छात्रों के लिए PG और हॉस्टल सुरक्षित कैसे बनें?

हर साल लाखों छात्र पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों का रुख करते हैं, लेकिन कैंपस के बाहर PG और हॉस्टल की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी और निगरानी का साफ सिस्टम नहीं है

Satya Niketan Building Collapse (PTI Photo)
दिल्ली में सत्य निकेतन हादसे के बाद चल रहा बचाव कार्य (फाइल फोटो)

नई दिल्ली के सत्य निकेतन में बहुमंजिला इमारत गिरने से सात लोगों की मौत हो गई. इस हादसे के बाद भारत में उच्च शिक्षा से जुड़ी एक बड़ी समस्या भी सामने आई है जिस पर लंबे समय से ध्यान नहीं दिया गया. छात्र पढ़ाई के लिए यूनिवर्सिटी जाते हैं लेकिन रहने के लिए शहर में PG लेते हैं. कई बार ये PG गैरकानूनी तरीके से चल रहे होते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इनमें रहने वाले छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

हर साल हजारों छात्र पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं. उनके लिए रहने की जगह ढूंढना भी कॉलेज ढूंढने जितना ही जरूरी होता है. यूनिवर्सिटी में पढ़ाई, परीक्षा और कैंपस की सुरक्षा के लिए व्यवस्था होती है लेकिन कैंपस के बाहर छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है और वहां उनकी सुरक्षा कैसे होगी, यह अभी तय नहीं है.

आजकल छात्र PG, हॉस्टल और को-लिविंग के अलावा ऐसी सामान्य इमारतों में भी रहते हैं जिन्हें छात्रों के रहने की जगह में बदल दिया गया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये जगहें सुरक्षित हैं, क्या वहां सभी जरूरी नियमों का पालन हो रहा है और अगर कोई समस्या या हादसा होता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

यूनिवर्सिटी लिविंग के संस्थापक और सीईओ सौरभ अरोड़ा का कहना है कि छात्रों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यूनिवर्सिटी लिविंग एक वैश्विक प्लेटफॉर्म है जो दुनिया भर के छात्रों को रहने के लिए कमरे और हॉस्टल ढूंढने में मदद करता है. सौरभ अरोड़ा ने बताया कि भारत के कॉलेज-यूनिवर्सियों में करीब 4.46 करोड़ छात्र पढ़ रहे हैं. वहीं करीब 1.2 करोड़ छात्रों को रहने की जगह की जरूरत है लेकिन कॉलेज और यूनिवर्सिटी मिलकर सिर्फ करीब 40 लाख छात्रों के रहने की व्यवस्था कर पाते हैं.

इमारत की सुरक्षा कौन जांचे?

PG ढूंढ़ते समय छात्र आमतौर पर किराया, जगह, खाना, वाई-फाई और कमरा कैसा है इन बातों पर ध्यान देते हैं. लेकिन जिस इमारत में वे रहने जा रहे हैं, वह कितनी सुरक्षित है इस पर अक्सर सबसे कम ध्यान जाता है.

दिल्ली के मुखर्जी नगर में बड़ी संख्या में स्टूडेंट पीजी और हॉस्टल में रहते हैं (सांकेतिक तस्वीर)

सौरभ अरोड़ा का कहना है कि छात्रों और उनके माता-पिता को रहने की जगह से जुड़ी जरूरी जानकारी भी जरूर देखनी चाहिए. इनमें बिल्डिंग का प्लान, इमारत में रहने की मंजूरी या निर्माण पूरा होने के कागज, इमारत की मजबूती, फायर क्लीयरेंस, PG या हॉस्टल का रजिस्ट्रेशन, बिजली की सुरक्षा से जुड़े रिकॉर्ड और लिफ्ट की सुरक्षा से जुड़े सर्टिफिकेट शामिल हैं. उन्हें यह भी पता करना चाहिए कि इमरजेंसी के समय क्या किया जाता है और सुरक्षा या मेंटेनेंस से जुड़ी शिकायत कहां और कैसे दर्ज की जा सकती है.

साथ ही किसी जगह को कानूनी तौर पर चलाने की मंजूरी, इमारत की मजबूती, वहां तय संख्या के मुताबिक लोगों का रहना और सभी सुरक्षा नियमों का पालन हो रहा है या नहीं यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी उस जगह को चलाने वाले और संबंधित सरकारी एजेंसियों की है.

फिर भी छात्र कुछ जरूरी चीजों की खुद जांच कर सकते हैं. क्या इमरजेंसी से बाहर निकलने के रास्ते साफ दिख रहे हैं? क्या फायर एक्सटिंग्विशर आसानी से नजर आ रहे हैं और उनकी समय-समय पर जांच होती है? क्या सीढ़ियां सुरक्षित हैं? क्या बिजली के तार खुले हुए हैं या उन पर जरूरत से ज्यादा लोड है? क्या कॉमन एरिया में पर्याप्त रोशनी है? क्या वहां आने-जाने वालों पर नजर रखने की व्यवस्था है? इन चीजों से यह पूरी तरह पता नहीं चल सकता कि इमारत अंदर से कितनी मजबूत है लेकिन खतरे के साफ संकेत जरूर मिल सकते हैं.

क्या ‘सेफ्टी पासपोर्ट’ मदद कर सकता है?

सोचिए आप ऑनलाइन PG ढूंढ रहे हैं और एक नजर में यह पता चल जाए कि वो जगह रजिस्टर्ड है या नहीं, वहां कितने लोगों के रहने की मंजूरी है, सुरक्षा से जुड़े सर्टिफिकेट की क्या स्थिति है और उसे चलाने की जिम्मेदारी किसकी है. सौरभ अरोड़ा का मानना है कि भारत में ऐसी ही व्यवस्था की जरूरत है.

