यूक्रेन में घायल सैनिक का ड्रोन से रेस्क्यू, भारत ऐसे ऑपरेशन के लिए कितना तैयार?

यूक्रेन ने करीब 500 दिनों से दुर्गम मोर्चे पर फंसे घायल सैनिक को भारी सामान उठाने वाले ड्रोन से सुरक्षित निकाला. भारत में भी ऐसी तकनीक विकसित हो रही है लेकिन उसे युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल लायक बनाने के लिए अभी कई चुनौतियां पार करनी होंगी

घायल सैनिक को बचाकर ले जाता यूक्रेन का ड्रोन

19 अक्टूबर को यूक्रेन आर्मी की 92वीं असॉल्ट ब्रिगेड ने एक वीडियो जारी किया. इसमें मेडिकल राहत-बचाव अभियान के दौरान एक ड्रोन घायल सैनिक को ले जाता दिखाई दे रहा है. 

रूस के यूक्रेन पर हमले को पांच साल पूरे होने वाले हैं. इस बीच यूक्रेनी सेना ने ड्रोन के जरिए अग्रिम मोर्चे से सैनिक को निकालने की इस घटना को ड्रोन के इस्तेमाल में माहिर अपने देश के लिए दुनिया में पहली ऐसी घटना बताया है. 

अगर यह दावा सही है, तो आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका में एक अहम बदलाव का संकेत है. अब उनका इस्तेमाल सिर्फ सैनिकों को निशाना बनाने के लिए नहीं बल्कि उनकी जान बचाने के लिए भी हो सकता है.

करीब 500 दिनों तक फंसे रहे एक सैनिक को यूक्रेन ने जिस तरह बचाया उससे पता चलता है कि युद्धक्षेत्र में घायलों को निकालने के तौर-तरीके ड्रोन की मदद से बदल सकते हैं. भारत में भी ऐसी तकनीकों पर काम हो रहा है. लेकिन देश में विकसित तकनीक को सेना के वास्तविक इस्तेमाल लायक बनाने के लिए सैन्य बलों की लगातार भागीदारी, वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण और लंबे समय तक संस्थागत सहयोग की जरूरत होगी.

यूक्रेनी सैनिक कॉन्स्टेंटिन व्लासेंको के लिए करीब 500 दिनों तक युद्धक्षेत्र एक जेल बना रहा. वे ऐसी जगह फंसे थे जहां चारों ओर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और रूसी ड्रोन लगातार निगरानी कर रहे थे. उनके साथी सैनिक भी उन तक नहीं पहुंच सकते थे. उन्हें बचाने के लिए कथित तौर पर भेजा गया एक जमीनी रोबोट भी नाकाम रहा. दिन बीतते गए और महीने गुजरते गए. उनके लिए जिंदा रहना बेहद मुश्किल होता गया.

फिर उन्हें बचाने के लिए एक अभियान चलाया गया जो सिर्फ एक घंटे 15 मिनट में पूरा हो गया. सैनिकों को मौत के जाल में भेजने या एक और जमीनी वाहन को खतरे में डालने के बजाय यूक्रेनी सेना ने भारी सामान उठाने वाले ड्रोन का सहारा लिया. 

रूस पर यूक्रेनी ड्रोन अटैक (फाइल फोटो)

इस ड्रोन को मूल रूप से रूसी ठिकानों पर बमबारी के लिए बनाया गया था लेकिन इसमें बदलाव कर एक इंसान को ले जाने लायक बनाया गया. सात दिनों की तैयारी के बाद यह मानवरहित विमान करीब 40 मील की दूरी तय करके घायल सैनिक को सुरक्षित स्थान पर ले आया.

सैन्य मामलों के जानकारों के मुताबिक भारत के लिए इस अभियान में समय के लिहाज से अहम सबक छिपा है. हिमालयी सीमा पर ऊंचाई वाला दुर्गम इलाका, अनिश्चित मौसम और ड्रोन का बढ़ता खतरा सैन्य अभियानों को मुश्किल बनाते हैं. 

