19 साल बाद तसलीमा की कोलकाता वापसी, अभिव्यक्ति की आजादी पर फिर छिड़ी बहस

तसलीमा नसरीन की वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, नई सरकार में संविधान, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं. धमकी और डराने-धमकाने की संस्कृति अब अतीत की बात हो चुकी है

करीब 19 साल पहले अपनी लेखनी को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच कोलकाता छोड़ने पर मजबूर हुईं निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन 1 अगस्त को एक बार फिर इस शहर में लौटीं. उन्होंने इसे वर्षों के निर्वासन के बाद एक तरह की 'घर वापसी' बताया और उनके लिए दरवाजे खोलने के लिए शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार का आभार जताया.

हालांकि, उनकी यह यात्रा विवादों से अछूती नहीं रही. रवींद्र सदन में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान उस समय कुछ देर के लिए हंगामा हो गया, जब तसलीमा नसरीन ने प्रसिद्ध बांग्ला कवि जॉय गोस्वामी को दर्शकों के बीच से मंच पर आने के लिए आमंत्रित किया. जैसे ही गोस्वामी अपनी सीट से उठे, दर्शकों के एक वर्ग ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया, जिसके बाद उन्हें वापस लौटना पड़ा.

जॉय गोस्वामी तसलीमा नसरीन के निर्वासन पर पहले ही अफसोस जता चुके थे और कह चुके थे कि उस समय बहुत कुछ नहीं कर पाने का उन्हें 'अपराधबोध' है. इसके बावजूद दर्शकों में मौजूद कई लोग उन्हें तसलीमा के साथ मंच साझा करते हुए नहीं देखना चाहते थे.

2 अगस्त को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तसलीमा नसरीन ने रवींद्र सदन की इस घटना को 'बेहद दुर्भाग्यपूर्ण' बताया और कहा कि यह उनका भी अपमान था. उन्होंने कहा, "मैंने उन्हें मंच पर बुलाया था. उन्हें मंच पर आने से रोकना अस्वीकार्य था." उन्होंने यह भी कहा कि वे जॉय गोस्वामी से उनके घर जाकर मुलाकात करेंगी.

इससे एक दिन पहले रवींद्र सदन के कार्यक्रम में जाने से पहले शुभेंदु अधिकारी ने एक कार्यक्रम में तसलीमा नसरीन का सम्मान किया था. उन्होंने भरोसा दिलाया कि पश्चिम बंगाल में हमेशा तसलीमा का स्वागत होगा और वे यहां सुरक्षित रहेंगी.

शुभेंदु अधिकारी ने कहा, "सुरक्षित पश्चिम बंगाल में आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की है. आप जितनी बार चाहें, जब चाहें यहां आइए और खुलकर अपनी बात कहिए."

मुख्यमंत्री ने पिछली सरकारों से तुलना करने की भी कोशिश की. उन्होंने कहा, "आप एक प्रतिष्ठित लेखिका हैं, जिनकी रचनाएं अनगिनत लोग पढ़ते हैं. पश्चिम बंगाल में खुलकर बोलिए. आज का बंगाल उस बंगाल से निश्चित रूप से अलग है, जिसे आपने पहले देखा था."

उन्होंने आगे कहा, "आज का यह कार्यक्रम दिखाता है कि नई सरकार में संविधान, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं. धमकी और डराने-धमकाने की संस्कृति अब अतीत की बात हो चुकी है. पश्चिम बंगाल अब उन बेड़ियों से मुक्त है. यहां हर व्यक्ति को आने का अधिकार है और हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार है."

इस दौरान कार्यक्रम कुछ समय के लिए रोक दिया गया था. इसके बाद तसलीमा नसरीन ने लोगों से शांत रहने की अपील की.

उन्होंने कहा, "क्या मैं बोलूं? तो कृपया शांत हो जाइए और अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाइए." इसके बाद स्थिति सामान्य हुई और उन्होंने अपना संबोधन फिर शुरू किया.

