‘अंकल’ से मुकाबले के बहाने आकाश आनंद गढ़ रहे BSP की नई रणनीति
हाथरस की सादाबाद रैली में आकाश आनंद ने BJP से हिसाब मांगने के साथ अखिलेश यादव और राहुल गांधी को ‘अंकल’ कहकर खुद को नई पीढ़ी के नेता के तौर पर पेश किया. क्या BSP का यह नया यूथ कार्ड 2027 में पार्टी की खोई जमीन वापस ला पाएगा?

हाथरस की रैली को संबोधित करते आकाश आनंद (फोटो : ITG)
बहुजन समाज पार्टी (BSP) के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद ने हाथरस की सादाबाद विधानसभा सीट से 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान का जो आगाज किया, वह महज एक चुनावी सभा नहीं थी. 30 साल के आकाश के भाषण में BSP की पुरानी राजनीति के साथ एक नई चुनावी भाषा दिखाई दी.
मंच से उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार पर बेरोजगारी, शिक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर हमला बोला तो विपक्षी खेमे में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को भी निशाने पर लिया. दोनों को ‘अंकल’ कहकर आकाश ने अपनी उम्र को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश की.
सादाबाद की सभा में आकाश का अंदाज भी पारंपरिक राजनीतिक भाषण से अलग था. उन्होंने लगातार सवाल किए और भीड़ से जवाब लेने की कोशिश की. 57 मिनट के भाषण में ‘कॉल एंड रिस्पांस’ तकनीक के जरिए वह जनता को सिर्फ सुनने वाली भीड़ के बजाय बातचीत का हिस्सा बनाते दिखे.
सवाल रोजगार का हो, शिक्षा का या कानून-व्यवस्था का, आकाश बार-बार यह पूछते रहे कि क्या ऐसी सरकार को फिर मौका दिया जाना चाहिए?
यही इस रैली का सबसे अहम राजनीतिक संदेश था. आकाश सिर्फ मायावती के उत्तराधिकारी या BSP के युवा चेहरे के तौर पर सामने नहीं आना चाहते बल्कि खुद को उस पीढ़ी की आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जो पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी और शिक्षा के संकट से जूझ रही है.
उनके लिए 2027 की लड़ाई सिर्फ BJP बनाम विपक्ष नहीं बल्कि नई पीढ़ी बनाम पुरानी राजनीतिक शैली की लड़ाई भी है लेकिन सवाल यही है कि क्या यह ‘यूथ कार्ड’ BSP को उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर से प्रासंगिक बना पाएगा?
तंज के बहाने नई पीढ़ी की राजनीति?
आकाश आनंद ने सादाबाद की सभा में अखिलेश यादव और राहुल गांधी की उम्र को जिस तरह अपने राजनीतिक भाषण का हिस्सा बनाया, वह उनकी रणनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है.
जब भीड़ में से किसी ने उन्हें अखिलेश यादव को ‘भैया’ कहने का सुझाव दिया तो आकाश ने जवाब दिया, “वे अखिलेश अंकल हैं, अखिलेश भैया नहीं.” इसके साथ उन्होंने अपनी उम्र का हवाला देते हुए यह बताने की कोशिश की कि वे खुद उस पीढ़ी से आते हैं जिसके मुद्दे आज की राजनीति के केंद्र में होने चाहिए.
यह टिप्पणी सुनने में भले ही हल्की-फुल्की लगे, लेकिन इसके पीछे गंभीर राजनीतिक संदेश है. आकाश एक ऐसा राजनीतिक स्पेस तलाश रहे हैं जिसमें उन्हें न तो मायावती की पुरानी पीढ़ी के नेता के रूप में देखा जाए और न ही अखिलेश-राहुल की विपक्षी राजनीति के हिस्से के तौर पर.
वे खुद को युवा मतदाता और युवा नेतृत्व के बीच पुल के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह स्पेस महत्वपूर्ण है. राज्य में बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं और पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं का रुख चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है.