ऐसे में घायल सैनिक को निकालना बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है. सवाल यह है कि क्या भारत अगला बड़ा संघर्ष शुरू होने से पहले अपनी उभरती स्वदेशी ड्रोन तकनीक को भरोसेमंद मेडिकल इवेक्युएशन (इलाज के लिए बचाव कार्य) में बदल पाएगा?

यूक्रेनी मीडिया की खबरों के मुताबिक 30वीं अलग ब्रिगेड के सैनिक व्लासेंको ऐसी जगह फंसे थे जहां पहुंचना बेहद मुश्किल था. बताया गया है कि इस साल की शुरुआत में रूसी ड्रोन के हमले में वे घायल हो गए थे. बचाव के रास्ते बंद थे और जमीन के रास्ते अभियान चलाने का जोखिम बहुत ज्यादा था. ऐसे में जिंदा रहने की कोशिश में उन्होंने अपने दोनों पैर आंशिक रूप से काट दिए.

उन्हें निकालने के अभियान में यूक्रेन की चार ब्रिगेड शामिल थीं. इसमें सैन्य विशेषज्ञों और ड्रोन बनाने वाली कंपनी ने मिलकर काम किया. 92वीं ब्रिगेड के मुताबिक, गुरजुफ डिफेंस की ओर से बनाया गया यूक्रेनी भारी सामान उठाने वाला हेक्साकॉप्टर सेना को मुफ्त में दिया गया था. 

इंजीनियरों ने इसमें एक व्यक्ति को ले जाने के लिए बदलाव किए. साथ ही, उड़ान के दौरान खतरनाक ढंग से झूलने की आशंका कम करने और संतुलन बनाए रखने पर ध्यान दिया गया. अभियान शुरू करने से पहले इस व्यवस्था का परीक्षण भी किया गया. 

ब्रिगेड ने बताया कि रूसी सेना का ध्यान भटकाने के लिए सहायक ड्रोन भी इस्तेमाल किए गए. इससे पता चलता है कि ड्रोन से भरे युद्धक्षेत्र में घायलों को बचाने के लिए भी छल, तालमेल और सावधानीपूर्वक योजना की जरूरत होती है.

इस अभियान का महत्व सिर्फ इतना नहीं है कि ड्रोन किसी इंसान को उठा सकता है. असली बात यह है कि जब बचाव के पारंपरिक तरीके बहुत खतरनाक या अव्यावहारिक हो जाएं तब भी ड्रोन घायल सैनिकों तक पहुंच सकते हैं. 

ऐसे युद्ध में जहां निगरानी करने वाले ड्रोन सैनिकों की आवाजाही का पता लगा सकते हैं और पहले से तय रास्तों को जानलेवा बना सकते हैं, वहां मानवरहित विमान सैन्य कमांडरों को एक अतिरिक्त विकल्प दे सकते हैं.

यूक्रेन की राजधानी कीएव पर रूस का ड्रोन अटैक (फाइल फोटो)

भारत की आर्म्ड फोर्सेस फिलहाल घायलों को निकालने के लिए जमीनी वाहनों, युद्धक्षेत्र में तैनात चिकित्सा कर्मियों और हेलीकॉप्टरों के मेल पर निर्भर हैं. दुर्गम इलाकों में, खासकर हिमालयी सीमा पर अलग-थलग ठिकानों तक पहुंचने और घायल सैनिकों को ले जाने के लिए सैन्य हेलीकॉप्टर बेहद जरूरी हैं. एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर और दूसरे विमानन संसाधन नियमित रूप से ऐसे अभियानों में मदद करते हैं. जहां परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां हेलीकॉप्टर के जरिए रस्सी से लोगों को ऊपर खींचकर भी निकाला जाता है.

