राहुल गांधी ने कांग्रेस में किसे आगे बढ़ाया, किसे आजमाया और किसे रीसेट किया?

कांग्रेस के छह राज्यों में फेरबदल से राहुल गांधी की संगठनात्मक रणनीति के संकेत मिलते हैं. सचिन पायलट को पंजाब में परीक्षा, रणदीप सिंह सुरजेवाला को गुजरात में बड़ा दांव और भूपेश बघेल को असम में संगठन के रीसेट की जिम्मेदारी मिली है

सचिन पायलट और रणदीप सिंह सुरजेवाला के साथ राहुल गांधी (फाइल फोटो)

कांग्रेस में 5 सितंबर को हुए संगठनात्मक फेरबदल में सिर्फ छह राज्यों को शामिल किया गया है लेकिन प्रभारियों के चयन से पार्टी के अंदर नेताओं की प्राथमिकता का काफी कुछ पता चलता है. 

छह राज्यों के प्रभारियों में बदलाव के पीछे हाईकमान का अपने नेताओं को लेकर एक आकलन भी दिखाई देता है. कौन भरोसेमंद है, किसे आजमाना है, किसे एक और मौका दिया गया है और किसे दूसरे स्तर से उठाकर राष्ट्रीय संगठन में बड़ी भूमिका दी जा रही है.

सबसे अहम नियुक्ति सचिन पायलट की छत्तीसगढ़ से पंजाब में जिम्मेदारी मिलने की है. यह उनके लिए पदोन्नति भी है और परीक्षा भी. पंजाब में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं. मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 16 मार्च 2027 को खत्म हो रहा है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उन बड़े उत्तर भारतीय राज्यों में से एक है, जहां कांग्रेस के सत्ता में लौटने की वास्तविक संभावना है.

पार्टी की तत्काल समस्या राजनीतिक जगह की कमी नहीं है बल्कि अंदरूनी लड़ाई के जरिए उस जगह को खत्म कर देने की उसकी असाधारण क्षमता है. ताजा लड़ाई प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच है. 

चन्नी अब चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हैं. इस मतभेद ने पहले ही दो अलग-अलग खेमे खड़े कर दिए हैं. वड़िंग को हटाने की मांग उठी है और पार्टी के कार्यक्रमों में भी तनावपूर्ण स्थिति देखने को मिली है. निवर्तमान प्रभारी भूपेश बघेल को चन्नी खेमे की ओर से वड़िंग के पक्ष में माना जा रहा था.

हाईकमान के लिए मुश्किल यह है कि वड़िंग और चन्नी दोनों ही राहुल गांधी के पसंदीदा नेताओं में रहे हैं. वड़िंग का राहुल से जुड़ाव उनके यूथ कांग्रेस के दिनों से है. राहुल ने संगठन में उनके उभार का समर्थन किया था और 2014 में वड़िंग को भारतीय युवा कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था. राहुल से उनकी नजदीकी इतनी है कि वे उन्हें ‘भैया’ कहकर संबोधित करते हैं.

पंजाब में चन्नी (बाएं) खेमा भूपेश बघेल को अपने खिलाफ मानता था

चन्नी भी राहुल की पसंद थे. सितंबर 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद कई दावेदारों के बीच अचानक चन्नी का नाम सामने आया. बाद में चन्नी ने कहा था कि राहुल ने उन्हें खुद फोन कर बताया था कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है.

इस तरह पंजाब में राहुल के समर्थन और भरोसे से आगे बढ़े दो नेता अब एक-दूसरे से लड़ रहे हैं. गांधी परिवार अब अपनी युवा पीढ़ी के तीसरे नेता पायलट पर भरोसा कर रहा है कि वे दोनों को नियंत्रण में रख सकें.

पायलट के लिए इस जिम्मेदारी का एक और पहलू भी है. बहुत कम कांग्रेस नेता ऐसे हैं जो इस बात को इतनी करीब से जानते होंगे कि लंबी चलने वाली अंदरूनी लड़ाई राजनीतिक करियर को कितना नुकसान पहुंचा सकती है. 

राजस्थान में अशोक गहलोत के साथ उनकी अपनी लड़ाई कांग्रेस सरकार पर हावी रही थी. आखिरकार यह लड़ाई राज्य में BJP के साथ पार्टी की राजनीतिक टक्कर जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई थी. इसलिए पंजाब पायलट को हाईकमान से वह जिम्मेदारी दे रहा है जिसकी उन्हें लंबे समय से तलाश थी. ऐसी राजनीतिक जिम्मेदारी जिसके नतीजे साफ तौर पर मापे जा सकें.

