चीनी के दाम अचानक क्यों बढ़े, सप्लाई से एथेनॉल तक क्या है कनेक्शन?
त्योहारों से पहले चीनी के दाम 70 रुपए किलो के आसपास पहुंच गए हैं. मिलों का घाटा, गन्ने की बढ़ती लागत और एथेनॉल की बढ़ती मांग ने कीमतों पर दबाव बढ़ाया है

भारत दुनिया में चीनी के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है
त्योहारों के मौसम में चीनी की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी ने आम लोगों का स्वाद बिगाड़ दिया है. प्रमुख शहरों में चीनी के खुदरा दाम दो हफ्तों में करीब 20 रुपए प्रति किलो बढ़कर औसतन 70 रुपए प्रति किलो के आसपास पहुंच गए हैं.
आने वाले त्योहारों को देखते हुए केंद्र सरकार ने चीनी की जमाखोरी रोकने के लिए 1 सितंबर से 30 नवंबर तक थोक खरीदारों के लिए स्टॉक रखने की सीमा तय कर दी है. चीनी का स्टॉक रखने की सीमा घटाकर 15 दिन कर दी गई है.
भारत दुनिया में चीनी के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है. बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख टन कच्ची चीनी को बिना शुल्क आयात करने की अनुमति दी. वाणिज्य मंत्रालय ने बताया कि यह आयात टैरिफ रेट कोटा व्यवस्था के तहत किया जाएगा और इसकी अनुमति सिर्फ 30 अक्टूबर तक होगी.
चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे आपूर्ति में कमी और सरकार के महत्वाकांक्षी लेकिन विवादित ईंधन मिश्रण कार्यक्रम के लिए गन्ने का एथेनॉल उत्पादन की ओर जाना बताया जा रहा है. चीनी मिल मालिकों का कहना है कि चीनी की कीमत बढ़ाना जरूरी है ताकि यह उद्योग घाटे से बाहर निकल सके.
नेशनल फेडरेशन ऑफ शुगर कोऑपरेटिव्स के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री जयप्रकाश दांडेगांवकर ने कहा, “पिछले चार साल से चीनी मिलें अपनी उत्पादन लागत से कम कीमत पर चीनी बेच रही हैं. देशभर में चीनी उद्योग मुश्किल में है.” उन्होंने कहा कि चीनी फैक्ट्रियां तभी अपने खर्च संभाल सकती हैं, जब उन्हें चीनी के करीब 45 रुपए प्रति किलो मिलें.
दांडेगांवकर ने कहा, “एक व्यक्ति महीने में औसतन 1.75 से 2 किलो चीनी खाता है. ऐसे में चीनी की कीमत बढ़ने का घरेलू बजट पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा.” उन्होंने कहा कि चीनी की कीमत बढ़ने से आखिरकार गन्ना किसानों को भी राहत मिलेगी.
दांडेगांवकर ने बताया कि पिछले चीनी सीजन में आर्थिक संकट के कारण कुछ चीनी मिलों ने अपने तय रिलीज कोटे से ज्यादा चीनी बेच दी थी. इसका मतलब है कि अब बाजार में कम चीनी पहुंच रही है.
कोल्हापुर के वारणा समूह के चेयरमैन, विधायक और पूर्व मंत्री विनय कोरे सावकर ने कहा कि केंद्र सरकार ने पिछले एक दशक में गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) करीब 28 फीसदी बढ़ाया है, लेकिन चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) काफी हद तक 3,100 रुपए प्रति क्विंटल के आसपास ही रहा है.
FRP वह न्यूनतम कीमत है जो चीनी मिलों को गन्ना किसानों को उनके गन्ने की खरीद और पेराई के लिए देनी होती है.
सावकर कहते हैं, “चीनी की कीमतें मौसमी कारणों से बढ़ी हैं और मांग और सप्लाई के बीच भी अंतर है. कोई भी सरकार चाहेगी कि लोगों को महंगाई से बचाया जाए और MSP कम रखा जाए.”
सावकर के मुताबिक केंद्र को उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग कीमतों की व्यवस्था शुरू करनी चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया, “आइसक्रीम, सॉफ्ट ड्रिंक, कन्फेक्शनरी और दवाओं जैसे महंगे उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को घरेलू उपभोक्ताओं की तुलना में ज्यादा कीमत पर चीनी दी जानी चाहिए.” उन्होंने कहा कि इससे मुश्किल में फंसे चीनी उद्योग को राहत मिलेगी.
महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज फेडरेशन के प्रबंध निदेशक संजय खताल बताते हैं कि चीनी की उत्पादन लागत 4,350 रुपए प्रति क्विंटल है, जबकि इसे 3,825 रुपए प्रति क्विंटल के काफी कम एक्स-मिल भाव पर बेचा जा रहा है. उन्होंने कहा, “इस वजह से महाराष्ट्र का चीनी उद्योग संकट में है.”
उद्योग ने केंद्र सरकार से आसान शर्तों पर कर्ज देने और मौजूदा कर्ज को दोबारा व्यवस्थित करने की मांग की थी,ताकि बैंक और वित्तीय संस्थान उद्योग को कर्ज दे सकें.
खताल यह भी कहते हैं, “चीनी की मौजूदा कीमत में बढ़ोतरी असामान्य नहीं है लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि चीनी अब तक घाटे में बेची जा रही थी. जुलाई तक मिलें अपनी करीब 80 फीसदी चीनी उत्पादन लागत से कम कीमत पर बेच चुकी थीं. MSP में कच्चे माल की लागत भी पूरी नहीं होती. MSP को FRP के हिसाब से बढ़ाया जाना चाहिए. कीमतों में बढ़ोतरी से चीनी मिलों को फायदा होगा क्योंकि वे अगस्त और सितंबर में बचा हुआ चीनी स्टॉक ज्यादा कीमत पर बेच सकेंगी.”
हालांकि, किसान नेता और पूर्व लोकसभा सांसद राजू शेट्टी ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को ‘संदिग्ध’ बताया. उन्होंने कहा कि इससे किसानों के बजाय व्यापारियों को फायदा होगा. उन्होंने सवाल किया कि जब देश में दिवाली तक चलने लायक पर्याप्त चीनी का स्टॉक है तो कीमतें लगातार क्यों बढ़ रही हैं. अगले सीजन में भी उत्पादन मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त रहने की उम्मीद है.
2024-25 में महाराष्ट्र में करीब 13.7 लाख हेक्टेयर जमीन पर गन्ने की खेती हुई थी. महाराष्ट्र देश में गन्ने के सबसे बड़े उत्पादक राज्यों में से एक है. 2023 में 14 लाख हेक्टेयर और 2022-23 में 14.8 लाख हेक्टेयर जमीन पर गन्ने की खेती हुई थी.
पिछले गन्ना पेराई सीजन 2025-26 में 16 लाख हेक्टेयर जमीन पर उगाए गए 1,045.6 लाख मीट्रिक टन (LMT) गन्ने की 208 सहकारी और निजी चीनी फैक्ट्रियों ने पेराई की थी.
आने वाले सीजन में यह आंकड़ा मामूली बढ़कर 1,100-1,125 LMT रहने की उम्मीद है. चीनी का उत्पादन करीब 99 LMT रहा, जो 2024-25 के करीब 81.04 LMT से ज्यादा है. 2025-26 में भारत के कुल चीनी उत्पादन का करीब एक तिहाई उत्पादन महाराष्ट्र में हुआ.