सात राज्य और 940 सीटें, 2027 बताएगा मोदी सरकार के लिए 2029 कितनी बड़ी चुनौती

2027 के विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दबदबे, योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षाओं, अखिलेश यादव की साख और कांग्रेस के अस्तित्व की परीक्षा लेंगे. इन चुनावों से पता चलेगा कि विपक्ष 2029 में BJP को कितनी कड़ी चुनौती दे सकता है

prime minister narendra modi special
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Photo-ITG)

उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव में 29 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी (BJP) वाराणसी की दोनों सीटें समाजवादी पार्टी से हार गई. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है. यहां BJP के नौ मंत्रियों और सात विधायकों ने चुनाव प्रचार किया था. महाराष्ट्र के नागपुर में, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय है, कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने 3,271 वोटों से स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीट बरकरार रखी.

हालांकि यह BJP की करारी हार नहीं थी. चार राज्यों की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 28 सीटों में BJP ने अपने दम पर 13 सीटें जीतीं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को कुल 16 सीटें मिलीं, जबकि पिछली बार उसके पास 18 सीटें थीं. कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली, वह भी नागपुर में. 

कर्नाटक में जहां कांग्रेस की अपनी सरकार है, पार्टी चारों सीटें हार गई. प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रदर्शन पर तंज कसने का मौका भी नहीं छोड़ा. इन नतीजों से न तो BJP के खिलाफ कोई लहर दिखी और न ही विपक्ष की वापसी के संकेत मिले. इसके बजाय इनसे आने वाले बड़े चुनावी मुकाबले से पहले राजनीतिक खेमों के भीतर की दरारें सामने आईं.

2027 में सात राज्यों की 940 विधानसभा सीटों और 132 लोकसभा सीटों पर चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में फरवरी-मार्च में मतदान होने की उम्मीद है. इसके बाद साल के आखिर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे. इन सात राज्यों में से पांच में BJP की सरकार है जबकि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस और पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) सत्ता में है.

940 विधानसभा सीटों में से अकेले BJP के पास 557 सीटें हैं. उसके सहयोगी दलों के पास 47 और हैं. 12 निर्दलीय विधायक भी गठबंधन का समर्थन करते हैं. इस तरह NDA के पास कुल 616 सीटें हैं, यानी हर तीन में से करीब दो सीटें. कांग्रेस के पास 98 सीटें हैं. जुलाई 2025 में INDIA गठबंधन से अलग हुई AAP के पास 101 सीटें हैं. इनमें से लगभग सभी पंजाब में हैं.

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश और गुजरात में ही विधानसभा की 585 और लोकसभा की 106 सीटें हैं. इन दोनों राज्यों में अपनी पकड़ बनाए रखना जून 2024 के बाद BJP की वापसी को और मजबूत करेगा. लोकसभा चुनाव में BJP की सीटें घटकर 240 रह गई थीं. 

इसके बाद नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार को तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ा था. इसलिए सात राज्यों के विधानसभा चुनाव 2029 के आम चुनाव से पहले दिल्ली में केंद्र सरकार की राजनीतिक ताकत और उसे चुनौती देने वाले दलों की साख की परीक्षा होंगे.

इन चुनावों में हार से केंद्र की सरकार का बहुमत खतरे में नहीं पड़ेगा. लेकिन मोदी के सामने बड़ा सवाल यह है कि क्या BJP 2024 के झटकों से पूरी तरह उबर चुकी है? उसके बाद NDA ने बिहार में बड़ी जीत दर्ज की, असम में सत्ता बरकरार रखी और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर कर दिया. 

अपने मजबूत राज्यों में जीत बरकरार रखना इस बात का संकेत होगा कि 2024 का झटका महज एक अस्थाई रुकावट था, न कि पार्टी के जनाधार में लंबे समय से चल रही गिरावट की शुरुआत. अब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में हार से पार्टी की सबसे अहम चुनावी जमीन पर उसकी पकड़ को लेकर फिर सवाल उठ सकते हैं.

इसका एक संवैधानिक पहलू भी है. जुलाई 2027 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में नए चुने गए विधायक मतदान करेंगे. उत्तर प्रदेश के हर विधायक के वोट का मूल्य 208 है जो देश में सबसे ज्यादा है. इसलिए राज्य की 403 विधानसभा सीटें सिर्फ यह तय नहीं करेंगी कि लखनऊ में किसकी सरकार बनेगी बल्कि अगले राष्ट्रपति को चुनने वाले निर्वाचक मंडल के गणित पर भी असर डालेंगी. इन नतीजों का असर भविष्य में राज्यसभा के समीकरणों पर भी पड़ेगा.

