विजयादशमी पर मोहन भागवत ने कैसे जताया कि संघ ही सत्ता है?
विपक्ष के ‘रेजीम चेंज’ अभियान के बीच मोहन भागवत ने संघ को भारतीय व्यवस्था और उसकी दिशा तय करने वाली ताकत के रूप में पेश किया. उनके भाषण में सरकार का बचाव, राष्ट्रवाद की व्याख्या और विरोध आंदोलनों को लेकर संघ की चिंता, तीनों दिखाई दिए

RSS प्रमुख मोहन भागवत
आमतौर पर नागपुर के रेशिमबाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक का स्थापना दिवस पर दिया गया भाषण संघ परिवार के भीतर ही चर्चा का विषय बनता है. लेकिन इस बार इसे दूसरे लोग भी गौर से पढ़ेंगे. संघ के शताब्दी वर्ष के समापन और 101वें स्थापना दिवस पर मोहन भागवत ने पश्चिम से उठे एक ऐसे ‘तूफान’ की बात की जो हर तरह की व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहता है.
उन्होंने बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया की घटनाओं का जिक्र करते हुए इन्हें मानो आरोपों की सूची के रूप में पेश किया. उन्होंने कहा कि जो लोग यह वादा करते हैं कि सत्ता बदलने से किसी देश की किस्मत बदल जाएगी वे ऐसा कभी करके नहीं दिखा पाए हैं.
भागवत ने किसी का नाम नहीं लिया. लेकिन भारत विरोधी ताकतों के हाथों में खेलने वाले ‘महत्वाकांक्षी नेताओं’ पर उनकी टिप्पणी को दिल्ली में दोनों पक्षों ने राहुल गांधी पर निशाने के तौर पर देखा. उन्हें इससे ज्यादा स्पष्ट होने की जरूरत भी नहीं थी.
इससे पांच दिन पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ आंदोलन को लेकर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत भूषण ने कहा था, “हम सभी रिजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन) चाहते हैं.” कांग्रेस के पवन खेड़ा और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेहा बोरा ने भी इसी वाक्यांश का इस्तेमाल किया था.
उस सुबह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के दो पदाधिकारी न्यायिक हिरासत में थे. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अध्यक्ष नितिन नवीन ने पूरा वीकेंड राहुल पर विदेश से जुड़े ‘टूलकिट’ के जरिए काम करने का आरोप लगाते हुए बिताया था. पार्टी तीन हफ्तों से यही दलील दे रही थी. 20 अक्टूबर को संघ ने भी यही बात कही और उसे वैचारिक रूप से स्वीकार्य बना दिया.
इस भाषण को हफ्तेभर से चल रही जुबानी जंग से ऊपर उठाने वाली बात उसका नजरिया था. भागवत ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन करना जायज है लेकिन उनका कोई उद्देश्य होना चाहिए. उन्हें संविधान के दायरे में रहना चाहिए, “विभाजन और गहरी खाइयां” पैदा नहीं करनी चाहिए और सस्ती लोकप्रियता के पीछे नहीं भागना चाहिए.
संघ प्रमुख ने पुलिस और राजनीतिक नेताओं को भी इसी तरह आगाह किया. यह उस भाषा से अलग था, जिसका इस्तेमाल BJP करती रही है. इसके बाद वे एक सदी पीछे गए. उन्होंने कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन, उसके विरोध में उठे गीत और 1947 की बात की.
उस समय देश का विभाजन इसलिए स्थाई रूप ले गया क्योंकि संघ प्रमुख के मुताबिक, “हमने मान लिया कि हम दिखने में अलग हैं और हैं भी अलग.” उन्होंने कहा कि किसी को भी पूरा ‘वंदे मातरम’ गाने में हिचकना नहीं चाहिए. यह अतीत की किसी घटना का महज जिक्र नहीं है. पिछले साल सर्दियों में इस गीत की 150वीं वर्षगांठ पर संसद में 10 घंटे बहस हुई थी. BJP देवी के आह्वान वाले इसके पूरे पाठ को देशभक्ति साबित करने की कसौटी बना रही है.
