भारतीय नौसेना को दो MQ-9B ड्रोन लीज पर लेने की जरूरत क्यों पड़ी?
चीन की हिंद महासागर में बढ़ती मौजूदगी के बीच नौसेना निगरानी में कोई खाली जगह नहीं छोड़ना चाहती. दो MQ-9B की लीज इसी जरूरत का जवाब है

भारत ने अमेरिका से 31 MQ-9B ड्रोन खरीदने का एक सौदा भी किया है (फाइल फोटो)
सैन्य ड्रोन आठ दशक से भी ज्यादा समय से मौजूद हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जर्मन पनडुब्बी ठिकानों और रॉकेट साइटों के खिलाफ रेडियो नियंत्रित B-24 लिबरेटर विमानों का इस्तेमाल किया था.
वियतनाम में टोही ड्रोन बड़े पैमाने पर युद्धक्षेत्रों के ऊपर कैमरे लेकर उड़ते थे. बाद में इजरायल ने 1982 में लेबनान की बेका घाटी के ऊपर निगरानी और ध्यान भटकाने वाले अभियानों के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया.
2000 के दशक की शुरुआत तक प्रीडेटर ड्रोन अमेरिकी आतंकवाद विरोधी अभियानों का अहम हिस्सा बन चुका था. इनमें अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को तलाशने में मदद करने वाले अभियान भी शामिल थे.
भारतीय नौसेना अपने मौजूदा मानव रहित निगरानी बेड़े में दो और MQ-9B सीगार्डियन हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस (HALE) रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट (ड्रोन) शामिल कर रही है. लेकिन इस नई लीज का महत्व सिर्फ दो ड्रोन जोड़ने तक सीमित नहीं है.
जनरल एटॉमिक्स एयरोनॉटिकल सिस्टम्स इंक के साथ 1,943 करोड़ रुपए का यह अनुबंध नौसेना को 30 महीने के लिए दो MQ-9B उपलब्ध कराएगा. इससे भारत को तुरंत निगरानी क्षमता मिल जाएगी. वहीं, अमेरिका से ऑर्डर किए गए 31 MQ-9B स्काई और सीगार्डियन की आपूर्ति 2029 से शुरू होनी है.
MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन की एक सीरीज है जिसे सैन डिएगो स्थित जनरल एटॉमिक्स बनाती है. अमेरिकी वायुसेना (USAF) के मुताबिक, 'M' का मतलब मल्टी-रोल, 'Q' का मतलब रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम और '9' का मतलब रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम की सीरीज में नौवां विमान है.
यह अंतर महत्वपूर्ण है. भारत के पास पहले से लीज पर दो MQ-9B हैं हालांकि सितंबर 2024 में एक टेक्निकल इश्यू की वजह से इनमें से एक खो गया था. ऐसे में नई लीज निकट अवधि में अतिरिक्त क्षमता देती है जबकि 31 विमानों की खरीद एक अलग दीर्घकालिक कार्यक्रम है.
अक्टूबर 2024 के समझौते के तहत नौसेना को 15 सीगार्डियन मिलने हैं जबकि भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना को आठ-आठ स्काईगार्डियन मिलेंगे. इनकी आपूर्ति 2029 से शुरू होने वाली है. हालांकि ज्यादा कीमत के कारण यह सौदा सवालों के घेरे में था.
कीमत का बचाव करते हुए रक्षा मंत्रालय (MoD) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अमेरिका की ओर से भारत को पेश किए गए MQ-9B की औसत अनुमानित कीमत दूसरे देशों द्वारा चुकाई गई कीमत से 27 फीसदी कम है.
उन्होंने कहा कि रक्षा खरीद से जुड़े अधिकारी बेहतर सौदा हासिल करने के लिए आगे कीमत को लेकर कड़ी बातचीत करेंगे. इस हिसाब से हर ड्रोन की कीमत 9.9 करोड़ डॉलर बैठती है.
