दुनिया के केंद्रीय बैंकों के साथ RBI ने भी क्यों थाम दी ब्याज दरों की रफ्तार?

RBI ने रेपो रेट 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा है. यह लगातार चौथी बार है जब उसने ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया है और यह फैसला अमेरिकी फेडरल रिजर्व के इसी तरह के फैसले के महज एक हफ्ते बाद आया है

Economists warn that the BJP-led NDA government might increase welfare spending to regain support, potentially driving inflation above the RBI's target.
RBI के मुताबिक महंगाई पूरे साल बने रह सकती है

मुंबई भी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ 'वैश्विक ठहराव' बनाए रखने की होड़ में शामिल है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा है और इस फैसले के पक्ष में सभी छह सदस्यों ने मतदान किया. 

यह लगातार चौथी बार है जब ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया गया है और यह फैसला अमेरिकी फेडरल रिजर्व के इसी तरह के फैसले के महज एक हफ्ते बाद आया है.

बाजार को ठीक यही उम्मीद थी इसलिए असल दिलचस्पी फैसले के बजाय अनुमान में है. RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान 6.6 फीसदी से बढ़ाकर 6.7 फीसदी कर दिया है और महंगाई का अनुमान 5.1 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया है. वि

परीत दिशाओं में किए गए 10-10 बेसिस पॉइंट के ये दो बदलाव सांख्यिकीय तौर पर बहुत मामूली हैं. घरेलू आंकड़ों में ऐसा कुछ नहीं बदला है जो बहुत मायने रखता हो.

इसके बजाय आंकड़ों के स्तर पर नजर डालिए. RBI का अनुमान है कि महंगाई 5 फीसदी रहेगी जो उसके लक्ष्य से पूरे एक प्रतिशत अधिक है जबकि नीतिगत दर 5.25 फीसदी पर ही है. इसका मतलब है कि आगे के अनुमान के आधार पर वास्तविक ब्याज दर करीब एक चौथाई प्रतिशत रह जाती है.

इन दोनों आंकड़ों को साथ रखिए और इस मौद्रिक नीति की सहज लगने वाली तस्वीर बदल जाती है. एक ऐसा केंद्रीय बैंक जो पूरे साल महंगाई के अपने लक्ष्य से ऊपर रहने की उम्मीद कर रहा है और वास्तविक ब्याज दर 25 बेसिस पॉइंट पर चला रहा है, उसके पास कोई बड़ा सुरक्षा कवच नहीं है. 

असल में RBI की नीति अब भी नरम है और यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया है. इससे पता चलता है कि समिति का मानना क्या है. उसका मानना है कि आगे महंगाई में होने वाली बढ़ोतरी मांग की वजह से नहीं, बल्कि गणितीय वजहों से होगी.

दिसंबर, 2025 तक चालू वित्त वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 2 फीसदी यानी काफी नीचे था

यह तर्क सही भी है. दिसंबर 2025 तक RBI चालू वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 2 फीसदी लगा रहा था. यह असाधारण रूप से कम आंकड़ा था जो खाद्य कीमतों में भारी गिरावट और यह GST में किए गए बदलावों और उनके उपभोक्ता कीमतों पर पड़े असर की वजह से आया था. 

दोनों ही एक बार होने वाली घटनाएं थीं. जैसे-जैसे इनका असर आधार से बाहर होगा, हेडलाइन महंगाई अपने आप बढ़ेगी, बिना किसी नए मूल्य दबाव के. 2 फीसदी से 5 फीसदी तक की इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा गणितीय है और ऐसे में इसे नजरअंदाज करना मौद्रिक नीति की किताबों के मुताबिक सही प्रतिक्रिया है.

दिक्कत यह है कि इससे बचाव के लिए क्या रह जाता है. अगर पहले से ही यांत्रिक कारणों से बढ़ रही महंगाई के बीच कोई वास्तविक झटका आ गया- चाहे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल हो, मानसून की नाकामी हो या रुपए में गिरावट- तो उसका असर ऐसी नीतिगत दर पर पड़ेगा, जिसके नीचे वास्तविक सुरक्षा कवच लगभग नहीं है. 