यह घटना नवंबर 2007 में तसलीमा नसरीन के कोलकाता छोड़ने से जुड़े विवाद की अब तक बनी हुई भावनाओं और धारणाओं को भी सामने लेकर आई. दर्शकों के एक वर्ग की नजर में जॉय गोस्वामी उन वर्षों के दौरान चुप रहे थे, जब तसलीमा नसरीन को कोलकाता से दूर रहना पड़ा था. साथ ही उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी के रूप में भी देखा जाता है. यही वजह रही कि वे विरोध का केंद्र बन गए.

भावुक तसलीमा नसरीन ने अपने भाषण का बड़ा हिस्सा निर्वासन के दर्द को याद करते हुए बिताया.

उन्होंने कहा, "मुझे एक साधारण वाक्य बोलने में 19 साल लग गए कि 'मैं कोलकाता लौट आई हूं.' निर्वासन झेलने वाले व्यक्ति के लिए कैलेंडर के साल केवल समय नहीं होते. हर साल एक बंद दरवाजा होता है, हर महीना इंतजार होता है और हर दिन अपना पता खो देने का दर्द होता है. इतने लंबे इंतजार के बाद आज कोलकाता की धरती पर खड़े होकर मुझे लगता है कि मैं सिर्फ एक शहर में नहीं लौटी बल्कि अपने जीवन के एक अध्याय में वापस लौटी हूं."

अपनी यात्रा संभव बनाने के लिए मौजूदा सरकार का धन्यवाद करते हुए उन्होंने कहा, "इतिहास यह याद रखता है कि दरवाजे किसने बंद किए थे. इतिहास यह भी याद रखेगा कि उन्हें किसने खोला."

तसलीमा नसरीन (पीटीआइ फोटो)

तसलीमा नसरीन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजामों के लिए भी शुभेंदु अधिकारी का आभार जताया. कोलकाता हवाई अड्डे पर उतरने के समय से ही वे कड़ी पुलिस सुरक्षा में रहीं. साथ ही उन्होंने इस बात पर दुख भी जताया कि किसी लेखक को सिर्फ उस शहर में आने के लिए पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़े, जहां उसकी भाषा बोली जाती है.

उन्होंने कहा, "मैं उस दिन का सपना देखती हूं, जब किसी लेखक को पुलिस सुरक्षा में नहीं चलना पड़ेगा और किसी को अपने विचारों के कारण अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा. किसी लेखक की जान की रक्षा करने का मतलब असहमति के अधिकार की रक्षा करना भी है."

उन्होंने स्पष्ट किया कि शुभेंदु अधिकारी सरकार का धन्यवाद करने का अर्थ राजनीतिक निष्ठा नहीं माना जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "आभार निष्ठा का कोई समझौता नहीं होता. आभार के बदले मैं अपनी स्वतंत्र सोच को गिरवी नहीं रखती. किसी अच्छे फैसले की सराहना करने के लिए राजनीतिक निष्ठा जरूरी नहीं होती और असहमति के लिए नफरत जरूरी नहीं होती. मैं यहां किसी राजनीतिक दल की ओर से नहीं आई हूं और न ही किसी को हराने आई हूं."

तसलीमा नसरीन ने कहा कि अगस्त का महीना उनके जीवन के कई महत्वपूर्ण पड़ावों का गवाह रहा है. उन्होंने कहा, "अगस्त मेरे जन्म का महीना है. यही मेरे निर्वासन का महीना भी है. और आज से अगस्त मेरी वापसी का महीना भी है."

उन्होंने याद किया कि 8 अगस्त 1994 को उन्हें बांग्लादेश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उन्होंने कहा, "उस समय की सरकार ने मुझे अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर किया. रात के अंधेरे में मेरे वतन के दरवाजे मेरे लिए बंद कर दिए गए. सरकारें बदलती रहीं, लेकिन वे दरवाजे फिर कभी नहीं खुले."

