AI के दौर में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में वोकेशनल ट्रेनिंग पर बढ़ा जोर
NEP 2020 के तहत कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा पर जोर है, लेकिन इसे अब भी कमजोर छात्रों के विकल्प के तौर पर देखा जाता है. AI और ऑटोमेशन के दौर में दिल्ली के सरकारी स्कूल इसे मुख्यधारा की पढ़ाई और करियर के विकल्प से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं

दिल्ली के एक स्कूल में वोकेशनल ट्रेनिंग की क्लास (फाइल फोटो)
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) पर जोर दिया गया है लेकिन माता-पिता और छात्र अब भी इसे ज्यादातर पढ़ाई में कमजोर छात्रों के लिए एक विकल्प के तौर पर देखते हैं. वे इसे ऐसा करियर नहीं मानते, जिसे आगे बढ़ने के लिए चुना जा सके.
गैर-लाभकारी संस्था आई-टीच स्कूल्स (iTeach schools) की संस्थापक और सीईओ सौम्या जैन के मुताबिक, "कोई छात्र यह नहीं कहेगा कि वह इलेक्ट्रीशियन या बढ़ई बनना चाहता है. इसकी एक वजह यह भी है कि हुनर वाले कामों में कमाई बढ़ने का रास्ता उतना साफ नहीं दिखता, जितना व्हाइट-कॉलर नौकरियों में दिखता है. व्हाइट-कॉलर नौकरियों में नौकरी की सुरक्षा, तय काम के घंटे और बीमा जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं."
सौम्या जैन नई दिल्ली में हाल ही में द/नज फाउंडेशन की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में 'NEP@Work: Secondary Education and Skilling' विषय पर पैनल चर्चा के दौरान अपनी बात रख रही थीं.
NEP 2020 में व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा में लाना एक अहम लक्ष्य बनाया गया है. इसके तहत मिडिल स्कूल से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू की जाती है ताकि स्पेशियलाइजेशन से पहले छात्रों की दिलचस्पी हाथ के हुनर वाली पढ़ाई में पैदा हो सके. नीति के तहत कक्षा 6 से व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं.
कक्षा 6 से 8 के लिए 'कौशल बोध' को व्यावसायिक शिक्षा की पाठ्यपुस्तक बनाया गया है, जबकि कक्षा 9 में स्किल एजुकेशन के लिए 'कौशल विकास' है. दोनों किताबें NEP 2020 के हिसाब से तैयार की गई हैं.
महाराष्ट्र में बोर्ड परीक्षाओं में व्यावसायिक विषयों के 70 अंक प्रैक्टिकल और 30 अंक थ्योरी के होते हैं. सौम्या जैन कहती हैं कि इससे हर तरह के छात्रों को परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करने का बराबर मौका मिलता है.
दिल्ली ने बनाई बढ़त
समग्र शिक्षा, शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार की राज्य परियोजना निदेशक और अतिरिक्त निदेशक (व्यावसायिक शिक्षा) प्रांजल पाटिल ने बताया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा रहा है. नए लैब बनाए जा रहे हैं और करीब 1,000 दिल्ली सरकार के स्कूलों में इसे लागू करने का काम चल रहा है.
प्रांजल पाटिल ने बताया कि राज्य में गणित और विज्ञान के शिक्षकों को भी व्यावसायिक कौशल सिखाने के लिए दोबारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है. उदाहरण के लिए, विज्ञान की जानकारी का इस्तेमाल बागवानी और स्वास्थ्य सेवा जैसे कामों में कैसे किया जाए, यह भी सिखाया जा रहा है.
प्रिंसिपल की भूमिका अहम
सौम्या जैन के मुताबिक, व्यावसायिक शिक्षा का असली असर तभी दिखेगा, जब स्कूल के प्रिंसिपल अपनी भूमिका ठीक से निभाएंगे. उनका कहना है कि प्रिंसिपल को एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभानी होगी, जो छात्रों के लिए सही चीजें चुने और उन्हें आगे बढ़ने में मदद करे. इससे STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स), सोशल लर्निंग, हॉबी क्लब जैसी गतिविधियों में छात्रों को बेहतर अनुभव मिल सकेगा.