तब RBI को 5.25 फीसदी से ब्याज दर बढ़ानी होगी जबकि अर्थव्यवस्था करीब 7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही होगी और सिर्फ आठ महीने पहले उसने 2 फीसदी महंगाई के दौर में दरों में कटौती की थी. किसी भी RBI गवर्नर के लिए इस सिलसिले को समझाना आसान नहीं होगा.

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस स्थिति को पर्याप्त स्पष्टता के साथ स्वीकार किया. MPC कार्रवाई करने से पहले महंगाई के अनुमान को लेकर अधिक स्पष्टता चाहती थी. इसे ऐसे समझिए कि समिति के सदस्य जानते हैं कि उनके अनुमान का भार इस समय काफी ज्यादा है.

रेपो रेट फिलहाल स्थिर है. लेकिन बाकी नीतिगत औजारों का इस्तेमाल जारी है और यहीं पाठकों को ध्यान देना चाहिए. मल्होत्रा ने पुष्टि की है कि सितंबर की समयसीमा खत्म होने से पहले FCNR(B) जमा से जुड़े उपायों को बंद करने का कोई प्रस्ताव नहीं है. FCNR(B) प्रवासी भारतीयों के लिए भारतीय बैंकों में विदेशी मुद्रा में रखा जाने वाला जमा खाता है.

इस साल देश में हो रही असमान बारिश महंगाई को और बढ़ा सकती है

इन उपायों का मकसद डॉलर को भारत में लाना और रुपए पर दबाव कम करना है. ब्याज दरों को स्थिर रखते हुए इस सुविधा को जारी रखना बताता है कि केंद्रीय बैंक बाहरी दबाव से निपटने को ब्याज दर का नहीं बल्कि बैलेंस शीट का मामला मान रहा है.

इसके साथ ही कर्ज की ब्याज दरों से जुड़े नियमों को एक जैसा करने की पहल की गई है. गवर्नर ने इसे बदलाव के बजाय नियमों को सरल और व्यवस्थित करने की प्रक्रिया बताया. नाम चाहे जो हो, यह मौद्रिक नीति का असर कर्ज लेने वालों तक पहुंचाने की नीति है. 

100 बेसिस पॉइंट से ज्यादा की दरों में कटौती पहले ही हो चुकी है और अब ब्याज दर के औजार को रोक दिया गया है. ऐसे में इन कटौतियों का फायदा कर्ज लेने वालों तक पहुंचाना ही उपलब्ध एकमात्र प्रोत्साहन है.

अब भारतीय मौद्रिक नीति की यही तस्वीर है. रेपो रेट स्थिर है, जबकि नकदी, विदेशी मुद्रा से जुड़े औजार और नियमन समायोजन का काम कर रहे हैं. जो व्यक्ति सिर्फ ब्याज दर के फैसले को पढ़ता है, उसने मौद्रिक नीति का करीब एक-तिहाई हिस्सा ही पढ़ा है.

प्रमुख केंद्रीय बैंकों की स्थिति को देखिए तो तस्वीर काफी अलग है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व अभी भी ऐसी महंगाई से जूझ रहा है जो पूरी तरह कम नहीं हो रही. यूरोपीय केंद्रीय बैंक ऐसी वृद्धि से जूझ रहा है जो ठीक से पटरी पर नहीं लौट रही. 

बैंक ऑफ इंग्लैंड ऊर्जा संकट के असर को मजदूरी और कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का कारण बनने से रोकने की कोशिश कर रहा है. बैंक ऑफ जापान तीन दशक तक अपस्फीति (सामान सस्ता होना) से लड़ने के बाद अब एक पीढ़ी के सबसे ऊंचे स्तर पर ब्याज दरें रखे हुए है और इस बात पर बहस कर रहा है कि उन्हें और बढ़ाया जाए या नहीं. 

अमेरिका जापान के डॉलर भंडार खरीदकर उसकी मदद कर रहा है जिससे येन में कुछ स्थिरता बनी हुई है और वहां के केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें और न बढ़ाने का मौका मिल रहा है. भारत इन सभी से तेज गति से बढ़ रहा है.

पांच केंद्रीय बैंकों की पांच अलग-अलग चिंताएं लेकिन एक साझा सीमा है. महंगाई को प्रभावित करने वाला सबसे अहम कारण अब घरेलू अर्थव्यवस्था के बाहर है और ब्याज दरें वहां तक नहीं पहुंच सकतीं.

