रुपए बचाने की RBI की कोशिशें कितनी कारगर साबित होंगी?

डॉलर के मुकाबले रुपया 97 के करीब पहुंचने के बीच RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार पर कई पाबंदियां लगाई हैं. लेकिन महंगा कच्चा तेल, अमेरिका से घटता ब्याज दर अंतर और विदेशी निवेशकों की निकासी रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं

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RBI ने रुपए की गिरावट रोकने के लिए ऐसे उपाय 2013 में भी किए थे (सांकेतिक तस्वीर)

10 अक्टूबर की सुबह-सुबह दो सर्कुलर जारी किए गए. तब तक न्यूयॉर्क में सप्ताह का कारोबार बंद हो चुका था. इन सर्कुलरों की भाषा वही थी जिसका इस्तेमाल भारतीय रिजर्व बैंक अपने सबसे सख्त कदमों के लिए करता है. 

इनमें कहा गया कि बाजार में अनुशासन मजबूत करने और रिस्क मैनेजमेंट को उचित बनाने के लिए ये कदम उठाए गए हैं. इसके कुछ ही देर बाद जारी तीसरी सूचना मुश्किल से एक पैराग्राफ की थी. 

इसमें बताया गया कि 12 अक्टूबर से RBI खुद इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को डॉलर बेचेगा. इन कंपनियों की रोज की पूरी जरूरत RBI पूरी करेगा ताकि उन्हें खुले बाजार में डॉलर खरीदने के लिए दूसरी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा न करनी पड़े.

12 अक्टूबर को जब मुंबई के फोर्ट इलाके में विदेशी मुद्रा बाजार के कारोबारी अपने दफ्तर पहुंचे, तब तक रुपए ने बाजार की प्रतिक्रिया बता दी थी. डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 1 फीसदी मजबूत हुआ. इस तरह वह 96.97 के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंचने से उबर गया, जहां तक वह पूरे सप्ताह फिसलता रहा था. 

इससे सिर्फ पांच दिन पहले, 7 अक्टूबर को रुपया डॉलर के मुकाबले 96.85 तक गिर गया था. उस दिन एशिया की मुद्राओं में उसका प्रदर्शन सबसे खराब रहा था. इसी दिन RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 44 महीने में पहली बार ब्याज दरें बढ़ाई थीं.

रुपए में आई तेजी वास्तविक है लेकिन इससे क्या साबित होता है, यह स्पष्ट नहीं है. 2026 की शुरुआत से अब तक रुपया 7 फीसदी से ज्यादा कमजोर हो चुका है. विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 30 अरब डॉलर निकाल चुके हैं. वहीं RBI का विदेशी मुद्रा भंडार सितंबर की शुरुआत में 785 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से घटकर 2 अक्टूबर तक 734 अरब डॉलर रह गया. 

RBI का विदेशी मुद्रा भंडार 2 अक्टूबर तक 734 अरब डॉलर रह गया (सांकेतिक तस्वीर)

RBI हाजिर बाजार, वायदा बाजार, विदेशी बाजार, जमा बाजार और नीतिगत ब्याज दरों के जरिए दखल दे चुका है लेकिन रुपया लगातार गिरता रहा है. वीकेंड में उठाए गए इन कदमों से असली सवाल यह है कि क्या RBI सिर्फ एक दिन के लिए रुपए को संभाल सकता है या एक तिमाही तक भी ऐसा कर पाएगा?

अक्टूबर में उठाए गए कदम इस साल चौथी बार हैं जब RBI ने अपनी मौद्रिक नीति के बजाय नियामकीय उपायों का सहारा लिया है. 1 अप्रैल को उसने बैंकों को नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) सौदे करने से रोक दिया था और रद्द किए गए सौदों को दोबारा बुक करने पर भी पाबंदी लगा दी थी. 

दस दिन बाद बैंकों के रुपए में शुद्ध खुली पोजिशन की सीमा 10 करोड़ डॉलर तय कर दी गई. इसके बाद रुपया 12 साल की सबसे बड़ी तेजी के साथ मजबूत हुआ लेकिन फिर गिरने लगा. 20 अप्रैल को RBI ने चुपचाप NDF पर लगी रोक हटा ली हालांकि पोजिशन की सीमा बरकरार रखी.

