भारत को ‘जीनोफोबिक’ बताने के पीछे बाइडन की क्या राजनीति है?
जीनोफोबिक देशों का मतलब ऐसे देशों से है जो अपने यहां प्रवासियों का आना पसंद नहीं करते

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भारत, चीन, जापान और रूस पर 'जीनोफोबिक' होने का आरोप लगाया है. बाइडेन के मुताबिक ये देश आसानी से प्रवासियों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और इस वजह से उनकी अर्थव्यवस्था को नुकसान भी हो रहा है. 1 मई के दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने न्यूज एजेंसी रायटर्स के एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने ये बातें कहीं.
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमने खुले दिल से प्रवासियों को स्वीकारा है. बाइडेन के मुताबिक चीन, भारत, रूस और जापान की अर्थव्यवस्थाएं काफी लंबे वक्त से स्थिर हैं, इसकी वजह इन देशों का 'जीनोफोबिया' है. ये देश प्रवासियों को असानी से स्वीकार नहीं करते, वहीं अमेरिका में स्थितियां ठीक इसके उलट हैं.
क्या है 'जीनोफोबिया'
स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ इडेनबर्ग की वेबसाइट के मुताबिक 'जीनोफोबिया' या अजनबियों का डर उन लोगों का डर या नफरत है जिन्हें खुद से अलग माना जाता है. यह किसी व्यक्ति की जाति, जातीयता, राष्ट्रीयता, धर्म या इस तरह की दूसरी खासियतों या पहचान पर आधारित हो सकता है. इसे नस्लवाद भी कह सकते हैं क्योंकि दोनों में ही किसी एक व्यक्ति या समुदाय के साथ भेद-भाव होता है.
क्या राजनीतिक है बाइडेन का बयान
बाइडेन अपने विरोधी और रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के प्रवासियों के प्रति कड़े रुख के आलोचक हैं. ट्रंप ने यह ऐलान किया है कि अगर वे दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं तो वे अवैध प्रवासियों पर पाबंदी लगाने के साथ कानूनी प्रवासन पर भी प्रतिबंध लगाएंगे. ट्रंप का मानना है कि अमेरिका में हिंसक घटनाएं बढ़ने के पीछे प्रवासी जिम्मेदार हैं.
भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन प्रवासियों के मुद्दे पर भारत को जीनोफोबिक बता रहे हों पर, अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मुकुल शर्मा की राय इस मामले में अलग है. प्रोफेसर मुकुल बाइडेन के बयान के राजनीतिक बताते हैं, क्योंकि अमेरिका फिलहाल राष्ट्रपति चुनावों की प्रक्रिया से गुजर रहा है.
प्रोफेसर शर्मा के मुताबिक लगभग सभी देशों के नेता चुनावों के समय इस तरह की बातें करते हैं ताकि वे राजनीतिक फायदा उठा सकें. मुकुल शर्मा देशों के विकास में प्रवासियों की अहमियत भी मानते हैं. उनके मुताबिक, "अगर ऐतिहासिक तौर पर देखें तो यह बात सही है कि अमेरिका ने कई सारे देशों के प्रवासियों को अपनाया है जो वहां कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रगति के भागीदार भी बनते रहे हैं. लेकिन पिछले 20 सालों के दौरान अमेरिका की इस प्रवृत्ति में भी कमी देखी गई है."
अर्थव्यवस्था के अलावा ये सवाल भी हैं अहम
मुकुल शर्मा शरणार्थियों को लेकर कुछ बनियादी समस्याओं के बारे में ध्यान दिलाते हैं. वे तर्क देते हैं, "ऐतिहासिक तौर पर यह बात भी सही है कि प्रवासी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में एक अहम भूमिका निभाते हैं और इसकी कई सारी मिसालें भी मौजूद हैं. लेकिन मौजूदा समय में प्रवासियों के साथ केवल इकोनॉमी एक मुद्दा नहीं है. बल्कि यह सीमा सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद, दक्षिणपंथी राजनीति और कई दूसरे आयामों से भी जुड़ी हुई है. जिस वजह से प्रवासियों के मुद्दे के साथ इन मुद्दों को शामिल करना भी जरूरी है."
वहीं इंडिया टुडे की एग्जीक्यूटिव एडिटर (फॉरेन अफेयर्स) गीता मोहन का मानना है कि हमें प्रवासियों और रेफ्यूजी के बीच के अंतर को भी समझना जरूरी है. प्रवासी वे हैं जो कानूनी तरीके से नौकरी या रोजगार की तलाश में किसी देश में जाते हैं. लेकिन रेफ्यूजी वे हैं जो अपने देश में हो रहे अत्याचारों से बचने के लिए दूसरे देशों से शरण मांगते हैं.
गीता बाइडेन के बयान पर कहती हैं कि शायद उन्होंने उस वक्त यह ध्यान नहीं दिया होगा कि उनके बयान का जपान और भारत के साथ रिश्तों पर क्या असर होगा. क्योंकि इन दोनों ही देशों के साथ अमेरिका के मजबूत रिश्ते हैं.
हालांकि जो बाइडेन के बयान पर अब वाइट हाउस की सफाई भी सामने आई है. वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरिन जीन पियरे ने कहा है कि बाइडेन की बातों का एक व्यापक अर्थ है और सभी जानते हैं कि वे दूसरे देशों का कितना सम्मान करते हैं और हमारे भारत व जापान के साथ काफी मजबूत संबंध रहे हैं.
प्रोफेसर मुकुल की तरह गीता भी बाइडेन के बयान को राजनीतिक ही मानती हैं. इसकी वजह बताते हुए वे कहती हैं कि अमेरिका में भी इन दिनों प्रवासियों का मुद्दा छाया हुआ है. बाइडेन के विरोधी ट्रंप लगातार इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अख्तियार किए हुए हैं. यहां तक कि जब वे राष्ट्रपति थे उस वक्त भी उनका रुख प्रवासियों को लेकर काफी सख्त था और वे अभी-भी उसी पर कायम हैं.
लेकिन ट्रंप के उलट बाइडेन का रुख इन मामलों में नरम है. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि बाइडेन रायटर्स के अपने संबोधन में ट्रंप को घेरने की कोशिश कर रहे हों, पर बात आगे बढ़ाने के क्रम में उन्होंने वैसी बातें भी बोल दीं जिससे उनको बचा जाना चाहिए था.