इन युवाओं के सामने रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक, सरकारी भर्तियां, शिक्षा और डिजिटल अवसर जैसे मुद्दे हैं. आकाश ने सादाबाद में इन्हीं मुद्दों को अपनी राजनीतिक भाषा बनाया. उन्होंने दिल्ली में पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े हालिया विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि वे भी उसी पीढ़ी का हिस्सा हैं जिसने इन मुद्दों पर प्रदर्शन किया है.
उनका संदेश था कि विरोध करना जरूरी है लेकिन सिर्फ प्रदर्शन से सरकार नहीं बदलती. राजनीतिक कार्रवाई और सही राजनीतिक विकल्प चुनना भी जरूरी है. यहीं से आकाश अपने ‘यूथ कार्ड’ को BSP की चुनावी रणनीति से जोड़ते हैं. उनका तर्क है कि युवा अगर अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें चुनाव में यह तय करना होगा कि कौन उनके लिए राजनीतिक लड़ाई लड़ सकता है.
राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय के मुताबिक, आकाश की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उनकी उम्र और आक्रामक शैली को सिर्फ भाषण की खासियत न रहने दिया जाए. इसे संगठन और वोट में बदलना होगा. BSP के सामने खासतौर पर उन युवा दलित मतदाताओं को दोबारा जोड़ने की चुनौती है जो पिछले कुछ चुनावों में BJP, समाजवादी पार्टी या आजाद समाज पार्टी जैसे विकल्पों की ओर गए हैं.
सुशील पांडेय कहते हैं कि आकाश की रणनीति में इसलिए “मैं भी आपकी पीढ़ी का हूं” वाला संदेश महत्वपूर्ण है. यह मायावती की राजनीति को खत्म करने की कोशिश नहीं बल्कि उसके भीतर नई पीढ़ी की आवाज जोड़ने की कवायद है.
निशाना सिर्फ सत्ता नहीं
सादाबाद में आकाश का सबसे बड़ा राजनीतिक हमला योगी आदित्यनाथ सरकार पर था. उन्होंने सरकार से ‘दस साल का हिसाब’ मांगने की अपील की.
बेरोजगारी से लेकर सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के खाली पदों तक के आंकड़ों का जिक्र करते हुए उन्होंने सवाल खड़ा किया कि सरकार के पास विज्ञापनों पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के लिए पैसा है, लेकिन सरकारी नौकरियों के खाली पद भरने और शिक्षकों की नियुक्ति के लिए पर्याप्त संसाधन क्यों नहीं हैं.
आकाश ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में पिछले दस वर्षों में 25 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हुए और करीब डेढ़ लाख सरकारी शिक्षकों के पद खाली हैं. उन्होंने चार लाख सरकारी नौकरियों के खाली पदों का भी मुद्दा उठाया. इन आंकड़ों के जरिए उन्होंने BJP की विकास और सुशासन की राजनीति के सामने शिक्षा और रोजगार का सवाल खड़ा करने की कोशिश की.
उनके भाषण में रोजगार का मुद्दा खास तौर पर युवाओं से जुड़ा हुआ था. उन्होंने सवाल किया कि क्या पकौड़े तलना या रेहड़ी लगाना ही रोजगार है? इस तरह उन्होंने BJP के उस तर्क पर हमला किया जिसमें स्वरोजगार और छोटे कारोबार को रोजगार के विकल्प के तौर पर पेश किया जाता रहा है.
शिक्षा को उन्होंने सिर्फ सरकारी स्कूलों या शिक्षक भर्ती का मुद्दा नहीं रहने दिया. उन्होंने इसे सामाजिक न्याय और आरक्षण से जोड़ा. उनका कहना था कि अगर शिक्षकों की नियुक्ति होगी तो वे समाज के वंचित तबकों के बच्चों को पढ़ाएंगे और पढ़े-लिखे युवा अपने अधिकारों के लिए खड़े होंगे. यानी आकाश का संदेश यह था कि शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व एक-दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे हैं.
यही वह सामाजिक-राजनीतिक भाषा है जिसके जरिए BSP अपने पारंपरिक दलित आधार को युवा पीढ़ी के साथ जोड़ना चाहती है. कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी आकाश ने योगी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गिनी जाने वाली ‘कानून का राज’ वाली छवि पर हमला किया.