अप्रैल के मध्य में RBI ने सरकारी बैंकों के जरिए सार्वजनिक क्षेत्र की तेल रिफाइनरी कंपनियों को डॉलर देना शुरू किया था. वीकेंड में जारी सूचना के बाद अब यह व्यवस्था औपचारिक हो गई है. जून से RBI ने नए विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) यानी FCNR (B) जमा पर हेजिंग की पूरी लागत खुद उठाने की पेशकश की. रॉयटर्स के अनुमान के मुताबिक इस सब्सिडी के चलते 127 अरब डॉलर से ज्यादा की विदेशी जमा राशि आई. अगस्त की शुरुआत में इस सुविधा को समय से पहले बंद कर दिया गया.

नए नियम चार मोर्चों पर पहले से ज्यादा सख्त हैं. रुपए के डेरिवेटिव सौदों में अंतर्निहित जोखिम या वास्तविक लेनदेन का सबूत दिए बिना पोजिशन लेने की सीमा 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर कर दी गई है. यह सीमा सीधे बैंकों के साथ होने वाले सौदों और एक्सचेंजों, दोनों पर लागू होगी. 

अब रद्द किए गए सौदों को किसी भी बैंक के साथ दोबारा बुक नहीं किया जा सकेगा. हेजिंग कराने वाले हर ग्राहक को यह लिखित आश्वासन देना होगा कि उसी जोखिम को किसी दूसरे बैंक के साथ पहले से हेज नहीं किया गया है.

इसके अलावा विदेशी मुद्रा जोखिम आरक्षित निधि (Foreign Exchange Risk Reserve) की नई व्यवस्था शुरू की गई है. इसके तहत जब कोई ग्राहक विदेशी मुद्रा खरीद रहा हो और चालू खाते से जुड़े रुपए के हेजिंग सौदे का मूल्य 20 लाख डॉलर से ज्यादा हो तो बैंक को सौदे के अनुमानित मूल्य का 20 फीसदी नकद RBI के पास जमा करना होगा. यह रकम सौदा पूरा होने तक जमा रहेगी.

तेल कंपनियों के लिए डॉलर की व्यवस्था इन कदमों में सबसे ज्यादा दिखाई देने वाला हिस्सा है. इसका एक पुराना उदाहरण भी है. अगस्त 2013 में RBI ने तत्कालीन गवर्नर डी. सुब्बाराव के कार्यकाल के आखिरी दिनों में इन्हीं तीन कंपनियों के लिए ऐसी ही सुविधा शुरू की थी. उस समय अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से बॉन्ड खरीद घटाने के संकेतों के बाद बाजार में उथल-पुथल थी और ये कंपनियां हर महीने 8 से 8.5 अरब डॉलर खरीद रही थीं.

आज तेल का बिल भी बड़ा है और कच्चे तेल की कीमत भी ज्यादा है. अनुमान है कि इन रिफाइनरी कंपनियों को रोजाना 20 करोड़ से लेकर 55 करोड़ डॉलर तक की जरूरत होती है. लेकिन इस सुविधा से भारत का तेल आयात बिल कम नहीं होगा. इससे सिर्फ डॉलर खरीदने वाला बदल जाएगा. अब कंपनियां इंटरबैंक बाजार से डॉलर लेने के बजाय RBI की बैलेंस शीट से डॉलर लेंगी.

गवर्नर संजय मल्होत्रा का सार्वजनिक रुख लगातार एक जैसा रहा है. 7 अक्टूबर की मौद्रिक नीति के बाद उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक रुपए में व्यवस्थित उतार-चढ़ाव बनाए रखने में मदद करेगा. 

उन्होंने यह भी कहा कि वास्तविक प्रभावी विनिमय दर समेत कई पैमानों पर रुपया जरूरत से ज्यादा मजबूत नहीं है बल्कि उसका मूल्य वास्तविक स्तर से कम भी हो सकता है. हालांकि, उन्होंने ब्याज दरों में कटौती का विकल्प फिलहाल बंद कर दिया है. उनके मुताबिक, निकट भविष्य में दरें घटाने की गुंजाइश नहीं है. आगे या तो ब्याज दरें बढ़ेंगी या उन्हें मौजूदा स्तर पर रखा जाएगा.

