AI से लौटा 1980 का दौर, फिर फर्जी तस्वीरों ने छेड़ी सियासी जंग
AI से रेट्रो तस्वीरें बनाना अब सिर्फ पुरानी यादों को तस्वीरों में उतारने तक सीमित नहीं रह गया है. इसका इस्तेमाल राजनीति में भी होने लगा है जहां फर्जी तस्वीरों के जरिए लोगों को गुमराह करने और महिलाओं की गलत छवि पेश करने का खतरा बढ़ रहा

सिद्धार्थ मल्होत्रा और कियारा आडवाणी ने भी ट्रेंड फॉलो करते हुए अपनी तस्वीर शेयर की है
रेट्रो-AI अब सिर्फ इंस्टाग्राम पर पुरानी यादों की तस्वीरें बनाने का ट्रेंड नहीं रह गया है. भारत में यह ट्रेंड बॉलीवुड की पुरानी यादों, खुद को खास दिखाने की चाह, राजनीति और तेजी से बढ़ती AI तकनीक से जुड़ गया है.
1980 के दशक की तस्वीरों का यह नया ट्रेंड कई अहम बातें सामने लाता है. जो चीज शुरुआत में सिर्फ मजाक और मनोरंजन लगती है, वह कितनी जल्दी राजनीति में इस्तेमाल होने लगती है, ये इस ट्रेंड से साफ दिखता है. अब मजाक, मीम और किसी को गलत तरीके से दिखाने वाली तस्वीर के बीच का फर्क भी बहुत कम रह गया है.
घिबली से भारतीय 80 और 90 के दशक तक
पिछले दो साल में भारत में AI से तस्वीरें बनाना इंटरनेट पर बड़ा ट्रेंड बन गया है. पहले घिबली जैसी तस्वीरें बनाने का ट्रेंड आया, फिर एक्शन फिगर और ऐसी सेल्फी बनाने का दौर चला, जो बिल्कुल असली लगती हैं. इसके बाद गूगल के जेमिनी से तस्वीरें बनाने का ट्रेंड तेजी से बढ़ा, खासकर नैनो बनाना मॉडल के लोकप्रिय होने के बाद.
गूगल के मुताबिक दुनियाभर में इस फीचर की मदद से अब तक 50 करोड़ से ज्यादा तस्वीरें बनाई जा चुकी हैं. भारत भी इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाले देशों में शामिल है. गूगल ने बताया कि भारत में लोग खास तौर पर 1990 के दशक के बॉलीवुड से जुड़ी रेट्रो तस्वीरें और पोर्ट्रेट बनाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
इस ट्रेंड की सबसे बड़ी खासियत यही है कि पुरानी यादों जैसी तस्वीर बनाना अब बहुत आसान हो गया है. आज किसी तस्वीर को AI में डालते ही उसे पुराने समय के परिवार के एलबम जैसी तस्वीर में बदला जा सकता है. बड़े बाल, चौड़े कॉलर, भारी गहने, एविएटर चश्मे, एंबेसडर कारें, फीके रंग, पुरानी फिल्मों जैसी तस्वीर और पुराने स्टूडियो जैसी हल्की रोशनी इसमें दिखाई जा सकती है.
इसके लिए न तो फोटोशॉप की जरूरत है और न ही डिजाइन का कोई खास ज्ञान. AI खुद आपकी तस्वीर को पुराने जमाने की तस्वीर जैसा बना देता है.
भारत में इस तरह की पुरानी यादों को लोग खास तौर पर पसंद कर रहे हैं. 1980 और 1990 का दशक यहां लोगों के लिए खास यादों वाला दौर रहा है. उस समय दूरदर्शन, ऑडियो और वीडियो कैसेट, मारुति कारें, हिंदी फिल्में, केबल टीवी और क्रिकेट के सितारे लोगों की जिंदगी का हिस्सा थे.