अधिकारी ने बताया कि इसकी तुलना में यूएई ने प्रत्येक ड्रोन के लिए 16.1 करोड़ डॉलर चुकाए. उन्होंने कहा कि भारत जिस MQ-9B को खरीदना चाहता है वह यूएई के ड्रोन के समान है, लेकिन उसका कॉन्फिगरेशन बेहतर है.
इसी तरह, ब्रिटेन ने ऐसे 16 ड्रोन खरीदे, जिनकी कीमत 6.9 करोड़ डॉलर प्रति ड्रोन थी. लेकिन वे सिर्फ 'ग्रीन एयरक्राफ्ट' थे. यानी उनमें सेंसर, हथियार और उड़ान के लिए जरूरी आधिकारिक मंजूरी शामिल नहीं थी.
रक्षा मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि सेंसर, हथियार और पेलोड जैसी चीजें कुल कीमत का 60-70 फीसदी हिस्सा होती हैं. उन्होंने कहा कि अमेरिका ने भी इनमें से पांच ड्रोन 11.9 करोड़ डॉलर प्रति ड्रोन की कीमत पर खरीदे हैं.
तत्काल जरूरतों और भविष्य में मिलने वाले विमानों के बीच का यही अंतर इस फैसले के केंद्र में है. नौसेना के पास कई साल तक उस क्षमता का इंतजार करने की गुंजाइश नहीं है, जिसे वह आज महत्वपूर्ण मानती है.
उसकी समुद्री निगरानी की जरूरतें हिंद महासागर क्षेत्र के विशाल इलाके तक फैली हैं. यहां जहाजों, पनडुब्बियों और दूसरी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए आसमान से लगातार निगरानी की जरूरत होती है. MQ-9B इसी जरूरत को पूरा करता है.
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह लीज भारत को एक ऐसी अंतरिम क्षमता देती है, जो बड़े MQ-9B बेड़े के आने तक काम करेगी. यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक और समुद्री मौजूदगी लगातार गहरी कर रहा है.
भारतीय नौसेना के लिए 2029 में आपूर्ति शुरू होने तक निगरानी में खाली जगह छोड़ना कभी व्यावहारिक विकल्प नहीं था. तत्काल प्राथमिकता समुद्री मार्गों पर नजर बनाए रखना, समुद्री गतिविधियों की जानकारी बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि इस क्षेत्र पर नजर रखने की भारत की क्षमता चीन की बढ़ती मौजूदगी की रफ्तार से पीछे न रह जाए.
MQ-9B को सिर्फ एक और सशस्त्र ड्रोन के रूप में देखना भी सही नहीं होगा. भारत के लिए इसकी सबसे बड़ी उपयोगिता लंबे समय तक उड़ान भरने और लगातार निगरानी करने की क्षमता हो सकती है.
HALE प्लेटफॉर्म लंबे समय तक हवा में रह सकता है और खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी तथा टोही अभियानों को अंजाम दे सकता है. इससे महंगे मानवयुक्त प्लेटफॉर्म पर दबाव कम होता है. नौसेना के लिए MQ-9B, P-8I पोसाइडन बेड़े का विकल्प नहीं बल्कि उसका उपयोगी पूरक है.
P-8I एक अत्याधुनिक मानवयुक्त समुद्री गश्ती और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमान है. इसमें कहीं ज्यादा व्यापक सेंसर और हथियार प्रणाली लगाई जा सकती है और यह जटिल अभियानों को अंजाम देने में सक्षम है.
लेकिन हर नियमित निगरानी जरूरत के लिए ऐसे विमानों का इस्तेमाल करने से परिचालन घंटों, रखरखाव, चालक दल की उपलब्धता और थकान के लिहाज से काफी दबाव पड़ सकता है. लगातार निगरानी करने वाला मानव रहित प्लेटफॉर्म निगरानी के काम का एक बड़ा हिस्सा संभाल सकता है.
इससे उच्च क्षमता वाले मानवयुक्त विमानों को उन अभियानों के लिए बचाकर रखा जा सकता है, जहां उनकी खास क्षमताओं की जरूरत होती है.