2022 में BJP ने उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 255 पर जीत हासिल की थी. समाजवादी पार्टी को 111 और कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं. योगी आदित्यनाथ राज्य के 37 साल में ऐसे पहले मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने अपना पूरा कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा सत्ता में वापसी की. 

योगी आदित्यनाथ यूपी में 37 साल में पहले सीएम रहे जिन्होंने अगला कार्यकाल हासिल किया (फाइल फोटो)

राष्ट्रीय लोक दल (RLD) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर NDA में आने के बाद अब गठबंधन के पास 292 विधायक हैं. समाजवादी पार्टी के चार बागी विधायक भी गठबंधन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर चुके हैं.

लगातार तीसरी जीत के साथ आदित्यनाथ आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में किसी पार्टी को लगातार तीन विधानसभा चुनाव जिताने वाले पहले मुख्यमंत्री बन जाएंगे. इससे 2024 के लोकसभा चुनाव में हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई में भी मदद मिलेगी. 

उस चुनाव में BJP राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 33 जीत पाई थी. विधानसभा में जीत से BJP के भीतर मोदी-शाह के बाद नेतृत्व को लेकर होने वाली चर्चाओं में आदित्यनाथ की स्थिति मजबूत होगी. हिंदुत्व, सख्त पुलिस व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं के उनके मेल को जनता की नई मंजूरी मिलेगी. दूसरी ओर, हार या बहुमत में बड़ी गिरावट से यह सवाल उठेगा कि क्या आदित्यनाथ BJP के जातीय समीकरणों को एकजुट रख पाने में सक्षम हैं.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए दांव शायद इससे भी बड़े हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार, तमिलनाडु में एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) की सत्ता से विदाई, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का कमजोर पड़ना और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की घटती राजनीतिक ताकत ने विपक्ष के कई बड़े केंद्रों को कमजोर किया है. 

ऐसे में अखिलेश को INDIA गठबंधन का सबसे अहम क्षेत्रीय नेता माना जा सकता है. उनका PDA फॉर्मूला पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को साथ लाने पर आधारित है. इसी रणनीति से समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीती थीं जो BJP से चार ज्यादा थीं. उसकी सहयोगी कांग्रेस ने भी छह सीटें जीती थीं.

तत्काल चुनौती राहुल गांधी के साथ उनकी साझेदारी की है. उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत में पुरानी खींचतान सामने आने लगी है. बताया जाता है कि राज्य में सिर्फ दो विधायकों वाली कांग्रेस करीब 170 सीटें मांग रही है, जबकि समाजवादी पार्टी के नेता 60 से 70 सीटें देने की बात कर रहे हैं. अखिलेश ने सितंबर में राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्र रायबरेली से अपना चुनाव प्रचार शुरू किया था. उनका कहना है कि सीटें उसी पार्टी को मिलनी चाहिए, जिसके जीतने की संभावना सबसे ज्यादा हो.

यूपी में सपा और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर खींचतान की खबरें हैं (सांकेतिक फोटो)

कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच है लेकिन उत्तर प्रदेश में विधानसभा स्तर पर उसका संगठन बहुत कमजोर है. अखिलेश के पास राज्य में मजबूत संगठन है लेकिन उन्हें कांग्रेस समर्थकों के वोट भी अपनी तरफ लाने होंगे. इस बीच, RLD और SBSP जैसे समाजवादी पार्टी के पूर्व सहयोगी NDA में जा चुके हैं. 

वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) अब भी दलित वोटों के जरिए करीबी मुकाबलों को प्रभावित कर सकती है. चुनौती यह है कि राष्ट्रीय चुनाव में काम आए सामाजिक समीकरण को विधानसभा चुनाव में भी एकजुट रखा जाए. इसके लिए अलग-अलग सीटों पर होने वाली खींचतान से निपटना होगा.

पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है जहां BJP मुख्य मुकाबले में नहीं है. 2022 में सत्तारूढ़ AAP ने 117 में से 92 सीटें जीती थीं. इससे पार्टी को दिल्ली से बाहर भी सरकार चलाने का आधार मिला. राष्ट्रीय राजधानी में सत्ता गंवाने के बाद पंजाब को बचाए रखना पार्टी की राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए बेहद अहम हो गया है. 

