सचिन के ‘पहले बैट’ वाले कश्मीर विलो पर छाया संकट

कश्मीर का क्रिकेट बैट उद्योग करीब 300 करोड़ रुपए का है और एक लाख से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी इससे जुड़ी है लेकिन विलो की कमी ने इसके भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं

जम्मू-कश्मीर में क्रिकेट बैट की एक फैक्ट्री

शाहीन अहमद पर्रे के पास महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर से जुड़ा ऐसा किस्सा है जो शायद ही किसी के पास हो. यह फरवरी 2024 की बात है जब सचिन उनकी अवंतीपोरा के चुरसू में बैट बनाने वाली फैक्ट्री में आए थे. उनके परिवार के साथ मुलाकात में तेंदुलकर बताया था, "मेरी जिंदगी का पहला क्रिकेट बैट कश्मीर से आया था. मेरी बड़ी बहन उसे वहां से लाई थीं."

चुरसू श्रीनगर-जम्मू नेशनल हाईवे पर पड़ता है. उस वक्त तेंदुलकर अपने परिवार के साथ निजी यात्रा पर कश्मीर घाटी आए थे. उन्होंने फैक्ट्री में कुछ समय बिताया और इस मुलाकात का एक वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भी शेयर किया था.

तेंदुलकर का यह दौरा और तारीफ दिखाती है कि कश्मीरी विलो से बने क्रिकेट बैट पर दुनियाभर के खिलाड़ियों का भरोसा है. श्रीलंका, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के क्रिकेटर कई सालों से इन बैट का इस्तेमाल करते रहे हैं. 2021 में यूएई में हुए पुरुष टी20 वर्ल्ड कप और अगले साल ऑस्ट्रेलिया में हुए वर्ल्ड कप के दौरान ओमान और यूएई के खिलाड़ियों ने भी कश्मीर विलो के बैट इस्तेमाल किए, जिसके बाद इनकी मांग और बढ़ गई.

प्रोफेशनल स्तर के कश्मीर विलो बैट को एक तय गुणवत्ता के दायरे में लाने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने इन्हें ISI मार्क के तहत शामिल किया है. लेकिन करीब 300 करोड़ रुपए सालाना कारोबार करने वाला और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 1 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाला यह उद्योग अब सबसे जरूरी कच्चे माल यानी कश्मीर विलो की भारी कमी से जूझ रहा है.

सचिन तेंदुलकर शाहीन अहमद पर्रे की फैक्ट्री में ​

शाहीन ने इंडिया टुडे को बताया, “दक्षिण कश्मीर खास तौर पर कश्मीर विलो की कमी से जूझ रहा है. इसी कच्चे माल पर बैट उद्योग टिका है. पहले ज्यादातर विलो यहीं से मिलता था. अब निर्माताओं को इसके लिए उत्तर कश्मीर तक जाना पड़ता है. दक्षिणी इलाके में यह कमी सात साल से ज्यादा समय से बनी हुई है.”

शाहीन एमजे स्पोर्ट्स बैट फैक्ट्री  चलाते हैं. एक फैक्ट्री को अपना काम लगातार जारी रखने के लिए औसतन 100 क्विंटल से ज्यादा तैयार और अच्छी तरह सुखाए गए विलो क्लेफ्ट का स्टॉक रखना पड़ता है.

तैयार बैट की बिक्री अच्छी रही है. शाहीन कहते हैं, “अल्लाह की मेहरबानी रही है.” लेकिन उद्योग से जुड़े लोग कई बार जम्मू-कश्मीर सरकार के सामने कच्चे माल की कमी का मुद्दा उठा चुके हैं. शाहीन चेतावनी देते हैं, “अगर सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया तो कश्मीर का बैट उद्योग बर्बाद हो जाएगा. यह इसके अस्तित्व के लिए खतरा है.”