इसी दौर में देश की अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव आए और लोगों का खरीदारी करने का तरीका भी बदला. आज का मध्य वर्ग भी इसी दौर से निकला. AI इन सभी पुरानी यादों और चीजों को एक ही तस्वीर में समेट सकता है.
यही वजह है कि यह ट्रेंड फिल्मी सितारों और दूसरी जानी-मानी हस्तियों के बीच भी तेजी से फैल रहा. कियारा आडवाणी और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने साथ में एक रेट्रो तस्वीर शेयर की. सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल भी पुरानी यादों वाले इस ट्रेंड में शामिल हुए.
भारत के पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान ने AI से बनाई गई तस्वीरें पोस्ट कीं. कवि कुमार विश्वास ने भी ऐसी तस्वीर शेयर की. राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भी पत्नी परिणीति चोपड़ा के साथ एक AI रेट्रो तस्वीर साझा की.
राजनेता भी इस ट्रेंड से दूर नहीं रहे. पीयूष गोयल, किरेन रिजिजू, चिराग पासवान, हिमंत बिस्वा सरमा, शिवराज सिंह चौहान और अनुराग ठाकुर ने भी अलग-अलग तरह से 1980 के दशक की तस्वीरों वाले इस ट्रेंड में हिस्सा लिया.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे एक अलग अंदाज में लिया. उन्होंने AI से अपनी उस दौर की तस्वीर बनवाने के बजाय 1980 के दशक में खींची गई अपनी असली तस्वीरें पोस्ट कीं. रेणुका चौधरी ने भी उसी दशक की एक मैगजीन कवर वाली असल तस्वीर शेयर की.
AI से बनाई गई फोटो और पुरानी फोटो में फर्क समझना बहुत जरूरी है. एक तरफ कुछ लोग AI की मदद से पुरानी यादों जैसी तस्वीरें बना रहे हैं. दूसरी तरफ कुछ लोग याद दिला रहे हैं कि ऐसी यादें पहले से ही पुराने एलबम, मैगजीन और नेगेटिव में मौजूद हैं. AI से बनी फोटो असली इसलिए लगती है क्योंकि वो उन पुरानी तस्वीरों जैसा ही लुक अपनाती है जो कभी सच में खींची गई थीं.
पुरानी यादों का राजनीतिक हथियार बनना
यह ट्रेंड जल्द ही BJP और कांग्रेस की मीम वाली लड़ाई तक पहुंच गया. शुरुआत में नेता AI की मदद से खुद को पुराने दौर का दिखा रहे थे, लेकिन बाद में दोनों पार्टियां एक-दूसरे के अतीत का मजाक उड़ाने और उसे अलग तरीके से दिखाने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करने लगीं.
कांग्रेस की केरल यूनिट ने 1980 के दशक के गुजरात की सड़क का सीन दिखाते हुए एक AI से बनी तस्वीर पोस्ट की. इसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जैसे दिखने वाले एक व्यक्ति को मारुति ओमनी में बैठे दिखाया गया था. 1980 के दशक में भारत में ओमनी काफी आम थी और फिल्मों में इसे अक्सर 'किडनैपिंग वैन' के तौर पर दिखाया जाता था.
इसी वजह से फिल्मों में ओमनी को अपराध से भी जोड़कर देखा जाने लगा. कांग्रेस ने एक और बदली हुई तस्वीर शेयर की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रेलवे स्टेशन पर एक यात्री का बटुआ लेते हुए दिखाया गया.
BJP ने भी जवाब में अपनी AI तस्वीरें शेयर कीं. गुजरात, केरल और तेलंगाना यूनिट ने 1980 के दशक की थीम वाली कई तस्वीरें पोस्ट कीं. इन तस्वीरों में कांग्रेस और खास तौर पर सोनिया गांधी को निशाना बनाया गया था. कुछ तस्वीरों में आपत्तिजनक इशारे भी किए गए थे. इनमें सोनिया गांधी जैसी दिखने वाली महिलाओं को पुरुष नेताओं के साथ बार में दिखाया गया था.
