प्रश्न पत्र तैयार करने की प्रक्रिया NTA की सबसे बड़ी कमजोरी?

NTA में परीक्षा सुरक्षा को लेकर कई सुधार किए जा रहे हैं लेकिन अलग-अलग परीक्षाओं के सवालों की गुणवत्ता और उन्हें तैयार करने की व्यवस्था अब भी बड़ी चुनौती है

शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी अधिकारी के साथ बैठक करते हुए (फाइल फोटो)

केंद्र सरकार को इसका श्रेय देना होगा कि इस बार उसने 2024 की तुलना में तेजी से कदम उठाया है. नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के हफ्तों तक प्रदर्शन के बाद 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.

प्रह्लाद जोशी ने कार्यभार संभालते ही राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) का पूर्ण ऑडिट कराने का आदेश दिया और सुधारात्मक कार्रवाई की रिपोर्ट के लिए 30 दिन की समयसीमा तय की. NTA के 50 से ज्यादा कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

10 वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियां की जानी हैं. इनमें मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी, मुख्य सूचना सुरक्षा अधिकारी और परीक्षा सुरक्षा, साइकोमेट्रिक्स (परीक्षणों के मनोवैज्ञानिक और सांख्यिकीय विश्लेषण) तथा प्रश्नपत्र तैयार करने के विशेषज्ञों के पद शामिल हैं.

26 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंफोसिस के संस्थापक नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में एक टास्कफोर्स बनाने की घोषणा की थी. इसका उद्देश्य ऐसी परीक्षा प्रणाली तैयार करना है, जिसमें सेंध न लगाई जा सके.

इस टास्कफोर्स में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ, इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक तपन डेका, IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा शामिल हैं.

नंदन नीलेकणि को NTA सुधार के लिए बनी टास्कफोर्स का प्रमुख बनाया गया है

लेकिन इस टास्कफोर्स को जिन मुद्दों पर काम करने को कहा गया है, उन्हें देखें. इसमें AI निगरानी, साइबर सुरक्षा, सुरक्षित लॉजिस्टिक्स, उम्मीदवारों की पहचान की पुष्टि और बड़ी राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं को कंप्यूटर आधारित बनाने की समयसीमा शामिल है. यानी इस पूरी सूची में इस बात पर ध्यान है कि प्रश्नपत्र तैयार होने के बाद उसकी सुरक्षा कैसे की जाए. लेकिन प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया पर एक शब्द नहीं है.

जोशी के NTA के गोपनीय संचालन व्यवस्था में पूरी तरह बदलाव के दूसरे बड़े आदेश में सीलबंद कमरे, इंटरनेट से अलग कंप्यूटर और दरवाजे पर फोन जमा कराने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं. लेकिन यह सब कमरे के बारे में है, उस व्यक्ति के बारे में नहीं जो कमरे में बैठा है. दरअसल, समस्या कभी कमरा था ही नहीं.

16 अगस्त को NTA ने 22 से 30 जून के बीच आयोजित UGC-NET की अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र की परीक्षाएं रद्द कर दीं. साथ ही 1,57,000 से अधिक उम्मीदवारों के लिए 9-10 सितंबर को दोबारा परीक्षा कराने का आदेश दिया.

इसकी अपनी समिति ने जो पाया, वह ध्यान देने लायक है. विद्वानों के नाम गलत लिखे गए थे. ऐसी किताबों के नाम थे, जिन्हें कोई पहचान नहीं सकता था. सवाल इस तरह लिखे गए थे कि बुनियादी व्याकरण तक की गलतियां थीं. ऐसे शब्द गढ़े गए थे, जिनके लिए पहले से मानक शब्द मौजूद हैं.

इसके अलावा पहले के प्रश्नपत्रों से बहुत सारे सवाल दोहराए गए थे. अंग्रेजी के प्रश्नपत्र में 150 में से 67 सवाल कथित तौर पर दिसंबर 2024 की परीक्षा से सीधे लिए गए थे. ये सभी पेपर II से थे और विकल्पों का क्रम भी वही रखा गया था.

अब याद रखिए कि UGC-NET क्या है. यह कंप्यूटर आधारित परीक्षा है. इसमें न संदूक होते हैं, न बैंक की तिजोरियां, न GPS से ट्रैक होने वाली गाड़ियां और न ही ऐसा स्ट्रॉन्गरूम (सुरक्षित कमरा), जिसे स्कूल का प्रधानाचार्य पीछे से खोल सके.

NTA ने 16 अगस्त को जून में कराई गई UGC-NET की परीक्षा रद्द कर दी (सांकेतिक तस्वीर)

हर समिति ने जिस सुधार पर सबसे ज्यादा जोर दिया था, यानी भारत की बड़ी परीक्षाओं को कंप्यूटर पर कराना, वह यहां पहले से लागू था. फिर भी इससे कुछ नहीं बदला क्योंकि परीक्षा के बाद की व्यवस्था में कुछ भी गलत नहीं हुआ था. एन्क्रिप्शन (डेटा को सुरक्षित रूप में बदलना) खराब सवाल को अच्छा नहीं बना सकता. इंटरनेट से अलग कंप्यूटर रखने से दोहराया गया सवाल नया नहीं हो जाता.

