मालदीव के पाकिस्तान की ओर झुकाव से बढ़ेगी भारत की मुश्किल?
राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के पाकिस्तान दौरे और दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग के बीच भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण जहाजों का माले पहुंचना हिंद महासागर में प्रभाव और रणनीतिक पहुंच के लिए भारत की कोशिशों को दिखाता है

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के साथ
21 अक्टूबर को भारतीय नौसेना के तीन जहाजों का माले पहुंचना पहली नजर में एक सामान्य घटना लग सकती है. नौसेना के जहाजों का दूसरे देशों में जाना कूटनीति की उन गतिविधियों में शामिल है जिन पर आम तौर पर ज्यादा चर्चा नहीं होती.
जहाज बंदरगाह पर आते हैं, सैन्य अधिकारी एक-दूसरे से मिलते हैं, भाषण दिए जाते हैं और तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं. लेकिन किसी घटना का समय कई बार उसकी रणनीतिक अहमियत उजागर कर देता है.
भारतीय नौसेना के जहाज आईएनएस तीर, आईएनएस सुजाता और भारतीय तटरक्षक जहाज (आईसीजीएस) सारथी की यह यात्रा 20 से 22 अक्टूबर तक मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के पाकिस्तान दौरे के साथ हुई. इस दौरान दोनों देशों ने रक्षा और समुद्री सुरक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश की.
इन दोनों घटनाक्रमों से एक ऐसा सवाल और अहम हो गया है जिस पर नई दिल्ली के रणनीतिक योजनाकारों का ध्यान लगातार जा रहा है: भारत मालदीव में अपना प्रभाव कैसे बनाए रखे जबकि यह पड़ोसी देश बाहरी साझेदारियों का दायरा लगातार बढ़ा रहा है?
भारतीय नौसेना के प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन का हिस्सा ये तीनों जहाज लंबी दूरी के प्रशिक्षण अभियान के तहत मालदीव पहुंचे हैं. मालदीव राष्ट्रीय रक्षा बल (एमएनडीएफ) ने उनका स्वागत किया. यहां वे एक कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे हैं जिसमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ बैठकें, गिरिफुशी प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण का आदान-प्रदान, एक-दूसरे के जहाजों का दौरा और कई संयुक्त गतिविधियां शामिल हैं.
भारतीय नौसेना के अधिकारियों का कहना है कि इन गतिविधियों का मकसद सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है. इनका उद्देश्य उन संस्थागत प्रक्रियाओं और कार्यप्रणाली को बनाए रखना है जिन पर भारत-मालदीव सुरक्षा सहयोग टिका है.
नियमित संपर्क से मालदीव के रक्षा बलों और तटरक्षक कर्मियों के साथ संबंध मजबूत बने रहते हैं. इससे समुद्री निगरानी, खोज एवं बचाव अभियान, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी व्यापक पहलों में सहयोग को भी बढ़ावा मिलता है.
हालांकि इस यात्रा के आसपास के घटनाक्रम भी अहम हैं. मुइज्जू के पाकिस्तान दौरे के दौरान दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग के लिए 20 समझौता ज्ञापनों का आदान-प्रदान किया.
सुरक्षा से जुड़े इन समझौतों का विस्तृत ब्योरा अभी सामने नहीं आया है. इसलिए यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि दोनों देशों के बीच कोई बड़ा रणनीतिक बदलाव हो रहा है या मालदीव में पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी बढ़ने वाली है. फिर भी यह संपर्क मालदीव की विदेश नीति में उभरते एक ऐसे रुझान को दिखाता है जो अब ज्यादा स्पष्ट नजर आने लगा है.
राष्ट्रपति बनने के बाद से मुइज्जू ने मालदीव की कूटनीतिक और आर्थिक साझेदारियों का दायरा जानबूझकर बढ़ाया है. इस रणनीति का सबसे अहम पहलू चीन के साथ गहरे होते संबंध हैं. जनवरी 2024 में बीजिंग की अपनी पहली राजकीय यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक सहयोगात्मक साझेदारी का दर्जा दिया.
साथ ही दोनों देशों ने बुनियादी ढांचे, व्यापार, ब्लू इकॉनमी (समुद्र से जुड़े संसाधनों और आर्थिक गतिविधियों पर आधारित अर्थव्यवस्था), डिजिटल अर्थव्यवस्था और बेल्ट एंड रोड सहयोग से जुड़े 20 समझौतों पर हस्ताक्षर किए. अगस्त 2025 में मुइज्जू की चीन यात्रा के दौरान इन संबंधों को और मजबूती मिली.
चीन के लिए मालदीव हिंद महासागर में एक रणनीतिक रूप से अहम ठिकाना है. यह दुनिया के कुछ सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों के पास स्थित है. वहीं, माले के लिए चीन निवेश, फंडिंग और बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग का एक स्रोत है. इससे मालदीव की किसी एक साझेदार पर निर्भरता कम होती है. दोनों देशों के रिश्ते भावनाओं के बजाय आपसी जरूरतों पर आधारित हैं.
इन घटनाक्रमों का मतलब यह नहीं है कि भारत को अपने आप नुकसान हो रहा है. लेकिन इन पर ध्यान देना जरूरी है. मालदीव की भौगोलिक स्थिति उसके रणनीतिक महत्व को काफी बढ़ा देती है. हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों के करीब और भारत के दक्षिणी समुद्री क्षेत्र के पास स्थित होने के कारण इसे कोई भी गंभीर भारतीय सुरक्षा रणनीतिकार नजरअंदाज नहीं कर सकता.