भाषण का बाकी हिस्सा परिचित मुद्दों पर था लेकिन इस बार तेवर ज्यादा तीखे थे. धर्म, क्षेत्र, जाति और भाषा की विविधता की रक्षा की जानी चाहिए लेकिन इसका आधार सनातन दर्शन और स्व-बोध यानी स्वयं के प्रति जागरूकता से निकली एकता होनी चाहिए. तकनीक साधन है, लक्ष्य नहीं.
सरकार को OTT प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया को नियंत्रित करना चाहिए. इस दौरान मुख्य अतिथि के तौर पर दैनिक जागरण के संजय गुप्ता मौजूद थे. ड्रग्स को राष्ट्रीय समस्या बताया गया. कहा गया कि हिमालय में ‘एकतरफा विकास’ के कारण नेपाल में आई बाढ़ की समस्या भी पैदा हुई. कोलकाता के एक होटल में लगी आग का भी जिक्र हुआ. भागवत ने कहा कि महान भारत “ईश्वर के आशीर्वाद से नहीं बनेगा”. इसे समाज को बनाना होगा केवल सरकार को नहीं.
संघ ने आम तौर पर जिन तीन बातों को अलग-अलग रखा है उन्हें इस बार एक साथ जोड़ दिया. मौजूदा व्यवस्था का बचाव, भारत को एकजुट रखने वाले तत्वों की व्याख्या और भारतीयों को किस तरह जीवन जीना चाहिए, इस बारे में निर्देश.
मौजूदा हालात
अप्रैल में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का कोई अस्तित्व नहीं था. 16 मई को यह मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी पर इंटरनेट के मजाक के तौर पर शुरू हुई. जून में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) से जुड़े विवाद के दौरान इसका विस्तार हुआ और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगना इसकी पहली बड़ी सफलता बनी.
अक्टूबर से यह मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ विपक्षी गठबंधन इंडिया की मुहिम के साथ चल रही है. इस पुनरीक्षण के तहत पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से करीब 90 लाख नाम हटा दिए गए. यह कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है. यह कार्रवाई अप्रैल में होने वाले चुनाव से पहले हुई.
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. अगले दिन सांसदों ने निर्वाचन सदन तक मार्च निकाला. 10 अक्टूबर को दिल्ली में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया. फिर भूषण ने वह बात खुले तौर पर कह दी, जिसे आम तौर पर लोग कहने से बचते हैं. मतदाता सूचियों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सरकार के अस्तित्व पर सवाल उठाने लगा.
BJP अजीब स्थिति में है. राज्यों में उसकी स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत है लेकिन संसद में वह शायद ही कभी इतनी कमजोर रही हो. उसने पहली बार बंगाल में 294 में से 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई और असम में भी सत्ता बरकरार रखी.
इसके बावजूद अप्रैल में 12 साल में पहली बार उसे संविधान संशोधन विधेयक पर हार का सामना करना पड़ा. परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव 54 वोटों से गिर गए. बंगाल जीतने के बावजूद संविधान में संशोधन न कर पाने वाली पार्टी के पास अपने विरोधियों को 230 सांसदों वाले गठबंधन के बजाय भीड़ के रूप में पेश करने की पूरी वजह है.
संघ की भी BJP के भीतर अपनी हिस्सेदारी है. दोनों के रिश्ते जून 2024 में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे. उस समय भागवत ने तंज कसते हुए कहा था कि सच्चे स्वयंसेवक में अहंकार नहीं होता. इसके जवाब में जे.पी. नड्डा ने दावा किया था कि BJP को अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जरूरत नहीं है.
इसके बाद रिश्ते धीरे-धीरे सुधरे. प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी पहली बार संघ मुख्यालय गए. लाल किले से संघ की तारीफ की. फिर जनवरी में एक साल से जारी गतिरोध के बाद नितिन नवीन को पार्टी अध्यक्ष चुना गया. 45 वर्षीय नवीन नीतीश कुमार की कैबिनेट में रह चुके हैं और दिल्ली की राजनीति का कोई पुराना बोझ उनके साथ नहीं है.
