दुनियाभर में 73% वन्यजीव घटे लेकिन भारत में बढ़े बाघ-शेर!
WWF की 'लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट-2026' के मुताबिक 1970 से 2022 के बीच दुनिया में वन्यजीवों की आबादी में औसतन 73% गिरावट आई. भारत में बाघों और शेरों की संख्या बढ़ी है लेकिन जंगलों का घटना, इंसानों से टकराव और सीमित इलाकों में सिमटी आबादी संरक्षण की चुनौती बने हुए हैं

2022 की गणना के मुताबिक भारत में बाघों की संख्या 3,682 दर्ज की गई है (फाइल फोटो)
विश्व वन्यजीव कोष (WWF) की 8 अक्टूबर को जारी की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट-2026 के मुताबिक दुनिया भर में जिन वन्यजीवों की आबादी पर लगातार नजर रखी जा रही है, बीते 52 साल में उनकी संख्या में औसतन 73 फीसदी की गिरावट आई है. जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (ZSL) के साथ मिलकर तैयार की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस गिरावट को रोका जा सकता है. रिपोर्ट इसके लिए भारत में बाघों और शेरों जैसे 'बिग कैट्स' के सफल संरक्षण की मिसाल देती है.
लिविंग प्लैनेट इंडेक्स में 1970 से 2022 के बीच रीढ़ वाले जीवो यानी कशेरुकी (वर्टिब्रेट) जीवों की 5,790 प्रजातियों की 35,803 आबादी के आंकड़े शामिल किए गए हैं. मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) में सबसे ज्यादा 85 फीसदी की गिरावट आई. इसके बाद स्थलीय (जमीन पर रहने वाले) जीवों की आबादी में 69 फीसदी और समुद्री जीवों की आबादी में 59 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में सबसे ज्यादा 95 फीसदी की गिरावट आई. इसके बाद अफ्रीका में 80 फीसदी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 49 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.वहीं उत्तरी अमेरिका में 28 फीसदी और यूरोप तथा मध्य एशिया में 23 फीसदी की गिरावट देखी गई. इन क्षेत्रों में गिरावट कम रहने की वजह यह भी है कि वहां बड़े पैमाने पर नुकसान 1970 से पहले ही हो चुका था.
इस आंकड़े का मतलब यह नहीं है कि 73 फीसदी जानवर गायब हो गए हैं. यह उन वन्यजीव आबादियों में औसतन हुए बदलाव का आंकड़ा है जिन पर नजर रखी गई. इनमें से आधी आबादी या तो स्थिर है (7 फीसदी) या बढ़ती हुई (43%) पाई गई. हालांकि, जिन आबादी में गिरावट आई है, वहां नुकसान की दर बढ़ोतरी के मुकाबले बहुत ज्यादा है. जीवों के रहने की जगहों का खत्म होना सबसे आम वजह बताई गई है. इसके बाद जरूरत से ज्यादा शिकार और जीवों का इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, बाहरी आक्रामक प्रजातियां और बीमारियां शामिल हैं.
रिपोर्ट में जिन जीवों की आबादी में सुधार का जिक्र किया गया है उनमें हरे समुद्री कछुए, ब्लूफिन टूना मछली, दक्षिणी अफ्रीका के हाथी और बाघ शामिल हैं. दुनिया भर में जंगली बाघों की संख्या 2010 में 3,200 से बढ़कर 2025 में करीब 5,700 हो गई. 2022 में हुई अखिल भारतीय बाघ गणना के मुताबिक, भारत में बाघों की संख्या 3,682 दर्ज की गई है.
भारत में जिन दूसरी प्रजातियों की आबादी बढ़ रही है उनमें एक सींग वाले गैंडे (3,300 से ज्यादा), तेंदुए (13,874) और हिम तेंदुए (718) शामिल हैं. वहीं एशियाई शेरों की संख्या 2020 में 674 से बढ़कर 2025 में 891 हो गई. भारत में पहली बार सभी इलाकों में रिवर डॉल्फिन गणना की गई. 2021 से 2023 के बीच 28 नदियों के 8,507 किलोमीटर लंबे हिस्से में किए गए आकलन में गंगा नदी में 6,324 डॉल्फ़िन होने का अनुमान लगाया गया है.
