टाटा ग्रुप में खींचतान और एन. चंद्रशेखरन के चेयरमैन पद छोड़ने की कहानी
IPO से लेकर एयर इंडिया में निवेश तक कई मुद्दों पर टाटा संस में खींचतान के बीच छह महीने से चंद्रशेखरन के भविष्य पर फैसला अटका हुआ था

चंद्रशेखरन का कार्यकाल अगले साल फरवरी में खत्म हो रहा है
छह महीने पहले टाटा संस में इस बात पर चर्चा हो रही थी कि चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल पांच साल के लिए बढ़ा दिया जाए. इस प्रस्ताव को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के साथ-साथ टाटा संस की नामांकन और पारिश्रमिक समिति और बोर्ड का भी समर्थन हासिल था.
फिर 24 फरवरी को बोर्ड की बैठक हुई. चंद्रशेखरन का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव एक बोर्ड सदस्य के विरोध के बाद पारित नहीं हो सका. चंद्रशेखरन ने फैसला टालने का विकल्प चुना क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि गतिरोध दूर हो जाएगा. लेकिन छह महीने बाद भी ऐसा नहीं हुआ.
आखिरकार 12 अगस्त को चंद्रशेखरन ने खुद इस अनिश्चितता को खत्म कर दिया. उन्होंने अपना पद छोड़ने का एलान कर दिया. उन्होंने साफ किया कि मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म होने के बाद वे एक और कार्यकाल नहीं मांगेंगे. हालांकि तब तक वे चेयरमैन पद की जिम्मेदारी संभाले रहेंगे.
एक बयान में चंद्रशेखरन ने कहा कि टाटा संस को अपने भविष्य के नेतृत्व को लेकर स्पष्टता की जरूरत है क्योंकि कई रणनीतिक परियोजनाएं महत्वपूर्ण चरण में हैं.
फरवरी का गतिरोध चंद्रशेखरन के भविष्य, टाटा संस के IPO की संभावना, पूंजी के इस्तेमाल, एयर इंडिया और टाटा डिजिटल जैसे कारोबारों के प्रदर्शन, बोर्ड में प्रतिनिधित्व और टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका को लेकर व्यापक टकराव में बदल गया था. टाटा ट्रस्ट्स के पास इस होल्डिंग कंपनी की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है.
चंद्रशेखरन ने अपने बयान में कहा, "उस बोर्ड बैठक को छह महीने हो चुके हैं और आज तक कोई समाधान नहीं निकला है." इस व्यापक विवाद में IPO सबसे बड़े मतभेदों में से एक बनकर उभरा लेकिन यह इकलौता मुद्दा नहीं था.
गतिरोध की शुरुआत कहां से हुई
24 फरवरी की बैठक में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल को जारी रखने को लेकर कई चिंताएं सामने रखीं. इनमें समूह की कुछ कंपनियों में घाटा, पूंजी का इस्तेमाल और वित्तीय अनुशासन से जुड़े मुद्दे शामिल थे.
नोएल टाटा टाटा संस की लिस्टिंग के भी खिलाफ थे और चाहते थे कि होल्डिंग कंपनी के शेयर बाजार में सूचीबद्ध न होने का आश्वासन दिया जाए. रिपोर्टों के मुताबिक चंद्रशेखरन ऐसा स्थाई आश्वासन देने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि रेगूलेटरी जरूरतें भविष्य में यह तय कर सकती हैं कि टाटा संस को क्या कदम उठाना होगा. इसके बाद फैसला टाल दिया गया.
चंद्रशेखरन के बयान में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई. उन्होंने कहा कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने "सर्वसम्मति से फैसला कर पांच साल के अगले कार्यकाल के लिए उनकी सिफारिश की थी." उनके मुताबिक इसके बाद टाटा संस की नामांकन और पारिश्रमिक समिति और बोर्ड ने भी इसे दर्ज किया और इसकी सिफारिश की.
लेकिन 24 फरवरी को जब यह प्रस्ताव बोर्ड के सामने आया तो इसे सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिला. चंद्रशेखरन ने अपने बयान में विरोध करने वाले सदस्य का नाम नहीं लिया. हालांकि उस समय की रिपोर्टों में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा का नाम सामने आया था. नतीजा यह हुआ कि नेतृत्व को लेकर फैसला आगे ही नहीं बढ़ सका.