विलो वाले इलाकों पर कब्जा

सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और बिजबेहरा से विधायक बशीर अहमद शाह वीरी भी इस चिंता से सहमत हैं. उन्होंने हाल ही में सरकार को एक पत्र सौंपा है, जिसमें बैट बनाने वाले उद्योग को फिर से मजबूत करने और अच्छी गुणवत्ता वाले विलो की लगातार सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए कदम सुझाए गए हैं.

वीरी कहते हैं, “इस कमी के पीछे दो बड़ी वजहें हैं. पहली, दक्षिण कश्मीर में कई किसानों ने कश्मीर विलो की जगह रूसी पॉपलर के पेड़ लगा दिए या अपनी जमीन पर सेब के बाग लगा लिए. दोनों से उन्हें जल्दी या लंबे समय तक बेहतर कमाई की उम्मीद थी.”

वे दावा करते हैं, “दूसरी वजह यह है कि 2019 के बाद, जब अनुच्छेद 370 हटाया गया और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म हुआ, अनंतनाग जिले समेत कई इलाकों में विलो वाले सामुदायिक और चरागाहों के बड़े हिस्से सरकारी संस्थान और औद्योगिक क्षेत्र बनाने के लिए ले लिए गए.” 

दक्षिण कश्मीर में एक बड़े इलाके में विलो की जगह अब सेब के बागान लग गए हैं (सांकेतिक तस्वीर)

विडंबना यह है कि 2017 में उत्तर कश्मीर की वुलर झील के आसपास 20 लाख से ज्यादा विलो के पेड़ों को काटने के लिए चिह्नित किया गया था. ये पेड़ दक्षिण एशिया के सबसे बड़े वैटलैंड्स में से एक और कश्मीर के सबसे बड़े बाढ़ क्षेत्र को फिर से विकसित करने की योजना के तहत काटे जाने थे.

ये पेड़ दक्षिण कश्मीर के क्रिकेट बैट बनाने वालों के साथ-साथ फल रखने वाले बक्सों के लिए कच्चे माल का एक बड़ा स्रोत थे.

उत्तर कश्मीर के सोनावारी गांव के रहने वाले गुलाम नबी बताते हैं, “वुलर के आसपास ये विलो के पेड़ बाढ़ के पानी से बचाव के लिए एक सुरक्षा घेरे की तरह लगाए गए थे. साथ ही इनसे स्थानीय अर्थव्यवस्था और किसानों को भी सहारा मिलता था. किसान इन पेड़ों की छाया में गाय और भेड़ पालते थे. इन पेड़ों की लकड़ी स्थानीय आरा मिलों में सेब के बक्से बनाने के लिए जाती थी जबकि सबसे अच्छी गुणवत्ता वाली लकड़ी से बैट बनाए जाते थे.”

झील के आसपास के दूसरे गांवों की तरह सोनावारी में भी कभी दूर-दूर तक कश्मीर विलो के पेड़ दिखाई देते थे. झील के आसपास विलो के पेड़ लगाने की शुरुआत 1924 में हुई थी. इसका मकसद जलावन की लकड़ी उपलब्ध कराना और पशुपालन व भेड़ पालन समेत स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देना था. 1980 के दशक में वुलर के जलग्रहण क्षेत्र को जम्मू-कश्मीर वन विभाग के नियंत्रण में दे दिया गया.

इन सभी कदमों का कुल असर यह हुआ कि पूरे कश्मीर में बैट बनाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले विलो के पेड़ों वाली जमीन तेजी से कम होती गई. इससे जुड़े लोग यह भी मानते हैं कि अधिकारी विलो क्लेफ्ट को कश्मीर से बाहर भेजे जाने से रोक नहीं पाए हैं. 

वीरी का कहना है कि नए औद्योगिक क्षेत्रों के लिए नई खेती योग्य जमीन लेने के बजाय सरकार को पहले यह देखना चाहिए कि मौजूदा औद्योगिक क्षेत्रों का कितना इस्तेमाल हो रहा है, वहां कितना रोजगार पैदा हो रहा है और भविष्य में उनकी कितनी उपयोगिता रह गई है.