हालांकि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. ड्रोन, लक्ष्य पर हमला करने से पहले कुछ समय तक मंडराने वाले हथियार और सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों ने खुले इलाकों में आवाजाही को ज्यादा खतरनाक बना दिया है. घायल सैनिक को निकालने के लिए भेजी गई बचाव टीम खुद निशाने पर आ सकती है. 

इससे और लोगों के हताहत होने का खतरा रहता है. ऊंचाई वाले इलाकों में हवा का कम घनत्व, खराब मौसम, संकरी घाटियां और हेलीकॉप्टर उतारने के लिए सीमित जगहें भी अभियान को मुश्किल बनाती हैं.

ऐसी परिस्थितियों में भारी सामान उठाने वाले ड्रोन एक अहम कमी को पूरा कर सकते हैं. वे हेलीकॉप्टरों की जगह नहीं ले सकते. हेलीकॉप्टर एक साथ कई घायलों, चिकित्सा कर्मियों और उपकरणों को कहीं ज्यादा दूरी तक ले जा सकते हैं. इसी तरह हर ड्रोन किसी गंभीर रूप से घायल सैनिक को सुरक्षित ढंग से नहीं ले जा सकता. 

वजन उठाने की क्षमता, बैटरी का बैकअप, हवा की गति, संचार व्यवस्था की विश्वसनीयता और इलेक्ट्रॉनिक दखल के प्रति संवेदनशीलता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. फिर भी, दुर्गम या दुश्मन के नियंत्रण वाले इलाकों से कम दूरी तक सैनिकों को निकालने के कुछ अभियानों में मानवरहित विमान अतिरिक्त कर्मियों को खतरे में पड़ने से बचा सकते हैं.

भारत का उद्योग भी ऐसी ही प्रणालियां विकसित कर रहा है. पुणे स्थित एयरोस्पेस स्टार्टअप सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने प्रोजेक्ट वरुणा विकसित किया है. इसे भारत का पहला स्वदेशी मानव-वाहक यात्री और भारी सामान उठाने वाला उपयोगी ड्रोन बताया जाता है. 

इसे मुख्य रूप से इंडिया नेवी और अन्य रक्षा उपयोगकर्ताओं के लिए तैयार किया गया है. इसका इस्तेमाल घायलों को निकालने, आपात चिकित्सा सहायता और सामरिक रसद के लिए किया जाना है.

यह ड्रोन किसी व्यक्ति या स्ट्रेचर पर रखे सामान को ले जा सकता है. इसकी वजन उठाने की क्षमता करीब 100-130 किलोग्राम है. इसके भारी संस्करण इससे ज्यादा वजन उठा सकते हैं. इसकी परिचालन सीमा करीब 25 किलोमीटर है और यह 25-33 मिनट तक उड़ान भर सकता है. इसमें स्वचालित तरीके से सीधा ऊपर उड़ने और नीचे उतरने की सुविधा है. 

एक जहाज से दूसरे जहाज तक के अभियानों के दौरान इसे समुद्र की ऊंची लहरों वाली परिस्थितियों में काम करने के लिहाज से तैयार किया गया है. साथ ही इसमें ऊंचाई वाले इलाकों के लिए वरुणा HA नाम का संस्करण और आपात स्थिति में सुरक्षित वापसी के लिए ऑटोमैटिक बैलिस्टिक पैराशूट प्रणाली भी शामिल है.

रक्षा मंत्रालय की iDEX (इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस) व्यवस्था के तहत प्रोजेक्ट अदिति (ADITI) में भी इसी तरह काम हो रहा है. इसका मकसद दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में रसद पहुंचाने, घायलों को निकालने और निगरानी करने के लिए स्वायत्त प्रणालियां और हवाई वाहन विकसित करना है.