टाटा संस का IPO कैसे बना बड़ा मुद्दा
टाटा संस की लिस्टिंग पर बहस वास्तव में चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी से जुड़े विवाद से पहले ही शुरू हो चुकी थी. टाटा संस टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी है. इसकी 30 से ज्यादा कंपनियों में हिस्सेदारी है. इनमें टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा मोटर्स और एयर इंडिया शामिल हैं. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी है जबकि शापूरजी पालोनजी समूह के पास करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी है.
टाटा संस की लिस्टिंग का मुद्दा इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस को अपर-लेयर NBFC के तौर पर वर्गीकृत किया था. इसके बाद वह ऐसे नियामकीय ढांचे के दायरे में आ गई जिसके तहत ऐसी कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना पड़ सकता है.
टाटा संस ने इसके बाद इस स्थिति से बचने के लिए कर्ज कम करने और अपनी नियामकीय स्थिति में बदलाव की कोशिश जैसे कदम उठाए. लेकिन लिस्टिंग का सवाल खत्म नहीं हुआ.
फरवरी तक यह मामला नियामकीय मुद्दे से आगे बढ़कर बोर्डरूम का मुद्दा बन गया था. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक नोएल टाटा चाहते थे कि टाटा संस के कभी भी शेयर बाजार में सूचीबद्ध न होने की गारंटी दी जाए. चंद्रशेखरन ऐसी गारंटी देने के लिए तैयार नहीं थे.
यह मतभेद सिर्फ इस बात को लेकर नहीं था कि चंद्रशेखरन व्यक्तिगत रूप से IPO चाहते थे या नहीं. सवाल यह था कि जब नियामकीय स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है तब क्या टाटा संस के चेयरमैन कंपनी के कभी भी शेयर बाजार में सूचीबद्ध न होने की गारंटी दे सकते हैं.
इस तरह IPO एक बहुत बड़े सवाल का प्रतीक बन गया था: भविष्य में टाटा संस का स्वरूप कैसा होना चाहिए और यह फैसला कौन करे?
एक और पेच था. टाटा संस को नियंत्रित करने वाले लोग भी उसके भविष्य को लेकर पूरी तरह एकमत नहीं थे. अप्रैल में खबर आई कि टाटा ट्रस्ट्स के भीतर टाटा संस के IPO के समर्थन में राय बढ़ रही है. इससे विवाद सिर्फ नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच का मामला नहीं रह गया.
शेयरधारकों के ढांचे के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आ गई थी. कुछ लोगों का मानना था कि लिस्टिंग से पूंजी जुटाने और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
वहीं कुछ लोग मौजूदा निजी ढांचे को बनाए रखने और समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी को शेयर बाजार की निगरानी में लाने से बचने के पक्ष में थे.
एसपी ग्रुप का मामला
शापूरजी पालोनजी ग्रुप यानी एसपी ग्रुप के लिए टाटा संस के भविष्य में दिलचस्पी की वजह अलग है. उसके पास होल्डिंग कंपनी की करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी है और वह सबसे बड़ा अल्पांश शेयरधारक है.
समस्या यह है कि टाटा संस सूचीबद्ध कंपनी नहीं है. इसलिए एसपी ग्रुप के लिए अपनी हिस्सेदारी की कीमत का फायदा उठाना मुश्किल है. अगर टाटा संस की लिस्टिंग होती है तो उसकी हिस्सेदारी के लिए शेयर बाजार में एक सार्वजनिक बाजार उपलब्ध हो जाएगा.
इसी वजह से एसपी ग्रुप ने टाटा संस के IPO का समर्थन किया है. साथ ही वह अपनी हिस्सेदारी से पैसा जुटाने या उसके पुनर्गठन के दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर रहा है.
इस तरह लिस्टिंग की बहस में एक साथ कई अलग-अलग हित जुड़ गए थे. टाटा ट्रस्ट्स समूह पर अपना नियंत्रण बनाए रखने को लेकर चिंतित था जबकि कुछ ट्रस्टी लिस्टिंग को पूंजी जुटाने और पारदर्शिता बढ़ाने का रास्ता मान रहे थे.
