भारतीयों के लिए महिलाओं के ‘न’ का मतलब समझना इतना मुश्किल क्यों है?

'इंडिया टुडे वुमन समिट 2026' में एक असहज सवाल उठाया गया: रोजमर्रा की जिंदगी में सहमति क्या है और महिलाओं के लिए अपनी सहमति जताना अब भी इतना मुश्किल क्यों है?

इंडिया टुडे वुमन समिट में शामिल प्रतिभागी रंजना कुमारी, प्रो. माधवी मेनन, नियति शर्मा, स्मिता भारती (बाएं से दाएं; फोटो : बंदीप सिंह)

ईशानी नंदी

भारत 'सहमति' शब्द की अहमियत जानता है और अब इसके मतलब को भी तेजी से समझ रहा है लेकिन नई दिल्ली में हुए इंडिया टुडे वुमन समिट 2026 के "Why consent matters at home, work and everywhere else'' सत्र में कई असहज सवाल उठाए गए. जैसे रोजमर्रा की जिंदगी में सहमति आखिर  कैसी होती है और महिलाओं के लिए अपनी सहमति जताना अब भी इतना मुश्किल क्यों है?

इस सत्र में नई दिल्ली के सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी, भारत में सेक्स और सहमति की शिक्षा के लिए काम करने वाले संगठन प्रतिसंधि फाउंडेशन की संस्थापक और कार्यकारी निदेशक नियति शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता, नाटककार-निर्देशक और एनजीओ साक्षी की कार्यकारी निदेशक स्मिता भारती और अशोका यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर स्टडीज इन जेंडर एंड सेक्सुअलिटी की निदेशक प्रो. माधवी मेनन ने जागरूकता और अपनी पसंद के मुताबिक फैसला लेने की आजादी के बीच के फर्क पर बात की.

रंजना कुमारी के लिए इसकी शुरुआत अपनी जिंदगी और शरीर पर अपने अधिकार से होती है. उनके मुताबिक, "सहमति दरअसल खुद पर अपना अधिकार है." हालांकि उनका कहना था कि बचपन से ही लड़कियों को ऐसी बातें सिखाई जाती हैं जो इस अधिकार को कमजोर करती हैं. उन्हें बहुत जोर से हंसने, ज्यादा सवाल करने या अपनी पसंद का विषय चुनने से रोका जाता है. यहां तक कि वे किससे शादी करेंगी, यह फैसला भी अक्सर उनकी अपनी पसंद के बजाय परिवार का फैसला माना जाता है.

इस तरह की परवरिश का असर पड़ता है. कुमारी ने महिलाओं के 'न' कहने और उनके इस फैसले का सम्मान होने के बीच के फर्क की ओर ध्यान दिलाया. उनका कहना था कि रिश्तों और काम की जगह पर बराबरी न होने के कारण अपनी सहमति जताना मुश्किल हो जाता है. दफ्तर में पद का फर्क, आर्थिक निर्भरता और नौकरी जाने का डर किसी व्यक्ति की अपनी पसंद बताने की आजादी छीन सकता है. उन्होंने कहा, "अपने शरीर पर आपका नियंत्रण है. कोई भी उस स्पेस में घुसने की कोशिश करता है तो वह इसका उल्लंघन कर रहा है."

माधवी मेनन ने "हां का मतलब हां और न का मतलब न" वाली आम समझ को और गहराई से देखने की बात कही. उनका कहना था कि सहमति को इस तरह नहीं समझा जा सकता कि हर व्यक्ति हमेशा अपनी इच्छा को पूरी तरह समझता हो और हर समय उसे लेकर पूरी तरह निश्चित हो. लोग असमंजस में हो सकते हैं. वे अपना फैसला बदल सकते हैं. उन्होंने कहा, "मैं यह कह सकूं कि मुझे नहीं पता. मैं यह कह सकूं कि मैंने अपना मन बदल लिया." उनका मानना है कि ऐसी संस्कृति बनानी होगी जिसमें अपना फैसला बदलना किसी गलती या बड़ी समस्या की तरह न देखा जाए.

