अहमदाबाद के पार्कों में किताबें लेकर क्यों जुट रहे लोग?
अहमदाबाद के एक महंगे स्कूल में खाने में कांच का टुकड़ा मिलने से शुरू हुआ विवाद किताबों तक पहुंचा और अब शहर के सार्वजनिक बगीचों में लोग चुपचाप किताबें पढ़कर विरोध जता रहे हैं

स्कूल में मलाला यूसुफजई और ऐनी फ्रैंक की किताब पर पाबंदी ने बढ़ाया विवाद
अहमदाबाद में पिछले एक महीने से लोग सार्वजनिक बगीचों में चुपचाप किताबें पढ़कर विरोध कर रहे हैं. शहर में इस मुद्दे को लेकर बहस अब बड़े स्तर पर पहुंच गई है. यह पूरा मामला एक महंगे स्कूल में एक छात्र के खाने में कांच का टुकड़ा मिलने के बाद शुरू हुआ.
11 अगस्त को आनंद निकेतन स्कूल के शिलाज कैंपस में कक्षा 8 के एक छात्र ने लंच के दौरान खाना खाते समय मुंह में कुछ अलग महसूस किया. जब उसने उसे बाहर निकाला तो वह कांच का टुकड़ा था. इसके तुरंत बाद उसे इलाज के लिए ले जाया गया.
माता-पिता का गुस्सा पहले स्कूल के कर्मचारियों की लापरवाही को लेकर था. इसके बाद वे उन किताबों के खिलाफ भी विरोध करने लगे, जिन्हें स्कूल के वैकल्पिक बुक-रीडिंग क्लब में छात्रों को पढ़ने के लिए दिया गया था. इनमें नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई की ‘आई एम मलाला’ और ऐनी फ्रैंक की ‘द डायरी ऑफ अ यंग गर्ल’ शामिल थीं.
माता-पिता स्कूल के बाहर इकट्ठा हुए और पूछा कि छात्रों को ऐसी किताबें पढ़ने के लिए क्यों दी गईं, जो “दूसरे धर्म के लेखकों ने लिखी हैं”. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुबह की प्रार्थना बंद कर दी गई है. उन्होंने कंसल्टेंट मुन्नाजा शम्स पर भी आपत्ति जताई. वे स्कूल की पूर्व छात्रा हैं, उन्होंने लिबरल आर्ट्स की पढ़ाई की है और टीच फॉर इंडिया की फेलो भी हैं. वे स्कूल में शिक्षकों की ट्रेनिंग और उनके काम की जांच में मदद कर रही थीं.
इसी दौरान बजरंग दल और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) भी इस मामले में शामिल हो गए. स्कूल दो हफ्ते के लिए बंद रहा. इस दौरान ABVP के कुछ सदस्यों ने स्कूल में घुसकर तोड़फोड़ की.
जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने स्कूल को नोटिस भेजकर जवाब मांगा. इसमें खाने की एजेंसी, स्कूल में खाने की सुरक्षा जांच और घटना के बाद उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी गई. साथ ही छात्रों के बयान, CCTV फुटेज और खाने के नमूनों की जांच के आदेश दिए गए.
स्कूल की कैंटीन बंद कर दी गई और खाने के ठेकेदार के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया गया. DEO ने अहमदाबाद के सभी स्कूलों की कैंटीन की जांच करने के भी आदेश दिए. खास बात यह थी कि इन दोनों किताबों को बुक क्लब में पढ़ने के लिए सुझाई गई किताबों की सूची से हटा दिया गया.
इसके बाद जो हुआ, उससे यह मामला और भी आगे बढ़ गया. 22 अगस्त को अहमदाबाद के स्टूडेंट एंड यूथ कलेक्टिव (SYC) ने स्कूल के समर्थन में एक बयान जारी किया. इसका शीर्षक था, ‘रीडिंग इज नॉट अ क्राइम’. इसके बाद अगस्त के आखिर में ‘गुजरात रीड्स एनीवे’ नाम के एक ऑनलाइन ग्रुप के जरिए कुछ लोगों ने शहर के एक सार्वजनिक बगीचे में चुपचाप किताब पढ़ने का कार्यक्रम रखा.
करीब 40 लोग ऐनी फ्रैंक, मलाला यूसुफजई, भगत सिंह, महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर की किताबें लेकर वहां पहुंचे. वहां मौजूद लोगों के लिए यह बहुत हैरान करने वाली बात थी कि भगवा स्कार्फ पहने बजरंग दल से जुड़े कुछ लोग हाथों में हॉकी स्टिक और लोहे की छड़ें लेकर वहां पहुंच गए. उन्होंने वहां मौजूद लोगों को पीटना शुरू कर दिया. किताबें फाड़ दी गईं. पढ़ने के कार्यक्रम में शामिल लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई और उनका धर्म जानने के लिए उनके पैंट उतार दिए गए.
पुलिस वहां पहुंची लेकिन पुलिस के साथ भी मारपीट हुई. कार्यक्रम में शामिल लोगों ने FIR दर्ज कराई. इसके बाद कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उन्हें जल्द ही छोड़ दिया गया.
इस कार्यक्रम में मौजूद कार्यकर्ता स्वाति गोस्वामी ने बताया, “यह बहुत डरावना था. हमें चोटें आईं लेकिन हम किसी तरह वहां से निकल गए. हमें डर था कि अगर हम वहां से नहीं निकल पाते तो लोगों की जान जा सकती थी.” उन्होंने बताया कि बगीचा एक व्यस्त सड़क पर था और उसके आसपास घर भी थे. इसके बावजूद वहां से गुजरने वाले लोग मदद के लिए नहीं आए.
इसके बाद से SYC लगातार मांग कर रहा है कि पुलिस इस हिंसा के साथ-साथ ऑनलाइन मिल रही धमकियों और डराने-धमकाने की घटनाओं की भी जांच करे. इनमें से ज्यादातर लोगों को लगातार ऐसी धमकियां मिल रही हैं.
इस बीच, आनंद निकेतन स्कूल में ऑफलाइन कक्षाएं फिर शुरू हो गई हैं. जिन छात्रों ने स्कूल का खाना नहीं लेने का फैसला किया था, उनकी फूड फीस वापस कर दी गई है.
दोनों किताबें हटा दी गई हैं, स्कूल के कम से कम दो लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है और सुबह की प्रार्थना भी फिर शुरू कर दी गई है. वहीं, शहर के कई सार्वजनिक बगीचे अब विरोध की जगह बन गए हैं. हर शाम बड़ी संख्या में लोग चुपचाप किताबें पढ़कर अपना विरोध जता रहे हैं. कोई समाज किस चीज को उकसाने वाली बात मानता है, इससे उस समाज की सोच का पता चलता है. गुजरात ने हाल ही में इसका एक नया उदाहरण सेट किया है- पेपरबैक यानी एक किताब.