कोलंबो-सिंगापुर पर भारत की निर्भरता कैसे घटाएगा विझिंजम पोर्ट?
भारत के कंटेनर ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा आज भी विदेशी बंदरगाहों से होकर गुजरता है. 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ' में चर्चा हुई कि केरल का विझिंजम पोर्ट भारत की इस निर्भरता को कम कर ट्रांसशिपमेंट का नया केंद्र कैसे बन सकता है

भारत अपने कंटेनर ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा कोलंबो, सिंगापुर, दुबई, पोर्ट ऑफ सलालाह और पोर्ट क्लांग जैसे विदेशी बंदरगाहों के जरिए ट्रांसशिप करता रहा है. इसकी वजह सीधी है. भारतीय बंदरगाहों में आज के विशाल कंटेनर जहाजों को खड़ा करने के लिए जरूरी गहराई नहीं रही है.
तिरुवनंतपुरम के पास स्थित विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट इस स्थिति को बदल रहा है. यह प्रायद्वीप के दक्षिणी छोर के पास अंतरराष्ट्रीय पूर्व-पश्चिम शिपिंग कॉरिडोर से जुड़ा है. बंदरगाह में करीब 20 मीटर की प्राकृतिक गहराई और लगभग 3 किलोमीटर लंबा ब्रेकवॉटर है.
इसका 800 मीटर का बर्थ बढ़ाया जा रहा है. यहां फिलहाल आठ प्रमुख क्रेन और 24 पूरी तरह ऑटोमेटेड यार्ड क्रेन हैं. यह जानकारी जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) के पूर्व चेयरमैन और मालाबार इंटरनेशनल पोर्ट एंड SEZ लिमिटेड के पूर्व एमडी और सीईओ लक्ष्मण राधाकृष्णन ने दी.
29 सितंबर को कोच्चि में हुए ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ’ के ‘विनिंग बैक द कार्गो: द बिग ट्रांसशिपमेंट बेट’ सत्र में राधाकृष्णन ने कहा, "इन सबकी वजह से विझिंजम उन अल्ट्रा-लार्ज कंटेनर जहाजों को संभाल सकता है जिन्हें फिलहाल भारत के ज्यादातर बंदरगाह नहीं संभाल सकते."
राधाकृष्णन के मुताबिक, कोलंबो, सिंगापुर या भारत के बाहर किसी दूसरे बंदरगाह से गुजरने वाले हर कंटेनर में समय और विदेशी मुद्रा दोनों खर्च होते हैं. इससे विदेशी बंदरगाहों पर रणनीतिक निर्भरता भी बनी रहती है.
उन्होंने कहा, "विझिंजम से गुजरने वाले हर कंटेनर पर, चाहे वह निर्यात का हो या आयात का, करीब 80-100 डॉलर की बचत होगी. यह काफी बड़ी बचत है. ट्रांजिट में लगने वाला समय भी बचेगा. किसी दूसरे हब का इस्तेमाल करने पर दो से सात दिन की देरी हो सकती है."
राधाकृष्णन ने बताया कि इससे भारत को अपनी व्यापार आपूर्ति श्रृंखला पर रणनीतिक नियंत्रण भी मिलेगा और विदेशी भू-राजनीतिक और आर्थिक बदलावों से जोखिम कम होगा.
राधाकृष्णन का अनुमान है कि अगर ट्रांसशिपमेंट के लिए विदेशी बंदरगाहों की जगह विझिंजम का इस्तेमाल किया जाए तो करीब 20-22 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है. उनका यह भी अनुमान है कि जहाजों की कुल पोर्ट से जुड़ी लॉजिस्टिक्स लागत करीब 30 फीसदी घट सकती है. जहाजों को ईंधन खर्च में भी प्रति कंटेनर करीब 50-70 डॉलर की बचत हो सकती है.
इसके नतीजे भी दिखने लगे हैं. विझिंजम ने 18 महीनों में 20 लाख ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट्स (TEUs) संभाले हैं और दुनिया के कुछ सबसे बड़े कंटेनर जहाज यहां पहुंचे हैं. बंदरगाह पर दुनिया के सबसे बड़े जहाजों में से एक MSC लोरेटो भी पहुंचा जिसमें 17,262 कंटेनर थे. राधाकृष्णन ने कहा, "सबसे बड़े और महंगे जहाज उन्हीं बंदरगाहों पर जाते हैं जिनकी गहराई, टर्नअराउंड स्पीड और ऑटोमेशन पर उन्हें भरोसा होता है."
विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट के सीईओ श्रीकुमार के. नायर ने भी इससे सहमति जताई. उन्होंने कहा, "किसी भी भारतीय बंदरगाह पर अल्ट्रा-लार्ज कंटेनर जहाज को देखना बेहद दुर्लभ है और इसे दुनिया के सामने दिखाना चाहिए."
उन्होंने बताया कि पिछले महीने ही विझिंजम में करीब सात या आठ अल्ट्रा-लार्ज जहाज आए. उनके मुताबिक बंदरगाह का कैचमेंट सिर्फ केरल या भारत तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि हिंद महासागर के सभी देशों तक होना चाहिए.