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को नशे, रोजगार, कर्ज, कानून-व्यवस्था, खेती के संकट और धार्मिक विवादों जैसे मुद्दों पर घेरा जा रहा है. हालांकि हाल के उपचुनावों और नगर निकाय चुनावों में AAP के प्रदर्शन से संकेत मिलता है कि उसका संगठन अब भी मजबूत है. 2022 के बाद विधानसभा की सात में से छह सीटों पर उपचुनाव जीतकर पार्टी के पास अब 95 सीटें हैं. वहीं कांग्रेस की सीटें 18 से घटकर 16 रह गई हैं.

2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की 13 में से सात सीटें जीतने वाली कांग्रेस को यहां वापसी की उम्मीद दिख रही है. लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है. शिरोमणि अकाली दल (SAD) कमजोर हुआ है, जबकि अमृतपाल सिंह के नए पंथक संगठन से सिख राजनीति में और बिखराव आ सकता है. 

BJP और अकाली दल के बीच फिर गठबंधन की चर्चा भी एक नया समीकरण है. दोनों दल साथ आते हैं या नहीं, इसका असर AAP विरोधी वोटों के बंटवारे पर पड़ सकता है. कांग्रेस की जीत से उत्तर भारत में उसका आधार फिर मजबूत होगा. वहीं AAP की एक और जीत यह दिखाएगी कि पार्टी दिल्ली से बाहर भी अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रख सकती है.

2022 में उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में से 47 पर BJP ने जीत दर्ज की थी. इसके साथ ही राज्य में हर चुनाव में सरकार बदलने की परंपरा टूट गई थी. हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी खटीमा सीट हार गए थे. इसके बाद कांग्रेस ने बदरीनाथ सीट जीती. यहां से उसके विधायक के BJP में जाने के बाद हुए उपचुनाव में उसे जीत मिली थी. 

मंगलौर सीट पर भी कांग्रेस ने जीत दर्ज की. इससे उसकी सीटें 19 से बढ़कर 20 हो गईं. रोजगार, पहाड़ों से पलायन, पर्यावरण पर बढ़ता दबाव और समान नागरिक संहिता चुनाव के अहम मुद्दे हो सकते हैं. 

अगर उत्तराखंड में सरकार बदलती है तो यह संकेत होगा कि BJP का मजबूत संगठन भी स्थानीय नाराजगी को हमेशा दबाकर नहीं रख सकता. वहीं सत्ता बरकरार रखने पर उत्तर भारत के एक और राज्य में कांग्रेस की गिरावट गहरी होगी. उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में भी ऐसा ही रुझान दिख चुका है.

BJP गोवा में 2012 से सत्ता में है. यहां कांग्रेस के सामने एक अलग चुनौती है. 2022 में BJP ने 40 में से 20 सीटें जीती थीं. इसके बाद कांग्रेस के 11 में से आठ विधायक BJP में शामिल हो गए. अब विधानसभा में कांग्रेस के सिर्फ तीन विधायक हैं. यह इस बात की याद दिलाता है कि चुनाव जीतना और अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को पार्टी में बनाए रखना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं. 

पर्यटन आधारित विकास, जमीन के इस्तेमाल और रोजगार जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की सरकार को घेरा जा सकता है. यहां आम आदमी पार्टी, गोवा फॉरवर्ड पार्टी और क्षेत्रीय दल भी मैदान में हैं. ऐसे में विपक्षी दलों के बीच तालमेल सत्ता विरोधी माहौल जितना ही अहम साबित हो सकता है.

मणिपुर में मुकाबला सिर्फ मौजूदा सरकार को बदलने या बनाए रखने का नहीं है. मई 2023 में जातीय हिंसा शुरू होने के बाद से 250 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं. 2022 में BJP ने 60 विधानसभा सीटों में से 32 पर जीत हासिल की थी. लेकिन दो साल बाद लोकसभा की दोनों सीटें कांग्रेस ने जीत लीं. 

एन. बीरेन सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटने, करीब एक साल तक राष्ट्रपति शासन रहने और फरवरी 2026 में युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद सरकार को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश हुई. इसके साथ ही कुकी-जो और नगा समुदायों से उपमुख्यमंत्री भी बनाए गए. लेकिन इन बदलावों से संकट का मूल कारण दूर नहीं हुआ है.