कश्मीर में करीब 400 सक्रिय क्रिकेट बैट बनाने वाली यूनिट और क्लेफ्ट डीलर हैं. ये मुख्य रूप से संगम-अवंतीपोरा इलाके में हैं, जो वीरी के विधानसभा क्षेत्र में आता है. यह यूनिट हर साल करीब 15 लाख बैट बनाती हैं, जिन्हें भारत के अलग-अलग खेल बाजारों में भेजा जाता है. यह उद्योग किसानों, विलो उगाने वालों, लकड़ी सप्लायरों, बैट निर्माताओं, थोक विक्रेताओं, खुदरा दुकानदारों और ट्रांसपोर्टरों के एक बड़े नेटवर्क को रोजगार और काम देता है.

विलो को फिर से बढ़ाने की मुहिम

बैट निर्माताओं के साथ हाल की बातचीत से मिले अनुभव के आधार पर वीरी का सुझाव है कि जम्मू-कश्मीर सरकार एक व्यापक ‘विलो रिवाइवल मिशन’ शुरू करे. इसमें वन, पर्यावरण, कृषि, उद्योग और वाणिज्य, बागवानी और खेल विभागों के साथ दूसरे संबंधित लोगों को भी शामिल किया जाए.

वीरी कहते हैं कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जुलाई में दक्षिण कश्मीर के संगम में बैट निर्माताओं से मुलाकात के दौरान अच्छी गुणवत्ता वाले विलो की लगातार सप्लाई का भरोसा दिया था. वीरी आगे बताते हैं कि “मुख्यमंत्री ने 3,000 कनाल यानी 375 एकड़ में फैले मरहामा नंबाल के दलदली इलाके को वापस लेने और वहां वैज्ञानिक तरीके से अलग-अलग हिस्से बनाकर ज्यादा पानी की जरूरत वाले विलो की खेती करने के सुझाव पर भी सहमति जताई थीं.”

मुख्यमंत्री के सामने यह सुझाव भी रखा गया कि बांदीपोरा के अजास और वुलर झील के आसपास के जलग्रहण क्षेत्रों में भी पर्यावरण की सुरक्षा और वैज्ञानिक जांच के बाद कश्मीर विलो उगाया जा सकता है.

विलो क्लेफ्ट की तस्करी

संगम में बैट बनाने वाली कंपनी जीआर8 स्पोर्ट्स  के निदेशक और संस्थापक मोहम्मद नियाजुल कबीर इस योजना को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. उनकी कंपनी के विलो बैट श्रीलंका, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के खिलाड़ियों ने इस्तेमाल किए हैं. उनका कहना है कि नए विलो के पेड़ लगाना लंबे समय की योजना है और इससे कच्चे माल की मौजूदा कमी तुरंत दूर नहीं होगी.

कबीर कहते हैं, “सरकार को सबसे पहले कश्मीर से विलो क्लेफ्ट की तस्करी पूरी तरह रोकने के लिए व्यवस्था की कमियों को दूर करना चाहिए.” उनका कहना है कि प्रतिबंध के बावजूद हर महीने हजारों अधबने कश्मीर विलो क्लेफ्ट पंजाब और उत्तर प्रदेश की फैक्ट्रियों तक पहुंच जाते हैं.

कबीर मांग करते हैं, “सरकार को जांच करनी चाहिए कि कश्मीर से विलो की तस्करी कैसे हो रही है.” उनका दावा है कि हर महीने करीब 3 लाख अधबने विलो क्लेफ्ट घाटी से बाहर तस्करी करके भेजे जा रहे हैं.

कश्मीर में जमीन सीमित है और इसकी भौगोलिक स्थिति भी अलग-थलग है, इसलिए इस उद्योग के लिए दांव बहुत बड़ा है. अगर कच्चे माल की समस्या पर तुरंत और ठोस कदम नहीं उठाए गए तो जिस उद्योग ने कभी कश्मीर को दुनिया के क्रिकेट नक्शे पर जगह दिलाई थी, उसे खत्म होने और सिर्फ याद बन जाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.

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