रुपए की लड़ाई के मोर्चे

यह समझने के लिए कि इन उपायों का असर क्यों सीमित रहा है, सबसे पहले फारस की खाड़ी पर नजर डालनी होगी. 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया, तब ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत करीब 57 डॉलर प्रति बैरल थी. साल की शुरुआत में भी यह इसी स्तर पर थी. मार्च की शुरुआत तक कीमत करीब 90 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई.

ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं (सांकेतिक तस्वीर)

इसके बाद कच्चे तेल की कीमत तीन बार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा चुकी है. अप्रैल और मई में यह करीब एक महीने तक इस स्तर से ऊपर रही. जुलाई में एक दिन के लिए कीमत 100 डॉलर के पार गई. फिर 9 सितंबर को अमेरिकी सेना ने ईरान के पांच तेल टैंकर नष्ट कर दिए और हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमला किया, जिसके बाद कीमत फिर 100 डॉलर के पार पहुंच गई.

ब्रोकरेज फर्म FXTM के लुकमान ओतुनुगा ने 100 डॉलर के स्तर को "बाजार के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक पड़ाव" बताया. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) को अब उम्मीद है कि इस साल वैश्विक तेल आपूर्ति औसतन 43 लाख बैरल प्रतिदिन घट जाएगी. भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतों में हर बढ़ोतरी का सीधा असर भारत पर पड़ता है.

2022 में तेल की कीमतों में आए उछाल के दौरान भारत को जिस राहत का सहारा मिला था, वह अब नहीं है. फरवरी में अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते के तहत भारतीय सामान पर अमेरिकी टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया था. 

लेकिन इसके साथ भारत ने रियायती दरों पर रूस से कच्चा तेल खरीदना धीरे-धीरे कम करने पर सहमति दी. यानी जब खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के कारण तेल महंगा हो रहा है, तब भारत को खाड़ी देशों से तेल भी खाड़ी की कीमतों पर ही खरीदना पड़ रहा है.

दूसरा मोर्चा ब्याज दरों का है. यहां वैश्विक हालात लगभग सभी उभरते बाजारों के लिए बदल चुके हैं. 2024 और 2025 में ब्याज दरों में कटौती का जो वैश्विक दौर चला था वह अब खत्म हो गया है. RBI के दरें बढ़ाने से पहले के चार हफ्तों में चार महाद्वीपों के छह केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाई थीं.

अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने 16 सितंबर को सर्वसम्मति से अपनी प्रमुख ब्याज दर बढ़ाकर 3.75 से 4 फीसदी कर दी. तीन साल में यह उसकी पहली बढ़ोतरी थी. बैठक के ब्योरे से संकेत मिला कि ज्यादातर नीति निर्माता दिसंबर तक एक और बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं. अक्टूबर में दरें बढ़ने की संभावना मुख्य रूप से इसलिए कम मानी जा रही है क्योंकि बैठक मध्यावधि चुनावों से कुछ दिन पहले होनी है.

यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने जून और फिर 10 सितंबर को ब्याज दरें बढ़ाईं. इससे यूरो क्षेत्र की मुख्य दर 2.65 फीसदी हो गई. वहां महंगाई 3.3 फीसदी तक पहुंच गई थी. बैंक ऑफ जापान ने 18 सितंबर को दर बढ़ाकर 1.25 फीसदी कर दी जो 1995 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है. इसके बावजूद येन कमजोर होकर डॉलर के मुकाबले 160 के करीब पहुंच गया. 

दक्षिण अफ्रीका, नॉर्वे और ऑस्ट्रेलिया ने भी अगले दो हफ्तों में दरें बढ़ाईं. तीनों ने इसके पीछे तेल की कीमतों को एक वजह बताया. बैंक ऑफ इंग्लैंड ने दर 3.75 फीसदी पर बरकरार रखी, लेकिन उसकी नौ सदस्यीय समिति में से तीन सदस्य बढ़ोतरी के पक्ष में थे. वहां महंगाई 4 फीसदी की ओर बढ़ रही थी.