सशस्त्र बलों के लिए इन तकनीकों का इस्तेमाल सिर्फ एक जहाज से दूसरे जहाज तक लोगों को ले जाने तक सीमित नहीं है. जरूरत के मुताबिक तैयार किए गए ये ड्रोन भविष्य में दुर्गम इलाकों और ऐसी जगहों से घायल सैनिकों को निकालने में मदद कर सकते हैं जहां पारंपरिक बचाव के तरीके अपनाना मुश्किल हो. ऊंचाई वाले इलाकों के लिए इनमें किए गए बदलाव भी इनके इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ा सकते हैं. हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में उनकी क्षमता और सुरक्षा साबित हो.

भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "नियंत्रित परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को ले जा सकने वाले ड्रोन और गोलीबारी के बीच घायल सैनिक को निकालने वाले ड्रोन में बहुत फर्क है. युद्धक्षेत्र में मेडिकल इवेक्युएशन के लिए इस्तेमाल होने वाले ड्रोन में व्यक्ति को सुरक्षित बांधने की व्यवस्था, स्थिर उड़ान, भरोसेमंद संचार और आपात स्थिति से निपटने के उचित इंतजाम होने चाहिए. मौसम, इलाके, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और घायल व्यक्ति की शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए भी इसका परीक्षण होना चाहिए."

वे कहते हैं कि चुनौती सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि क्या सेना भारतीय उद्योग के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है ताकि शुरुआती प्रोटोटाइप को वास्तविक अभियानों में इस्तेमाल होने वाली प्रणालियों में बदला जा सके. 

भारतीय वायु सेना के एक अनुभवी हेलीकॉप्टर पायलट कहते हैं, "भारत में ऐसे इनोवेटर हमारे आसपास ही हैं जो इन समस्याओं का हल निकाल सकते हैं. जरूरत है कि सैन्य उपयोगकर्ता, खरीद से जुड़ी संस्थाएं और फैसले लेने वाले अधिकारी उन्हें पहचानें."

उनकी चिंता यह है कि जिन लोगों को आखिरकार इन तकनीकों का इस्तेमाल करना है उनकी जिम्मेदारी और नेतृत्व के बिना संभावनाशील तकनीक आगे नहीं बढ़ सकती. कंपनियों को सेना की जरूरतों के बारे में स्पष्ट जानकारी, वास्तविक परिस्थितियों में प्रणालियों के परीक्षण के अवसर और सशस्त्र बलों के साथ लगातार संवाद चाहिए. 

इन विशेष चुनौतियों का हल निकाल सकने वाले इनोवेटर्स की संख्या सीमित हो सकती है. इसलिए उन्हें लंबे समय तक सहयोग देना और भी जरूरी है.

ऐसे सहयोग के अभाव में कोई शुरुआती प्रोटोटाइप महज दिखावटी परियोजना बनकर रह सकता है. वह नियंत्रित परिस्थितियों में असरदार प्रदर्शन तो कर सकता है लेकिन अग्रिम मोर्चे पर इस्तेमाल होने वाली प्रणालियों का हिस्सा नहीं बन पाता. 

घायलों को निकालने वाले ड्रोन के मामले में सेना को ऐसे अभियानों की पहचान करनी होगी, जहां ये प्रणालियां वास्तविक बदलाव ला सकती हैं. इसके लिए प्रदर्शन के मानक तय करने होंगे और परीक्षण व मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया में युद्धक्षेत्र के चिकित्सा कर्मियों, पायलटों और अग्रिम मोर्चे के कमांडरों को शामिल करना होगा.

हालांकि भारतीय ड्रोन उद्योग से जुड़े सभी लोग नहीं मानते कि भारत यूक्रेन में दिखाई गई क्षमता हासिल करने के करीब है. एक ड्रोन निर्माता का आकलन ज्यादा सधा हुआ है. उनका कहना है कि भारतीय कंपनियां अभी सामान को भरोसेमंद तरीके से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की चुनौतियों से ही जूझ रही हैं. निर्माता के मुताबिक किसी इंसान को ले जाने वाला ड्रोन विकसित करना तकनीकी रूप से कहीं बड़ी उपलब्धि होगी.