संघ पर नजर रखने वालों ने उन्हें नया गडकरी बताया. मोदी ने 20 अक्टूबर के भाषण को कुछ ही घंटों में ‘बहुत प्रेरक’ करार दिया. कांग्रेस ने कहा कि BJP अध्यक्ष “संघ के बयानों को ही दोहरा रहे हैं.” दोनों पक्ष असल में एक ही बात कह रहे थे. नागपुर जो पंक्ति लिख रहा है, दिल्ली उसे पढ़कर सुना रही है. 2014 से पहले के दौर के बाद पहली बार संघ का BJP के संदेशों पर इतना नियंत्रण दिखाई दे रहा है.
वैचारिक चुनौती
संघ के लिए सबसे अहम बात प्रदर्शनकारियों को लेकर नहीं थी. भागवत का यह दावा ज्यादा महत्वपूर्ण था कि जो ताकतें सक्रिय हैं, वे “भारत और संघ को खत्म करने की कोशिश कर रही हैं.” एक सदी से संगठन खुद को राज्य से अलग एक सामाजिक संगठन बताता रहा है. खुद को सत्ता परिवर्तन की मुहिम का निशाना बताना आंदोलन के मुख्य आरोप को स्वीकार करने जैसा है. यानी व्यावहारिक तौर पर संघ और सरकार एक ही हैं.
संघ इस मुद्दे को इतना निजी तौर पर क्यों ले रहा है, इसकी वजह है. असल में SIR संघ की ही परियोजना है. मतदाता सूची से ‘घुसपैठियों’ के नाम हटाने की मांग भागवत 2012 से ही इस मंच से करते रहे हैं. असम में हिंसा के बाद उन्होंने यह मांग उठाई थी और 2024 में भी इसे दोहराया. निर्वाचन आयोग की कार्रवाई इसी मांग को जमीन पर उतारती है.
BJP की बंगाल में पहली जीत से पहले मतदाता सूची से 90 लाख नाम हटाए जाने और बिहार में SIR के पहले दौर के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की बड़ी जीत को नागपुर इसी का प्रमाण मानता है. विपक्ष के लिए यह आंदोलन मतदाता सूची की विश्वसनीयता से जुड़ा है. संघ के लिए यह उसके जनसांख्यिकीय एजेंडे के उस एक हिस्से पर हमला है, जिसे सरकार ने वास्तव में लागू किया है.
विपक्ष ने इस समीकरण को जानबूझकर बनाया है. 10 अक्टूबर को चेन्नई में राहुल गांधी ने ‘खलनायकों’ की सूची में सबसे पहले नरेंद्र मोदी, फिर अमित शाह, भागवत, ज्ञानेश कुमार और अजित डोभाल का नाम लिया.
सरसंघचालक को गृह मंत्री और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बीच रखकर वे यह संदेश दे रहे थे कि संघ सरकार का ही एक विभाग है, न कि कोई सांस्कृतिक संगठन जिसका एक राजनीतिक सहयोगी है. यह आरोप संघ के लिए पुराने सांप्रदायिकता के आरोप से ज्यादा मुश्किल है. क्योंकि यह उस आत्म-छवि पर सवाल उठाता है जिस पर उसका घर-घर तक पहुंचने का पूरा अभियान टिका है.
इस चुनौती को और मुश्किल बनाने वाली बात यह है कि इसे कौन दे रहा है. संघ की सोच और कार्यशैली कांग्रेस, वामपंथ और अल्पसंख्यक राजनीति से मुकाबले के लिए बनी थी. कॉकरोच जनता पार्टी इनमें से कोई नहीं है. यह व्यंग्य पर आधारित है, ढीले-ढाले ढंग से संगठित है और इंस्टाग्राम पर इसके करीब 1.9 करोड़ फॉलोअर हैं जबकि BJP के करीब 90 लाख.
CJP के मुद्दे परीक्षा में पेपर लीक, रोजगार और मतदाता सूचियां हैं. यह ठीक उसी युवा वर्ग को आकर्षित करती है जिसके बीच संघ का दावा है कि उसने इस साल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच बनाई है. जुलाई में भागवत ने जेन ज़ी को ‘भावुक’ बताया था और कहा था कि यह पीढ़ी उसी चीज की ओर आकर्षित होती है जो ‘दिखने में असली लगती है.’