अगर पायलट वड़िंग, चन्नी और पंजाब के दूसरे सत्ता केंद्रों के बीच काम करने का कोई समझौता करा पाते हैं, बिना किसी और बगावत के उम्मीदवारों का चयन करा पाते हैं और सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) के खिलाफ कांग्रेस को मुकाबले में ला पाते हैं तो वे सिर्फ एक राज्य का चुनाव अभियान सफल नहीं करेंगे. 

तब पायलट राजस्थान से जुड़े उस सवाल का भी जवाब देंगे जो लंबे समय से उनके साथ जुड़ा है. क्या वे अपने समर्थकों को संगठित करने जितनी ही प्रभावी तरीके से आपस में टकरा रहे नेताओं को भी संभाल सकते हैं?

सचिन पायलट की पंजाब में सफलता उनके गृह राज्य राजस्थान में भी असर डाल सकती है (फाइल फोटो)

इसका असर 2028 में राजस्थान में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है. अगर पायलट यह साबित कर देते हैं कि अधिकार मिलने पर वे उसी गुटबाजी को रोक सकते हैं, जिसका खुद उन्हें सामना करना पड़ा था, तो राजस्थान में नेतृत्व पर उनका दावा मजबूत होगा. इस मायने में पंजाब उनके लिए राजस्थान की अगली परीक्षा में क्वालीफाइंग परीक्षा बन सकता है.

पंजाब से जुड़ा एक और दिलचस्प पहलू है. पायलट के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर के साथ लंबे समय से अच्छे व्यक्तिगत संबंध रहे हैं. 2021 में अमरिंदर को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद घटनाओं की वह कड़ी शुरू हुई, जिसने आखिरकार चन्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया और फिर 2022 के पंजाब चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई.

अमरिंदर अब कांग्रेस में नहीं हैं इसलिए उनके साथ पायलट के रिश्ते से संगठन को सीधे तौर पर कोई खास फायदा नहीं मिलता. लेकिन यह इतिहास एक उपयोगी चेतावनी जरूर देता है. पंजाब कांग्रेस को पहले ही दिखा चुका है कि जब हाईकमान आपस में टकरा रहे सत्ता केंद्रों को जैसे-तैसे संभाल तो लेता है लेकिन उनके बीच अंतिम समझौता नहीं करा पाता तो क्या होता है. पायलट को वहां इसलिए भेजा गया है ताकि इतिहास खुद को दोहरा न सके.

अगर पायलट की जिम्मेदारी एक परीक्षा है तो रणदीप सिंह सुरजेवाला की नियुक्ति भरोसे का प्रमाण है. सुरजेवाला उस समय अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के प्रभारी थे जब 2023 में कांग्रेस ने कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से 135 पर जीत हासिल की थी. 

इसके बाद मुख्यमंत्री चुनने का बेहद संवेदनशील सवाल सामने आया. सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार में से किसे मुख्यमंत्री बनाया जाए, इस पर फैसला होना था. तीन साल बाद इससे भी ज्यादा संवेदनशील स्थिति आई, जब सिद्धारमैया ने पद छोड़ा और 3 जून को शिवकुमार मुख्यमंत्री बने. सुरजेवाला इस बदलाव को संभालने में भी गहराई से शामिल रहे. यह बदलाव बिना उस तरह के टूट-फूट के हुआ जिसने दूसरे राज्यों में कांग्रेस की सरकारों को बार-बार नुकसान पहुंचाया है.

यही रिकॉर्ड बताता है कि हाईकमान ने कर्नाटक से उनका प्रभार नहीं हटाया और इसके साथ गुजरात की अतिरिक्त जिम्मेदारी दे दी. कर्नाटक में सुरजेवाला को कांग्रेस की ताकत के कई बड़े केंद्रों के बीच संतुलन बनाना पड़ा. इनमें सिद्धारमैया, शिवकुमार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पार्टी के वरिष्ठ नेता बी.के. हरिप्रसाद शामिल हैं. गुजरात में इसके उलट समस्या राजनीतिक ताकत की कमी को संभालने की है.

गुजरात में कांग्रेस 1995 के बाद से अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है. 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की सीटें घटकर सिर्फ 17 रह गई थीं. 2024 में लोकसभा की एक सीट जीतने से राज्य में BJP का क्लीन स्वीप जरूर खत्म हुआ लेकिन दोनों पार्टियों के बीच असंतुलन में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया.