यह सावधानी जायज है. सामान ले जाने वाला ड्रोन कुछ ऐसे झटकों और परिस्थितियों में उतरने को सहन कर सकता है जो किसी घायल व्यक्ति को ले जाने के दौरान स्वीकार्य नहीं होंगे. इंसान को ले जाने वाले ड्रोन में बिजली की आपूर्ति बंद होने, नियंत्रण प्रणाली में खराबी आने, भार का अस्थिर होने और आपात स्थिति में उतरने के नतीजों का ध्यान रखना होगा. युद्ध के दौरान उसे दुश्मन की निगरानी, संचार संकेतों को बाधित करने और मार गिराए जाने के खतरे से भी निपटना होगा.

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ फंड देने से किसी तकनीक का सेना में इस्तेमाल सुनिश्चित नहीं हो जाता. आर्म्ड फोर्सेस को अपनी परिचालन जरूरतें स्पष्ट करनी होंगी, कठिन परिस्थितियों में प्रणालियों का परीक्षण करना होगा और उन्हें खरीदने तक पहुंचने का एक विश्वसनीय रास्ता बनाना होगा. 

घायलों को निकालने वाले ड्रोन के मामले में यह तय करना भी जरूरी है कि घायल सैनिक को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा और उसकी स्थिति पर नजर कैसे रखी जाएगी, ड्रोन को कितनी स्वायत्तता दी जा सकती है, दुश्मन की मौजूदगी वाले इलाकों में वह कम्युनिकेशन कैसे करेगा और मैदान में उसका संचालन व रखरखाव कौन करेगा.

यूक्रेन का अनुभव बताता है कि ये सवाल क्यों अहम हैं. व्लासेंको को बचाने के लिए इस्तेमाल किया गया ड्रोन मूल रूप से हमले के अभियानों के लिए बनाया गया था. युद्धक्षेत्र में तत्काल जरूरत पैदा होने पर उसे इवैक्युएशन के लिए इस्तेमाल करने लायक बनाया गया. 

इसमें सैन्य विशेषज्ञों और उद्योग के बीच करीबी तालमेल ने अहम भूमिका निभाई. इस इनोवेशन का महत्व सिर्फ ड्रोन में नहीं था बल्कि मौजूदा क्षमता को किसी की जान बचाने के लिए इस्तेमाल करने की तत्परता में भी था.

भारत के लिए सबक यह नहीं है कि ड्रोन हेलीकॉप्टरों की जगह ले लेंगे या इंसान को ले जाने वाली प्रणालियां हर युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल के लिए तैयार हैं. सबक यह है कि जब बचाव के पारंपरिक रास्ते बंद हों, विमान सुरक्षित तरीके से न पहुंच सकें और अतिरिक्त सैनिकों को भेजने से अस्वीकार्य खतरा पैदा हो, तब सशस्त्र बलों के पास दूसरे विकल्प भी होने चाहिए. 

भारत में पहले से ऐसी स्वदेशी कंपनियां हैं जो इस तकनीक पर काम कर रही हैं. रक्षा क्षेत्र में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम भी मौजूद हैं. अब सबसे जरूरी है कि सेना इन तकनीकों की जिम्मेदारी ले उनका कठोर परीक्षण हो और शुरुआती नमूनों से वास्तविक परिचालन तैनाती तक पहुंचने का स्पष्ट रास्ता तैयार किया जाए.

आधुनिक युद्धक्षेत्र में किसी ड्रोन की क्षमता का आकलन अब सिर्फ इस आधार पर नहीं होगा कि वह कितनी दूर उड़ सकता है, कितना वजन उठा सकता है या कितने सटीक तरीके से हमला कर सकता है. यह भी देखा जा सकता है कि क्या वह ऐसे सैनिक तक पहुंच सकता है जहां कोई और नहीं पहुंच सकता और उसे जिंदा घर वापस ला सकता है.

Read more!