यह स्वीकारोक्ति थी कि शाखाओं का अनुशासन जंतर मंतर पर जुटने वाली भीड़ तक नहीं पहुंच पा रहा था. इसके बाद से संघ एक तरफ इस पीढ़ी से संवाद करने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ उसके नेताओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है. भाषण से पहले वाले हफ्ते में ‘ऑर्गनाइजर’ ने CJP से जुड़े 16 लोगों को हिंदू विरोधी बताने वाली सूची प्रकाशित की. जब नेहा बोरा ने बांग्लादेश के छात्र आंदोलन को प्रेरणा बताया तो संघ को वह विदेशी उदाहरण मिल गया, जिसकी उसे तलाश थी.
यही बात इस भाषण को महत्वपूर्ण बनाती है. भागवत ने 2024 में इस्तेमाल हुए ‘डीप स्टेट’, ‘वोकिज्म’ और ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’ जैसे अमूर्त विचारों को एक मौजूदा, पहचाने जा सकने वाले घरेलू आंदोलन से जोड़ दिया. उन्होंने BJP के ‘टूलकिट’ वाले आरोप को वैचारिक आधार दिया.
संघ प्रमुख के मुताबिक कोई आंदोलन तब अवैध हो जाता है जब वह ‘पीड़ित होने की भावना’ का सहारा लेता है और ‘देश की व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास’ पैदा करता है. उन्होंने प्रदर्शनकारियों से उनके ही शब्द भी छीन लिए. जं
तर मंतर पर “हम, भारत के लोग” और संविधान के नाम पर प्रदर्शन हो रहे हैं. भागवत ने उन्हीं प्रतीकों को उठाया, उनमें कर्जन और राष्ट्रगीत को जोड़ा और घोषित कर दिया कि संविधान का रक्षक सड़क पर उतरा आंदोलन नहीं, बल्कि संघ है.
कार्ययोजना
भाषण का वह हिस्सा, जिसे उद्धृत करना सबसे मुश्किल है, शायद बाकी बातों से ज्यादा समय तक याद रखा जाएगा. भागवत ने बताया कि शताब्दी वर्ष के दौरान स्वयंसेवकों ने 4.61 लाख गांवों में 10.19 करोड़ घरों तक पहुंच बनाई. उन्होंने 34,187 मंडलों में हिंदू सम्मेलन किए और 39 लाख युवाओं को युवा सम्मेलनों में जुटाया.
चुनाव के बाहर कोई राजनीतिक दल इतने बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंचने का दावा नहीं कर सकता. इस पहुंच के साथ पंच परिवर्तन का संदेश भी जाता है. इसमें सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध यानी आत्म-जागरूकता और स्वदेशी शामिल हैं. ऊपर से देखें तो यह गैर-राजनीतिक लगता है. यही बात इसे उपयोगी बनाती है.
उन्होंने संघ के एक अध्ययन का भी जिक्र किया. इसमें ग्रामीण इलाकों के 1,296 स्कूलों को शामिल किया गया था. अध्ययन के मुताबिक जहां स्वयंसेवक सक्रिय थे, वहां विद्यार्थियों की उपस्थिति बेहतर थी. इसे इस बात के प्रमाण के तौर पर पेश किया गया कि समस्याओं का समाधान सरकार या आंदोलन नहीं, बल्कि ‘समाज’ करता है.
संघ अब भारतीय पहचान की परिभाषा देने से आगे बढ़कर यह बताने लगा है कि भारतीयों को कैसा व्यवहार करना चाहिए. साथ ही वह अपने काम के नतीजे भी गिना रहा है. इस तरह उसने खुद को अपने काम के परिणामों के आधार पर आंके जाने की चुनौती भी दे दी है.
बदलाव का सिलसिला
एक साल पहले शताब्दी वर्ष की शुरुआत में भागवत का भाषण बाहरी दुनिया पर केंद्रित था. उसमें पहलगाम, ऑपरेशन सिंदूर और अमेरिकी टैरिफ के बीच “स्वदेशी का कोई विकल्प नहीं” जैसी बातें थीं. 2026 में दुश्मन पश्चिम से उठा ‘तूफान’ है, जो देश के भीतर आंदोलनों के जरिए काम कर रहा है. निशाना सीमा से हटकर सड़क पर आ गया है. समय के साथ मुद्दे भी इसी दिशा में बदले हैं.
