पहुंचने पर उनकी समस्याओं को अपेक्षित महत्व नहीं मिलता और स्थानीय स्तर पर लिए गए फैसलों में व्यापक कार्यकर्ता समूह की भागीदारी सीमित रहती है. हालांकि इन नेताओं के समर्थक ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं. फिर भी यदि कार्यकर्ताओं की शिकायतें व्यापक हैं तो उनका असर पार्टी की संगठनात्मक सक्रियता पर पड़ सकता है.
कन्नौज में सपा के राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की चर्चा नवाब सिंह यादव के प्रभाव के संदर्भ में भी होती रही है. जिले की राजनीति में कभी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती थी. उनके जेल जाने के बाद स्थानीय समीकरणों में बदलाव की चर्चा तेज हुई. अब सवाल यह है कि क्या पार्टी के अलग-अलग स्थानीय शक्ति केंद्रों के बीच समन्वय स्थापित हो पा रहा है.
अखिलेश यादव अपने सार्वजनिक राजनीतिक संदेशों में कार्यकर्ताओं की एकजुटता पर जोर देते रहे हैं लेकिन जिले में सामने आ रही गुटबाजी की चर्चाएं बताती हैं कि इस संदेश को स्थानीय संगठन में लागू करना अलग चुनौती है. राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से देखें तो कन्नौज में सपा के सामने दो स्तरों पर संगठन को मजबूत करने का प्रश्न है. पहला, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसे अभियानों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना. दूसरा टिकट की दावेदारी और स्थानीय वर्चस्व से जुड़े मतभेदों को चुनाव से पहले सुलझाना.
कन्नौज के वरिष्ठ शिक्षक अमित चौहान बताते हैं, “किसी सम्मेलन में भीड़ जुटना संगठन की सक्रियता का एक संकेत हो सकता है लेकिन पार्टी की वास्तविक स्थिति जानने के लिए बूथवार काम, स्थानीय जनसंपर्क और चुनावी प्रदर्शन जैसे व्यापक पहलुओं को देखना होगा. प्रदेश नेतृत्व की कार्रवाई के बाद यह भी देखना होगा कि नई कार्यकारिणी में किन नेताओं को जिम्मेदारी मिलती है और क्या पुराने गुटों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जाता है.”
अखिलेश यादव के लिए चुनौती इसलिए भी अहम है कि जिस कन्नौज ने लोकसभा चुनावों में सपा को लगातार राजनीतिक आधार दिया है वहां विधानसभा स्तर पर पार्टी को लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है. 2027 के चुनाव से पहले यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 17 अक्टूबर के PDA सम्मेलन की खाली कुर्सियों के बाद उठाया गया कदम संगठनात्मक सुधार की शुरुआत बनता है या जिले में चल रही खींचतान नए रूप में सामने आती है.