एक तस्वीर पर 'लुसियाना, इटली' लिखा था, जो शायद सोनिया गांधी के जन्मस्थान की ओर इशारा था. बाद में इनमें से कुछ पोस्ट हटा दी गईं. इसके बाद कांग्रेस ने कानूनी कार्रवाई करने की बात कही और अखिल भारतीय महिला कांग्रेस ने गुजरात BJP के एक्स अकाउंट के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई.
BJP ने कांग्रेस की गुजरात और ओमनी वाली तस्वीरों का जवाब देते हुए 1984 के सिख विरोधी दंगों और इंदिरा गांधी के दौर में कांग्रेस के रिकॉर्ड की याद दिलाई. युवा मोदी की AI तस्वीर बनाने के बजाय BJP ने 1980 के दशक की उनकी असली तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया. यह एक दिलचस्प जवाब था, जिससे ये संदेश दिया गया कि हमारे (BJP) इतिहास को दिखाने के लिए AI की जरूरत नहीं है.
अब यह मामला सोशल मीडिया के किसी आम ट्रेंड तक सीमित नहीं रह जाता. AI की तस्वीर देखने में किसी असली फोटो या डॉक्यूमेंट्री की तस्वीर जैसी लगती है लेकिन जरूरी नहीं कि उसमें दिखाई गई बात सच हो. वह सबूत जैसी दिख सकती है जबकि असल में वो AI से बनाई गई होती है.
भारतीय राजनीति में इसका असर काफी बड़ा हो सकता है. जब हम कोई तस्वीर देखते हैं, तो आम तौर पर मान लेते हैं कि उसमें जो दिख रहा है, वह सच में हुआ होगा. AI इस भरोसे को खत्म कर सकता है. किसी नेता की ऐसी तस्वीर बनाई जा सकती है, जिसमें वह किसी खास जगह पर, किसी खास व्यक्ति के साथ या कोई खास काम करते हुए दिखे. इससे पहले कि कोई इन तस्वीरों की सच्चाई जान सके, ये तस्वीरें हजारों बार शेयर हो सकती हैं.
पुरानी तस्वीरों जैसा रेट्रो लुक इस समस्या को और बढ़ा देता है. तस्वीर में रंग थोड़े फीके हों और फोकस थोड़ा धुंधला हो तो हमें अक्सर लगता है कि ये किसी पुराने समय की असली तस्वीर है. AI अब इन चीजों को भी तस्वीर में जानबूझकर जोड़ सकता है. यानी पुरानी तस्वीर को असली दिखाने वाली चीजें भी अब AI से बनाई जा सकती हैं.
राजनीतिक दलों को भी समझ आ गया है कि यह सब करना ज्यादा मुश्किल नहीं है और इसमें ज्यादा खर्च भी नहीं होता. सिर्फ एक तस्वीर, एक प्रॉम्प्ट और सोशल मीडिया अकाउंट की मदद से पूरा सीन बनाया जा सकता है. इससे राजनीति में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का एक नया तरीका सामने आया है: इतिहास मीम बन जाता है, मीम किसी पर हमला करने वाला विज्ञापन बन जाता है और वह विज्ञापन ऐसी तस्वीर में बदल जाता है, जो देखने में बिल्कुल असली लगती है.
पर्यावरण की कीमत पर
इसमें एक दिलचस्प बात है. तस्वीरें दिखने में ऐसी लगती हैं, जैसे वे पुराने जमाने में खींची गई हों लेकिन ऐसी तस्वीरें बनाने के पीछे डेटा सेंटर, चिप, बिजली और मशीनों का तापमान कम रखने जैसी कई चीजों की जरूरत होती है.
