GDP ग्रोथ रेट तेज फिर भी आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार की राह हुई मुश्किल!
GDP ग्रोथ मजबूत रहने के बावजूद रोजगार, निवेश, महंगाई, कच्चे तेल और विदेशी निवेश से जुड़ी चुनौतियां मोदी सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती हैं

नरेंद्र मोदी सरकार को परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर युवाओं के गुस्से का सामना करना पड़ा. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने इससे भी गहरी चुनौतियां हैं, जिनसे सरकार को निपटना होगा. आगे जिन चुनौतियों का जिक्र है वे सरकार के लिए आने वाले दिनों में भारी मुश्किल पैदा कर सकती हैं.
आर्थिक वृद्धि और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट
कई लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि 7 प्रतिशत से अधिक की आर्थिक वृद्धि दर्ज करने के बावजूद जनता को व्यापक स्तर पर समृद्धि और खुशहाली का एहसास क्यों नहीं हुआ. केंद्र सरकार ने बड़े पैमाने पर सरकारी इन्वेस्टमेंट के जरिए इन्वेस्टमेंट चक्र को गति देने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद कई वर्षों से प्राइवेट इन्वेस्टमेंट सुस्त बना हुआ है.
भारत अपनी आबादी का पूरा लाभ नहीं उठा पाया है. हर साल रोजगार बाजार में आने वाले लगभग 1.2 करोड़ लोगों के लिए नौकरियां उपलब्ध कराना अब भी चुनौती बना हुआ है. विनिर्माण क्षेत्र में भी कोई खास प्रगति नहीं हुई. कई वर्षों से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसकी हिस्सेदारी करीब 16-17 प्रतिशत पर ही अटकी हुई है.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस साल की शुरुआत में इंडिया टुडे टीवी से कहा था, “या तो GDP के आंकड़े अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति नहीं दिखा रहे हैं, या फिर किसी वजह से कंपनियां जरूरत से ज्यादा निराश हैं और इन्वेस्टमेंट नहीं कर रही हैं. यह समझना मुश्किल है कि अगर अर्थव्यवस्था वास्तव में 7 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रही है, जैसा कि GDP के आंकड़े बताते हैं, तो कॉरपोरेट इन्वेस्टमेंट इतना कमजोर क्यों है.”
प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में तेजी नहीं आने और पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल नहीं छंटने से GDP वृद्धि के ऊंचे एकल अंक या दोहरे अंक तक पहुंचने की उम्मीद कमजोर दिख रही है. दूसरी ओर, वित्त वर्ष 2026-27 में आर्थिक वृद्धि 7 प्रतिशत से नीचे भी जा सकती है. RBI ने इसके 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है.
नेट एफडीआई में गिरावट और एफपीआई की निकासी
सिर्फ घरेलू इन्वेस्टमेंट ही नहीं, शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी इन्वेस्टमेंट (FDI) में भी गिरावट आई है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में सकल एफडीआई 94.53 अरब डॉलर रहा, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 80.6 अरब डॉलर था.
हालांकि भारत में कमाए गए मुनाफे को बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपने देशों में वापस ले जाने और भारतीय कंपनियों के विदेशों में बढ़ते इन्वेस्टमेंट के कारण वित्त वर्ष 2025-26 में नेट एफडीआई घटकर सिर्फ 7.65 अरब डॉलर रह गया.
वित्त वर्ष 2024-25 में स्थिति और खराब थी, जब नेट एफडीआई 1 अरब डॉलर से भी नीचे पहुंच गया था. इसकी तुलना में वित्त वर्ष 2022-23 और 2023-24 में नेट एफडीआई 27-28 अरब डॉलर के स्तर पर था.
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर अनिश्चितता
ट्रंप प्रशासन की तरफ से लगाए गए टैरिफ का पिछले वित्त वर्ष के अधिकांश समय भारतीय निर्यातकों पर गंभीर असर पड़ा.
इसके बाद अमेरिका ने नए व्यापार उपायों के तहत भारत से आयात पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया. भारत ने कहा है कि वह द्विपक्षीय व्यापार समझौता पूरा करने के लिए अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा.
कच्चे तेल का दबाव
युद्ध का अर्थव्यवस्था पर कई तरह से नकारात्मक असर पड़ा है. भारत अपनी रिफाइनरियों के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का लगभग आधा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है.
इसके अलावा, वाहनों और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस का 60 प्रतिशत और घरों व होटलों में इस्तेमाल होने वाली लिक्विड पेट्रोलियम गैस (LPG) का 90 प्रतिशत भी इसी क्षेत्र से आता है. भारत के यूरिया आयात का दो-तिहाई हिस्सा भी पश्चिम एशिया से आता है.
अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान होरमुज स्ट्रेट बंद होने से भारत को आपूर्ति प्रभावित हुई. वहीं लाल सागर के तट पर सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर हूती विद्रोहियों के हमलों से वैकल्पिक बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के रास्ते होने वाला समुद्री यातायात भी प्रभावित हुआ.
