अमेरिका ने अगर 100 फीसदी टैरिफ लगाया तो भारत क्या करेगा?
रूसी तेल खरीदने की वजह से अमेरिका भारत पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगा सकता है. इससे अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात के साथ रूस से तेल आयात पर भी असर पड़ने का खतरा है

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)
अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने 16 सितंबर को रूस के ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाने वाला एक कानून पारित किया. इसके तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले भारत और दूसरे देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया.
इसके दो दिन बाद ट्रंप ने इस कानून पर हस्ताक्षर कर दिए. इसका नाम लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 है.
7 अगस्त को अमेरिकी सीनेट ने उस विधेयक को मंजूरी दी थी जिसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदार देशों- भारत, चीन, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया पर ये टैरिफ लगाए जा सकते हैं.
भारत अपने कच्चे तेल का आधा हिस्सा रूस से आयात करता है. अगर ट्रंप इस विधेयक को लागू करते हैं तो यह भारत के लिए दोधारी चुनौती साबित होगी. इससे अमेरिका को होने वाले भारत के वस्तु और सेवा निर्यात के साथ-साथ रूस से होने वाले तेल और गैस आयात पर भी असर पड़ेगा.
अमेरिका ने फरवरी 2026 में रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 25 फीसदी जुर्माना लगाने के अपने प्रस्ताव को वापस ले लिया था. हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के इस नए कदम से भारत के तेल आयात के साथ-साथ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भी अनिश्चितता बढ़ गई है. दोनों देशों के व्यापार प्रतिनिधि फिलहाल इस समझौते की अंतिम रूपरेखा तैयार कर रहे हैं.
भारत पर फिलहाल अमेरिका में 10 फीसदी बेसलाइन टैरिफ (धारा 301 के तहत) लागू है. इसका असर अमेरिका को होने वाले भारत के करीब 55 फीसदी निर्यात पर पड़ता है. बाकी 45 फीसदी निर्यात, जिसमें जेनेरिक दवाएं, स्मार्टफोन आदि शामिल हैं, या तो इससे छूट प्राप्त हैं या उन पर धारा 232 के तहत टैरिफ लागू है. इसमें स्टील, एल्युमीनियम, ऑटो पार्ट्स आदि शामिल हैं.
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा के मुताबिक, अमेरिका में भारत पर मौजूदा प्रभावी टैरिफ दर करीब 12 फीसदी है. यह बांग्लादेश (करीब 25 फीसदी), चीन (करीब 22 फीसदी), वियतनाम (करीब 14 फीसदी) और इंडोनेशिया (करीब 14 फीसदी) की तुलना में कम है.
अरोड़ा ने रिसर्च एसोसिएट हर्षल पटेल के साथ लिखी एक रिसर्च रिपोर्ट में कहा, "इस घटनाक्रम से टैरिफ को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. इससे अमेरिका को भारत के निर्यात में सुधार की रफ्तार पटरी से उतरने का जोखिम है, खासकर तब जब फरवरी 2026 में इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया गया था."
उन्होंने लिखा, "सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के दौरान, जब भारत पर 50 फीसदी टैरिफ था, अमेरिका को भारत का औसत मासिक निर्यात घटकर 6.5 अरब डॉलर रह गया था. इससे पहले के छह महीनों में यह 8.1 अरब डॉलर था. अब यह बढ़कर 8.5 अरब डॉलर हो गया है."
वे आगे यह भी लिखती है, “मार्च 2026 से अगस्त 2026 के बीच टैरिफ दर घटकर 10 फीसदी हो गई थी और यह दर दूसरे देशों के लगभग बराबर थी. अगर इस विधेयक के तहत काफी ज्यादा टैरिफ लगाया जाता है तो इससे एक बार फिर अमेरिका को भारत के निर्यात में बड़ी गिरावट आने की संभावना है."
वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका को भारत का निर्यात बढ़कर 87.31 अरब डॉलर हो गया. यह भारत के कुल निर्यात का करीब 20 फीसदी है.
एमके ग्लोबल के विश्लेषकों ने लिखा, "भारत ने पिछले साल के टैरिफ संकट से निपटने के लिए उत्पादों और निर्यात बाजारों में विविधता लाया था. स्पेन, चीन, हांगकांग और पूर्वी अफ्रीकी देशों जैसे बाजारों में निर्यात में काफी बढ़ोतरी हुई थी. अगर अमेरिका फिर से टैरिफ बढ़ाता है तो इसी तरह की रणनीति अपनाए जाने की संभावना है."
इस रिपोर्ट के मुताबिक, "भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लागू होने से भी ब्रिटेन को निर्यात बढ़ाने में मदद मिलेगी. इसके बाद यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता लागू होने की दिशा में भी आगे बढ़ा जा रहा है."
हालांकि उन्होंने आगाह किया कि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है इसलिए अमेरिका को होने वाले निर्यात पर बड़ा झटका केवल कम किया जा सकता है उसकी पूरी भरपाई नहीं की जा सकती.
अरोड़ा के मुताबिक, "इससे भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते की बातचीत को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ती है. साथ ही भारत पर अमेरिकी वस्तुओं के लिए ज्यादा रियायतें देने और भारतीय बाजार में शुल्क-मुक्त पहुंच देने का दबाव बढ़ सकता है."
अमेरिका को भारत के निर्यात पर असर पड़ने के साथ ही अमेरिकी कदम से रूस से होने वाले भारत के तेल आयात पर भी असर पड़ेगा. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारत अपनी तेल जरूरत का करीब 90 फीसदी आयात करता है और अगस्त में उसके कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी आधी थी.
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक भारत ने अगस्त में रूस से रोजाना करीब 24.7 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया. यह एक साल पहले की तुलना में 62.4 फीसदी ज्यादा था और भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50.83 फीसदी थी.
फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद भारत की रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता तेजी से बढ़ी. पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और यूरोपीय खरीदारों के रूस से दूरी बनाने के बाद मॉस्को ने एशियाई रिफाइनरियों को कम कीमत पर तेल देना शुरू किया.
रूस से होने वाले आयात पर अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करने के बाद इसमें बाद में कुछ कमी आई लेकिन इस साल फिर इसमें तेजी आई है.
फरवरी के अंत में शुरू हुए ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में पैदा हुए बड़े व्यवधानों ने मध्य पूर्व से भारत को होने वाली कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित किया. इसके चलते एक बार फिर रूस से कच्चे तेल के आयात में बढ़ोतरी हुई.
होर्मुज स्ट्रेट में गतिरोध जारी रहने के कारण भारत के पास रूस से तेल आयात जारी रखने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं. पिछले साल रूस से तेल खरीदने के लिए अमेरिका की ओर से भारत पर लगाया गया 25 फीसदी जुर्माना भी नई दिल्ली को मॉस्को से तेल खरीदने से नहीं रोक सका था.
अमेरिका की ओर से रूस की दो कंपनियों- रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत ने इन दोनों कंपनियों से तेल खरीदना बंद कर दिया था. हालांकि उसने रूस के दूसरे आपूर्तिकर्ताओं से तेल खरीदना जारी रखा. विशेषज्ञों का कहना है कि नए हालात में भी ऐसा ही होने की संभावना है.