इसके तहत हर प्रॉपर्टी के लिए एक डिजिटल ‘सेफ्टी पासपोर्ट’ या सार्वजनिक रिकॉर्ड हो जिसमें उस जगह से जुड़े नियमों और सुरक्षा की पूरी जानकारी हो. छात्र PG के लिए पैसे जमा करने से पहले यह जानकारी देख सकें.

इससे किसी हादसे के बाद कार्रवाई करने के बजाय इन जगहों की लगातार निगरानी की जा सकेगी. समय-समय पर जांच हो, सर्टिफिकेट दोबारा दिए जाएं, नियमों के पालन से जुड़ी जानकारी साफ तौर पर उपलब्ध हो और जगह चलाने वाले की जिम्मेदारी तय हो. ये सब किसी हादसे के बाद नहीं बल्कि पहले से ही नियमित व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए.

सुरक्षित रहने की जगह किसी लग्जरी की तरह नहीं होनी चाहिए लेकिन ऐसा होता जा रहा है. उदाहरण के लिए, 2026 में दिल्ली में अच्छी जगह पर एक ठीक-ठाक PG का किराया करीब 7,000-18,000 रुपए महीना हो सकता है. मुंबई में ये करीब 9,000-22,000 रुपए, बेंगलुरु में 7,500-17,000 रुपए, पुणे में 6,500-15,000 रुपए और हैदराबाद में 7,000-16,000 रुपए तक हो सकता है.

ये किराए बाजार में चल रहे दामों के आधार पर बताए गए हैं इसलिए इन्हें किसी शहर का औसत किराया नहीं माना जा सकता. साथ ही, एडवांस राशि, खाना, बिजली-पानी, कपड़े धोने और आने-जाने के खर्च भी जोड़ने पड़ सकते हैं जिससे हर महीने का कुल खर्च और बढ़ सकता है.

घर से दूर पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए खर्च सबसे बड़ी चिंता होती है. लेकिन कम किराए का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि एक कमरे में जरूरत से ज्यादा लोग रहें, बिजली की वायरिंग असुरक्षित हो या आग लगने पर बाहर निकलने के रास्ते ठीक न हों. सुरक्षा के नाम पर रहने की जगहों का किराया बढ़ाना इसका हल नहीं है. जरूरत इस बात की है कि अच्छी और सुरक्षित जगहें ज्यादा हों ताकि छात्रों को आसानी से सुरक्षित रहने की जगह मिल सके.

यूनिवर्सिटियों को भी आगे आना होगा!

छात्रों के लिए खास तौर पर बनाई गई जगहें जिन्हें पर्पज-बिल्ट स्टूडेंट अकमोडेशन (PBSA) कहा जाता है एक अच्छा और व्यवस्थित विकल्प हो सकती हैं. लेकिन बड़े स्तर पर ऐसी जगहें बनाने के लिए कॉलेज और यूनिवर्सिटी के आसपास जमीन, लंबे समय का निवेश, सरकारी अनुमति और तय नियमों की जरूरत होगी.

PG और किराए की ऐसी इमारतें जिन्हें छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल किया जाता है आगे भी जरूरत पूरी करती रहेंगी क्योंकि इन्हें कम समय और कम खर्च में शुरू किया जा सकता है. चुनौती यह है कि रहने की इन अलग-अलग जगहों में भी सुरक्षा और जिम्मेदारी को लेकर एक जैसी व्यवस्था बनाई जाए.

यूनिवर्सिटियों को भी छात्रों के रहने की व्यवस्था में मदद करनी चाहिए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कैंपस के बाहर छात्रों के रहने की हर जगह की जिम्मेदारी यूनिवर्सिटी खुद ले. यूनिवर्सिटी को साफ बताना चाहिए कि कैंपस में कितने छात्रों के रहने की जगह है और किन छात्रों को कैंपस में रहने की सुविधा मिल सकती है.

अगर कैंपस में सभी छात्रों के लिए जगह नहीं है तो यूनिवर्सिटी उन्हें कैंपस के बाहर ऐसी जगहों की जानकारी दे सकती है जिनकी पहले जांच हो चुकी है. ऐसी जगहों की सूची बनाने के लिए कुछ तय नियम होने चाहिए.

इनमें रजिस्ट्रेशन, इमारत की मजबूती, आग और बिजली से सुरक्षा, कितने लोगों के रहने की मंजूरी है, रहने के लिए जरूरी सुविधाएं, सुरक्षा और शिकायत का समाधान जैसी बातें शामिल होनी चाहिए. इस सूची में शामिल जगहों की समय-समय पर फिर से जांच भी होनी चाहिए.

सबसे बड़ी बात यह है कि छात्रों के रहने की जगह भी पढ़ाई की व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है. अगर कोई छात्र ऐसी इमारत में रह रहा है जहां जरूरत से ज्यादा लोग रहते हैं, ठीक से देखभाल नहीं होती या आने-जाने की सुविधा अच्छी नहीं है तो उसका तनाव पढ़ाई तक पहुंच सकता है.

घर से कॉलेज तक का लंबा सफर, पढ़ाई के लिए सही जगह न मिलना, इंटरनेट ठीक से न चलना, सुरक्षा की चिंता और मेंटेनेंस से जुड़ी शिकायतों का हल न होना इन सब बातों का असर पढ़ाई पर फोकस करने, मेंटल पीस और पूरे कॉलेज अनुभव पर पड़ सकता है. भारत में उच्चतर शिक्षा का दायरा बढ़ा है. अब छात्रों के रहने की सुविधाएं भी उसी रफ्तार से बढ़ाने की जरूरत है.

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