विझिंजम की रणनीतिक स्थिति इसे संभव बनाती है. श्रीकुमार ने कहा कि आज विझिंजम दुनिया का ऐसा इकलौता भारतीय बंदरगाह है जो करीब 50 देशों में फैले 100 से ज्यादा बंदरगाहों और लगभग सभी महाद्वीपों से जुड़ा है.
उन्होंने बताया कि तीन दशक पहले तिरुवनंतपुरम से संयुक्त अरब अमीरात के जेबेल अली तक माल पहुंचने में करीब छह हफ्ते लगते थे. श्रीकुमार कहते हैं, "आज विझिंजम से जेबेल अली तक सीधी शिपिंग में पांच दिन लगते हैं. यही बदलाव विझिंजम ला रहा है."
विझिंजम के लिए अगला कदम ट्रांसशिपमेंट हब से आगे बढ़कर गेटवे पोर्ट बनना है. हालांकि इसके लिए लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम में अभी कई कमियां हैं. राधाकृष्णन के मुताबिक, तत्काल जरूरत कंटेनर फ्रेट स्टेशनों की है.
उन्होंने कहा, "हमें विझिंजम के आसपास करीब एक दर्जन कंटेनर फ्रेट स्टेशन चाहिए जो फिलहाल मौजूद नहीं हैं. ऐसा नहीं हुआ तो हमारे पास बेहद कुशल बंदरगाह तो होगा, लेकिन उससे जुड़ने के लिए लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी नहीं होगी."
इसके अलावा राज्य को विझिंजम के आसपास औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम तैयार करना होगा. राधाकृष्णन ने कहा, "केरल को विझिंजम से उसी तरह फायदा उठाना चाहिए जैसे गुजरात ने मुंद्रा और महाराष्ट्र ने जवाहरलाल नेहरू पोर्ट के साथ किया है. मुंद्रा और जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ने सिर्फ कंटेनर नहीं संभाले. इनके आसपास इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, SEZ, वेयरहाउसिंग क्लस्टर और इससे जुड़े मैन्युफैक्चरिंग उद्योग विकसित हुए. इससे पोर्ट ट्रैफिक पूरे राज्य के आर्थिक इंजन में बदल गया."
उन्होंने मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी की जरूरत पर भी जोर दिया. उनके मुताबिक किसी बंदरगाह का कामकाज इस बात पर निर्भर करता है कि माल कितनी तेजी से अंदरूनी इलाकों तक पहुंच सकता है. पर्याप्त रेल और सड़क कनेक्टिविटी नहीं होने पर जहाजों को तेजी से संभालने के बावजूद बंदरगाह पर माल जमा हो सकता है.
तिरुवनंतपुरम चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष एस.एन. रघुचंद्रन नायर ने विझिंजम को केरल के लिए बड़ा मौका बताया. हालांकि, उन्होंने कहा कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को इसका फायदा तभी मिलेगा जब बंदरगाह के आसपास का पूरा इकोसिस्टम विकसित हो.
उन्होंने बताया कि 1990 के दशक की शुरुआत में केरल ने राज्य का पहला IT पार्क बनाया था, लेकिन बाद में दूसरे राज्य आगे निकल गए. उन्होंने कहा, "इस बार विझिंजम के मामले में हमें मौका नहीं गंवाना चाहिए."
अब चिंता यह है कि सड़क, रेल और दूसरी बुनियादी सुविधाएं बंदरगाह की रफ्तार के साथ नहीं बढ़ी हैं. उन्होंने कहा, "बंदरगाह तैयार हो गया है. इसे कमीशन होने से वास्तविकता बनने तक 10 साल लगे, लेकिन बुनियादी ढांचा इसके साथ नहीं बढ़ पाया. अगर बंदरगाह को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचना है तो सड़क और रेल कनेक्टिविटी को बंदरगाह के विकास के स्तर तक लाना होगा."
जमीन भी एक बड़ी चुनौती है. केरल में जमीन सीमित है और कीमतें काफी ज्यादा हैं. इससे कंपनियों के सामने औद्योगिक विकास के लिए बड़े भूखंड खरीदना में बड़ी मुश्किल होती है. नायर ने कहा, "केरल बेहद महंगा है. 10 एकड़ जमीन की कीमत 150 करोड़ रुपए तक हो सकती है. ऐसे में किसी कंपनी के लिए जमीन खरीदना लगभग असंभव है. पड़ोसी राज्य तमिलनाडु इस संभावना का फायदा उठा रहा है. केरल सरकार को भी इस संभावना को समझना चाहिए और शायद लैंड पूलिंग शुरू करके करीब 1,000-1,500 एकड़ जमीन जुटानी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा उद्योग यहां आ सकें."