इस भाषा की नींव पहले ही पड़ चुकी थी. 2022 में जनसंख्या नीति की मांग उठी और यह जोर दिया गया कि अवधारणा को स्पष्ट रखने के लिए संघ को हिंदू संगठन कहा जाना चाहिए. 2023 में ‘सांस्कृतिक मार्क्सवादियों’ और ‘वोक’ विचारधारा की चर्चा हुई. उदयनिधि स्टालिन के बयान का जवाब देने के लिए सनातन को एकता का आधार बताया गया.
अक्टूबर 2024 में लोकसभा चुनाव में बहुमत खोने के बाद ‘डीप स्टेट’ का जिक्र हुआ. शेख हसीना की सत्ता से विदाई को एक उदाहरण के रूप में देखा गया. हिंदुओं से कहा गया कि कमजोरी अपराध है और OTT के लिए कानून बनाने की मांग की गई. इस बार इन सभी मुद्दों की फिर वापसी हुई. 2024 में कमी सिर्फ इतनी थी कि इन आरोपों को जोड़ने के लिए देश के भीतर कोई आंदोलन मौजूद नहीं था.
और पीछे जाएं तो हिंदू से स्व की ओर बदलाव दिखाई देता है. 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने की तारीफ की गई. 2021 में स्वाधीनता और स्वतंत्रता के बीच अंतर बताया गया. इससे भी पीछे 2018 में विज्ञान भवन में दिए गए व्याख्यानों में समावेशिता को संघ की आत्म-छवि का हिस्सा बनाया गया था.
2009 से 2013 के बीच भागवत ने अन्ना हजारे के आंदोलन का समर्थन किया था. तब उनका कहना था कि सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन समाज बना रहता है. 2013 में सत्ता से बाहर होने के दौर में यह बात सांत्वना देने वाली थी. 2026 में यही बात सत्ता में बैठी पार्टी पर अधिकार जताने का दावा बन गई है.
तीन कसौटियां
2009 से 2026 तक का सफर वैचारिक बदलाव का नहीं है. इसके पीछे की मूल सोच नहीं बदली है. बदली है तो उससे जुड़ी महत्वाकांक्षा जो लगातार बढ़ी है. तीन कसौटियां तय करेंगी कि संघ की दूसरी सदी दूरदर्शी सोच का उदाहरण बनेगी या अपनी सीमा से आगे बढ़ने का.
संवैधानिक बहुलता: भागवत ने भाषण में “हम, भारत के लोग” का उल्लेख किया. फिर उसी एकता की नींव सनातन को बताया और सभी से पूरा ‘वंदे मातरम’ गाने की अपील की. हिंदू आधार पर विविधता को स्वीकार करना अपनी शर्तों पर उदारता दिखाना है लेकिन इसमें दूसरों के लिए शर्तें भी जुड़ी हैं.
असहमति: बयानबाजी को हटा दें तो आंदोलन की मांग इतनी है कि मतदाता सूचियां सही हों और निर्वाचन आयोग जवाबदेह बने. जब अन्ना हजारे ने आंदोलन का नेतृत्व किया था तब संघ ने नागरिक विरोध का समर्थन किया था. अगर 20 अक्टूबर को भागवत ने आंदोलन के जिन दो रूपों में अंतर किया- एक जो समाधान चाहता है और दूसरा जो सत्ता चाहता है- वह अपने ही पक्ष के खिलाफ उठने वाले आंदोलन पर लागू नहीं होता तो संघ असहमति को ही देशभक्ति के दायरे से बाहर कर देगा.
कामकाज: 10 करोड़ घर और 1,296 स्कूल. अपने काम के नतीजों का दावा करके संघ ने खुद को उन नतीजों के आधार पर परखे जाने के लिए पेश कर दिया है.
इन सवालों के शुरुआती जवाब जल्द मिलेंगे. सुप्रीम कोर्ट में, दिल्ली की सड़कों पर, संसद में परिसीमन का मुद्दा दोबारा उठने पर, अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में और इस बात में कि संघ की पसंद से बने अध्यक्ष के नेतृत्व वाली BJP इस भाषण को निर्देश मानती है या सिर्फ सलाह.