मणिपुर की घाटी और पहाड़ी इलाकों की विधानसभा सीटों पर सुरक्षा, क्षेत्र और स्वायत्तता को लेकर गहरा विभाजन है. कुकी-जो समुदाय के लिए अलग प्रशासन की मांग अब भी जारी है. समुदायों के बीच भरोसा भी कमजोर बना हुआ है. BJP के लिए बिना सुलह-सफाई के चुनाव जीतना सीमित राजनीतिक राहत ही देगा. 

कांग्रेस हिंसा को लेकर लोगों की नाराजगी को एक विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प में बदल पाएगी या नहीं, यही पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए उसे ऐसे उम्मीदवारों और गठबंधन की जरूरत होगी जो गहरे बंटे समुदायों के बीच समर्थन जुटा सकें. चुनाव नतीजों को केंद्र सरकार के संकट से निपटने के तरीके पर जनता के फैसले के रूप में भी देखा जाएगा.

साल 2027 के आखिर में होने वाले चुनावों से देश की राजनीतिक तस्वीर और साफ होगी. गुजरात प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह का गृह राज्य है. यहां 1995 से BJP की सरकार है. 2022 में पार्टी ने रिकॉर्ड 156 सीटें जीती थीं. इसके बाद दलबदल के जरिए उसने अपनी स्थिति और मजबूत की. 

अप्रैल में हुए सभी 15 नगर निगमों के चुनावों में भी BJP ने जीत दर्ज की. ऐसे में कांग्रेस के लिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाना मुश्किल हो गया है. उसे BJP के साथ-साथ AAP से भी चुनौती मिल रही है. रोजगार, किसानों की समस्याएं और स्थानीय मुद्दे ऐसे विषय हैं, जिनके जरिए विपक्ष लंबे समय से जमी BJP सरकार को चुनौती देने की कोशिश कर सकता है.

हिमाचल प्रदेश में चुनौती इसके उलट है. 2022 में कांग्रेस ने 68 में से 40 सीटें जीती थीं और बगावत के बावजूद अपनी सरकार बचाए रखी. लेकिन मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को बढ़ते वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है. राज्य में 1985 के बाद से किसी मौजूदा सरकार को दोबारा सत्ता नहीं मिली है. 

हालांकि फरवरी 2024 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले कांग्रेस के छह विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के बाद पार्टी ने नौ में से छह उपचुनाव जीत लिए थे. इससे विधानसभा में सीटों का समीकरण फिर 40-28 हो गया. हिमाचल में सत्ता बरकरार रखना यह दिखाएगा कि कांग्रेस उन राज्यों में भी अपनी सरकार बचा सकती है जहां उसका चुनावी आधार बढ़ाने का संघर्ष जारी है.

इन चुनावी मुकाबलों के बीच एक और राजनीतिक धारा भी आकार ले रही है. इसकी वजह नई पीढ़ी में बढ़ता असंतोष है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) परीक्षा में गड़बड़ियों, बेरोजगारी और संस्थानों की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर युवाओं को लामबंद करने का माध्यम बनकर उभरी है. 

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक (NEET-UG) से जुड़े विवाद और दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के बाद जुलाई में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था. CJP कोई पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं है. इसके बावजूद वह मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में शामिल हुई है. उसका राजनीतिक महत्व इस बात से तय होगा कि क्या नाराज छात्र और नौकरी की तलाश कर रहे युवा मतदान और चुनावी फैसलों को प्रभावित कर पाते हैं. साथ ही, क्या स्थापित राजनीतिक दल उनकी शिकायतों का भरोसेमंद जवाब दे पाते हैं.

इन चुनावों से अगला प्रधानमंत्री नहीं चुना जाएगा. लेकिन ये 2029 के चुनाव की दिशा और उसके मुद्दे तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे. BJP के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि क्या लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद वह अपना राजनीतिक दबदबा बनाए रख सकती है. 

विपक्ष के सामने चुनौती है कि अखिलेश, राहुल, कांग्रेस और दूसरे दल बिखरी हुई नाराजगी को मजबूत संगठन और एकजुट गठबंधन में बदल पाते हैं या नहीं. वहीं उभरते युवा आंदोलन के सामने सवाल है कि क्या सड़कों पर दिख रहा गुस्सा वोटों में भी बदल पाएगा. इस लिहाज से 2027 के शुरुआती चुनाव ही 2029 की राजनीति की दिशा तय करने में मदद कर सकते हैं.

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