यही वजह है कि MQ-9B को समुद्री निगरानी की एक बहुस्तरीय संरचना के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए. P-8I, MH-60R रोमियो हेलिकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियां, उपग्रह, तटीय सेंसर और मानव रहित प्रणालियां मिलकर एक ही परिचालन तस्वीर के अलग-अलग हिस्से उपलब्ध करा सकती हैं.
नौसेना ने खुद समुद्री क्षेत्र की जागरूकता से जुड़ी अपनी व्यवस्था को समुद्र की तलहटी से अंतरिक्ष तक फैली बहुस्तरीय संरचना बताया है.
इसके पीछे एक व्यापक रणनीतिक संदर्भ भी है. पिछले दो दशकों में भारत के अमेरिकी मूल के रक्षा बेड़े में काफी विस्तार हुआ है और इसमें अलग-अलग भूमिकाओं के लिए कई तरह की प्रणालियां शामिल हैं. C-17 ग्लोबमास्टर III और C-130J सुपर हरक्यूलिस ने भारत की रणनीतिक और सामरिक हवाई परिवहन क्षमता को बदल दिया है.
AH-64E अपाचे ने भारत की अटैक हेलिकॉप्टर क्षमता को मजबूत किया है, जबकि MH-60R ने नौसेना की पनडुब्बी रोधी और दुश्मन के जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की क्षमता को बढ़ाया है.
P-8I भारतीय नौसेना की सबसे महत्वपूर्ण लंबी दूरी की समुद्री निगरानी क्षमताओं में से एक बन गया है. अब MQ-9B इस पूरे तंत्र में लगातार निगरानी करने वाली मानव रहित क्षमता जोड़ रहा है.
भारत के पास मौजूद अमेरिकी रक्षा प्रणालियों की अहमियत सिर्फ इस बात में नहीं है कि उनकी संख्या कितनी है. इसका असली महत्व उनके आसपास मौजूद पूरे परिचालन तंत्र में है. इसमें सेंसर, संचार, हथियार, प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स, रखरखाव और आपसी संचालन क्षमता शामिल है.
इन प्रणालियों ने भारत को ऐसी क्षमताएं तेजी से हासिल करने में मदद की है, जिन्हें पूरी तरह शून्य से विकसित करने में काफी ज्यादा समय लगता.
लेकिन यह निर्भरता एक असहज सवाल भी खड़ा करती है. जब भारत आखिरकार स्वदेशी समाधान चाहता है तो वह अब भी अमेरिकी मानव रहित प्रणाली को लीज पर क्यों ले रहा है? इसका जवाब यह है कि परिचालन जरूरत तत्काल है जबकि स्वदेशी विकास एक लंबी प्रक्रिया है.
भारत ने स्वदेशी मानव रहित प्रणालियों के क्षेत्र में भी प्रगति की है. नौसेना ने दृष्टि MALE RPA को अपने बेड़े में शामिल किया है. लेकिन MQ-9B की लंबी उड़ान क्षमता, पेलोड, सेंसर और परिचालन परिपक्वता के मेल वाली प्रणाली अभी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं है.
मौजूदा लीज को इसी संदर्भ में सावधानी से देखा जाना चाहिए. यह जरूरी नहीं कि यह स्वदेशी विकास के खिलाफ कोई तर्क हो. इसके उलट, इससे घरेलू HALE क्षमता विकसित करने की जरूरत और साफ होती है.
लीज एक अंतरिम परिचालन व्यवस्था देती है लेकिन विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता की मूल समस्या का समाधान नहीं करती.
इस बीच, दूसरी तरफ खबरों के मुताबिक ईरान के साथ संघर्ष के दौरान अमेरिकी सेना ने कम से कम 45 MQ-9A रीपर खोए हैं. यह उसके रीपर बेड़े का करीब एक चौथाई है. इन सभी नुकसानों को दुश्मन की कार्रवाई से नहीं जोड़ा गया है.
