सुप्रीम कोर्ट की अरावली समिति के तौर-तरीकों पर क्यों उठे सवाल?
सुप्रीम कोर्ट की अरावली समिति की सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया पर ग्रामीणों की अनदेखी के आरोप लगे हैं. 64 जिलों में राय लेने के बजाय समिति के सीमित दौरे और सुझाव लेने के तरीके पर भी सवाल उठे हैं
अरावली की पहाड़ियां (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त समिति के अरावली क्षेत्र के पांच दिवसीय दौरे से पहले ग्रामीणों की राय नहीं लिए जाने का मुद्दा उठा है. मामले में शामिल एक पक्ष ने समिति से कहा है कि उसकी सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया अरावली पर निर्भर किसी भी ग्रामीण परिवार तक नहीं पहुंची है.
4 अगस्त को लिखे पत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समूह ‘पीपल फॉर अरावलीज’ की ओर से एडवोकेट कृति भाटिया ने उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) से कहा कि 21 जुलाई की उसकी प्रेस विज्ञप्ति "सार्वजनिक परामर्श की उस भावना को सामने नहीं रखती, जिसकी कल्पना सुप्रीम कोर्ट ने की थी."
पत्र में कहा गया कि अरावली के जिलों में सरपंचों और जमीनी स्तर के नेताओं तक को यह जानकारी नहीं थी कि सुझाव मांगे जा रहे हैं. इसमें कहा गया कि अरावली को लेकर किसी भी फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले समुदायों की राय लिए बिना "HPC के लिए अपनी रिपोर्ट तैयार करना उचित नहीं होगा."
HPC का गठन पिछले आठ महीने से चल रहे विवाद के कारण हुआ है. पिछले साल 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता वाली समिति की ओर से सुझाई गई अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा को स्वीकार कर लिया था.
खनन को नियंत्रित करने के उद्देश्य से तय की गई इस परिभाषा में उन्हीं भू-आकृतियों को अरावली की पहाड़ियों में शामिल किया गया था, जो स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हों.
दिसंबर में पूरे राजस्थान में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए. 29 दिसंबर को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए अपने ही नवंबर के फैसले पर रोक लगा दी और नई समिति बनाने का आदेश दिया. इस समिति का गठन 25 मई 2026 के आदेश के तहत किया गया था और उसे 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट देनी है.
समिति की परामर्श प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही उस पर सवाल उठने लगे थे. 19 जून को जारी संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने वाले वैज्ञानिकों और संरक्षण समूहों ने कहा था कि यह समिति न तो उच्चाधिकार प्राप्त है और न ही स्वतंत्र.
गैर सरकारी संगठन ‘वनशक्ति’ के निदेशक स्टालिन दयानंद ने कहा कि भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के अध्यक्ष, महानिदेशक और सदस्य सचिव का पद उस पर्यावरण सचिव से नीचे है, जिसकी रिपोर्ट की अब उन्हें दोबारा समीक्षा करनी है. उन्होंने यह भी बताया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ही ICFRE को नियंत्रित करता है.
पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. रवि चोपड़ा, जो सुप्रीम कोर्ट की दो पिछली समितियों की अध्यक्षता कर चुके हैं, ने लिखा कि उनके अनुभव में ऐसी समितियों में काम कर रहे या सेवानिवृत्त अधिकारी कभी सरकार के रुख के खिलाफ नहीं जाते.
भू-विज्ञानी सी.पी. राजेंद्रन और नीति विशेषज्ञ सागर धारा ने मांग की कि समिति की अध्यक्षता किसी अधिकारी के बजाय क्षेत्र के किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ को करनी चाहिए.
19 जून के संयुक्त प्रेस बयान में 22 सितंबर 2025 की भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की एक रिपोर्ट को दबाए जाने का भी आरोप लगाया गया था. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां मरुस्थलीकरण को रोकने में अहम भूमिका निभाती हैं. FSI ने अरावली वाले जिलों की संख्या 63 बताई थी.
सुप्रीम कोर्ट के मई 2024 के आदेश के तहत पर्यावरण सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति ने 13 अक्टूबर 2025 के अपने हलफनामे में केवल 37 जिलों को सूचीबद्ध किया था. इसमें चित्तौड़गढ़, सवाई माधोपुर, भरतपुर, करौली और बूंदी समेत कई जिलों को हटा दिया गया था.
4 अगस्त के पत्र में इस संख्या को आगे बढ़ाते हुए ब्रजभूमि की पहाड़ियों के लिए उत्तर प्रदेश के मथुरा को भी इसमें शामिल किया गया है. इसके मुताबिक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में अरावली से जुड़े कुल 64 जिले हैं. इसके विपरीत, समिति 6 से 10 अगस्त के बीच तीन राज्यों के 10 जिलों का दौरा करने वाली है. इसमें गुजरात को पूरी तरह छोड़ दिया गया है.
परामर्श प्रक्रिया को लेकर पत्र में कई कमियों को गिनाया गया है. सूचना केवल प्रेस सूचना ब्यूरो की प्रेस रिलीज के रूप में जारी की गई. इसे हिंदी या क्षेत्रीय अखबारों में विज्ञापन के रूप में प्रकाशित नहीं किया गया.
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट पर भी यह पांच पेज नीचे जाकर मिलती है. यह किसी पंचायत, तहसील, वन क्षेत्र या अस्पताल के नोटिस बोर्ड तक नहीं पहुंची. न ही इसे रेडियो या वॉट्सएप के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया.
सुझाव केवल ईमेल या गूगल फॉर्म के जरिए भेजे जा सकते हैं, जबकि ग्रामीण परिवारों में केवल करीब 4 फीसदी के पास कंप्यूटर है. इसके अलावा डाक से सुझाव भेजने के लिए कोई पता भी नहीं दिया गया. सुझाव देने के लिए 21 दिनों का समय सावन के दौरान रखा गया है. इसी दौरान कांवड़ यात्रा, मानसून से जुड़ी दिक्कतें और प्रवासी खदान मजदूरों की घर वापसी भी होती है.
पत्र में पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 का हवाला दिया गया है, जिसमें लिखित सुझावों के साथ मौखिक सुनवाई का भी प्रावधान है. इसमें सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की धारा 4(4), 'विक्रांत तोंगड़' मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के स्थानीय भाषा में प्रकाशन संबंधी आदेश और पर्यावरण एवं विकास पर 1992 की रियो घोषणा के सिद्धांत 10 का भी उल्लेख किया गया है.
पत्र में इस प्रक्रिया की तुलना पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल से की गई है, जिसने नागरिक समाज के साथ 40 परामर्श और 14 क्षेत्रीय दौरे किए थे.
पत्र में मुख्य मांगें हैं कि नई सूचना जारी की जाए, सुझाव देने के लिए अधिक समय दिया जाए, अरावली के सभी 64 जिलों में परामर्श किया जाए, सुप्रीम कोर्ट से समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया जाए और खनन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को लेकर डॉक्टरों से भी परामर्श किया जाए.