भारतीयों को किस तरह की नौकरियां लुभाती हैं?

छोटे शहरों और कम आय वाले परिवारों के युवा नौकरी चुनते समय अब सिर्फ सैलरी नहीं, बल्कि स्थिरता, सम्मान और आगे बढ़ने के मौके को भी दे रहे हैं तरजीह

नौकरी के साथ जुड़ा सामाजिक सम्मान भी युवाओं को आकर्षित करता है (सांकेतिक तस्वीर)

कम आय वाले परिवारों के युवा भारतीयों के लिए कोई नौकरी सिर्फ इसलिए आकर्षक नहीं होती कि उसमें कितनी सैलरी मिलती है. काम की गरिमा, आगे बढ़ने के मौके और सम्मान भी उनके करियर विकल्प तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं.

सिटीजन मीडिया प्लेटफॉर्म यूथ की आवाज की ओर से टियर-3 और टियर-4 शहरों और कम आय वाले परिवारों के 1,600 युवाओं (60 फीसदी पुरुष और बाकी महिलाएं) पर किए गए सर्वे में करीब 62 फीसदी युवाओं ने कहा कि नौकरी के अवसर को परखते समय नौकरी की स्थिरता, सामाजिक पायदानों पर आगे बढ़ने का मौका और सम्मान सबसे अहम कारक हैं.

यूथ की आवाज के संस्थापक और सीईओ अंशुल तिवारी कहते हैं, "युवा ब्लू-कॉलर जॉब को खारिज नहीं कर रहे हैं लेकिन वे इस बात को लेकर काफी सजग हैं कि उनके करीबी यानी माता-पिता, दोस्त और पड़ोसी कुछ नौकरियों को किस नजर से देखते हैं. यह बात उनके शिक्षकों की राय से ज्यादा मायने रखती है. वे उन्हीं विकल्पों को चुनना चाहते हैं." तिवारी के मुताबिक, युवा खुद से यही सवाल पूछ रहे हैं कि उनके लिए दूसरों ने जो मापदंड तय किए हैं वे उन्हें कैसे पूरा करें.

तिवारी और अन्य वक्ताओं ने हाल ही में नई दिल्ली में द/नज फाउंडेशन  के एक कार्यक्रम में ‘इंडिया’स न्यू स्किलिंग जर्नी : एस्पिरेशन, एक्सेस एंड बियॉन्ड विषय पर हुई पैनल चर्चा में हिस्सा लिया.

सरकारी नौकरियों की संख्या काफी कम है लेकिन युवाओं के ये ज्यादा लुभाती हैं (सांकेतिक तस्वीर)

उद्यम लर्निंग फाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ मेकिन महेश्वरी कहते हैं, "युवाओं के लिए क्या आकर्षक है, यह दुर्भाग्य से समाज तय करता है और सरकारी नौकरियां भी उनमें से एक हैं. आज ऐसी नौकरियां बहुत कम हैं फिर भी यह सोच नहीं बदली है." उद्यम ने सरकारी स्कूलों के करीब 18 लाख छात्रों के साथ उद्यमशील सोच विकसित करने के लिए काम किया है.

आकांक्षाओं तक पहुंचने का रास्ता

युवा जॉब मार्केट की हकीकत को सही तरीके से नहीं समझ पा रहे हैं. महेश्वरी कहते हैं, "हम ऐसा सपना बेचते हैं जो ज्यादातर लोगों के लिए काम नहीं करता. हमें ऐसा सपना दिखाना चाहिए जिसे हासिल किया जा सके."

उन्होंने उद्यम की ओर से सरकारी स्कूलों के छात्रों के बीच किए गए एक सर्वे का उदाहरण दिया. इसमें करीब 85 फीसदी 14 साल के बच्चों के पास स्पष्ट और बड़े लक्ष्य थे. लेकिन 18 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते 25 फीसदी से भी कम युवाओं को लगता था कि वे अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं.

महेश्वरी कहते हैं, "युवाओं के पास आकांक्षाएं और सपने हैं. हमारे देश में इसकी कोई कमी नहीं है और उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं अवसर पैदा कर सकती हैं. हमें बस इसे प्रोत्साहित करने और इसे आकर्षक बनाने की जरूरत है."

