पैदल चलने वालों की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने क्यों दी धरने की चेतावनी?
सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने वालों की सुरक्षा के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी पर नाराजगी जताई है. सुरक्षित क्रॉसिंग और फुटपाथ बनाने के आदेशों पर अमल में देरी के बीच अदालत ने फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार भी माना है

सुप्रीम कोर्ट ने पैदल यात्रियों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने को कहा है (फोटो : AI)
जरा सोचिए, हालात कितने खराब होंगे कि सुप्रीम कोर्ट के दो जज पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग बनाने की मांग को लेकर धरने पर बैठने की बात कहने लगें. मथुरा रोड पर नेशनल जूलॉजिकल गार्डन के पास एक व्यस्त चौराहा है. यहां पैदल चलने वालों की सुरक्षा के लिए बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. इससे नाराज जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 16 अक्टूबर को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि अगर अगली सुनवाई से पहले समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो वे हाई कोर्ट के मुख्य गेट पर धरने पर बैठ जाएंगे. उन्होंने यहां तक कहा, "जब तक आप (राज्य सरकार) काम पूरा नहीं कर लेते, तब तक घर नहीं जाएंगे."
जजों ने यह बात भले ही हल्के-फुल्के अंदाज में कही हो लेकिन इससे समस्या की गंभीरता का पता चलता है. इसे दूर करने में एक साल से ज्यादा समय से कोशिशें हो रही हैं फिर भी समाधान नहीं निकला है. इसका खामियाजा हर दिन हजारों पैदल चलने वालों को भुगतना पड़ रहा है.
अक्टूबर 2025 में पीठ ने सड़क सुरक्षा से जुड़ी एक अहम जनहित याचिका (एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ) पर आदेश दिया था. इसमें सड़क हादसों और उनमें होने वाली मौतों को कम करने के लिए पांच प्रमुख पहलुओं पर निर्देश दिए गए थे. इनमें फुटपाथ पर चलते समय पैदल चलने वालों की सुरक्षा, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग बनाना, हेलमेट पहनना, गलत लेन में गाड़ी चलाने और असुरक्षित तरीके से ओवरटेक करने से जुड़े पहलूके साथ ही आंखों को चकाचौंध करने वाली हेडलाइट, बिना अनुमति वाली स्ट्रोब लाइट और गैरकानूनी हूटर के इस्तेमाल से जुड़े निर्देश शामिल थे.
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय जिन 50 शहरों के सड़क हादसों के सालाना आंकड़े जारी करता है. इनका जिक्र करते हुए अदालत ने इन शहरों में सड़कों का रखरखाव करने वाली एजेंसियों को मौजूदा फुटपाथों और पैदल यात्रियों के लिए बनी क्रॉसिंग का ऑडिट शुरू करने का निर्देश दिया. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि ये सुविधाएं जहां तक संभव हो, इंडियन रोड्स कांग्रेस के दिशा-निर्देशों के मुताबिक हों.
अदालत ने गौर किया कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें पैदल यात्रियों के लिए बने फुट ओवरब्रिज या सबवे का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है या उनका रखरखाव ठीक से नहीं हो रहा है. अदालत ने कहा कि इस स्थिति ने "लोगों के व्यवहार में एक तरह की जड़ता पैदा कर दी है, जिसके चलते कई पैदल यात्री इन सुविधाओं के मौजूद होने के बावजूद सीधे सड़क पार करना पसंद करते हैं. यह इन सुविधाओं का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित करने और पैदल यात्रियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए डिजाइन में सुधार, लोगों को जागरूक करने की पहल और नियमों को लागू करने जैसे उपायों की तत्काल जरूरत को दिखाता है."
अदालत ने इन 50 शहरों में सड़कों का रखरखाव करने वाली एजेंसियों को कार्य-योजना तैयार करने और ज्यादा भीड़ वाले इलाकों में पैदल यात्रियों के लिए सड़क पार करने की अतिरिक्त सुविधाओं की जरूरत का आकलन करने के लिए चरणबद्ध तरीके से सर्वे शुरू करने का निर्देश भी दिया. 7 अक्टूबर, 2025 के आदेश में कहा गया, "हम निर्देश देते हैं कि सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट और मथुरा रोड पर नेशनल जूलॉजिकल गार्डन के पास सड़क पार करने की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए."
आदेश में अधिकारियों को इसके लिए सात महीने का समय दिया गया था. एक साल बाद 15 सितंबर को मामले की समीक्षा के दौरान अदालत ने अधिकारियों को सुरक्षा के उपाय जल्द तैयार करने का फिर से निर्देश दिया. इसके बाद 28 सितंबर को एक बार फिर इस बारे में याद दिलाया गया.
सुप्रीम कोर्ट कई मौकों पर अधिकारियों से पैदल यात्रियों के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने को कहता रहा है.19 जून को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि सुरक्षित और तय सीमा वाले फुटपाथों पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है. यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) से मिलता है, जो आने-जाने की आजादी देता है और अनुच्छेद 21 से भी जुड़ता है, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देता है. अदालत ने कहा कि पैदल यात्रियों के अधिकार "सबसे अहम" हैं और उन्हें मोटर वाहनों की आवाजाही से पहले प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
इस फैसले के बाद हर नगर निगम, शहरी विकास प्राधिकरण और पंचायत की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे सुरक्षित फुटपाथ बनाए और उनका रखरखाव करे. इस जिम्मेदारी को कानूनी तौर पर लागू कराया जा सकता है.
फैसले में कहा गया, "अगर कोई सड़क है तो यह भी जरूरी है कि पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ तय किया जाए और उसका रखरखाव किया जाए. यह ऐसी जिम्मेदारी है, जिसे कानूनी तौर पर लागू कराया जा सकता है." फैसले में आगे कहा गया, "यह जरूरी बल्कि बेहद जरूरी है कि हम पहले यह धारणा दूर करें कि 'आने-जाने का अधिकार' सिर्फ पहियों पर चलने से जुड़ा है."
19 जून का यह फैसला 2014 में पांच साल के एक स्कूली बच्चे की दर्दनाक मौत के मामले में आया था. फुटपाथ न होने के कारण उस बच्चे को सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ा था. अब पीठ ‘चलने का मौलिक अधिकार और फुटपाथ’ नाम की जनहित याचिका (पीआईएल) के जरिए इस मामले को आगे बढ़ा रही है.
5 अक्टूबर को जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने केंद्र सरकार को एक ऐसी एजेंसी की पहचान करने का निर्देश दिया जो फुटपाथ बनाने की जरूरत को पूरा करने के लिए जिम्मेदार होगी. आदेश में पीठ ने कहा, "हमारा मत है कि देश में कम से कम पांच ऐसे शहरों की पहचान की जा सकती है जहां पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर उन सभी जगहों पर फुटपाथ उपलब्ध कराने की व्यवस्था शुरू की जाए, जहां सड़क मौजूद है."