23 जुलाई को ब्रेंट क्रूड की कीमत मई के बाद फिर 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. ज्यादातर विश्लेषकों का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में इसकी कीमत 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी रह सकती है. यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक है. ऐसे में सरकार को बढ़ती ईंधन कीमतों के मुद्दे पर किसी समय कदम उठाना होगा, इससे पहले कि यह बड़े पैमाने पर जन असंतोष का कारण बन जाए.
महंगाई का खतरा
युद्ध के दौरान केंद्र सरकार ने कई बार ईंधन की कीमतें बढ़ाईं. इससे पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमतों में कुल मिलाकर 7.50 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई. कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के कारण सरकार फिलहाल इन बढ़ोतरी को वापस लेने की जल्दी में नहीं है.
ईंधन महंगा होने से उत्पादन लागत बढ़ती है. इसका असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ता है. खाद्य महंगाई के साथ मिलकर इसका परिणाम यह हुआ कि जून में खुदरा महंगाई पिछले 18 महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई.
जून में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई, जो मई में 3.93 प्रतिशत थी. दिसंबर 2024 के बाद यह पहला मौका था, जब खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4 से 6 प्रतिशत के लक्ष्य दायरे की निचली सीमा से ऊपर पहुंची. जून में खाद्य महंगाई 5.32 प्रतिशत रही, जबकि मई में यह 4.78 प्रतिशत थी. RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 में महंगाई 5 प्रतिशत से ऊपर रहने का अनुमान जताया है.
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, “300 कंपनियों के पहली तिमाही के नतीजे बताते हैं कि उनकी आय में अच्छी वृद्धि हुई है लेकिन मुनाफा उसी अनुपात में नहीं बढ़ा. इसका मतलब है कि इन कंपनियों की लागत बढ़ी है लेकिन वे अभी इसे उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पा रही हैं.” हालांकि कंपनियां जल्द ही बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं.
रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया
पश्चिम एशिया के युद्ध ने रुपए पर भी दबाव डाला. 20 मई को डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 97 तक गिर गया था. हालांकि बाद में इसमें कुछ सुधार हुआ और 31 जुलाई को यह 95.34 प्रति डॉलर पर पहुंच गया.
युद्ध के दौरान भारत के आयात बिल में बढ़ोतरी से चालू खाते का घाटा बढ़ गया. यह किसी देश के निर्यात और आयात के मूल्य के बीच का अंतर होता है. वहीं नेट एफडीआई में गिरावट और विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट के बाहर जाने से पूंजी खाते पर भी असर पड़ा.
पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 35 अरब डॉलर (करीब 3.3 लाख करोड़ रुपए) से अधिक की निकासी की है. इन सभी कारणों से भारत के भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ा. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भुगतान संतुलन का घाटा बढ़कर 30.8 अरब डॉलर हो गया. वित्त वर्ष 2024-25 में यह 5 अरब डॉलर का घाटा था जबकि वित्त वर्ष 2023-24 में 63.7 अरब डॉलर का सरप्लस दर्ज किया गया था.
विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव
भुगतान संतुलन से जुड़ी चुनौतियां उस समय चर्चा में आईं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से ईंधन, सोना और विदेश यात्रा जैसे खर्चों में कटौती करने की अपील की, ताकि देश से धन का बाहर जाना कम हो.
उन्होंने महामारी के दौर का जिक्र करते हुए ऐसे संकेत दिए कि अर्थव्यवस्था महंगाई और धीमी वृद्धि वाली स्थिति, यानी स्टैगफ्लेशन के खतरे के करीब पहुंच सकती है. दूसरी ओर RBI ने रुपए को सहारा देने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया. इससे फरवरी 2026 में 728.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा विदेशी मुद्रा भंडार जुलाई 2026 के आखिर तक घटकर लगभग 676.2 अरब डॉलर रह गया.
मदन सबनवीस कहते हैं कि पश्चिम एशिया के युद्ध के बाद सरकार को कृषि, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs), पर्यावरण और वैकल्पिक ऊर्जा पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
उनके अनुसार, कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने, मूल्यवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देने, बर्बादी कम करने और निर्यात बढ़ाने पर जोर होना चाहिए ताकि यह क्षेत्र जलवायु की अनिश्चितताओं का बेहतर सामना कर सके.
MSMEs क्षेत्र में फिलहाल ऋण गारंटी और मुद्रा लोन जैसी सहायता पर जोर है. अब जरूरत ऐसे सुधारों की है जो इन्हें वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकें.
इन दोनों क्षेत्रों में केंद्र सरकार को यह भी देखना चाहिए कि वह यूके और यूरोपीय संघ के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौतों का अधिकतम लाभ कैसे उठा सकती है.
इसके साथ ही पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है. इसी तरह आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का बड़े पैमाने पर विकास किया जाना चाहिए.