होर्मूज स्ट्रेट खुलने पर जारी अनिश्चितता ने दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों की नीतियों को प्रभावित किया है

मल्होत्रा ने वैश्विक स्थिति के बारे में यही बात कही. उन्होंने कहा कि वृद्धि धीमी हो रही है, महंगाई पूरे साल ऊंची रहने की संभावना है और केंद्रीय बैंकों के रुख अलग-अलग हो गए हैं. कुछ ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं, जबकि दूसरे इंतजार कर रहे हैं. जब दूसरे केंद्रीय बैंकों के फैसले दिशा बताने के बजाय अनिश्चितता पैदा करने लगें, तो केंद्रीय बैंकों के बीच तालमेल कमजोर पड़ जाता है. 2008 के बाद की मौद्रिक नीति की रणनीति में ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई थी.

ब्याज दरें बढ़ाने से किसी नाकेबंदी वाले समुद्री मार्ग से कच्चा तेल बाहर नहीं निकलेगा, कोई शिपिंग लेन फिर से नहीं खुलेगी और बारिश भी नहीं होगी. लेकिन वे अब भी यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि कीमतों का झटका महंगाई के चक्र में न बदल जाए. 

अब मौद्रिक नीति का बड़ा काम यही है और यह काम ब्याज दरों की कीमत से ज्यादा केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता पर निर्भर करता है.

एक केंद्रीय बैंक का ब्याज दर स्थिर रखना घरेलू मामला है. लेकिन पांच केंद्रीय बैंकों का एक साथ दरें स्थिर रखना वैश्विक स्थिति है और इसके असर कर्ज लेने की लागत से कहीं आगे तक जाते हैं.

सबसे पहले उस झटके को देखिए, जिस पर सभी की नजर है. जब मार्च में ईरानी बलों ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने का ऐलान किया तो समुद्र के रास्ते होने वाले कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों के वैश्विक व्यापार का करीब 27 फीसदी हिस्सा अपने रास्ते से कट गया. उस महीने वैश्विक आपूर्ति में रोजाना 1.01 करोड़ बैरल की कमी आई. 

चार हफ्तों में ब्रेंट की कीमत करीब 65 फीसदी यानी लगभग 46 डॉलर प्रति बैरल बढ़ गई. यह अब तक दर्ज एक महीने की सबसे तेज बढ़ोतरी थी और विश्व बैंक का अनुमान है कि जून तिमाही में उत्पादन में गिरावट कोविड महामारी के बाद सबसे तेज रही होगी. तेल बाजार के इतिहास में इस स्तर की घटना पहले कभी नहीं हुई.

नीति निर्माताओं के लिए इसे इतना मुश्किल बनाने वाली बात झटके का आकार नहीं, बल्कि इसका अब तक खत्म न होना है. अप्रैल में युद्धविराम हुआ, जून में एक समझौता हुआ, जुलाई में फिर लड़ाई शुरू हुई और होर्मूज एक बार फिर खाली हो गया. 

अब ईरान और ओमान के बीच यातायात के प्रबंधन को लेकर एक समझ बन रही है, जिसे कथित तौर पर अंतिम रूप दिया जा रहा है. इसी दौरान वॉशिंगटन कभी बातचीत की बात कर रहा है तो कभी सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहा है. 

जिस सुबह RBI ने अपनी मौद्रिक नीति का ऐलान किया, उस दिन ब्रेंट 79.45 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ और अमेरिकी कॉन्ट्रैक्ट 75.22 डॉलर पर आ गया. यह ऐसा बाजार है जिसने अब नतीजे का अनुमान लगाना छोड़ दिया है और बहस के हिसाब से कीमत तय करना शुरू कर दिया है.

अमेरिका का फेडरल रिजर्व भी दबाव में है लेकिन भारत जैसे देशों के मुकाबले उसके पास ज्यादा विकल्प हैं

मौद्रिक नीति के लिए दो संभावनाओं वाली ऐसी स्थिति मुश्किल होती है, जिसका अनुमान लगाकर भी उससे बचा नहीं जा सकता. कोई समिति कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर की बढ़ोतरी का मॉडल बना सकती है. लेकिन वह ऐसे जलमार्ग का मॉडल नहीं बना सकती, जो बातचीत करने वालों की तय समयसीमा के आधार पर या तो खुला हो या बंद. 

