जब लद्दाख के लिए अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के पिता से मिलने पहुंची इंदिरा गांधी

1984 में सोनम वांग्याल और 2026 में सोनम वांगचुक, दो पीढ़ियां और भूख हड़ताल के जरिए व्यवस्था से टकराने की कहानी

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सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल जम्मू-कश्मीर के मंत्री भी थे (File Photo- Social Media)

शनिवार, 18 जुलाई को सुबह दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक हैरान करने वाला नजारा देखने को मिला. करीब तीन हफ्तों से दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे 59 साल के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पुलिस ने सुरक्षा घेरा बनाकर उनके बेड से उन्हें उठाया और ले गई. बताया गया कि तबीयत बिगड़ने की वजह से उन्हें तुरंत एम्बुलेंस से सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया. पुलिस का कहना है कि उन्होंने यह कदम कोर्ट के आदेश और डॉक्टरों की सलाह पर उठाया जबकि आंदोलन के आयोजकों का आरोप है कि उन्हें जबरन उठाया गया.

वजह जो भी हो, इन तस्वीरों ने 40 साल पुरानी एक याद ताजा कर दी. ठीक इसी तरह साल 1984 में सोनम वांगचुक के पिता, सोनम वांग्याल भी सरकार तक लद्दाख की आवाज पहुंचाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठे थे. आज बेटा अस्पताल में है और पिता का संघर्ष इतिहास के पन्नों में दर्ज है.

अपनी जवानी के दिनों में सोनम वांग्याल (Photo: Rediff)

सोनम वांग्याल लद्दाख की राजनीति का बड़ा नाम रहे हैं. राजनीति में आने से पहले उन्होंने एक एवरेस्ट पर्वतारोही के रूप में इतिहास रचा था. 1965 में महज 23 साल की उम्र में वे एवरेस्ट फतह करने वाले सबसे कम उम्र के इंसान बने थे.

एक गरीब किसान परिवार में जन्मे वांग्याल आगे चलकर जम्मू-कश्मीर सरकार में विधायक और मंत्री भी बने. 1980 के दशक में लद्दाख में बाहरी प्रभाव और बदलाव तेजी से बढ़ रहे थे. स्थानीय लोगों को डर था कि वे अपनी पहचान, भाषा, रोजगार और जमीन खो देंगे. इसलिए लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए आंदोलन शुरू हुआ.

इंदिरा गांधी और सोनम वांग्याल (AI से सुधारी गई तस्वीर; Photo: Reddit/r/unitedstatesofindia)

जब सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो 1984 में सोनम वांग्याल भूख हड़ताल पर बैठ गए. उनकी इस हड़ताल के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंचीं. वादे किए गए और उपवास खत्म हुआ लेकिन हक मिलने में अभी समय था.

सालों के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार 1989 में सरकार ने लद्दाख के 8 बड़े समुदायों को आधिकारिक तौर पर अनुसूचित जनजाति का दर्जा दे दिया. यह लद्दाख के इतिहास की सबसे बड़ी जीतों में से एक थी.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 2017 में सोनम वांग्याल को 'तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार' से सम्मानित करते हुए (Photo: PIB)

आज चार दशक बाद इतिहास खुद को दोहरा रहा है. पिता की तरह बेटे सोनम वांगचुक ने भी अपनी बात मनवाने के लिए भूख हड़ताल का रास्ता चुना है. हालांकि, इस बार उनकी लड़ाई लद्दाख के लिए नहीं है. लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने के लिए तो वे पिछले साल 35 दिनों का उपवास रख चुके हैं.

इस बार जंतर-मंतर पर उनकी भूख हड़ताल देश के छात्रों के लिए है. वे NEET पेपर लीक विवाद और परीक्षाओं में हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं. प्रदर्शनकारियों की मांग है कि शिक्षा मंत्री इस्तीफा दें और देश की परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधार किए जाएं. मुद्दे भले ही अलग हों लेकिन तस्वीरें बिल्कुल वैसी ही हैं. 

दोनों की कहानी में एक बात समान है कि जब व्यवस्था ने उनकी आवाज़ नहीं सुनी तो उन्होंने देश को जगाने के लिए अपने शरीर को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया.

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