मई में NEET-UG का प्रश्नपत्र लीक होने के मामले को आमतौर पर अलग नजरिए से देखा जाता है. इसे परीक्षा व्यवस्था की अक्षमता नहीं, बल्कि अपराध माना जाता है. लेकिन CBI की जांच को पढ़ें तो दोनों एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. प्रश्नपत्र किसी प्रिंटिंग प्रेस, कूरियर वैन या परीक्षा केंद्र के गेट पर लीक नहीं हुआ था. यह उस चरण में हुआ, जब प्रश्न तैयार और अनुवादित किए जा रहे थे.

NEET-UG 13 भाषाओं में आयोजित होती है. प्रश्नपत्र के लीक होने का खतरा कम रखने के लिए NTA कभी-कभी एक ही विशेषज्ञ को प्रश्न तैयार करने और उनका अनुवाद करने, दोनों की जिम्मेदारी दे देता है.

रसायन विज्ञान के व्याख्याता पी.वी. कुलकर्णी के पास रसायन विज्ञान के 45 सवाल थे. जीव विज्ञान की विशेषज्ञ मनीषा गुरुनाथ मंधारे के पास 90 सवाल थे. दोनों पुणे से थे. दोनों एक-दूसरे को कई वर्षों से जानते थे. दोनों के पास मिलकर जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान के सभी 135 सवाल थे.

यह किसी सुरक्षित व्यवस्था को मात देने वाला कोई आपराधिक गिरोह नहीं था. यह व्यवस्था ही थी, जिसने पूरा प्रश्नपत्र दो लोगों को सौंप दिया और उम्मीद की कि सब ठीक रहेगा. NTA के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने खुद बताया था कि इनमें से कई अनुवादक छह या सात साल से काम कर रहे थे और संस्था को उन पर भरोसा हो गया था.

भरोसा कोई व्यवस्था नहीं है. और यह भरोसा लापरवाही का नतीजा भी नहीं था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि NTA उन लोगों को नौकरी पर रखता ही नहीं है जो उसकी परीक्षाओं के प्रश्न तैयार करते हैं.

NTA के पास खुद प्रश्नपत्र तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की स्थाई व्यवस्था नहीं है. हर परीक्षा के लिए उसे बाहर के विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता है. अलग-अलग विषयों के बाहरी शिक्षाविद विशेषज्ञ पैनल में प्रश्नों का बैंक तैयार करते हैं. मॉडरेटर प्रश्नों के सेट चुनते हैं. जांचकर्ता उन्हें स्वतंत्र रूप से हल करते हैं. अनुवादक उन्हें क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करते हैं और फिर दूसरे अनुवादक मूल प्रश्नों से मिलाकर अनुवाद की जांच करते हैं.

यह पूरी व्यवस्था मानदेय पर चलती है. दिल्ली के एक कमरे में करीब एक हफ्ते तक काम होता है और इसमें एक छोटे, पुराने परिचित समूह पर निर्भरता रहती है. एंट्री गेट पर फोन जमा करा दिए जाते हैं.

HR टेक कंपनी पीपल-स्ट्रॉन्ग (PeopleStrong) के सह-संस्थापक और के. राधाकृष्णन समिति के सदस्य रहे पंकज बंसल ने एक तुलना के जरिए इस कमी को समझाया. अमेरिका की एजुकेशन टेस्टिंग सर्विस, जो GRE और TOEFL जैसी परीक्षाएं आयोजित करती है, में करीब 600 रिसर्चर काम करते हैं. NTA में लगभग कोई नहीं है.

NTA के पास पर्याप्त साइकोमेट्रिशियन (परीक्षणों के मनोवैज्ञानिक और सांख्यिकीय विशेषज्ञ) नहीं हैं और न ही प्रश्न तैयार करने वाले गहरे विशेषज्ञ हैं. और ऐसी क्षमता 12 महीने में तैयार नहीं की जा सकती.

NTA के पास खुद प्रश्नपत्र तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की स्थाई व्यवस्था नहीं है

तलाशी और CCTV यह तय कर सकते हैं कि प्रश्न तैयार करने वाले लोग कमरे से क्या बाहर ले जा सकते हैं. लेकिन वे यह तय नहीं कर सकते कि जिन सवालों को तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें तैयार करने के लिए उन लोगों के पास पर्याप्त विशेषज्ञता है या नहीं

यह कोई नई समस्या नहीं है. पिछली NEET परीक्षा में हुई गड़बड़ी के बाद जून 2024 में गठित राधाकृष्णन समिति ने अपनी नौवीं सिफारिश में इसकी बात कही थी.

इसमें विशेषज्ञों का जांचा-परखा समूह, सुरक्षित प्रश्न तैयार करने और फॉर्मेटिंग की व्यवस्था, नियंत्रित पहुंच वाली गोपनीय प्रक्रिया तथा एन्क्रिप्टेड और छेड़छाड़ से सुरक्षित प्रश्नपत्र पहुंचाने की व्यवस्था की सिफारिश की गई थी. दो साल बाद भी इसे लागू नहीं किया गया था.