एसपी ग्रुप के लिए इससे अपनी हिस्सेदारी की कीमत का फायदा उठाने का रास्ता खुल सकता था. वहीं टाटा संस के लिए नियामकीय सवाल अब भी अनसुलझा था.
एयर इंडिया के साथ और दूसरे मसले
यहीं से कहानी और पेचीदा हो जाती है. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा ने दशकों में अपने कुछ सबसे बड़े दांव लगाए हैं. एयर इंडिया, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, डिजिटल कारोबार और दूसरे नए उपक्रमों के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत है. इनमें से कई में सार्थक रिटर्न मिलने में वर्षों लग सकते हैं.
इस रणनीति ने टाटा संस के भीतर एक और तत्काल सवाल खड़ा कर दिया है. क्या इन कारोबारों में लगाए जा रहे भारी पैसे के बदले पर्याप्त नतीजे मिल रहे हैं?
यह सवाल मई में टाटा संस की बोर्ड बैठक में खास तौर पर सामने आया. इस बैठक में कई नए कारोबारों के प्रदर्शन की समीक्षा की गई.
एयर इंडिया और बिगबास्केट को घाटे, निवेश और पूंजी के इस्तेमाल को लेकर सवालों का सामना करना पड़ा. वहीं टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का आकलन ज्यादा सकारात्मक रहा क्योंकि समूह की सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी महत्वाकांक्षाओं के लिए उसका रणनीतिक महत्व है.
खास बात यह रही कि उस बैठक में टाटा संस के संभावित IPO का मुद्दा नहीं उठा.
यह काफी कुछ बताता है. इससे संकेत मिला कि बोर्डरूम के भीतर मतभेद अब सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं थे कि टाटा संस को भविष्य में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना चाहिए या नहीं.
बड़ी बहस इस बात पर होने लगी थी कि समूह की पूंजी का इस्तेमाल कैसे किया जाए, किन कारोबारों को ज्यादा समय दिया जाए और लंबी अवधि की महत्वाकांक्षाओं तथा वित्तीय अनुशासन के बीच सीमा कहां तय की जाए.
इस बहस का एयर इंडिया से बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता. सरकार से एयर इंडिया को वापस खरीदने के बाद टाटा समूह ने एयरलाइन को फिर से खड़ा करने में भारी निवेश किया है. इस पैसे का इस्तेमाल बेड़ा बढ़ाने, पुनर्गठन, तकनीक और पहले की कंपनी विस्तारा के परिचालन को इंटीग्रेट करने में किया गया है.
लेकिन इस बदलाव की प्रक्रिया काफी महंगी भी रही है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने एयर इंडिया के घाटे को टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद के एक प्रमुख मुद्दे के तौर पर बताया है. सवाल यह था कि टाटा संस को एयरलाइन में और कितना निवेश करना चाहिए और उसे इस बदलाव से रिटर्न मिलने का कितना इंतजार करना चाहिए.
यह चुनौती जून 2025 में हुए एयर इंडिया के घातक विमान हादसे के बाद और बढ़ गई. इसके बाद नियामकीय जांच तेज हुई और एयरलाइन पर परिचालन तथा छवि से जुड़ा दबाव भी बढ़ा.
बाद में एयर इंडिया ने सालाना आधार पर रिकॉर्ड घाटा दर्ज किया, जिससे टाटा समूह के सामने एयरलाइन को फिर से खड़ा करने की चुनौती का पैमाना सामने आया.
यही तनाव दूसरे नए कारोबारों में भी दिखाई दिया. एक पक्ष इन्हें लंबी अवधि के रणनीतिक दांव के रूप में देख सकता था. दूसरा पक्ष इन्हें ऐसे कारोबारों के तौर पर देख सकता था जिनमें वित्तीय अनुशासन और कड़ा होना चाहिए.
एयर इंडिया, बिगबास्केट और नए दांव की कीमत
दिलचस्प बात यह है कि मई में हुई टाटा संस की अगली बोर्ड बैठक ज्यादा शांत रही.