जब संभावनाओं का वितरण दो अलग-अलग हिस्सों में बंटा हो और उनके बीच कुछ न हो, तब इंतजार करना ही तार्किक विकल्प होता है और पांच केंद्रीय बैंकों ने यही किया.

इसका सबसे तत्काल असर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर पड़ता है. जब सभी प्रमुख नीतिगत दरें स्थिर हो जाती हैं तो ब्याज दरों का अंतर भी स्थिर हो जाता है और मुद्रा तथा पूंजी के आवंटन को चलाने वाला सामान्य कारक शांत पड़ जाता है. 

इस दौरान पैसा चलना बंद नहीं करता. वह बस किसी दूसरी चीज पर प्रतिक्रिया देने लगता है, इस मामले में पश्चिम एशिया से आने वाली खबरों पर.

उभरते बाजारों के लिए यह मौद्रिक नीतियों में अंतर से भी खराब स्थिति है. नीतिगत अंतर कम से कम एक दिशा में बढ़ता है और उसके हिसाब से तैयारी की जा सकती है. लेकिन खबरों से संचालित पूंजी का प्रवाह एक सेशन में आ सकता है और उसी में उलट भी सकता है. 

उसका घरेलू आर्थिक बुनियाद से कोई लेना-देना नहीं होता और वह एक साथ मुद्रा और बॉन्ड बाजार पर असर डालता है. भारत अपनी राजकोषीय मजबूती की प्रक्रिया कितनी भी अच्छी तरह पूरी करे, फिर भी ओमान से आए किसी बयान के कारण रुपए में उतार-चढ़ाव देख सकता है.

यहां एक और असमानता महत्वपूर्ण है. तेल का झटका सभी पर समान असर नहीं डालता. यह आय को तेल आयातकों से निर्यातकों की ओर स्थानांतरित करता है. अमेरिका, जो अब कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के मामले में लगभग आत्मनिर्भर है, इसे भारत, जापान या यूरोजोन की तुलना में कहीं आसानी से झेल सकता है. 

इससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व के पास ब्याज दरें स्थिर रखने की ज्यादा गुंजाइश होती है जो डॉलर को मजबूती देती है और इसका मतलब है कि आयातकों को मजबूत मुद्रा में तेल के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ता है. एक ही घटना का असर वॉशिंगटन में एक दबाव के रूप में और मुंबई व टोक्यो में दोहरे दबाव के रूप में सामने आता है.

मैक्रो आर्थिक आंकड़ों को समझना अब और मुश्किल होगा. तेल आयात करने वाले देशों में महंगाई बढ़ने की एक बड़ी वजह ऊर्जा की कीमतें होंगी, जिनका घरेलू मांग से कोई सीधा संबंध नहीं होगा. वहीं कुछ समय बाद माल ढुलाई और इनपुट लागत के जरिए इसका असर मुख्य महंगाई पर भी पड़ने लगेगा. 

अमेरिका-ईरान युद्ध पूरी तरह रुक भी जाता है तो इससे महंगाई जल्दी घटने की उम्मीद नहीं है (फोटो : AI)

चालू खाते के संतुलन पर सिर्फ व्यापार शर्तों का असर पड़ेगा. दिल्ली में प्रचलित यह अनुमान कि कच्चे तेल की कीमत में लगातार 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के चालू खाते पर GDP के करीब एक-तिहाई प्रतिशत का असर पड़ता है, आने वाले समय में चर्चा में बहुत काम आएगा.

दो कारण ऐसे हैं जो किसी भी युद्धविराम की खबर के बावजूद कीमतों को ऊंचा बनाए रखेंगे. पहला है बीमा. युद्ध के जोखिम का प्रीमियम, समुद्र में बारूदी सुरंगों का खतरा और पारदर्शी आवाजाही के खत्म होने का मतलब है कि किसी बैरल की वास्तविक लागत स्क्रीन पर दिखाई देने वाली कीमत से काफी ज्यादा है. इसलिए ब्रेंट उस वास्तविक कीमत को कम करके दिखाता है, जो आयातकों को चुकानी पड़ती है. 