सरकार ने जिन चीजों पर तेजी से काम किया, वे दिखाई देने वाली व्यवस्थाएं थीं. जिला स्तर पर समन्वय. आधार से पहचान की पुष्टि. AI आधारित CCTV. सरकार के स्वामित्व वाले परीक्षा केंद्र. इन सुधारों से लॉजिस्टिक्स व्यवस्था मजबूत हुई लेकिन प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया जैसी थी, वैसी ही रही.  और यहीं 2026 में दो बार संकट सामने आया.

जिस किसी ने 2024 की नाकामियों को सुरक्षा की नहीं बल्कि प्रश्न तैयार करने की समस्या के रूप में देखा था, उसके सामने पिछले दो साल से यह सब मौजूद था. उस साल NEET में फिजिक्स के एक सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर था कि उम्मीदवार के पास NCERT की पाठ्यपुस्तक का कौन सा संस्करण था.

NTA ने पहले एक उत्तर को सही माना, फिर दो उत्तरों को सही मानने की अनुमति दी. इससे पूर्ण अंक पाने वाले उम्मीदवारों की संख्या बढ़ गई. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामला विशेषज्ञों के पास भेजा और विशेषज्ञों ने कहा कि केवल एक विकल्प ही सही था.

और जब उसी सितंबर में दोबारा आयोजित UGC-NET के नतीजे आए तो उम्मीदवारों ने अकेले इतिहास के प्रश्नपत्र की अस्थाई आन्सर की में 60 से ज्यादा गलत उत्तर गिने. इन उत्तरों को चुनौती देने के लिए प्रति सवाल 200 रुपए देने पड़ते. यानी 12,000 रुपए. जब कोई एजेंसी छात्रों से अपनी ही गलतियां सुधारने के लिए पैसे लेती है, तो वह चुपचाप यह तय कर चुकी होती है कि उन गलतियों की जिम्मेदारी उसकी नहीं है.

इसे ठीक करने के लिए किसी और समिति की जरूरत नहीं है. NTA को आखिरकार वह एक काम करना होगा जो उसने अब तक कभी नहीं किया. प्रश्न तैयार करने के लिए एक स्थाई और वेतनभोगी इकाई बनानी होगी और उसे इतना अच्छा वेतन देना होगा कि गंभीर और योग्य शिक्षाविदों को आकर्षित किया जा सके.

एक बड़ा प्रश्न बैंक बनाना होगा और प्रश्नों को परीक्षा के काफी करीब अंतिम रूप देना होगा, ताकि किसी प्रश्न तैयार करने वाले को यह पता न हो कि उसका सवाल किस परीक्षा में आएगा.

अभिषेक सिंह जब कहते हैं कि प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया परीक्षा से अलग और स्वतंत्र होनी चाहिए तो उनका मतलब यही है. प्रश्न तैयार करने की प्रक्रिया को अनुवाद से अलग करना होगा ताकि किसी एक व्यक्ति के पास किसी पूरे विषय का प्रश्नपत्र कभी न हो.

प्रश्नों की जांच की प्रक्रिया को भी प्रभावी बनाना होगा. NET के प्रश्नपत्रों से लगता है कि किसी ने वास्तव में उन्हें दोबारा हल करके नहीं देखा. साथ ही हर पुराने प्रश्नपत्र के साथ ऑटोमेटिक तरीके से मिलान करना होगा. इससे 67 दोहराए गए सवालों का पता कुछ ही सेकंड में चल जाता. लेकिन एजेंसी स्पष्ट रूप से ऐसी जांच नहीं करती.

जवाबदेही का भी सवाल है और एजेंसी अब भी इससे बच रही है. शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि तीन NET प्रश्नपत्रों पर समिति के निष्कर्ष आंतरिक हैं और उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाएगा. परीक्षा खत्म होने के 47 दिन बाद NTA ने अस्थाई आन्सर-की जारी की और परीक्षाएं रद्द करने की घोषणा की.

यह देरी संयोग से संसद के पूरे मानसून सत्र के दौरान रही जो 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला. मंत्रालय इस देरी की वजह जांच और सत्यापन के कई स्तरों को बताता है.

नीलेकणि की टास्कफोर्स लगभग निश्चित रूप से एन्क्रिप्शन, पहचान की पुष्टि और कंप्यूटर आधारित परीक्षा की ओर बदलाव पर एक अच्छी रिपोर्ट देगी. भारत के पास इससे कहीं बेहतर व्यवस्था हो जाएगी. लेकिन इस सुधार प्रक्रिया में किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि इस व्यवस्था के जरिए आखिर जाएगा क्या.

अगर NTA अब भी अंग्रेजी में 150 ऐसे मौलिक, सही स्पेलिंग वाले और पाठ्यक्रम के अनुरूप सवाल तैयार नहीं कर सकता, जिसमें सुरक्षा से जुड़ा कोई पहलू ही न हो, तो फिर उसकी सुरक्षा के लिए इतनी तकनीक आखिर बनाई किस चीज को बचाने के लिए जा रही है?

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