मेनन ने इस सोच को भी चुनौती दी कि सेक्स और यौन पहचान पूरी तरह निजी मामले हैं. जन्म से ही समाज किसी व्यक्ति का जेंडर तय करता है, उसके व्यवहार को लेकर उम्मीदें तय करता है और महिलाओं की पसंद पर नजर रखता है. उन्होंने ऑनलाइन बुरी तरह ट्रोल की गई एक महिला का उदाहरण दिया, जिसने इसके बाद अपने कपड़ों को लेकर दोबारा सोचना शुरू कर दिया. मेनन ने सवाल किया, "उसकी सहमति कहां है?" उनका मानना है कि अपनी पसंद और फैसले की आजादी हमारे आसपास के सामाजिक माहौल से भी तय होती है.

नियति शर्मा के मुताबिक इसकी शुरुआत बहुत छोटी उम्र से होनी चाहिए. बच्चों, माता-पिता और शिक्षकों के साथ अपने काम का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि सहमति को सिर्फ एक वर्कशॉप या अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में एक पाठ तक सीमित नहीं किया जा सकता. बच्चों के बड़े होने के साथ उन्हें अलग-अलग तरह की परिस्थितियों और ताकत के रिश्तों का सामना करना पड़ता है. इसलिए इस बारे में लगातार बात होती रहनी चाहिए. उनका कहना था, "ऐसा कोई एक पाठ नहीं है जिसके बाद कहा जाए कि अब तुम सब जान गए हो, घर जाओ और बात खत्म."

युवाओं के साथ अपने काम के अनुभव के दौरान शर्मा ने लड़के और लड़कियों के बीच सोच का एक बड़ा फर्क भी देखा है. कई लड़कियां यह समझते हुए बड़ी होती हैं कि लड़के और पुरुष अक्सर इसलिए नहीं पूछते क्योंकि उनके पास ताकत होती है. वहीं कई लड़के कहते हैं कि उन्होंने बस यही मान लिया था कि चीजें इसी तरह होती हैं, क्योंकि उन्हें कभी यह बताया ही नहीं गया कि वे पूछ भी सकते हैं.

डिजिटल दुनिया ने इस समस्या को और मुश्किल बना दिया है. ऑनलाइन गुमनाम रहने के कारण कई युवाओं को लगता है कि उनके ऑनलाइन किए गए कामों के कोई खास नतीजे नहीं होंगे. शर्मा का मानना था कि सहमति के बारे में सिर्फ सीमाएं बताने के बजाय सम्मान, दूसरे की भावनाओं को समझने और अच्छे व्यवहार के जरिए बात करनी चाहिए.

स्मिता भारती ने चर्चा को पूरे सामाजिक माहौल से जोड़ा. उनका कहना था कि सहमति "कभी अकेले नहीं होती." यह परिवार, दफ्तर, दोस्तों और समाज की उम्मीदों के बीच मौजूद होती है. लेकिन समाज ने बार-बार ऐसी जगहें बनाई हैं जहां 'न' को ठुकराए जाने, अपमान या मुश्किल पैदा करने वाली बात के तौर पर देखा जाता है.

पैनल ने महिलाओं पर डाली जाने वाली जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाया. कुमारी ने कहा कि लड़कियों को अक्सर झुकना और दूसरों की बात मानना सिखाया जाता है, जबकि लड़कों को यह एहसास दिलाया जाता है कि उनका हक ज्यादा है. लेकिन वर्तमान में उन्हें उम्मीद की एक नई किरण भी दिखाई देती है. नई पीढ़ी अब पुरानी सोच को चुनौती दे रही है और पूछ रही है कि "मैं ही क्यों? वह क्यों नहीं?"