गुजरात में कांग्रेस को मजबूत करना रणदीप सिंह सुरजेवाला की बड़ी चुनौती है (फाइल फोटो)

इसके अलावा गुजरात कोई सामान्य BJP शासित राज्य नहीं है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है. इसलिए कांग्रेस इसे सामान्य विपक्षी चुनाव की तरह नहीं लड़ सकती.

इसलिए सुरजेवाला की जिम्मेदारी कर्नाटक से बिल्कुल अलग है. उन्हें 2027 के चुनाव से पहले कमजोर प्रदेश संगठन को ऐसी स्थिति में लाना होगा, जहां वह संभावित सरकार के रूप में दिखाई देने लगे. उनका काम करने का तरीका इस जिम्मेदारी के लिए उपयोगी हो सकता है. 

सुरजेवाला आमतौर पर जिन राज्यों का प्रभार संभालते हैं वहां खुद को मुख्य चेहरा बनाने की कोशिश नहीं करते. वे स्थानीय सत्ता केंद्र के विकल्प के बजाय हाईकमान के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं. साथ ही राहुल और प्रियंका गांधी तक उनकी सीधी पहुंच है. 

कर्नाटक का प्रभार बरकरार रखते हुए गुजरात की जिम्मेदारी मिलना बताता है कि गांधी परिवार उन्हें पार्टी के उन चुनिंदा संगठनात्मक संकट सुलझाने वाले नेताओं में देख रहा है, जिनकी संख्या कम है.

बघेल का पंजाब से असम जाना अलग तरह से देखा जाना चाहिए. उन्हें पंजाब से हटाया जाना इनाम बताना मुश्किल है. वहां गुटीय संघर्ष बघेल के नियंत्रण से बाहर हो गया था और ऐसी खबरें थीं कि असंतुष्ट नेताओं को लगता था कि वे वड़िंग के पक्ष में हैं. इसलिए उन्हें चुनावी राज्य से हटाना निश्चित तौर पर रणनीति में सुधार की कोशिश है. लेकिन असम उनके लिए न तो अनजान जिम्मेदारी है और न ही कोई महत्वहीन राज्य.

बघेल लगातार दो विधानसभा चुनावों में असम में काम कर चुके हैं. 2021 में उनकी छत्तीसगढ़ टीम को बूथ स्तर की तैयारी और संगठनात्मक प्रशिक्षण के लिए बड़े पैमाने पर लगाया गया था. 2026 में वे कांग्रेस के वरिष्ठ पर्यवेक्षकों में शामिल होकर फिर असम गए. 

अब प्रभारी महासचिव बनाए जाने के बाद बघेल को ऐसे संगठन की औपचारिक जिम्मेदारी मिल गई है जिसे वे पहले से जानते हैं. इससे असम में प्रियंका गांधी की भूमिका भी मजबूत होती है.

2026 के असम विधानसभा चुनाव के लिए प्रियंका स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष थीं, जबकि बघेल को वरिष्ठ पर्यवेक्षक बनाया गया था. यह जोड़ी नई नहीं थी. 2022 में उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी AICC की प्रभारी महासचिव थीं और बघेल को पार्टी का वरिष्ठ चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया था.

उनकी छत्तीसगढ़ टीम ने बूथ प्रबंधन और प्रचार पर काम किया था. उसी साल बाद में दोनों ने हिमाचल प्रदेश में भी मिलकर काम किया. वहां बघेल वरिष्ठ पर्यवेक्षक थे और प्रियंका ने उस चुनाव अभियान में अहम भूमिका निभाई, जिसने कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाया.

इसलिए असम तीसरा बड़ा चुनाव अभियान है, जिसमें दोनों को साथ काम करने की जिम्मेदारी मिली है. बघेल की नियुक्ति से संकेत मिलता है कि चुनाव में हार के बाद भी असम में संगठन को प्रियंका गांधी के नेटवर्क के जरिए ही संभाला जाता रहेगा. 

पार्टी के प्रदेश संगठन को खुद दोबारा खड़ा करने की जरूरत है. असम में कांग्रेस लगातार तीन विधानसभा चुनाव हार चुकी है. पिछले कुछ वर्षों में कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं. संगठन में कई प्रतिस्पर्धी गुट हैं और 2026 के नतीजे ने प्रदेश इकाई का मनोबल और गिरा दिया है.

