कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा जिन पर बनी फिल्म OTT से हटाई गई?

जसवंत सिंह खालड़ा के ऊपर बनी फिल्म 'सतलुज’ जी5 पर 3 जुलाई को रिलीज हुई थी लेकिन 48 घंटे बाद ही उसे हटा लिया गया

Jaswant Singh Khalra, Diljit Dosanjh
दिलजीत दोसांझ ने 'सतलुज' में जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है

जसवंत सिंह खालड़ा. पंजाब की धरती का वह नाम जो एक जख्म की तरह आज भी रिसता है. अमृतसर के एक गांव में 1952 में जन्मा यह शख्स कभी बैंक में काम करता था फिर एक दिन उसकी आंखों के सामने वह सब आ गया जिसे देख कोई भी संवेदनशील इंसान चुप नहीं रह सकता था.

बात 1980-90 के दशक की है. पंजाब उग्रवाद की आग में जल रहा था. ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद के दंगों ने राज्य को एक ऐसे भंवर में डाल दिया था, जहां से लौटना आसान नहीं था.  उग्रवाद को दबाने के लिए चलाए गए सुरक्षा अभियानों के दौरान 'जबरन गायब किए जाने' (Enforced Disappearances) और 'फर्जी मुठभेड़ों' के गंभीर आरोप पुलिस पर लग रहे थे. पुलिस संदिग्धों को पूछताछ के लिए उठाती और कई मामलों में वे कभी लौटकर नहीं आते.

जसवंत सिंह खालड़ा उस समय अमृतसर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे थे. जब उनके एक सहकर्मी को पुलिस ने उठाया और बाद में दावा किया कि वह हिरासत से भाग गया तो खालड़ा ने सच जानने की ठानी. खालड़ा को यह बेचैन करता रहा.

उन्होंने खोजबीन शुरू की और अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के श्मशान घाटों के रिकॉर्ड खंगाले. जो सामने आया, वह किसी को भी सुन्न कर देने वाला था.  हजारों लावारिस लाशें, जिन्हें बिना पहचान बताए चुपचाप जला दिया गया, इन्हें खालड़ा ने उजागर किया. सीबीआई ने बाद में अदालत को बताया कि अकेले तरनतारन जिले में ही 900 से ज्यादा लाशों का अंतिम संस्कार हुआ जबकि कुल आंकड़ा दो हजार से ऊपर था.

खालड़ा की यह मेहनत उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले गई लेकिन जिस सच को उन्होंने उजागर किया, उसने उन्हें पुलिस की आंख की किरकिरी भी बना दिया. धमकियां मिलने लगीं. घर के इर्द-गिर्द अनजान लोग मंडराने लगे. 6 सितंबर 1995 की सुबह जब वे अपने घर के बाहर गाड़ी धो रहे थे, पुलिस की वर्दी में कुछ लोग उन्हें उठा ले गए. फिर वे कभी नहीं लौटे.

बाद की जांच में सीबीआई ने पाया कि खालड़ा को तरनतारन के एक थाने में हिरासत में रखा गया. प्रताड़ित किया गया और गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. उनका शव हरीके इलाके की एक नहर में बहा दिया गया, जो आज तक बरामद नहीं हो सका. वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद 2007 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चार दोषी पुलिस अधिकारियों, सतनाम सिंह, सुरिंदरपाल सिंह, जसबीर सिंह और प्रीतिपाल सिंह  की सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी. मुख्य अभियुक्त तत्कालीन एसएसपी अजीत सिंह संधू, आरोप तय होने से पहले ही खुदकुशी कर चुके थे. खालड़ा अपने पीछे पत्नी परमजीत कौर और दो बच्चों को छोड़ गए, जिनकी लड़ाई आज भी जारी है.

तीन दशक बाद, इसी कहानी को पर्दे पर उतारने की कोशिश हुई जो किसी संघर्ष से कम नहीं रही. निर्देशक हनी त्रेहान की यह फिल्म पहले 'पंजाब 95' के नाम से आगे बढ़ी. 2022 में सेंसर बोर्ड के पास पहुंची तो बोर्ड ने 127 कट्स की मांग रख दी. यह आंकड़ा खुद फिल्म निर्माताओं ने सार्वजनिक किया था. निर्माताओं ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया पर बाद में मामला वापस ले लिया गया. 2023 में टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर की योजना भी टालनी पड़ी. तीन साल तक यह फिल्म एक तरह के अंधेरे में लटकी रही.

आखिरकार, बिना किसी कट के, सिर्फ नाम बदलकर  'सतलुज' के रूप में  यह फ़िल्म 3 जुलाई को ज़ी-5 पर रिलीज हुई. दिलजीत दोसांझ ने खालड़ा की भूमिका निभाई. साथ में अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यान जैसे कलाकार फिल्म में मौजूद हैं. लेकिन यह राहत बहुत छोटी साबित हुई. रिलीज के महज 48 घंटे बाद 5 जुलाई की शाम को फिल्म भारत में ज़ी-5 से हटा ली गई. हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध है.

दिलजीत की प्रतिक्रिया तीखी और भावुक दोनों थी. इंस्टाग्राम पर उन्होंने पंजाबी में लिखा कि सतलुज के साथ भी वही हुआ जो खालड़ा साहब के साथ हुआ था.  सच को दबाने की कोशिश. एक इंस्टाग्राम लाइव में उन्होंने कहा कि जिस आवाज को 1995 में दबाया गया, उसे 2026 में भी दबाया जा रहा है और यह उन्हें समझ से परे लगता है. निर्देशक हनी त्रेहान की प्रतिक्रिया कहीं ज्यादा ठहरी हुई थी. उन्होंने बस इतना लिखा कि ईश्वर की मर्जी मीठी है.

ज़ी-5 ने अपने बयान में दर्शकों का आभार जताते हुए कहा कि फिल्म फिलहाल भारत में अनुपलब्ध रहेगी. प्लेटफॉर्म ने कलाकारों, रचनाकारों और कहानी की सच्चाई के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर कायम रहने की बात कही और उचित कानूनी रास्तों से फिल्म को जल्द वापस लाने की कोशिश जारी रखने का भरोसा भी दिया.

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