कोलकाता से अपने रिश्ते के बारे में बात करते हुए तसलीमा नसरीन ने कहा कि साहित्य और बांग्ला संस्कृति ने उन्हें पहली बार शहर आने से बहुत पहले ही कोलकाता की ओर आकर्षित कर लिया था.

उन्होंने कहा, "मेरा जन्म एक बंगाल में हुआ और दूसरे बंगाल में मैंने अपना घर पाया, जब मैं अपना पहला घर खो चुकी थी. लेकिन अंत में एक बांग्ला लेखिका के लिए दोनों बंगाल में कोई घर नहीं बचा. यूरोप ने मुझे सुरक्षा और आश्रय दिया लेकिन वह आश्रय कभी मेरा घर नहीं बन सका. घर सिर्फ सुरक्षा से नहीं बल्कि भाषा, स्मृतियों और संस्कृति से बनता है."

तसलीमा नसरीन ने कोलकाता छोड़ने की परिस्थितियों को भी याद किया, "22 नवंबर 2007 को तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार ने मुझे कोलकाता छोड़ने के लिए मजबूर किया. मैंने कोई अपराध नहीं किया था. किसी अदालत ने मेरे निर्वासन का आदेश नहीं दिया था. फिर भी मुझे कट्टरपंथियों की धमकियों की कीमत चुकानी पड़ी."

2 अगस्त को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तसलीमा नसरीन ने दोहराया कि वे हर तरह के धार्मिक कट्टरवाद का विरोध करती हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने मुस्लिम समाज के रूढ़िवादी तौर-तरीकों की आलोचना इसलिए की क्योंकि वे उसी समुदाय से आती हैं. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी धर्म आलोचना से ऊपर नहीं है.

उन्होंने भारत और बांग्लादेश, दोनों देशों में संविधान, समानता और मानवाधिकारों पर आधारित समान नागरिक संहिता लागू करने की भी वकालत की, न कि किसी बहुसंख्यक समुदाय के धार्मिक कानूनों पर आधारित व्यवस्था की.

बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति पर तसलीमा नसरीन ने कहा कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की नीतियों की आलोचना की थी लेकिन जिस तरह उन्हें निर्वासन में जाना पड़ा, उसका वे समर्थन नहीं करतीं. उन्होंने लोकतंत्र की बहाली, अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं की वापसी की मांग की. साथ ही कहा कि जमात-ए-इस्लामी की जगह अवामी लीग को देश की मुख्य विपक्षी पार्टी होना चाहिए.

उन्होंने आरोप लगाया कि मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान हिंदुओं पर हमले बढ़े हैं. धर्मनिरपेक्षता के समर्थन को दोहराते हुए उन्होंने बांग्लादेश की मदरसा व्यवस्था की जगह धर्मनिरपेक्ष सरकारी शिक्षा व्यवस्था लागू करने की भी वकालत की.

हालांकि, भारत में अल्पसंख्यकों पर कथित हमलों और हाल के दिनों में बंगाली भाषी लोगों को बांग्लादेश भेजे जाने के आरोपों से जुड़े सवालों का जवाब देने से उन्होंने इनकार कर दिया.

2007 में अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक 'द्विखंडित' के प्रकाशन के बाद हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के चलते तसलीमा नसरीन को कोलकाता छोड़ना पड़ा था. पहले उन्हें केंद्रीय सुरक्षा के बीच जयपुर भेजा गया और बाद में नई दिल्ली ले जाया गया. इसके बाद वे भारत छोड़कर चली गईं और वाम मोर्चा तथा तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल के दौरान कभी कोलकाता नहीं लौटीं.

1 अगस्त की उनकी यह यात्रा, जिसमें एक ओर नई बीजेपी सरकार ने उनका सम्मान किया और दूसरी ओर रवींद्र सदन में कुछ समय के लिए व्यवधान भी देखने को मिला, ने पश्चिम बंगाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक सहिष्णुता और असहमति रखने वाले लेखकों के साथ होने वाले व्यवहार पर लंबे समय से चल रही बहस को एक बार फिर जीवित कर दिया.

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