बघेल पूर्व मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ प्रियंका गांधी तक सीधी पहुंच रखने वाले नेता भी हैं. उनके आने से गौरव गोगोई के लिए भी स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर हो सकती है. बघेल के गोगोई के साथ सहज संबंध रहे हैं. ऐसे समय में जब विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद गोगोई को अपनी स्थिति फिर मजबूत करनी है उनके साथ पहले से काम कर चुके प्रभारी का होना ऐसे व्यक्ति से बेहतर है जो किसी दूसरे स्थानीय समीकरण के साथ आए.

बाकी तीन नियुक्तियां फेरबदल के एक और पहलू को सामने लाती हैं. कांग्रेस संगठन संभालने वाले नेताओं का अपना बड़ा समूह तैयार करने की कोशिश कर रही है. छत्तीसगढ़ के नए प्रभारी सुखदेव भगत झारखंड कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारी और आदिवासी नेता हैं. वे फिलहाल अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लोहरदगा लोकसभा सीट से सांसद हैं.

भगत 2019 में थोड़े समय के लिए BJP में गए थे लेकिन 2022 में कांग्रेस में लौट आए. झारखंड के एक आदिवासी नेता को आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ भेजना कोई संयोग नहीं है. यह आदिवासी प्रतिनिधित्व पर राहुल के जोर देने के हिसाब से ही है. साथ ही इससे अपेक्षाकृत नए राष्ट्रीय स्तर के नेता को 2028 के चुनाव से पहले राज्य को समझने और संगठन खड़ा करने के लिए पर्याप्त समय भी मिलेगा.

सिरीवेल्ला प्रसाद की महाराष्ट्र में नियुक्ति ज्यादा चौंकाने वाली है. आंध्र प्रदेश के इस नेता ने AICC सचिव और तमिलनाडु तथा झारखंड जैसे राज्यों में सह-प्रभारी के तौर पर काम किया है. लेकिन महाराष्ट्र उनके लिए राजनीतिक रूप से काफी बड़ी छलांग है. 

महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं. यहां उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के गुटों के साथ जटिल गठबंधन है. साथ ही कांग्रेस में भी कई ऐसे नेता हैं जिनका अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार है.

प्रसाद के पास महाराष्ट्र का कोई पुराना राजनीतिक बोझ नहीं है और यही उनके लिए फायदे की बात हो सकती है. वे किसी मौजूदा गुट का हिस्सा बने बिना हाईकमान के प्रतिनिधि के रूप में काम कर सकते हैं. लेकिन महाराष्ट्र यह भी परखेगा कि संगठनात्मक तटस्थता उस समय पर्याप्त है या नहीं जब किसी प्रभारी को मजबूत गठबंधन सहयोगियों से बातचीत करनी हो और अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को संभालना हो.

पी.वी. मोहन का आंध्र प्रदेश जाना भी इसी तरह का मामला है. कर्नाटक के इस नेता ने एनएसयूआई (NSUI) और यूथ कांग्रेस के जरिए राजनीति में जगह बनाई. उन्होंने पार्टी संगठन में काम किया और कर्नाटक में इस साल विधान परिषद का सदस्य बनाए जाने से पहले केरल में AICC सचिव और सह-प्रभारी के तौर पर काम किया.

आंध्र प्रदेश में मोहन को अलग तरह की जिम्मेदारी मिली है. महाराष्ट्र के उलट यहां संभालने के लिए कांग्रेस के बहुत कम बड़े नेता हैं. समस्या यह है कि संभालने के लिए संगठन भी लगभग नहीं बचा है. 2024 में कांग्रेस विधानसभा की एक भी सीट नहीं जीत पाई थी और दशकों तक शासन करने के बाद अब राज्य में हाशिये पर है. मोहन के लिए काम लगभग शून्य से संगठन खड़ा करने का है.

यह फेरबदल बताता है कि कांग्रेस अब अपनी संगठनात्मक क्षमता को किस तरह देखती है. पायलट को परीक्षा, सुरजेवाला को बड़े भरोसे और बघेल को रीसेट की जिम्मेदारी मिली है. वहीं भगत, प्रसाद और मोहन को बड़ी भूमिकाओं की ओर बढ़ाया जा रहा है. लेकिन उनकी असली अहमियत इस बात पर निर्भर करेगी कि हाईकमान उन्हें कितने अधिकार देने को तैयार है.

Read more!