इसी संदर्भ में वे फिल्मों, संगीत, रील्स, इंस्टाग्राम और दूसरे माध्यमों के जरिए सही नैरेटिव बनाने की अहमियत बताते हैं. युवा अपनी ज्यादातर जानकारी इन्हीं माध्यमों से हासिल करते हैं. वे सवाल उठाते हैं, "कितनी फिल्में सफल छोटे कारोबारों के बारे में बात करती हैं?" उनका कहना है कि काम की गरिमा और मेहनत के महत्व से जुड़े संदेश को बढ़ावा देने के लिए फिल्मों और यहां तक कि आमिर खान जैसी शख्सियतों का भी पर्याप्त इस्तेमाल नहीं किया गया है.

इस पर तिवारी कहते हैं, "अगर युवाओं की ज्यादातर बातचीत वहीं हो रही है तो उद्यमिता को लेकर नैरेटिव भी वहीं बनाया जाना चाहिए वरना हम पीछे रह जाएंगे."

जॉब मार्केट में जाने से पहले करियर काउंसलिंग युवाओं की काफी मदद कर सकती है (सांकेतिक तस्वीर)

करियर काउंसलिंग

अक्सर युवा किसी नौकरी को जिस तरह देखते हैं और वास्तव में वह नौकरी जैसी होती है, उसके बीच अंतर होता है. वे इस उम्मीद में उच्च शिक्षा हासिल करते हैं कि उन्हें किसी वैश्विक कंपनी में व्हाइट-कॉलर जॉब मिलेगी और वे शानदार दफ्तरों में काम करेंगे. करियर काउंसलिंग और काम को लेकर बेहतर नैरेटिव इस अंतर को कम करने में मदद कर सकते हैं.

इसे समझाने के लिए ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट में यूथ, स्किल्स एंड लाइवलीहुड्स लीड और प्रिंसिपल कंसल्टेंट दिव्या नांबियार ने नोकिया की एक फैक्ट्री में काम करने वाली युवतियों पर किए गए अपनी डॉक्टरेट रिसर्च का उदाहरण दिया. 

यह फैक्ट्री स्पेशल इकॉनॉमिक जोन में थी. एक ग्लोबल कंपनी में नौकरी मिलना उनके लिए आकर्षक था, लेकिन जल्द ही उन्हें पता चला कि इस नौकरी में 12 घंटे असेंबली लाइन पर खड़े रहना और काम पर जाने के लिए एक तरफ से 50 किलोमीटर का सफर करना शामिल है. 

इसके बाद कई युवतियों ने इस विकल्प पर दोबारा विचार किया. नांबियार के शोध के मुताबिक, नई नौकरी शुरू करने वाले 10 लोगों में से सिर्फ तीन ही तीन महीने बाद तक नौकरी में बने रहते हैं और एक साल बाद सिर्फ एक व्यक्ति नौकरी पर रहता है.

तिवारी कहते हैं कि इन गलतफहमियों को दूर करना जरूरी है. पहले बच्चे अपने माता-पिता के करियर की राह पर चलते थे लेकिन अब वे बेहद अस्थिर और काफी हद तक अनिश्चित दुनिया में रह रहे हैं.

महेश्वरी का कहना है कि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है. ऐसे में ‘भविष्य के कौशल’ सिखाने के बजाय बुनियादी कौशल मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए. इनमें चार चीजें सबसे अहम हैं- कम्युनिकेशन, क्रिटिकल थिंकिंग, कोलैबरेशन और क्रिएटिविटी.

इसके अलावा, करियर काउंसलिंग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. हालांकि यह पारंपरिक तरीके से नहीं होना चाहिए, जिसमें विशेषज्ञ युवाओं को उपलब्ध विकल्पों के बारे में अपनी राय दें. इसके बजाय, करियर मार्गदर्शन में टीनएजर्स को खुद को समझने और अपनी रुचि पहचानने में मदद करनी चाहिए. इससे वे अलग-अलग विकल्पों को आजमा सकेंगे और समझ पाएंगे कि उनकी असल में किस क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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