रिपोर्ट का कहना है कि सिर्फ वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों से इस नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती. इसके लिए तीन व्यवस्थाओं में बदलाव जरूरी है: भोजन, जिससे जीवों के रहने की जगहों का नुकसान होता है; ऊर्जा, जिससे जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिलता है; और फंडिंग.
साल 2023 में करीब 7.3 लाख करोड़ डॉलर ऐसे कामों में लगाए गए, जिनसे प्रकृति को नुकसान पहुंचता है. इसके मुकाबले प्रकृति को बचाने या उसे फिर से बेहतर बनाने के लिए 220 अरब डॉलर खर्च किए गए. जैव विविधता को बचाने के लिए हर साल 1.3 लाख करोड़ डॉलर की कमी बनी हुई है.
रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के शोध का हवाला देते हुए कहा गया है कि ऊर्जा के क्षेत्र में बदलाव का ऐसा अहम मोड़ पहले ही आ चुका है, जहां से बदलाव अपने आप और तेजी से आगे बढ़ने लगता है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चीन के मुकाबले ज्यादा तेजी से सौर ऊर्जा से चलने वाली अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है.
भारत ने 2030 तक अपनी कुल बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 50 फीसदी करने का लक्ष्य पांच साल पहले ही हासिल कर लिया. 31 अगस्त 2026 तक बिजली उत्पादन की कुल क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 54.88 फीसदी हो गई थी. अब भारत का नया लक्ष्य 2035 तक इसे 60 फीसदी तक पहुंचाना है.
WWF-India की प्रोग्राम डायरेक्टर सेजल वोरा कहती हैं, “25 साल पहले यह सोचना लगभग नामुमकिन लगता था कि आर्थिक विकास को जीवाश्म ईंधन की निर्भरता से अलग किया जा सकता है. आज भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में अहम नेतृत्व दिखाया है और खेती के तरीके बदलने की दिशा में भी काम हो रहा है. चुनौतियों के बावजूद समाधान मौजूद हैं. अगर हम मिलकर इन पर काम करें तो विकास, तरक्की और प्रकृति को बचाने का काम साथ-साथ हो सकता है.”
बाघों और शेरों जैसी अहम प्रजातियों की आबादी में सुधार एक तरफ तारीफ के काबिल है लेकिन दूसरी तरफ यह सुधार अब भी नाजुक दौर में है. पिछले दो दशकों में बाघों के रहने का इलाका 30 फीसदी बढ़ा है लेकिन 2011 से 2021 के बीच जंगलों का क्षेत्रफल 92,989 वर्ग किलोमीटर घट गया. इसमें से करीब आधा नुकसान रिजर्व फॉरेस्ट वाले इलाकों में हुआ.
अब 45 फीसदी बाघ ऐसे इलाकों में रह रहे हैं जहां वन्यजीवों के साथ दूसरे काम भी होते हैं. यहां बाघों को 6.6 करोड़ लोगों के साथ जगह साझा करनी पड़ रही है. इंसानों की जान जाने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. 2014 से 2024 के बीच बाघों के हमलों में 600 से ज्यादा लोगों की मौत हुई. 2022 के बाद मौतों की संख्या बढ़ी, जबकि बाघों की आबादी हर साल करीब 6 फीसदी की दर से बढ़ रही थी.
बाघों के रहने के इलाके 18 राज्यों के 58 वन्यजीव अभयारण्यों में फैले हैं, वहीं दूसरी ओर शेरों की बढ़ती आबादी के सामने बड़ा खतरा है. वे गुजरात के सौराष्ट्र प्रायद्वीप के एक ही इलाके तक सीमित हैं. गिर के जंगलों और आसपास के 35,000 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके में उद्योग, खेती की जमीन, हाईवे, रेल की पटरियां और शहरों की बस्तियां भी हैं.