वक्ताओं ने माना कि इसकी शुरुआत घर से ही होती है. दर्शकों में से एक व्यक्ति ने पूछा कि लड़कों को 'न' कहना कौन सिखाएगा. कुमारी का जवाब साफ था, "माता-पिता के अलावा और कौन?" हालांकि पैनल ने यह भी कहा कि सहमति की शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर डाल देना ठीक नहीं होगा. बच्चे बड़ों की बात सुनकर जितना सीखते हैं, उतना ही उनके रिश्तों और व्यवहार को देखकर भी सीखते हैं.

आखिर में चर्चा अपनी पसंद और फैसले की आजादी पर लौट आई. महिलाओं को यह समझना जरूरी है कि उन्हें अपनी पसंद के मुताबिक फैसला लेने का अधिकार है लेकिन यह आजादी ऐसे माहौल में पूरी तरह काम नहीं कर सकती जहां डर, निर्भरता और बराबरी की कमी हो. कुमारी के मुताबिक आसपास के पूरे माहौल को बदलना होगा, ताकि महिलाएं बिना किसी डर के अपनी पसंद और फैसले का इस्तेमाल कर सकें.

भारती ने शायद इस पूरी चर्चा को सबसे आसान तरीके से समझाया. उनका कहना था, "अगर 'न' को ठुकराना माना जाएगा तो सीमाएं मिटती जाएंगी. अगर 'न' को जानकारी माना जाएगा तो सीमाओं का सम्मान होगा."

इसलिए चुनौती सिर्फ लोगों को 'न' कहना सिखाने की ही नहीं है बल्कि चुनौती ऐसे परिवार, दफ्तर और संस्थान बनाने की है जहां किसी के 'न' को समझाने, नरम करने या डर के साथ कहने की जरूरत न हो. जहां दूसरे व्यक्ति की सीमा को ठीक उसी रूप में समझा जाए जैसी वह है: उस व्यक्ति की अपनी सीमा.

इसलिए असली चुनौती लोगों को 'न' कहना सिखाने से भी बड़ी है. चुनौती ऐसे परिवार, दफ्तर और संस्थान बनाने की है जहां किसी 'न' के लिए सफाई न देनी पड़े, उसे मीठा न बनाना पड़े और न ही उससे डरना पड़े. और जहां किसी दूसरे इंसान की सीमा को ठीक वैसा ही समझा जाए जैसी वह है: उसकी अपनी तय की हुई.

मुख्य बातें

रंजना कुमारी

"सहमति दरअसल खुद पर अपना अधिकार है. यह अपनी पसंद और फैसले की आजादी है."   

"अपने शरीर पर आपका नियंत्रण है."

"महिलाओं को समझना होगा कि उनके पास अपनी पसंद और फैसले लेने की ताकत है. यह सबसे जरूरी बात है."

प्रो. माधवी मेनन

"मैं यह कह सकूं कि मुझे नहीं पता. मैं यह कह सकूं कि मैंने अपना मन बदल लिया."

''हमेशा पूरी तरह निश्चित और अपनी हर इच्छा को जानने वाले व्यक्ति के तौर पर सहमति को समझना सही नहीं है.''

"सेक्स और जेंडर को पूरी तरह निजी मानने की सोच ही बहुत सारी समस्याओं की वजह है."

नियति शर्मा

"ऐसी कोई एक सीख नहीं है जिसके बाद कहा जाए कि अब तुम सब जान गए हो, घर जाओ और बात खत्म."

"सहमति हर परिस्थिति के हिसाब से बदल सकती है. इसलिए इस बारे में लगातार बातचीत होनी चाहिए."

"बच्चे हमारी बातों से जितना सीखते हैं, उतना ही हमें देखकर भी सीखते हैं."

स्मिता भारती

"सहमति कभी अकेले नहीं होती. यह किसी खाली जगह में नहीं दी जाती."

"हमने ऐसी जगहें नहीं बनाई हैं जहां 'न' को स्वीकार किया जा सके."

"अगर 'न' को ठुकराना माना जाएगा तो सीमाएं मिटती जाएंगी. अगर 'न' को जानकारी माना जाएगा तो सीमाओं का सम्मान होगा."

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