पाकिस्तान और मालदीव के बीच सुरक्षा सहयोग तभी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगा जब वह कूटनीतिक घोषणाओं से आगे बढ़कर नियमित खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, सैन्य प्रशिक्षण की व्यवस्थाओं या अभियान संबंधी तालमेल तक पहुंचेगा. अंततः इन समझौतों का महत्व उनकी संख्या से नहीं बल्कि उनके अमल से तय होगा.
सैन्य मामलों के जानकार मुइज्जू की इस पहल को साझेदारियों में विविधता लाने और अधिक रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा मानते हैं. बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच मालदीव भी कई छोटे देशों की तरह अपने लिए विकल्पों का दायरा बढ़ाना चाहता है. उसका मकसद किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अपनी रणनीतिक गुंजाइश बढ़ाना नजर आता है.
संतुलन बनाने की यही कोशिश मुइज्जू के कार्यकाल में भारत-मालदीव संबंधों की दिशा को भी कुछ हद तक समझाती है. मुइज्जू के राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आ गया था. इसकी एक प्रमुख वजह द्वीपसमूह में तैनात भारतीय सैन्य कर्मियों को वापस बुलाने की उनकी मांग थी.
एक विशेषज्ञ कहते हैं, "2024 में भारतीय सैन्य कर्मियों की वापसी के मुद्दे पर मुइज्जू के राष्ट्रपति बनने के बाद शुरुआत में भारत के साथ रिश्तों में तनाव आया. हालांकि इसके बाद संबंध स्थिर हुए हैं. जुलाई 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माले यात्रा से दोनों देशों के बीच संपर्क और सहयोग को फिर गति देने में मदद मिली."
यह टिप्पणी नई दिल्ली के सामने मौजूद मुख्य चुनौती को रेखांकित करती है. भारत को क्षेत्रीय साझेदारियों को लेकर मतभेदों की वजह से व्यावहारिक सहयोग कमजोर नहीं होने देना चाहिए. भौगोलिक निकटता अब भी भारत के पक्ष में है. दोनों देशों के पुराने रक्षा संबंध भी भारत की ताकत हैं.
संकट के समय भारत ने जिस तरह समय पर मदद पहुंचाई है, वह भी उसके पक्ष में जाता है. लेकिन भौगोलिक निकटता और पुराना रिश्ता फायदे तो हैं, स्थाई गारंटी नहीं. इनके भरोसे लगातार कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने या मालदीव की प्राथमिकताओं के प्रति संवेदनशील रहने की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
यहीं प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन की यात्रा का महत्व और स्पष्ट होता है. यह तैनाती भारत के महासागर विजन के अनुरूप है. महासागर का पूरा नाम है- म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन (विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र प्रगति). इस यात्रा का महत्व किसी भव्य आयोजन में कम और सहयोग की निरंतरता बनाए रखने में ज्यादा है. इस तरह की गतिविधियां संपर्क के रास्ते खुले रखती हैं, पेशेवर संबंधों को मजबूत करती हैं और पुराने भरोसे को व्यावहारिक सहयोग में बदलती हैं.
एक अन्य सैन्य विशेषज्ञ के शब्दों में, "पाकिस्तान की इस पहल को भारत के लिए अपने आप में झटका मानने की जरूरत नहीं है. मालदीव नई दिल्ली के साथ अपने पुराने संबंध छोड़े बिना कई साझेदारों के साथ रिश्ते बनाए रख सकता है. असली सवाल यह है कि क्या नई व्यवस्थाओं से हिंद महासागर में सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों की स्थिति बदलती है."
इस अंतर को याद रखना जरूरी है. दक्षिण एशिया में रणनीतिक मामलों पर चर्चा अक्सर कूटनीति को जीत और हार के हिसाब से देखने लगती है. लेकिन छोटे देश दुनिया को इतने सीधे दो खेमों में बंटे रूप में नहीं देखते. मालदीव भारत, चीन और पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने के बजाय तीनों के साथ अपने विकल्प अधिकतम करने की कोशिश कर रहा है.
भारत के लिए ज्यादा उपयोगी रास्ता घबराहट दिखाना नहीं बल्कि संपर्क और सहयोग बढ़ाना है. विशेषज्ञों का कहना है कि नई दिल्ली को समुद्री क्षमताओं के विकास, तटरक्षक सहयोग और विकास साझेदारियों में निवेश जारी रखना चाहिए. साथ ही मालदीव और पाकिस्तान के बीच हुए समझौतों पर अमल की बारीकी से निगरानी भी करनी चाहिए. माले में भरोसा बनाए रखना, पाकिस्तान की हर कूटनीतिक सफलता को भारत की हार मानने से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है.
इसलिए आईएनएस तीर, आईएनएस सुजाता और आईसीजीएस सारथी का मालदीव पहुंचना महज एक सामान्य बंदरगाह यात्रा नहीं है. यह क्षेत्रीय भू-राजनीति की एक बुनियादी सच्चाई की याद दिलाता है: प्रभाव किसी एक यात्रा, समझौते या सुर्खी से कायम नहीं होता. इसे लगातार मौजूदगी, निरंतर ध्यान और भरोसेमंद साझेदारियों के जरिए बनाया जाता है.
मालदीव जब अपनी कूटनीतिक पहुंच का दायरा बढ़ा रहा है तब भारत का काम सिर्फ वहां अपनी मौजूदगी बनाए रखना नहीं, बल्कि द्वीपसमूह की बदलती सुरक्षा और विकास संबंधी जरूरतों के लिहाज से प्रासंगिक, भरोसेमंद और उत्तरदायी बने रहना भी है.