उन्होंने अपराध, हत्या, महिलाओं के खिलाफ अपराध और अपहरण की घटनाओं का जिक्र करते हुए सवाल किया कि क्या ऐसी सरकार को एक और मौका दिया जाना चाहिए. उन्होंने जनता से पूछा कि क्या वास्तव में कानून का राज है या पुलिस की आड़ में गुंडों का राज चल रहा है?
यह हमला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BJP 2017 के बाद से कानून-व्यवस्था को अपनी राजनीति का बड़ा आधार बनाती रही है. आकाश ने इसी मुद्दे को पलटने की कोशिश की. उनका मकसद यह दिखाना था कि सरकार जिस कानून-व्यवस्था को अपनी उपलब्धि बताती है, उसी पर जनता से सवाल पूछा जाना चाहिए.
इस तरह सादाबाद की सभा में आकाश ने BJP के खिलाफ मुद्दों का एक पैकेज तैयार किया. रोजगार, शिक्षा, सरकारी भर्ती, आरक्षण और कानून-व्यवस्था. यानी ऐसी राजनीति जिसमें युवा वोटर को सीधे अपने भविष्य से जुड़े सवाल दिखाई दें.
क्या लौटेगा 2007 का फॉर्मूला?
सादाबाद की सभा का चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश BSP की सामाजिक रणनीति से जुड़ा है. आकाश ने सिर्फ दलित समाज की बात नहीं की. उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, मुस्लिम, किसान, युवा और दूसरे सामाजिक समूहों का भी जिक्र किया.
मंच से सतीश चंद्र मिश्रा, स्वर्गीय उमाशंकर सिंह और बाबू मुनकाद अली जैसे नेताओं का उल्लेख किया गया. सादाबाद से डॉ. अविन शर्मा को उम्मीदवार बनाना भी इसी रणनीति का संकेत है. ब्राह्मण चेहरे को टिकट देकर BSP ने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी का लक्ष्य केवल अपने परंपरागत दलित वोट बैंक तक सीमित रहना नहीं है.
BSP के लिए यह रणनीति नई नहीं है. कांशीराम ने बहुजन समाज को राजनीतिक ताकत में बदलने का सामाजिक आधार तैयार किया था. मायावती ने बाद में ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के जरिए इस आधार का विस्तार किया.
2007 के विधानसभा चुनाव में दलित-ब्राह्मण सहित विभिन्न सामाजिक समूहों के समीकरण ने BSP को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाया था. अब 2027 के लिए उसी पुराने फॉर्मूले को नए राजनीतिक संदर्भ में इस्तेमाल करने की कोशिश है. फर्क इतना है कि इस बार इसका चेहरा मायावती के साथ आकाश आनंद भी हैं और भाषा में युवा मुद्दे ज्यादा प्रमुख हैं.
आकाश के सामने हालांकि 2007 को दोहराने की राह आसान नहीं है. उत्तर प्रदेश का सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है. BJP ने दलित समाज के एक हिस्से के बीच अपनी पकड़ बनाई है. समाजवादी पार्टी ने पिछड़े और मुस्लिम समीकरण के साथ दलित मतदाताओं के बीच भी पैठ बनाने की कोशिश की है.
वहीं चंद्रशेखर आजाद की सक्रियता पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित दलित युवाओं के बीच BSP के लिए नई चुनौती है. ऐसे में आकाश की रणनीति का मूल सवाल यही है कि क्या वह दलित आधार को बनाए रखते हुए गैर-दलित समूहों को फिर से BSP के साथ जोड़ पाएंगे?
हालांकि हाथरस से आकाश ने सवाल उछाल दिया है. अब 2027 तक उन्हें उन सवालों के जवाब वोट में तलाशने होंगे. यही तय करेगा कि ‘अंकल’ से मुकाबले का उनका इरादा बस एक राजनीतिक तंज था या BSP की नई पीढ़ी की राजनीति की शुरुआत.