दूसरा कारण है भंडार की फिर से भरपाई. हर तेल आयात करने वाला देश वसंत के दौरान इस्तेमाल किए गए भंडार को फिर से भर रहा है. इससे मांग को एक आधार मिलता है, जो शांति समझौते के बाद भी बना रहेगा. तनाव कम होने से मिलने वाला लाभ बाजार की मौजूदा उम्मीदों की तुलना में छोटा और धीमा होगा.

होर्मुज ही एकमात्र कमजोर कड़ी नहीं है. ब्लैक सी के बंदरगाहों पर हमले और कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम में बार-बार होने वाले व्यवधानों ने वैकल्पिक रास्तों को भी एक साथ प्रभावित किया है. भारत के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले चार वर्षों में रियायती दरों पर मिलने वाला कच्चा तेल उसके लिए एक तरह का शांत सुरक्षा कवच रहा है.

इसके बाद स्थिरता का सवाल आता है और यहां तस्वीर सहज नहीं है. केंद्रीय बैंकों का एक साथ ब्याज दरें स्थिर रखना एक तरह का समन्वय है. कोई भी विकास दर बढ़ाने के लिए ब्याज दरें कम नहीं कर रहा और कोई भी मुद्रा को बचाने के लिए दरें बढ़ा नहीं रहा. इसलिए कोई भी विनिमय दर के जरिए अस्थिरता दूसरे देशों तक नहीं पहुंचा रहा. मुद्रा युद्ध के लिए जरूरी है कि कोई पहला कदम उठाए.

लेकिन यह समन्वय किसी सोची-समझी रणनीति का नतीजा नहीं, बल्कि मजबूरी में पैदा हुआ ठहराव है और इससे व्यवस्था कमजोर हो जाती है. किसी भी केंद्रीय बैंक के पास अतिरिक्त सुरक्षा कवच नहीं है. अगर होर्मुज हमेशा के लिए बंद हो जाता है तो सभी को एक साथ और तुरंत ऐसे आपूर्ति संकट से निपटना होगा, जिसे ब्याज दरों में बदलाव से दूर नहीं किया जा सकता.

अगर होर्मूज फिर खुल जाता है तो जोखिम उलट जाएगा और ब्याज दरें घटाने की अव्यवस्थित होड़ शुरू हो सकती है जिसमें हर केंद्रीय बैंक यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा कि वह सबसे आखिर में न रहे.

इस बीच, आगे की मौद्रिक नीति के बारे में संकेत देना भी लगभग असंभव हो गया है. कोई भी केंद्रीय बैंक भरोसे के साथ भविष्य की दिशा नहीं बता सकता, जब किसी अहम फैसले का आधार ऐसी बातचीत पर निर्भर हो, जिसमें वह खुद शामिल नहीं है. 

यही वजह है कि हर जगह इस्तेमाल होने वाली भाषा अब स्पष्टता, लचीलेपन और विकल्प खुले रखने की ओर बढ़ गई है. यह टालमटोल नहीं है. यह ईमानदार स्वीकारोक्ति है कि ब्याज दरों का अंतिम स्तर कहीं ओमान के तट से दूर तय हो रहा है.

घरेलू स्तर पर भारत अब भी मजबूत स्थिति में है और RBI का अपना अनुमान भी यही बताता है. उसके मुताबिक पहली तिमाही में विकास दर 7 फीसदी रहेगी, जो साल के मध्य में घटकर 6.4 फीसदी और 6.5 फीसदी हो जाएगी और चौथी तिमाही तक फिर बढ़कर 6.8 फीसदी हो जाएगी. 

सरकार का पूंजीगत खर्च अभी भी अर्थव्यवस्था का भरोसेमंद इंजन बना हुआ है

जोखिम दोनों तरफ बराबर हैं. खपत बनी हुई है. सरकार का पूंजीगत खर्च अब भी अर्थव्यवस्था का भरोसेमंद इंजन है. स्वस्थ कर्ज वृद्धि और क्षमता के ऊंचे इस्तेमाल के आधार पर निजी निवेश भी बढ़ रहा है.

बैंक और कंपनियों की बैलेंस शीट एक दशक पहले की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति में हैं. मल्होत्रा ने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया के संघर्ष से पैदा होने वाला आपूर्ति पक्ष का दबाव कम हुआ है.