हालांकि श्रीकुमार ने कहा, "यह बंदरगाह एक मछली पकड़ने वाले गांव में और पेंशनभोगियों के शहर तिरुवनंतपुरम में हकीकत बना है जहां औद्योगिक इकोसिस्टम नहीं है. लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम नहीं है. समुद्री क्षेत्र का इकोसिस्टम भी नहीं है. यहां अवसरों की एक सोने की खान है लेकिन इसके लिए सरकार की ओर से कुछ सक्रिय कदम उठाने की जरूरत है."
सरकार ने सड़क और रेल कनेक्टिविटी को लेकर योजनाएं बनाई हैं. श्रीकुमार ने बताया कि केंद्र सरकार के सहयोग से प्रस्तावित 65 किलोमीटर लंबी तिरुवनंतपुरम आउटर रिंग रोड से सड़क कनेक्टिविटी बेहतर होगी. रेल कनेक्टिविटी भी अगले कुछ वर्षों में तैयार होने की उम्मीद है.
केरल के सामने अब बड़ा सवाल यह है कि वह विझिंजम के आसपास सड़क, रेल लिंक, औद्योगिक क्लस्टर, लॉजिस्टिक्स सुविधाएं और दूसरे जरूरी इकोसिस्टम को कितनी तेजी से विकसित कर पाता है. तभी गहरे पानी वाला यह ट्रांसशिपमेंट पोर्ट एक बड़े आर्थिक इंजन में बदल सकेगा.
सत्र की खास बातें
लक्ष्मण राधाकृष्णन :
- "कोलंबो, सिंगापुर या भारत के बाहर किसी दूसरे बंदरगाह से गुजरने वाले हर कंटेनर में समय और विदेशी मुद्रा खर्च होती है. साथ ही इन देशों पर हमारी रणनीतिक निर्भरता बनी रहती है. विझिंजम का मकसद इस ट्रैफिक के साथ उससे जुड़े रोजगार और राजस्व को वापस लाना और हमारे लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम को भारत की जमीन पर लाना है."
- "विझिंजम पोर्ट की वजह से हर कंटेनर पर, चाहे आप निर्यात कर रहे हों या आयात, करीब 80-100 डॉलर की बचत होती है. ट्रांजिट में लगने वाला दो से सात दिन का समय भी बचता है. जहाजों को आम तौर पर कई बंदरगाहों पर संभाला जाता है, लेकिन यहां हमें सीधा नियंत्रण मिलता है. यह विदेशी भू-राजनीतिक या आर्थिक बदलावों से प्रभावित नहीं होगा. इससे आपूर्ति श्रृंखला पर रणनीतिक नियंत्रण मिलता है."
- "अगर हम विदेशी बंदरगाहों की जगह विझिंजम का इस्तेमाल करें तो करीब 20-22 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है. जहाजों की कुल पोर्ट से जुड़ी लॉजिस्टिक्स लागत करीब 30 फीसदी कम हो सकती है. जहाजों को सिर्फ ईंधन खर्च में प्रति कंटेनर करीब 50-70 डॉलर की बचत होगी."
श्रीकुमार के. नायर :
- "किसी भी भारतीय बंदरगाह पर अल्ट्रा-लार्ज कंटेनर जहाज को देखना बेहद दुर्लभ है और इसे दुनिया के सामने दिखाना चाहिए. अब यह विझिंजम में हो रहा है. पिछले महीने ही विझिंजम में करीब सात या आठ अल्ट्रा-लार्ज जहाज आए. इसकी वजह पूर्व-पश्चिम वैश्विक समुद्री मार्ग के पास इसकी स्थिति और तट के पास प्राकृतिक गहराई है."
- "पूर्व-पश्चिम वैश्विक समुद्री मार्ग विझिंजम से करीब 10 नॉटिकल मील दूर से गुजरता है. जब आप किसी वैश्विक हाईवे के ठीक पास होते हैं तो संभावनाएं बहुत बड़ी होती हैं."
- "आज विझिंजम दुनिया का ऐसा इकलौता भारतीय बंदरगाह है जो करीब 50 देशों में फैले 100 से ज्यादा बंदरगाहों और लगभग सभी महाद्वीपों से जुड़ा है."
एस.एन. रघुचंद्रन नायर
- "बंदरगाह तैयार हो गया है. इसे कमीशन होने से वास्तविकता बनने तक 10 साल लगे लेकिन बुनियादी ढांचा इसके साथ नहीं बढ़ पाया. सड़क और रेल कनेक्टिविटी अभी तैयार होनी बाकी है. अगर बंदरगाह को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचना है तो दोनों को इसके विकास के स्तर तक लाना होगा."
- "केरल में जमीन बेहद महंगी है. 10 एकड़ की कीमत 150 करोड़ रुपए तक हो सकती है जिससे किसी कंपनी के लिए जमीन खरीदना लगभग असंभव है. पड़ोसी राज्य तमिलनाडु इस संभावना का फायदा उठा रहे हैं और जमीन खरीद रहे हैं. केरल सरकार को भी इस संभावना को समझना चाहिए और शायद लैंड पूलिंग शुरू करके करीब 1,000-1,500 एकड़ जमीन जुटानी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा उद्योग यहां आ सकें."