इन हालात के बीच 7 अक्टूबर को RBI की ओर से 25 आधार अंक की बढ़ोतरी मामूली लगती है. 2025 में 125 आधार अंक की कटौती के बाद रेपो दर अब 5.50 फीसदी है. भारत और अमेरिका की नीतिगत ब्याज दरों के बीच अंतर करीब 150 आधार अंक रह गया है. 

एक दशक पहले यह अंतर 5 से 6 प्रतिशत अंक था जिससे रुपए में निवेश कर ब्याज के अंतर का फायदा उठाना विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बन जाता था. आज यह अंतर बहुत कम रह गया है. विदेशी निवेशकों के पैसा निकालने की बड़ी वजह यही है, न कि सिर्फ सट्टेबाजों की गतिविधियां.

नए नियमों का सबसे पहला असर आयातकों पर पड़ेगा. मान लीजिए किसी कंपनी को तीन महीने बाद अपने विदेशी सप्लायर को 1 करोड़ डॉलर देने हैं और वह रुपए में भुगतान की लागत अभी तय करना चाहती है. डॉलर की दर 96 रुपए होने पर इस सौदे का मूल्य 96 करोड़ रुपए होगा. नए नियम के तहत बैंक को इस सौदे के पूरे समय के लिए अपनी 19.2 करोड़ रुपए की नकदी RBI के पास जमा करनी होगी.

RBI की पिछली मौद्रिक समीक्षा समिति की बैठक जिसमें ब्याज दर बढ़ाने का फैसला हुआ

बैंकरों ने 12 अक्टूबर को रॉयटर्स को बताया कि इस रकम को जमा रखने की लागत ग्राहकों पर डालने से हेजिंग शुल्क 80 से 150 आधार अंक तक बढ़ सकता है. इस आकार के तीन महीने के सौदे पर आयातक को 19 लाख से 36 लाख रुपए तक अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है. यह खर्च उसे पिछले सप्ताह तक नहीं उठाना पड़ रहा था.

इसके अलावा ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर भी है. रॉयटर्स के मुताबिक, 7 अक्टूबर के फैसले के बाद एक साल की हेजिंग लागत एक हफ्ते में 60 आधार अंक से ज्यादा बढ़ गई. नुवामा में फिक्स्ड इनकम प्रमुख अजय मरवाहा ने चेतावनी दी कि रुपए में अस्थिरता और हेजिंग महंगी होने से भारतीय शेयर बाजार विदेशी निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत कम आकर्षक बने रहेंगे.

यह RBI के लिए एक असहज स्थिति है. एक तरफ वह डॉलर की सट्टेबाजी वाली मांग को रोकना चाहता है, दूसरी तरफ नए नियम उन विदेशी निवेशकों के लिए भी सुरक्षा महंगी कर देते हैं जो भारत में पैसा लगाने से पहले विनिमय दर के जोखिम से बचना चाहते हैं.

भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो अपनी मुद्रा को संभालने की कोशिश कर रहा है लेकिन उसने इसके लिए अलग रास्ता चुना है. इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक ने इस साल ब्याज दर बढ़ाकर 5.75 फीसदी कर दी फिर भी वहां का रुपिया डॉलर के मुकाबले 18,000 के स्तर की ओर कमजोर होता रहा. 

दक्षिण कोरिया के केंद्रीय बैंक ने जुलाई से अब तक दो बार दरें बढ़ाई हैं लेकिन वॉन 17 साल के सबसे कमजोर स्तर के करीब है. जकार्ता और सियोल ने ब्याज दरों का सहारा लिया. मुंबई ने नियमों को हथियार बनाया है. और ये नियम चीन की व्यवस्था से मिलते-जुलते हैं.

चीन के केंद्रीय बैंक ने अक्टूबर 2015 से विदेशी मुद्रा जोखिम आरक्षित निधि की व्यवस्था लागू कर रखी है. इसके तहत बैंकों को ग्राहकों को डॉलर बेचने के वायदा सौदों के अनुमानित मूल्य का 20 फीसदी केंद्रीय बैंक के पास बिना ब्याज के एक साल के लिए जमा करना होता है. RBI की व्यवस्था का नाम, दर और उद्देश्य भी यही है.