चंद्रशेखरन ने ज्यादातर कारोबार प्रमुखों को अपनी बात रखने का मौका दिया और उन्हें अपने कारोबार से जुड़े सवालों के सीधे जवाब देने दिए.
इस बैठक में एयर इंडिया, बिगबास्केट, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और मुनाफे, निवेश तथा पूंजी के इस्तेमाल से जुड़े व्यापक सवालों पर चर्चा हुई.
ऊपरी तौर पर बैठक शांत रही, लेकिन अंदरूनी मतभेद दूर नहीं हुए थे. सवाल अब सिर्फ कारोबार के संचालन से जुड़े हो गए थे.
टाटा संस को कितना निवेश करना चाहिए? इन निवेशों से कितनी जल्दी रिटर्न मिलना चाहिए? कौन से कारोबार वास्तव में रणनीतिक हैं और किनकी ज्यादा कड़ी समीक्षा की जरूरत है? और अंतिम फैसला किसका होना चाहिए?
टाटा ट्रस्ट्स में प्रबंधन को लेकर तनाव
टाटा ट्रस्ट्स के भीतर मतभेदों ने स्थिति को और जटिल बना दिया. अप्रैल में ट्रस्ट्स के भीतर नियंत्रण को लेकर फिर से खींचतान शुरू हुई. इसमें ट्रस्टी की नियुक्तियों और प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल शामिल थे.
यह मुद्दा महत्वपूर्ण था क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स को टाटा संस के बोर्ड के एक-तिहाई सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार है. उसके नामित निदेशकों के पास कंपनी के नियमों के तहत महत्वपूर्ण अधिकार भी हैं.
इस तरह जब टाटा संस अपने चेयरमैन को लेकर आम सहमति बनाने में संघर्ष कर रही थी, तब उसकी दो-तिहाई हिस्सेदारी नियंत्रित करने वाला शेयरधारक खुद प्रबंधन और बोर्ड में प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों से जूझ रहा था.
इससे टाटा समूह का पूरा ढांचा और जटिल हो गया.
छह महीने का असहज इंतजार
24 फरवरी की बैठक के बाद चंद्रशेखरन ने इस्तीफा नहीं दिया. वे पद पर बने रहे जबकि बोर्ड उनके दोबारा नियुक्त किए जाने के सवाल पर विचार करता रहा. लेकिन अगले छह महीनों में कोई सहमति नहीं बन सकी.
12 अगस्त को जारी अपने बयान में चंद्रशेखरन ने इस लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता का जिक्र किया. उन्होंने कहा, "उस बोर्ड बैठक को छह महीने हो चुके हैं और आज तक कोई समाधान नहीं निकला है."
फरवरी की बैठक के छह महीने बाद भी अपने भविष्य को लेकर सहमति नहीं बनने पर चंद्रशेखरन ने एक और कार्यकाल नहीं मांगने का फैसला किया. उन्होंने बोर्ड से अपने उत्तराधिकारी को चुनने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा.
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि टाटा संस की सालाना आम बैठक 18 अगस्त को होनी है और चंद्रशेखरन के निदेशक पद पर दोबारा नियुक्ति का मामला भी सामने आना था.
चेयरमैन के पद पर बने रहना बोर्ड में बने रहने पर निर्भर था. इसलिए महीनों से चली आ रही अनिश्चितता के बाद AGM एक महत्वपूर्ण समयसीमा बन गई थी.
अनसुलझे सवाल को औपचारिक टकराव में बदलने देने के बजाय चंद्रशेखरन ने अपने मौजूदा कार्यकाल के अंत में पद छोड़ने का फैसला किया.
चंद्रशेखरन ने कहा कि उन्होंने टाटा संस के बोर्ड को अपने फैसले की जानकारी दे दी थी और बोर्ड से जल्द उत्तराधिकारी तय करने को कहा ताकि ‘सही तरीके से कार्यभार हस्तांतरण’ सुनिश्चित हो सके.
हालांकि वे 20 फरवरी 2027 तक चेयरमैन बने रहेंगे. इससे टाटा संस को अपना उत्तराधिकारी खोजने के लिए कई महीने मिल जाएंगे.