उन्होंने बताया कि अलग-अलग समुदायों में छात्रों की रुचि, जरूरत और पसंद अलग होती है. कुछ इलाकों में छात्र कोडिंग की तरफ ज्यादा रुचि दिखा सकते हैं तो कुछ जगहों पर ऑटो टेक्नीशियन बनने में दिलचस्पी हो सकती है. वहीं कुछ दूसरे इलाकों में छात्र खेती को पसंद कर सकते हैं. इसलिए स्कूलों में हर जगह एक जैसा पाठ्यक्रम लागू करने के बजाय स्थानीय जरूरत के हिसाब से बदलाव की गुंजाइश होनी चाहिए.
सौम्या जैन का मानना है कि शिक्षा हर पांच साल में बदल रही है. इसलिए आज के समय के हिसाब से जरूरी विषय चुनने और शिक्षकों को उन्हें सही तरीके से पढ़ाने के लिए तैयार करने की जरूरत है. हर बार नए ट्रेनर लाना संभव नहीं होता. ऐसे में यह जिम्मेदारी प्रिंसिपल की होती है.
iTeach पुणे और नवी मुंबई में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत कक्षा 8 से 10 तक के 15 स्कूल चलाता है. इन स्कूलों में कम आय वाले परिवारों के 6,000 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं.
सौम्या जैन ने बताया कि सेकेंडरी कक्षा के छात्र पहले ही करीब 10 घंटे रोज पढ़ने, लिखने और टेस्ट की तैयारी में लगा देते हैं. उनका मानना है कि यह रफ्तार ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि छात्रों को खेलना, प्रयोग करना और चीजें बनाना भी चाहिए. व्यावसायिक विषयों में चीजों को बनाना या खोलना-तोड़ना शामिल होता है, जिससे छात्रों को अपने हाथों से कुछ बनाने की खुशी मिलती है.
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि उनके स्कूलों में कौशल सीखने के एक प्रोजेक्ट के तहत छात्रों को एक्सटेंशन बोर्ड बनाना सिखाया जाता है. इसे खुद बनाने के बाद छात्रों को जो खुशी मिलती है, वह बेमिसाल होती है.
उनके मुताबिक, पढ़ाई में स्किल शामिल करने से छात्रों के लिए नए मौके खुलते हैं, उनकी सोच का दायरा बढ़ता है और रचनात्मकता आती है. इससे छात्रों को सिर्फ अकादमिक परीक्षाएं पास करने से आगे भी बहुत कुछ मिलता है.
सोच बदलने की जरूरत
प्रांजल पाटिल ने बताया कि व्यावसायिक शिक्षा को छात्रों के लिए ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए दिल्ली कुछ चुनिंदा स्कूलों में कंपनियों और दूसरे नियोक्ताओं के साथ ज्यादा गहराई से काम कर रही है. इन स्कूलों में कंपनियों के साथ साझेदारी के जरिए इंटर्नशिप को बढ़ावा दिया जा रहा है.
अब तक करीब 3,000 नियोक्ताओं ने स्कूलों के साथ साझेदारी की है और कक्षा 10 और 11 के 20,000 छात्रों ने इंटर्नशिप पूरी की है. प्रांजल पाटिल के मुताबिक, जब कंपनियां स्कूलों के साथ जुड़ी होती हैं तो माता-पिता को अपने बच्चों को व्यावसायिक विषय पढ़ने के लिए तैयार करना आसान हो जाता है.
पैनल में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि AI और ऑटोमेशन के कारण व्हाइट-कॉलर नौकरियों में लगातार बदलाव हो रहा है. ऐसे में छात्रों और माता-पिता की सोच में मौजूद इस अंतर को कम करना जरूरी है, ताकि व्यावसायिक कौशल को सिर्फ एक दूसरे विकल्प के बजाय एक वास्तविक करियर के रास्ते के तौर पर देखा जा सके.