चीन ने इस नियम को जरूरत के मुताबिक लागू और वापस लिया है. 2015 में युआन का अवमूल्यन होने के बाद इसे लागू किया गया. 2017 में इसे शून्य कर दिया गया. 2018 में अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के दौरान इसे फिर लागू किया गया. 2020 में हटाया गया और सितंबर 2022 में युआन के डॉलर के मुकाबले सात के स्तर को पार करने पर फिर 20 फीसदी कर दिया गया.

बाकी तरीके भी कुछ ऐसे ही हैं. चीन सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर बेचता है ताकि केंद्रीय बैंक को सीधे बाजार में उतरने की जरूरत न पड़े. वह विदेशी बाजार में डॉलर के कारोबार पर लगाम लगाता है और इस बात की जांच करता है कि डॉलर खरीदने वाले के पास वास्तविक जरूरत है या नहीं.

लेकिन चीन के पास इन नियमों को सहारा देने वाली आर्थिक स्थिति भारत से अलग है. चीन अपनी मुद्रा का रोजाना का संदर्भ मूल्य खुद तय करता है. उसका करेंट अकाउंट सरप्लस है और कैपिटर अकाउंट पर ऐसे प्रतिबंध हैं कि वह पूरी तरह खुला नहीं है. भारत के पास इनमें से कोई सुविधा नहीं है.

चैथम फाइनेंशियल के हेजिंग सलाहकारों का कहना है कि नए प्रतिबंधों से विदेशी बाजार में रुपए के कारोबार की तरलता पहले ही कम हो गई है और घरेलू तथा विदेशी बाजारों में रुपए की कीमत का अंतर बढ़ गया है. यानी भारत ने अपनी मुद्रा के लिए चीन के नियम तो अपना लिए, लेकिन उसके पास चीन जैसी भुगतान संतुलन की स्थिति नहीं है.

इसके अलावा डॉलर की एक बड़ी संभावित मांग भी है जिसे नए सर्कुलर संबोधित नहीं करते. रॉयटर्स ने सितंबर में बताया था कि बैंकों ने विदेश से जुटाए गए 127 अरब डॉलर के नए जमा पर ब्याज लागत के कम से कम आधे हिस्से को हेज नहीं किया था. 

इसकी वजह यह थी कि हेजिंग पर सालाना करीब 3 फीसदी खर्च आता है. डीलरों ने चेतावनी दी थी कि डॉलर के मुकाबले रुपया 96 से 97 के स्तर पर पहुंचने पर बैंकों को डॉलर खरीदने के लिए जल्दबाजी करनी पड़ सकती है. रुपया पिछले एक सप्ताह से इसी दायरे में है.

पूंजी और सरकारी खजाने का गणित

नई दिल्ली में वित्त मंत्रालय इन्हीं आंकड़ों को सरकारी खजाने के नजरिए से देख रहा है. मंत्रालय और RBI के बीच सार्वजनिक रूप से किसी मतभेद की बात सामने नहीं आई है. सितंबर में मल्होत्रा ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की थी और RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से फैसला लिया था. लेकिन मंत्रालय पर तीन तरफ से दबाव है और रुपए में हर गिरावट के साथ यह दबाव बढ़ रहा है.

पहला दबाव ब्याज दरों का है. अप्रैल में सीतारमण ने राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान में कहा था कि भारत के पास पूंजीगत खर्च जारी रखने, RBI के ब्याज दरें घटाने और प्रभावित क्षेत्रों को समर्थन देने की गुंजाइश है. छह महीने बाद RBI ब्याज दरें बढ़ा चुका है, कटौती की संभावना से इनकार कर चुका है और दिसंबर तिमाही के लिए महंगाई का अनुमान 6 फीसदी रखा है. इससे आगे और बढ़ोतरी की आशंका है.

सरकार पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों का भार फिलहाल ग्राहकों पर नहीं डालना चाहती (सांकेतिक तस्वीर)

सरकार के सामने पहली तिमाही में दर्ज 7.8 फीसदी की आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने की चुनौती है. साथ ही उसे उधारी कार्यक्रम भी चलाना है. रेटिंग एजेंसी ICRA को राजकोषीय जोखिमों के कारण बॉन्ड पर ब्याज दरें ऊंची बने रहने की आशंका है.