AI का पर्यावरण पर कितना असर हो रहा है, इसका सही अंदाजा लगाना मुश्किल है क्योंकि कंपनियां आम तौर पर यह नहीं बतातीं कि एक तस्वीर बनाने में कितना बिजली, पानी और कार्बन खर्च होता है. 2025 में हुई एक रिसर्च में सामने आया कि अलग-अलग AI से तस्वीर बनाने में बिजली की खपत काफी अलग होती है. कुछ AI मॉडल एक तस्वीर बनाने में दूसरे मॉडल से 46 गुना ज्यादा तक बिजली लेते हैं. इसलिए AI से बनी एक तस्वीर पर्यावरण पर कितना असर डालती है, इसका एक तय आंकड़ा बताना मुश्किल है.
हालांकि AI के पर्यावरण पर असर को लेकर कुछ आंकड़े सामने आए हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में की गई जांच के तहत 2025 में AI सिस्टम से 3.26 करोड़ से 7.97 करोड़ टन तक कार्बन निकलने का अनुमान आया है.
इसके साथ ही 31,250 करोड़ से 76,460 करोड़ लीटर तक पानी की खपत भी हो सकती है. इन आंकड़ों को लेकर पूरी पक्की जानकारी नहीं है, क्योंकि कंपनियां AI के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बारे में अब भी बहुत कम जानकारी देती हैं.
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की एक रिसर्च में एक और चिंता की बात सामने आई. पर्यावरण पर AI का बढ़ता असर सिर्फ AI मॉडल को बनाने और उसे ट्रेनिंग देने से ही नहीं हो रहा, बल्कि मॉडल के इस्तेमाल से भी हो रहा है. AI में होने वाली कुल बिजली खपत का करीब 80-90 फीसदी हिस्सा इसके हर दिन होने वाले इस्तेमाल में जा सकता है. ऐसे में सिर्फ एक व्यक्ति का रेट्रो तस्वीर बनाना जलवायु संकट के लिए बड़ी वजह नहीं है. असली चिंता तब होती है, जब बहुत बड़ी संख्या में लोग AI का इस्तेमाल करने लगते हैं.
भारत के लिए इस पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यहां डेटा सेंटरों में पानी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) जैसे थिंक टैंक के आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में देश के डेटा सेंटर हर साल करीब 15,000 करोड़ लीटर पानी का इस्तेमाल कर रहें, जो 2030 तक बढ़कर करीब 35,800 करोड़ लीटर हो सकता है.
इस तरह रेट्रो-AI का ये ट्रेंड AI के दौर की एक अजीब लेकिन सच्ची तस्वीर दिखाता है. यह देखने में दिलचस्प है और इसे इस्तेमाल करना भी बहुत आसान है. भारतीय संस्कृति से जुड़ी तस्वीरों में इससे कई तरह के नए प्रयोग किए जा सकते हैं. आज भारतीय युवा कुछ ही सेकंड में वह काम कर सकता है, जिसके लिए पहले किसी प्रोफेशनल फोटो एडिटर की जरूरत पड़ती थी.
लेकिन ताजा ट्रेंड यह भी दिखाता है कि नए तरह के काम के लिए बनाई गई तकनीक कितनी आसानी से राजनीति में इस्तेमाल हो सकती है. राजनीति में किसी की मंजूरी के बिना उसकी तस्वीर बनाना, लोगों को गुमराह करना, महिलाओं को गलत तरीके से दिखाना, इतिहास को बदलकर पेश करना और किसी की छवि खराब करना बड़ी समस्या बन सकते हैं.
शायद इस पूरे ट्रेंड की सबसे खास बात यही है कि भारतीय AI का इस्तेमाल सिर्फ भविष्य की कल्पना करने के लिए नहीं कर रहे हैं. वे इससे अतीत की तस्वीरें भी बना रहे हैं. पुराने एलबम में जो यादें होती हैं, वे सच में बीते समय की होती हैं लेकिन AI से बनाई गई तस्वीरें ऐसे अतीत को दिखाती हैं, जो कभी हुआ ही नहीं.