ध्यान दीजिए कि यह आश्वासन कितनी सावधानी से दिया गया है. दबाव कम हुआ है, खत्म नहीं हुआ. गवर्नर ने इस बात के साथ यह चेतावनी भी दी कि भू-राजनीतिक खबरों के आधार पर तेल की कीमतों में दोनों दिशाओं में तेज उतार-चढ़ाव हो रहा है, जिससे निकट अवधि की तस्वीर धुंधली हो रही है. 

यह एक ऐसे केंद्रीय बैंक की स्थिति है, जो ऐसे युद्धविराम को लेकर आश्वस्त नहीं है. भारत अब भी अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. इसलिए पश्चिम एशिया में होने वाला हर तनाव अब भारतीय मौद्रिक नीति को प्रभावित करने वाला अहम कारक बन गया है.

फिर भी चार चीजें गलत हो सकती हैं. पहली है अल नीनो और खास तौर पर बारिश की मात्रा से ज्यादा उसका वितरण. RBI ने मानसून के समय और उसके फैलाव, दोनों को लेकर चिंता जताई है. 

तकनीकी रूप से बारिश को लेकर यह सही चिंता है क्योंकि गलत समय पर गलत जिलों में होने वाली बारिश फसल उत्पादन को उतना ही नुकसान पहुंचा सकती है, जितना बारिश का न होना. पर्याप्त खाद्यान्न भंडार और सक्रिय आपूर्ति प्रबंधन इसके बचाव के उपाय हैं और दोनों ने इस चक्र के दौरान अच्छा काम किया है.

दूसरा है महंगाई का दूसरे दौर का असर. समिति का अपना आकलन है कि फिलहाल व्यापक दबाव सीमित हैं लेकिन खाद्य, ईंधन और इनपुट की लागत के व्यापक महंगाई में बदलने का जोखिम बना हुआ है. 

एक बार होने वाली कीमत वृद्धि को नजरअंदाज किया जा सकता है. लेकिन उसे माल ढुलाई की दरों, सेवा शुल्क, वेतन समझौतों और परिवारों की महंगाई संबंधी उम्मीदों में बदलने से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. झटके और महंगाई के चक्र के बीच की रेखा ठीक यहीं खिंचती है.

तीसरा है वास्तविक ब्याज दर का कम होना. नीतिगत दर अनुमानित महंगाई से बमुश्किल एक चौथाई अंक ऊपर है. इस चक्र में पहली बार अगला कदम दोनों दिशाओं में हो सकता है और यह स्पष्ट नहीं है कि बाजार ने इसके लिए खुद को तैयार किया है या नहीं.

चौथा है जिम्मेदारियों का बंटवारा. अगर महंगाई के अनुमान पर आपूर्ति पक्ष के झटकों का दबदबा रहता है तो प्रभावी औजार ब्याज दरें नहीं हैं. वे हैं बफर स्टॉक, ईंधन पर कर, शुल्क नीति और रणनीतिक भंडार. 

मौद्रिक नीति महंगाई की उम्मीदों को स्थिर कर सकती है. लेकिन वह बाकी उपायों की जगह नहीं ले सकती. इसका मतलब है कि खाद्य और ऊर्जा को लेकर सरकार का मैनेजमेंट भी मौद्रिक नीति का एक कारक है भले ही वित्त मंत्रालय में कोई इसे इस तरह बताना पसंद करे या नहीं.

इसीलिए अगस्त की बैठक सिर्फ ब्याज दर को स्थिर रखने की सामान्य कवायद नहीं है. यह बताती है कि वैश्वीकरण के बाद केंद्रीय बैंकों के सामने हालात कितने बदल गए हैं. अब उनके सामने सबसे बड़े जोखिम देश की सीमाओं के बाहर से आ रहे हैं. ऐसे में उनकी सबसे बड़ी ताकत अपनी विश्वसनीयता है, जबकि ब्याज दरें उनकी मौद्रिक नीति का सबसे अहम हिस्सा नहीं रह गई हैं.

RBI ने इसलिए ब्याज दरें स्थिर नहीं रखीं कि वह आंकड़ों का इंतजार कर रहा है. उसने इसलिए दरें स्थिर रखीं क्योंकि निर्णायक कारक उसके आंकड़ों में नहीं है. वह एक समुद्री मार्ग में है और अभी किसी को नहीं पता कि वह किस दिशा में खुलेगा.

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