अमेरिकी अधिकारियों ने बताया है कि कुछ विमानों को मार गिराया गया जबकि कुछ संचार संपर्क टूटने के बाद खो गए.
भारतीय सेना को मिलने वाली प्रणाली के बारे में बताते हुए एक अधिकारी ने कहा कि MQ-9A अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला संस्करण है, जबकि MQ-9B निर्यात के लिए तैयार किया गया इसका विकसित संस्करण है, जिसे अलग-अलग ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया जाता है.
भारत के लिए इन अमेरिकी नुकसानों का क्या मतलब है, यह समझने में यह अंतर महत्वपूर्ण है. फिर भी अगर खबरों में सामने आई यह क्षति नए विमानों की लगातार मांग में बदलती है तो इससे जनरल एटॉमिक्स की उत्पादन क्षमता पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है और आपूर्ति कार्यक्रम भी जटिल हो सकता है.
इसका असर सिर्फ एयरफ्रेम के उत्पादन पर नहीं बल्कि इंजन, सेंसर, कलपुर्जों और विशेष रूप से प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है.
सैन्य विशेषज्ञों ने कहा कि ईरान से जुड़े मौजूदा संघर्ष के साथ तुलना करते समय उसके संदर्भ को भी ध्यान में रखना जरूरी है. इस संघर्ष में MQ-9 के नुकसान की खबरों से अमेरिकी मानव रहित विमानों की बचने की क्षमता पर सवाल उठे हैं.
लेकिन भारत की जरूरत और परिचालन परिस्थितियां अलग हैं. किसी भी मानव रहित प्लेटफॉर्म की प्रभावशीलता उस खतरे के माहौल, मिशन की प्रकृति, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की परिस्थितियों, वायु रक्षा नेटवर्क और उसमें इस्तेमाल की जाने वाली रणनीति पर काफी निर्भर करती है.
भारत के लिए तत्काल गणना इसलिए अपेक्षाकृत सीधी है. खासकर हिंद महासागर के विशाल समुद्री क्षेत्र में लगातार निगरानी करना भारत के लिए बेहद जरूरी है. MQ-9B P-8I जैसे बेहद महत्वपूर्ण मानवयुक्त विमानों पर कम दबाव डालते हुए लगातार निगरानी की क्षमता दे सकता है. जरूरत पड़ने पर इसमें सशस्त्र क्षमता का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
हालांकि इससे मिलने वाला दीर्घकालिक सबक और भी महत्वपूर्ण है. भारत केवल एक विदेशी प्लेटफॉर्म की जगह दूसरे विदेशी प्लेटफॉर्म को अपनाकर रणनीतिक स्वायत्तता हासिल नहीं कर सकता.
लंबे समय में भारत का लक्ष्य ऐसा स्वदेशी तंत्र विकसित करना होना चाहिए, जिसमें विमान, सेंसर, संचार, इंजन, हथियार, डेटा लिंक और रखरखाव की पूरी व्यवस्था देश में ही हो.
इसलिए MQ-9B की लीज को भारत की अमेरिकी तकनीक पर निर्भरता के प्रतीक के तौर पर नहीं, बल्कि दो जरूरतों के बीच फंड़ी एक सैन्य व्यवस्था की तस्वीर के रूप में देखना बेहतर होगा. एक तरफ आज जरूरी क्षमताओं को हासिल करने की जरूरत है और दूसरी तरफ कल इन्हें देश में ही विकसित करने की महत्वाकांक्षा है.
C-17 और C-130J से लेकर अपाचे, MH-60R, P-8I और MQ-9B तक भारत के बढ़ते अमेरिकी मूल के रक्षा बेड़े ने महत्वपूर्ण क्षमताओं की कमी को दूर करने में मदद की है. अब चुनौती यह है कि यह पुल आखिरकार एक ऐसे भारतीय एयरोस्पेस तंत्र तक पहुंचे जो अगली पीढ़ी की प्रणालियां खुद बनाने में सक्षम हो.