दूसरा दबाव ईंधन की कीमतों का है. 27 मार्च को केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क 10 रुपए प्रति लीटर घटा दिया था ताकि पंप पर कीमतें स्थिर रखी जा सकें. डीबीएस के मुताबिक, इससे पूरे साल करीब 1.7 लाख करोड़ रुपए का खर्च आएगा, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 0.4 से 0.5 फीसदी है. यह खर्च सरकार के 4.3 फीसदी राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के मुकाबले अहम है.

कच्चे तेल की कीमतें फिर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने से पहले ही उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी के लिए बजट में 1.83 लाख करोड़ रुपए रखे गए थे. सरकार के एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि नई दिल्ली की कच्चे तेल की बढ़ी कीमतें उपभोक्ताओं पर डालने की संभावना कम है. इसकी एक वजह उन राज्यों का विरोध भी है जहां विधानसभा चुनाव होने हैं.

रुपया कमजोर होने से हर बैरल तेल की कीमत रुपए में और बढ़ जाती है. इस तरह वित्त मंत्रालय के राजकोषीय गणित और RBI के मुद्रा संबंधी गणित के सामने मूल समस्या एक ही है, बस नजरिया अलग है. जुलाई में स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने उम्मीद जताई थी कि तेल सस्ता होने पर केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क में की गई कटौती का आधा हिस्सा वापस ले सकती है. अब यह उम्मीद खत्म हो चुकी है.

तीसरा दबाव कम दिखाई देता है और सरकार में किसी ने इसे सार्वजनिक रूप से नहीं कहा है. बजट में RBI से मिलने वाले सालाना सरप्लस ट्रांसफर पर भी भरोसा किया जाता है. लेकिन रिकॉर्ड गति से विदेशी मुद्रा भंडार बेचने और FCNR (B) स्वैप पर हेजिंग के नुकसान को अपनी बैलेंस शीट पर लेने से RBI के सरप्लस में कमी आ सकती है. नॉर्थ ब्लॉक यानी वित्त मंत्रालय की दिलचस्पी सिर्फ इस बात में नहीं है कि रुपए को बचाया जाए बल्कि इसमें भी है कि उसे बचाने का तरीका क्या हो.

नए डेरिवेटिव प्रतिबंध वित्त मंत्रालय की रुपए को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिश और गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट सिटी) को विदेशी वित्तीय केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना से भी मेल नहीं खाते. साथ ही, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के तहत 500 अरब डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता के लिए भारत में डॉलर आने चाहिए बाहर नहीं जाने चाहिए. अप्रैल में NDF पर लगी रोक को तीन हफ्ते बाद हटाना इस बात का संकेत है कि इस फैसले का विरोध हुआ था.

कब तक टिकेगी यह लड़ाई?

RBI के भीतर तेल कंपनियों के लिए डॉलर की व्यवस्था को 2013 की वापसी के रूप में देखा जा रहा है. उस समय इन्हीं तीन रिफाइनरी कंपनियों के लिए ऐसी सुविधा शुरू की गई थी और कुछ ही हफ्तों में रुपए को स्थिर करने में मदद मिली थी. लेकिन दोनों स्थितियों की तुलना पूरी तरह सही नहीं है.

2013 में समस्या पूंजी के बाहर जाने की आशंका से पैदा हुई थी. इसकी वजह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से बॉन्ड खरीद घटाने के संकेत थे. यह संकट तब खत्म हुआ जब फेड ने अपना रुख नरम कर लिया. RBI को तब सिर्फ इतना करना था कि वह हालात संभाले रखे जब तक वॉशिंगटन अपना फैसला नहीं बदलता.

आज की स्थिति की तुलना 2022 से ज्यादा की जा सकती है. तब यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद ऊर्जा की कीमतों में उछाल आया था और इसी दौरान फेड ने चार दशकों में सबसे तेज गति से ब्याज दरें बढ़ाई थीं. 

उस समय RBI ने प्रशासनिक नियमों का सहारा लेने के बजाय मई 2022 से फरवरी 2023 के बीच रेपो दर 250 आधार अंक बढ़ाई थी. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी 2021 के उच्च स्तर से 100 अरब डॉलर से ज्यादा गिरा था हालांकि इसमें बड़ी भूमिका मूल्यांकन में बदलाव की भी थी.

व्यापार की शर्तों को नुकसान पहुंचाने वाले तेल के झटके से सिर्फ इंतजार करके नहीं निपटा जा सकता. इसी तरह वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें बढ़ने की प्रक्रिया को नियमों के जरिए रोका नहीं जा सकता.

विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े भी यही सबक दे रहे हैं. सितंबर की शुरुआत से अब तक इसमें 51 अरब डॉलर की गिरावट आई है. यह अब तक की सबसे तेज साप्ताहिक गिरावट रही है और इसमें केवल मूल्यांकन का असर नहीं है. फिर भी भारत के पास एशिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडारों में से एक है. वित्त मंत्री के अनुमान के मुताबिक, यह 11 महीने के आयात के लिए पर्याप्त है. लेकिन भारत जिस गति से इसका इस्तेमाल कर रहा है वैसा पहले कभी इतने लंबे समय तक नहीं हुआ.

RBI के नए कदमों से समय जरूर मिलेगा. लेकिन असली सवाल यह है कि इस समय का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है. रुपए का भविष्य तय करने वाली कई अहम तारीखें भारत के बजाय दूसरे देशों के कैलेंडर पर हैं.

14 अक्टूबर को अमेरिका के महंगाई आंकड़े 28 अक्टूबर की फेड बैठक को प्रभावित करेंगे. इसके अगले दिन बैंक ऑफ जापान की बैठक होगी. उसके पूर्व सदस्यों का अनुमान है कि ब्याज दर हर तिमाही बढ़ाई जा सकती है, जब तक कि यह 2 फीसदी तक न पहुंच जाए. RBI की मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक 2 से 4 दिसंबर के बीच होगी. नोमुरा और SBI रिसर्च, दोनों को इसमें 25 आधार अंक की एक और बढ़ोतरी की उम्मीद है.

अगर ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है और यूनाइटेड ओवरसीज बैंक (UOB) समेत कई संस्थानों के अनुमान के मुताबिक दिसंबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी ब्याज दर बढ़ाता है, तो RBI के नए सर्कुलर करीब छह सप्ताह तक ही असरदार साबित होंगे. उसके बाद इनकी सीमा सामने आ जाएगी.

तब RBI के सामने वही विकल्प होगा, जिसे वह पिछले आठ महीने से टालता रहा है. या तो ब्याज दरें और बढ़ाई जाएं जिससे 7.1 फीसदी की आर्थिक वृद्धि के अनुमान पर दबाव पड़ेगा या फिर रुपए को संभालने के लिए और विदेशी मुद्रा भंडार खर्च किया जाए. गवर्नर का कहना है कि रुपया पहले ही अपने वास्तविक मूल्य से नीचे है.

RBI की यह बात गलत नहीं है कि रुपए में जरूरत से ज्यादा गिरावट आई है और एकतरफा दांव ने इस गिरावट को और बढ़ाया है. यह भी संभव है कि तेल कंपनियों को डॉलर देने की व्यवस्था और नई आरक्षित निधि की शर्त से वायदा बाजार में घबराहट कम हो जाए. 

लेकिन भारत को कच्चा तेल खरीदने के लिए डॉलर कहीं न कहीं से जुटाने ही होंगे. अमेरिका के मुकाबले ब्याज दरों का अंतर एक पीढ़ी के सबसे निचले स्तर पर रहेगा और जिस युद्ध ने इस पूरी स्थिति को जन्म दिया है उसे खत्म करना मुंबई स्थित RBI के हाथ में नहीं है.

12 अक्टूबर को बाजार ने रुपए की तेजी पर भरोसा जताया. आने वाले हफ्ते बताएंगे कि निवेशक सिर्फ इस तेजी पर दांव लगा रहे थे या RBI की रणनीति पर भी उन्हें भरोसा है.

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